निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ११५
अभ्राणि । उपरता आपः-इति वा । तेषामेषा
भवति ॥ ४ ॥
अर्थ ।
क्योंकि 'अहन्' शब्द रात्रि और दिन दोनोंका ही वाचक है,
इससे सन्देहका स्थान है । इसका विभाग इस ऋचामें विशेषणके
भेदसे दिखाया है ।
'भारद्वाजस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । पृष्ठस्य षष्ठे
अहनि आग्निमारुते शस्त्रे शस्यते ।'
काला दिन (रात्रि) सुपेद दिन (दिन) दोनों बदलते रहते
हैं-रात्रि बीतो दिन आया, दिन बीता रात आई । दोनों प्राणियोंकी
अनन्त प्रवृत्तियोंसे (अथवा ज्योति (प्रकाश) से दिन, और अँधेरेसे
रात्रि ।) “रजसी” रञ्जक या प्रीतिके देनेवाले है । “वैश्वानर”
अग्नि “जायमान” उदय होते हुए ज्योतियोंके राजा सूर्यके समान
अपने “ज्योतिष्” प्रकाशसे “तमांसि” अँधेरोंको “अवातिरत्”
'अवाहन्' दूर करता है ।
व्याख्या ।
इस ऋचामें एक ही 'अहन्' शब्द 'कृष्ण' विशेषण लगानेसे
रात्रिका और अर्जुन (शुक्ल) विशेषण लगानेसे दिनका वाचक
होता है । इसी रीतिसे सन्देहके स्थानमे विशेषण आदिके सम्बन्ध-
से शब्दका विशेष अर्थ निर्णीत करना चाहिये ।
वेदितव्या । 'विदित' नाम जानी हुई वस्तुओंका कदाचित्
अन्त हो सकता है, किन्तु जो वेदितव्या या अभी नहीं जानी गई हैं
किन्तु जानने योग्य है (जानी जावेंगी) उनका अन्त नहीं हो