नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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शक्तिसम्पन्नता पर। अतएव शक्तिसम्पन्न रहने के लिए उपयुक्त आहार का
(प्रयत्नपूर्वक) सेवन करना चाहिए।
अशुद्धकायं प्रक्लान्तमतीव क्षुत्पिपासितम् ॥ ९९ ॥
अतिपीतं तथा भुक्तं व्यायामं नैव कारयेत्।
जब शरीर स्वच्छ न हो, (शरीर) थका हुआ हो, भूख (या) प्यास
लग रही हो, पानी (काफी) पी लिया हो (या) डटकर भोजन कर
लिया हो तो उस समय चारी व्यायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
अचलैर्मधुरैरङ्गैश्चतुरश्रेण वक्षसा ॥ १०० ॥
व्यायामं कारयेद्धीमान्नरमङ्गाक्रियार्थिनम्।
योग्य शिक्षक अपने ऐसे शिक्षार्थियों को—जिनका शरीर सुन्दर, स्थिर
हो वक्षस्थल चौखट जैसा विशाल हो—अधिक अलंकारों को धारण न किये
हो—व्यायाम की शिक्षा दें ॥ १००-१०१ ॥
एवं व्यायामसंयोगे कार्यश्चारीकृतो विधिः ॥ १०१ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मण्डलानां विकल्पनम् ॥ १०२ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे चारीविधानो नामैकादशोऽध्यायः।
शरीर के व्यायाम के साथ होनेवाली प्रदर्शन के इन चारी के ये (ही)
नियम हैं। तदनुसार चारी का प्रदर्शन करना चाहिए। अब मैं विभिन्न
मण्डलों का (अगले अध्याय में) वर्णन करूँगा ॥ १०१-१०२ ॥
भरत नाट्यशास्त्र का चारीविधान नामक एकादशोऽध्याय समाप्त।
१. क्रियात्मकम्—ख० ग०। २. चारीविधानो नाम दशमोऽध्यायः—क०।