निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ २ अ० १ पा० २-३ खं० ।
व्याख्या—( खं० २, ३ । )
उपायका नाम । उदाहरण । व्यवस्था ।
( १ ) आदिलोप । स्तः । सन्ति । यह दोनों प्रयोग 'अस्'
धातुके होते हैं। इनमें
धातुके आदि 'अ'का लोप
हो जाता है। जहां वृद्धि या
गुण नहीं हो सकता ।
( २ ) अन्तलोप । गत्वा । गतम् । यह दोनों शब्द 'गम्' धातु-
से बनते हैं, इनमें गम्के
अन्त 'म्'का लोप होता है ।
( ३ ) उपधालोप । जग्मतुः । जग्मुः । यहां दोनो स्थानोंमें 'गम्'
धातुके 'ग्-अ-म्'मेंसे 'अ'
का लोप होता है । अन्त-
से पहिले अक्षरको उपधा
कहते है ।
( ४ ) उपधा विकार¹ । राजा । दण्डी । इन दोनोंमें उपधा 'अ' तथा
'इ' को दीर्घ होता है ।
राजन् ( र्-आ-ज्-अ-न् )
दण्डिन् ( द्-अ ण् ड्-इ-न् )
पहिलेमें 'अ' और दूसरेमें
'इ' उपधा है । यहां 'अ'
१—विकारका प्रयोजन यह है कि-एक अक्षरके बदलेमें दूसरा
अक्षर हो जाना, जैसे—'अ' का 'आ' और 'इ' का 'ई' । लोपमें
वह अक्षर उठ जाता है, किन्तु उसके बदलेमें और अक्षर नहीं आता ।