निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ २ अ० १ पा० २-३ खं० ।
उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था ।
'त्रि' (त्-र्-इ) में र्
और इ का लोप होने
पर त्, ऋचके ऋसे
मिल जाता है। व्याक-
रणमें यह सप्रसारणके
द्वारा होता है। उसीका
यह स्पष्टीकरण है।
(७) आदि विपर्यय । ज्योतिः । घनः । विन्दुः । वाट्यः । द्युत्
दीप्तौ धातुके द् का ज्
बननेसे ज्योतिः सिद्ध
होता है। हन् हिंसा-
गत्योः इस धातुसे
'घनः,' 'भिदिर्' 'बदा-
रणे' (रु० उ०) धातुसे
'विन्दुः' और 'भट' भृ-
तौ (भ्वा० प०) धातुसे
'वाट्यः' बनता है।
(८) आद्यन्तविपर्यय । स्तोकाः । रज्जुः । सिकताः । तर्कु ।
'श्रु च्तिर' क्षरणे (भू०
प०) धातुके आदि तथा
अन्त दोनों अक्षरोंका
परिवर्त्तन होनेसे 'स्तोक'
शब्द बनता है। ऐसे-
'सृज' विसर्गे (-दि०
आ० तु० प०) धातुसे