निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था ।
'रज्जुः,' 'कस' विक्र-
सने धातुसे 'सिकता'
और 'कृती' छेदने (तु०
प०) धातुसे तर्क
शब्द बनता है।
(६) अन्तव्यापत्ति-(क) ओघः । 'वह' (भू० उ०) प्रापण,
अन्त 'ह्' का घ् ।
(ख) मोघः । 'मिह' (भू० प०) सेचने,
अन्त 'ह्' का घ् ।
(ग) नाधः । णह (दि० प०) बन्धने,
अन्त ह् का ध् ।
(घ) गाधः । गाहू (भू० आ०) विलोडने
अन्त ह का ध् ।
(ङ) वधूः । वह (भू० उ०) प्रापणे,
अन्त ह् का ध् ।
(च) मधु । मद (चु० आ०) तृप्तौ
अन्त द् का ध् ।
(१०) वर्णोपजन । (क) आस्थत् । 'असु' (दि० प०) क्षेपणे,
[वर्णकी उत्पत्ति या आगम] थ् का आगम ।
(ख) द्वारः । वृङ् (क्र्या० आ०) संभक्तौ,
द् का आगम ।
(ग) भरूज । भ्रस्ज (तु० उ०) पाके,
ऊ का आगम ।
इस उपर्युक्त प्रकारसे लक्षण-प्रधान (जिसमें लक्षणहीकी प्रभा-
नता है, किन्तु अर्थकी नहीं) व्याकरण शास्त्रमें भी शब्दोंमें अर्थके
अनुसार लोप, आगम तथा विपरिणाम देखा गया है, फिर अर्थ-