निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । २३
बताना चाहिये, पहिले पूर्व पूर्व पदोंका निर्वचन होकर पर पदोंका
निर्वचन होगा या इससे उलटा ? इस प्रश्नका स्पष्ट अर्थ यह है कि-
( १ ) तद्धित युक्त पदोंमें क्या पहिले, पूर्व पदके अर्थका निर्वचन
होगा ? या तद्धितके अर्थका ?
( २ ) ऐसे ही समास युक्त पदोंमें पहिले पदोंके अर्थका निर्वचन
होगा ? या समासके अर्थका ?
तद्धित और समास ।
“तद्धिताः” ( पा०-४, १, ७६ ) इस सूत्रके अधिकारमें जो प्रत्यय
विधान किये गये हैं, वे तद्धित कहाते हैं । तथा “समर्थः पदविधिः”
( पा०-२, १, १ ) या “प्राक्कडारात्समासः” ( पा० २, १, ३ )
सूत्रके अधिकारमें जो संस्कार या वृत्ति विधान की गई हैं, वे
समास हैं ।
इन दोनोंमें ही समान नियम हैं, चाहे वे एक पर्व ( एक पद )
या अनेक पर्व ( अनेक पद ) हों, उनमें पहिलेको पहिले, और
पिछलेको पीछे निर्वचन करना । अर्थात् तद्धित युक्तपदमें पहिले
तद्धितार्थका निर्वचन करे और पीछे पदार्थका । एवम्, समास
युक्त पदोंमें पहिले समासार्थका निर्वचन करे, और पीछे पदार्थोंका ।
“दाण्ड्यः”—यह एक तद्धित है,और “वाष्र्ण्यायणिः” यह अनेक
पद । क्योंकि यह अपने आत्मामें अनेक पदोंको लय किये हुए है ।
जैसे “वृषस्यापत्यं-वार्ष्यः” वृषका अपत्य या सन्तान वार्ष्य, और
‘वार्ष्यस्यापत्यं = वाष्र्ण्यायणः’ वार्ष्यका सन्तान वाष्र्ण्यायण, तथा-
‘वाष्र्ण्यायणस्य अपत्यं वाष्र्ण्यायणिः’ वाष्र्ण्यायणका अपत्य वाष्र्ण्यायणि
होता है ।
ऐसे ही एक शेष, एक पद समास होता है, जिसको विधान
“सरूपाणामेकशेष एक विभक्तौ” ( पा०-१, २, ६४ ) सूत्रसे होता
है, जैसे कि -“पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषौ” दो पुरुष शब्दोंमेंसे एक