निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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भी करेंगे। यह संमोह तुम्हारी मतिको घुमाता है। इससे 'मन्त्र
अर्थवान् हैं" यह सिद्ध हुआ । और इससे यह शास्त्र भी मन्त्रोंके
अर्थ के जनानेके लिये सार्थक हो हैं, इससे शास्त्रका आरम्भ भी
सिद्ध हुआ । इस कारण वहां तुमने यह कहा कि—‘यदि मन्त्रार्थ-
के जाननेके लिये यह शास्त्र आरम्भ किया जाता है तो अनर्थक
है' यह अयुक्त है ।
इस रीतिसे वादीके हेतुओंका निराकरण हो जाने पर अपने
पक्षकी सिद्धिमें हेतु उठे और मन्त्रगणकी सार्थकता तथा उसके
लिये इस शास्त्रको प्रयोजनवत्ता सिद्ध हुई ।
॥ समाप्तः पञ्चमः पादः ॥
षष्ठः पाद ।
(खं० १ )
अथापि इमन्तरेण पदविभागो न विद्यते ।
“अवसाय पद्वते रुद्र मृल”-इति । पद्वत् अवसं
गावः पथ्यदनम् । अते र्गत्यर्थस्य असौ नाम करणः ।
तस्मात् न अवगृह्णन्ति । “अवसायाश्वान्”-
इति । स्यतिः उपसृष्टः विमोचने, तस्मात् अव-
गृह्णान्ति । ‘दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” इति ।
पञ्चम्यर्थ प्रेक्षा वा षष्ठ्यर्थप्रेक्षा वा, आः कारा-
न्तम् । “परो निर्ऋत्या आचष्ट्व”-इति । चतुर्थ्यर्थ
प्रेक्षा, ऐकारान्तम् । “परः संनिकर्षः संहिता” ।
पद प्रकृतिः संहिता । पद प्रकृतीनि सर्वचरणानां