निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ २ अ० १ पा० ४ खं० ।
शब्दका लोप और एक शेष रहनेसे 'पुरुषौ' बनता है। 'पुरुषश्च
पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषाः' यहां तीन पुरुष शब्दोंमेंसे एक पुरुष शब्द-
का शेष और दोके लोप होनेसे 'पुरुषाः' पद बनता है।
^१ द्विगु, द्वन्द्व, अव्ययी भाव, कर्मधारय, बहुव्रीहि और तत्पुरुष ये
छः समास अनेक पद हैं।
पाणिनीयसूत्र—"संख्या पूर्वीद्विगुः” ( पा० २, १, ५२) उदा-
हरण—पञ्चमूली पञ्चरथी, दशरथी–इत्यादि।
सूत्र—"चार्थे द्वन्द्वः” ( पा० २, १, २६) यह विकल्पसे एकके
समान होता है वहां एक वचन और अन्य स्थलमें पदार्थोंकी
संख्याके अधीन द्विवचन तथा बहु वचन होता है।
उदाहरण—'प्लक्षन्यग्रोधौ' पिलखन-बट । 'अहिनकुलम्' साँप-
न्योला । 'भीमार्जुनवासुदेवाः' भीम-अर्जुन-वासुदेव । इत्यादि ।
'उपसर्ग निपात पूर्वकोऽव्ययीभावः' उदाहरण—
'उपमणिकम्' मणिकके समीप । 'अनुसमुद्रम्' समुद्रके
सदृश्य । 'व्यभ्रम्' मेघोंका अभाव । इत्यादि । इनमें उपसर्ग या
निपात ही पूर्व पद होते हैं।
'तुल्यलिङ्ग विभक्ति कयो रुभयोः पदयोः समा-
नाधिकरणः कर्मधारयः'
जिन दो पदोंके लिङ्ग और विभक्ति समान हों, उनके समाना-
धिकरण या एकार्थ पर समासको कर्मधारय कहते हैं।
जैसे—'कृष्णमृगः' काला मृग। 'रक्ताश्व' लाल घोड़ा।
श्वेत पताका इत्यादि निर्वचनमें क्रमके जाननेके लिये उदाहरण ।
१—"द्विगु द्वन्द्वोऽव्ययी भावः कर्मधारयएवच ।
पञ्चमस्तु बहुव्रीहिः षष्ठस्तत्पुरुषः स्मृतः ॥”