निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५१ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं०
प्रभवा वा । ऋजुगामिनी वा । ‘विपाट्’ विपाट-
नाद् वा । विप्राशनाद् वा । विप्रापणाद् वा ।
पाशाः अस्यां न्यपाश्यन्त वसिष्ठस्य मुमूर्षतः तस्माद्
‘विपाट्’ उच्यते । पूर्वम्- आसीद् ‘उरुञ्जिरा’ ।
‘सुषोमा’ = सिन्धुः । यद्- एनाम्- अभिप्रसु-
वन्ति नद्यः ॥
‘सिन्धुः’ स्यन्दनात् ॥
‘आपः’ आप्नोतेः ।
तासाम्- एषा भवति ॥ ५ (२६) ॥
अर्थः—“इमं मे०” हे मरुद्वृधे । = मरुतों से बढाई
जाने वाली ! गङ्गे ! (१) हे ‘यमुने !’ (२) हे ‘सरस्वति !’ [३]
हे ‘शुतुद्रि !’ (४) हे ‘परुष्णि !’ (५) (यूयम्) तुम सब ‘मे’ मेरे
‘इमं’ ‘स्तोमम्’ इस स्तोत्र को ‘आ-सचत’ (आसेवध्वम्) सेवन
करो = उस पर ध्यान दो । हे ‘ मरुद्वृधे ! ’, ‘आर्जीकीये !’
(६) [त्वमपि] तूभी ‘असिक्न्या-’ (७) ( सह ) असिक्नी के
साथ ‘वितस्तया’ (८) (चसह)और वितस्ता के सहित ‘सुषोम-
या’(च)और सुषोमा नदी के सहित ‘आ-शृणुहि’ इधर ध्यान
देकर मेरे स्तोत्र को सुन ॥ यह समस्त (मिलित) अर्थ है ।
अब एक पद निरुक्त है-
‘गङ्गा’ क्यों ? गमन से- गति अर्थ में ‘गम’ ( भ्वा०प०)
धातु से है। क्यों कि- वह गमन करती है- चलती है।
अथवा प्राणियों को उत्तम लोक को लेजाती है (१) ।
‘यमुना’ क्यों? प्रप्रथन करती हुई जाती है- अपने जलों