निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १३
उपाङ्गका नाम । उदाहरण । व्यवस्था ।
'आ' से और 'लृ', 'ई' से
बदलता है । दीर्घ होते ही
अन्त न्'का लोप होजाता है ।
२-*
( ५ ) वर्णलोपः । तत्त्वायामि । यह वैदिक उदाहरण है,
यहां 'याचामि'का 'यामि'
रह गया है । 'चा'का लोप
होता है । लोकमें इसके
स्थानमें याञ्चे'पद बनता है ।
( ६ ) द्विवर्णलोप तृचः । 'त्रि-ऋच्' दो शब्दोंसे
'तृच्' बनता है । यहां
२—तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमान स्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः ।
अहेळमानो वरुणेह बोध्युरु शंसमान आयुः प्रमोषीः ॥ [ ऋ० सं०
१, २, १५, १ । ]
*—इस त्रिष्टुप् छन्दसे उपाकरण किये हुए शुनःशेप (ऋषि-
पुत्र ) ने वरुणकी स्तुति की है। इस ऋचासे साग्निक ऋतुओंमें
समिष्ट यजुःके उत्तरकालमें आज्य ( घृत ) की आहुति होती है ।
और चातुर्मास्योंमें वरुणप्रघासमें यह वरुण देवताके हविष्की
याज्या है ।
हे वरुण ! तुझसे मैं वेदसे स्तुति करता हुआ, याचना करता
हूं, और जिस वस्तुको मैं मांगता हूं, उसीको यह यजमान भी तेरे
लिये संस्कृत हविषोंको प्रस्तुत किये हुए तुझसे मांगता है । सो
तू क्रोध न करता हुआ ( क्योंकि-जिससे कुछ मांगा जाता है, वह
क्रोध करता है ) जान, या चेत कर । हे बहुस्तुत्य ! वरुण ! और
चेत करके हम दोनोंके वाञ्छितको पूरा कर, कि—हमारी आयुको
नष्ट मत कर, अर्थात् हमारे अभिप्रायको सिद्ध कर ।