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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

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DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1275

हिन्दी निरुक्त ( ५१४ ) १२अ० ३पा० ६ खं०
आदित्य अपने अधिकार युक्त कर्मों से विश्व को देखता है,
या लोक को अपने २ कर्मों से युक्त देखता है। क्योंकि—
रात्रिमें सब लोक सोया हुआ रहता है, और जब दिन होता
है, तो सब प्राणी अपने २ कर्म में लग जाते हैं। “एकस्य
( मध्यमस्य ) भ्राजिः ( गतिः ) दहशे [दृश्यते]
न रूपम्” और एक मध्यम ( वायु ) की गति उठी हुई
धूलिसे या जलसे देखी जाती है, किन्तु रूप (आकृति) नहीं।
“अथ रश्मिभिः” और जब आदित्य अपनी रश्मिओं
से भूतों को कंपाता हुआ आता है, तब 'वृषाकपि' ( १६ )
होता है । क्योंकि-अवश्यायों ( ओसों ) का वर्षिता (बरसाने
वाला ) है और भूतों का कम्पन ( कंपाने वाला ) है [ क्यों
कि-जब भगवान् सूर्य तेज दिखाई नहीं देते, तब सब लोक
भय से डरने लगता है ] इससे 'वृषाकपि' है ।
“तस्य०” उस ( वृषाकपि ) की यह ऋचा है—॥८(२७)॥
( खं० ६ )
निरु०-“पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनार्विश्वस्मा-
दिन्द्र उत्तरः ॥” [ ऋ०सं० ८, ४, ४, ६ ] ॥
पुनः एहि वृषाकपे ! सुप्रसूतानि वः कर्माणि
कल्पयावहै, यः एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान् नाश-
यति आदित्यः उदयेन, सः अस्तम् एषि पथा,
पुनः, सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः
आदित्यम् ।