निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें-अयुक्त है, क्योंकि—मन्त्रोंमें सब उपपन्न होता है। तिससे 'मन्त्र
अर्थवन् हैं' यह सिद्ध हुआ ।
७—फिर यह कहा कि—मन्त्रोंमें बहुत ऐसे शब्द हैं जिनका
कुछ अर्थ स्पष्ट नहीं होता, जैसे अम्यक् इत्यादि। यह भी ठीक
नहीं। क्योंकि—"यह स्थाणु (खूँठ) का अपराध नहीं कि उसे
अन्धा न देखे" "किन्तु वह पुरुषका अपराध है" अर्थात् पुरुषका
ही वह अपराध है कि—वह नेत्ररहित है। इसी प्रकार यहां भी
मन्त्रोंका कोई अपराध नहीं है, कि—आप अशिक्षित होनेसे अर्थोंको
न जाने। किन्तु वह आपका अपराध है, हे सज्जन ! आप सब अपने
अपराधोंको मन्त्रोंमें अथवा हमारेमें लगाना चाहते हो' वास्तवमें
तुम्हें कुछ प्रज्ञा नहीं है।
जिस प्रकार लौकिक शिल्पकलादिकोंमें कोई पुरुष शिक्षित
होकर अन्य पुरुषोंकी अपेक्षा उन क्रियाओंमें वह विशेष हो जाता
है, उसी प्रकार यहां पर भी मन्त्रार्थकी शिक्षासे कोई पुरुष अन्य
पुरुषोंसे विशेष हो जाता है। ऐसी स्थितिमें कोई पुरुष स्पष्ट
मन्त्रोंका भी निर्वचन नहीं कर सकते और कोई गूढ़ मन्त्रोंके भी
अर्थोंको स्पष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। यही बात "उतत्वः”
(ऋ० सं० ८, २, २३, ४) इस ऋचामें कही गई है।
इसी प्रकार वेद-शास्त्रके आद्यन्तके जाननेवाले ब्राह्मण जो कि—
साक्षात्कृतधर्मा नहीं हैं, उनमें जो अधिक विद्वान् होता है, वही
श्रेष्ठ होता है। जो ब्राह्मण मन्त्रोंके अर्थोंका विज्ञाता होता है, वही
प्रशंसनीय होता है किन्तु अन्य जो मन्दबुद्धि एवम् अशिक्षित पुरुष
नहीं। क्योंकि—बहुश्रुत पुरुष अनेक विषयोंवाले मन्त्रार्थमें कहीं
भी रुकता नहीं, उसको कोई अर्थ भी गुप्त नहीं है। इस कारण हे
कौत्स ! तुम विस्तारसे सुनो ! उससे तुम मन्त्रार्थोंको जानोगे।
जैसाकि—तुमने पहिले कहा है कि—'मन्त्र अविस्पष्टार्थ हैं"
वे अविस्पष्टार्थ नहीं हैं, और उनको स्पष्ट करके हम व्याख्यान