निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० अ० १ पा० ६ ख० १ ।
पार्षदानि । अथापि यज्ञेदैवतेन बहवः प्रदेशा
भवन्ति । तत् एतेन उपेक्षितव्यम् । ते चेद् ब्रूयु
'लिङ्गज्ञा अत्र स्मः' इति । "इन्द्रं न त्वा शवसा
देवता वायुम्पृणन्ति" – इति । वायुलिङ्गञ्च इन्द्र-
लिङ्गञ्च आग्नेये मन्त्रे । "अग्निरिव मन्यो त्विषितः
सहस्वः"-इति । तथा अग्निर्मान्यवे मन्त्रे त्विषितः-
ज्वलितः । 'त्विषिः'-इत्यपि-अस्य दीप्तिर्नाम भव-
ति । अथापि ज्ञान प्रशंसा भवति, अज्ञान
निन्दा च ॥ १ ॥
अनुवाद ।
और भी इस ( निरुक्त ) के बिना पद विभाग ( पाठ ) नहीं
है, या हो सकता है । [ ज से– ] "अवसायं पद्धते रुद्र मृळः"
[ ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ] हे रुद्र ! पैरवाले अवस या अन्नके लिये
सुखरूप हो । पद्धत् = पैरवाला, अवस = खाद्य, गोरूप, –जो पाथेय
या पथिभोजन है । गत्यर्थक 'अव' धातुसे यह ( अवस ) नाम
बनता है । इससे इसमें अवग्रह नहीं करते । "अवसायाश्वान्"
[ १, ७, १८, १ ] हे इन्द्र! घोड़ोंको [ रथसे ] अलग करके । यहां
'षो' ( सा ) अन्तर्कमणि, धातु 'अव' उपसर्गके साथ विमोचन
या छोड़ देने अर्थ में है । इससे यहां 'अव' और 'सा' का विभाग
दिखानेके लिये अवग्रह या रुककर पाठ करते हैं । "दूतो निर्ऋत्या"...
[ ऋ० सं० ८, ८, २३, १ ] हे देवगण ! निर्ऋतिका या निर्ऋति
से ( कपोत ) दूत इस ( घरमें ) आया । यहां [ निर्ऋत्याः पदमें ]
पञ्चमीके अर्थका ग्रहण अथवा षष्ठीके अर्थका ग्रहण होता है।