निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५२ ) ६ अ ० ३ पा ० ५ खं ०
को और नदियों से मिलाती हुई चलती है।अथवा 'प्रवियुत'
होकर चलती है-अपने तरङ्गो से स्थिर हुई जैसी चलती है
[यह भाव त्रिवेणी संगमपर प्रयाग में देखा जासकता है] (२)।
'सरस्वती क्या ?'सरस्' यह जल का नाम है।'सृ' (जु०प०)
धातु से है। तद्वती = सरस्वती = सरस्वाली होने से 'सरस्वती
है वह विशेष प्रकार के जल वाली होने से 'सरस्वती' है।
क्यो कि- राजसूय यज्ञ में सारस्वती जलो का अभिषेक के
अर्थवाद (कथन) में देखा जाता है- “वरुणस्य वा अभि-
षिच्यमानस्येन्द्रियं वीर्य्य मपाक्रामत्, तत् त्रेधा-
भवत, भृगुस्तृतीयमभवत्, श्रायन्तीयं सरस्वती
तृतीयं प्राविशत्” अर्थात्- अभिषेक किये जाते हुयेवरुण
का इन्द्रिय वीर्य्य निकला,वह तीन भागोंमें हुआ, एकतृतीयंश
भृगु हुआ , एक आयन्तीय और एक तृतीय भाग सरस्वती
होकर प्रविष्ट हुआ । प्रयोजन यह कि- इसमें जो वरुण देव
के वीर्य का तेज है, वही इसमें विशेष धर्म है,उसी के कारण
यह'सरस्वती' है ( ३ )।
'शुतुद्री' क्यों ? 'शुद्राविणी' सो क्या ? शीघ्र बहने वाली
'शु' यह शीघ्र का नाम है। अथवा 'आशुतुन्ना इव द्रवति'
शीघ्र तुन्न = किसी से वेधी हुई जैसी बहती है। 'आशु'
से 'शु', 'तुन्ना' से 'तु' और 'द्रवति' से 'द्रु' लेकर 'शुतुद्री'
शब्द बना ( ४ )।
इरावती को 'परुष्णी' इस नाम से कहते हैं। वह
'परुष्णी'क्यों? पर्ववती = ग्रन्थि वाली होने से । क्याहुआ?
वह कुटिलगामिनी है- टेढी मेढी चलती है, उसमें उसके