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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 136

कि—“विप्रतिषिद्धार्थ होनेसे मन्त्र अनर्थक हैं” यह तुम्हारा कहना
ठीक नहीं है, क्योंकि 'ये मन्त्र विप्रतिषिद्धार्थ नहीं हैं, किन्तु मन्द
शिक्षाके कारण तुम्हारी बुद्धिका ही यह दोष है, इसलिये “मन्त्र
अर्थवान् हैं”।
जानते हुएकी प्रेरणाका प्रश्न भी अयुक्त है, क्योंकि लौकिक
अर्थवाले शब्दोंमें भी यही स्वभाव देखा गया है। जानते हुए गुरुको
अभिवादन करते हुए शिष्य अपना गोत्र कहते हैं, तथा जानते
हुए वर आदिको मधुपर्क देता हुआ तीनवार “मधुपर्को मधुपर्को
मधुपर्कः” ऐसा कहता है। इस तरह जैसे अर्थवान् शब्दोंमें भी
विहित अर्थके प्रकाश करनेके लिये शब्द प्रयोग होता है, वैसे ही
वेदमें भी “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” इत्यादि मन्त्र जानते
हुए भी होता आदिके लिये कहे जाते हैं। इसलिये मन्त्र अर्थ-
वान् हैं।
६—जोकि—“अदितिः सर्वम्” इसमें यह आक्षेप किया कि—
विभिन्न वस्तुओंको एक वस्तुमें देखना मन्त्रोंकी अनर्थकताको सिद्ध
करता है। यह भी ठीक नहीं है। क्योकि—शब्दकी प्रवृत्ति दो
प्रकारकी होती है, एक मुख्यार्थ और दूसरी गौणी। इससे यह
स्वारस्य निकला कि—जहां मुख्य अर्थ असम्भव हो वहां गौण
अर्थ स्वीकार करना। जैसे किसीने किसीके बहुत उपकार किये
हैं और वह उस उपकारीसे कहे कि—'तू ही मेरी माता और तू ही
पिता है' उसी प्रकार इसको भी देखना चाहिए। जिस प्रकार
लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी देखा गया है कि—“जिसे पानी मिल
गया उसे सभी रस प्राप्त हो गये” उसी प्रकार यहां भी अदितिकी
सर्वरूपता किसी तरह कही गई है। इससे जोकि—तुमसे यह
कहा कि—'मन्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध बहुत कुछ कहा हुआ है? यह
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