निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५१५ ) १२अ० ३पा० १०खं०
'यमः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति—॥ ९ (२८) ॥
अर्थः-“पुनरेहि वृषाकपे०” इस ऋचा का वृषाकपि
ऋषि है, और पृष्ठ्य के षष्ठ (छठे) अहन् में ब्राह्मणाच्छंसी के
शस्त्र में विनियुक्त है ।
'वृषाकपे !' हे वृषाकपि देव ! “यः एषः त्वं स्वप्न-
नंशनः ( स्वप्नान् नाशयति उदयेन आदित्यः )
अस्तम् एषि पथा” जो यह तू अपने उदय से लोगों के
स्वप्नों का नाश करने वाला ( निद्रा का भङ्ग करने वाला )
आदित्य अपने मार्ग से अस्त को प्राप्त होता है । “ ( यश्च
त्वं ) विश्वस्मात् ( सर्वस्मात् ) इन्द्रः उत्तरः ” और
जो तू सब से ऊंचा या बड़ा है, ( सः त्वम् ) सो तू “पुनः
एहि” फिर आ-उदय को प्राप्त हो । “सुविता, (सुप्र-
सूतानि वः कर्माणि) कल्पयावहै” फिर हम दोनों
तुम्हारे प्रवृत्त हुये शुभ कर्मों को साधें (करें) (.तम् एतद् ब्रूमः
आदित्यम् ) उस आदित्य को हम यह कहते हैं ॥
‘यम ’ ( १७ ) शब्द व्याख्यान किया जा चुका है
[ १०, २, ६ ] ।
“तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है-॥ ६(२८) ॥
[ खं० १० ]
निरु०-“यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते