नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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नहीं करना चाहिए तथा स्वयं भी श्रीहरि को समर्पित प्रसादादि अन्न को किसी
अवैष्णवजन को प्रदान नहीं करना चाहिए॥३९॥
ये त्ववैष्णवभर्त्तव्या ये चावैष्णवभर्तृकाः ।
एकान्त्यस्योपघातेन न तैः कर्माप्यनापदि ॥४०॥
आपत्ति की स्थिति को छोड़कर यदि जिनका पालन किया जा रहा हो ऐसे पुत्र, स्त्री
आदि के वैष्णव न रहने या जो पालन करनेवाले पिता माता आदि भी वैष्णव न हों
तो अनैकान्ती भाव के उपघात हो जाने से इनसे भी कार्य तथा सम्बन्ध को दूर रखे
और आपत्काल में इसे पालनयोग्य न समझे॥४०॥
त्यक्ताचारस्त्यक्तदृष्टिस्त्यक्तार्थस्त्यक्तलक्षणः ।
त्यक्ताचार्यस्त्यक्तमन्त्रः प्रत्येकं प्रच्युतो नरः ॥४१॥
अब प्रच्युत का स्वरूप बतलाते हैं कि जो वैष्णवानुमत वृत्ति के आचारों को पालन न
करता हो, जिसने दृष्टि (नामक अवयव) का ध्यान न रखा हो, जो वैष्णवार्थ में
भक्ति आदि का सम्यक् ज्ञान न रखता हो तथा जो ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि धारण के भगवत्
चिन्हों का परित्याग करता हो तो उसे 'प्रच्युत' समझना चाहिए, जो कि अपने
मन्त्रादिकों के प्रदाता गुरु तथा उनके दिये गए मन्त्रों का भी परित्याग कर देता
हो॥४१॥
पातकेन कुदृष्ट्यान्त्यभजनेनान्यलक्षणैः ।
अवैष्णवोपसत्यान्यमन्त्रेणाऽपि च्यवन्ति वै ॥४२॥
विहित आचार के विरुद्ध आचरण के पातक से, दृष्टि विरुद्ध अन्य देवता के भजन
तथा भक्ति करने से, अन्य लक्ष्म के धारण करने से तथा अवैष्णवजन की संगति के
कारण सत्सेवा न करने से और अन्य देवता के मन्त्र को लेने के कारणों में प्रत्येक की
स्थिति में वह पतित या 'प्रच्युत' हो जाता है॥४२॥
यो दिव्यशास्त्रमन्त्रेषु कुरुते त्ववधीरणाम् ।
तथान्यशास्त्रमन्त्रेषु प्रसक्तिं न स वैष्णवः ॥४३॥
जो पञ्चरात्रागमादि प्रोक्त दिव्यशास्त्रीय मन्त्र तथा इन शास्त्रों के मन्त्रों की
अवधीरणा करे तथा अन्य शास्त्रों के प्रति श्रद्धा या आसक्ति रखने लगे तो वह
'वैष्णव' नहीं माना जाता है॥४३॥
सर्वैश्च लक्षणैर्युक्तो नियतश्च स्वकर्मसु ।
यस्तु भागवतान् द्वेष्टि सुदूरं प्रच्युतो हि सः ॥४४॥
और जो पूर्व में दिखलाये गये सभी लक्षणों से युक्त हो, अपने कर्म तथा आचार में जो
निष्ठा रखता हो किन्तु जो भागवतजन से द्वेष करनेवाला या उनका तिरस्कार
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करनेवाला हो तो उसे भी 'प्रच्युत' ही समझना चाहिए॥४४॥
अपि चेत् सेवनपरो न चेत्तापादिसंस्कृतः ।
अनर्चार्हतया विष्णोर्दास्यात् प्रच्यवते ध्रुवम् ॥४५॥
और यदि भागवतजन की सेवा में रत होकर भी जो तापादि चक्रांकित रूप से
संस्कार प्राप्त न किया हुआ हो तो उसे श्रीनारायण की अर्चना करने का अधिकार
न मिलने से वह भी निश्चितरूप से श्रीविष्णु के दास्यभाव से पतित हो जाता है
(श्रीविष्णु की भक्ति का अधिकारी भी नहीं रह पाता है)॥४५॥
यस्तु प्राप्य गुरोर्विद्यां नार्चयेत् पुरुषोत्तमम् ।
प्रणमेदन्यदेवाय न स भागवतः स्मृतः ॥४६॥
जो उत्तम आचार्य से विद्या की शिक्षा तथा मन्त्रादि की दीक्षा प्राप्त करने पर भी
श्री पुरुषोत्तम की अर्चना (नित्य) नहीं करे और अन्य देवताओं की प्रणामादि
अर्चना करता हो तो वह भी भांगवतजन या वैष्णव नहीं है॥४६॥
ये नात्मानमनात्मानं विद्याविद्ये फलाफले ।
उपास्यमनुपास्यञ्च वेत्ति भागवतो न सः ॥४७॥
जो आत्मा तथा अनात्मा का, विद्या और अविद्या का, फल और फल विरोधी अफल
का तथा इष्ट एवं उपास्य देव तथा अनुपास्य देवता का भेद न समझता हो तो उसे
भी भागवतजन या वैष्णव नहीं समझना चाहिए॥४७॥
देवतानाञ्च याथात्म्यं कैङ्कर्यस्य हरेरपि ।
अविदित्वाऽऽचरन् कर्म विहीनां गतिमश्नुते ॥४८॥
जो अग्नि तथा इन्द्र आदि देवगण का भगवद् देह भाव तथा श्रीहरि के किंङ्करभाव
को न जानकर कर्म, वर्ण तथा आश्रम में अपने नियतकर्मों का आचरण करते हुए न रहे
तो वह भी प्रच्युत है तथा उसे भी सद्गति प्राप्त नहीं होती है॥४८॥
देवर्षिभूतात्मतया त्यजन् केवलमेव वा ।
विष्णुं तत्तत्फलाकाङ्क्षी पारमैकान्त्यतश्च्यवेत् ॥४९॥
और जो देव तथा ऋषियों के यजनादि कर्मों को नियत विधि से सम्पन्न करते हुए
तथा उनमें केवल विष्णु का अर्चन कर उससे कार्य के फल की इच्छा रखे तो वह भी
परमैकान्त्य-भाव से च्युत (होता) है॥४९॥
तेषां न परिशुद्धानि योनिविद्याञ्च कर्म वा ।
ये विष्णुचरणैकान्त्यविहीना ब्राह्मणादयः ॥५०॥
जिनको श्रीविष्णु के चरणों से एकान्त्य प्राप्त नहीं है वे ब्राह्मणादि वर्ण की योनि
(वर्ण या जाति में) उत्पत्ति विद्या तथा कर्मों को परिशुद्ध नहीं माना जाता
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है॥५०॥
मरणं जन्मने यस्य मरणायैव केवलम् ।
तेषां भगवदैकान्त्यविमुखा ये नराधमाः ॥५१॥
और जो भगवच्चरणों से विमुख एकान्त्य रहित ब्राह्मणादि वर्ण है उनका जन्म
केवल मरण के लिये होता है तथा मरण भी केवल मरण के लिये होता है तथा मरण
भी केवल पुनर्जन्म के लिये होता है और बाद में ये भी मनुष्यों में हीन स्थिति के ही
रखनेवाले बन जाते हैं (तथा ये मोक्ष से वंचित हो जाते हैं)॥५१॥
न विद्या केवलार्थाय नाचारो नार्चनं हरेः ।
न चक्राद्यङ्कदेहत्वं विना भागवतार्चनम् ॥५२॥
श्रीहरि के अर्चन का कार्य न करने पर उनकी प्राप्त की गयी विद्या भी व्यर्थ है,
उनकी आचारनिष्ठता तथा चक्रादि का शरीर पर धारण करना भी बिना श्रीहरि
के अर्चन के साथ भागवतजन की सत्सेवारूप अर्चन भी निरर्थक होता है॥५२॥
न प्रपत्तेः परा विद्या न विष्णोर्देवतं परम् ।
न तद्दास्यात् परा सिद्धिर्न गुरुर्वैष्णवात् परः ॥५३॥
क्योंकि श्रीहरि की प्रपत्ति के 'न्यास-योग' से श्रेष्ठ कोई विद्या नहीं है तथा श्रीविष्णु
से उत्तम कोई अन्य देवता नहीं। उनकी दास्यता प्राप्ति से उत्तम कोई सिद्धि नहीं
होती तथा वैष्णवजन से उत्तम दूसरा कोई आचार्य या गुरु भी नहीं
होता॥५३॥
नित्यमच्युतभक्तानां कुर्यात् पादावनेजनम् ।
नम्रः समुपभुञ्जीत सर्वपातकनाशनम् ॥५४॥
अतएव जो श्रीविष्णु के परमभक्तजन वैष्णव हों तो उनके नित्य पाद प्रक्षालन करना
चाहिए तथा ऐसे चरणतीर्थ जल का विनम्रभाव से सेवन करना सभी पातकों का
विनाश करनेवाला होता है॥५४॥
वैष्णवस्याङ्कशय्यायां वैष्णवस्य गृहेऽपि वा ।
देशे वा तद्विचरिते संस्थिता यान्ति सद्गतिम् ॥५५॥
यदि किसी वैष्णव की गोद में अन्तिम समय मस्तक रखकर या किसी वैष्णव के गृह
में अथवा श्रीवैष्णव के द्वारा संचालित भूमि या स्थान पर स्थित रहकर यदि प्राण
निकले तो उसकी सद्गति हो जाती है॥५५॥
यत्र क्वाप्यथवा देशे वैष्णवो म्रियते यदा ।
तदा तत्राशु सान्निध्यं करोति वृषभध्वजः ॥५६॥
और वैष्णव भक्त जहाँ कहीं भी स्थित रहकर अपना प्राण छोड़ता है तो उन सभी
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स्थानों पर श्रीगरुड़ध्वज विष्णु उसके समीप आकर उसको करुणावश विष्णुलोक में
ले जाते हैं॥५६॥
न जन्मनो नाध्ययनान् न यज्ञान्न तपःश्रमात् ।
न त्यागादश्नुते ब्रह्म गुरूपसदनं विना ॥५७॥
उपदेष्टा आचार्य की सेवा का आश्रय ही मुख्य है। अतः इसके बिना यदि ब्राह्मणादि
उत्तमवर्ण में जन्म हो जाने से या वेदादि शास्त्रों के अध्ययन सम्पन्न हो जाने से,
यज्ञादि अनुष्ठानों के कराने से तथा विरक्तिभाव से इन्द्रियादि के विषयों का त्याग
करने से भी ब्रह्म की प्राप्ति (मोक्ष की प्राप्ति) नहीं हो सकती॥५७॥
देहकृन्मन्त्रविन्न स्यान्मन्त्री संस्कारकृत् परः ।
तौ च नात्मविदौ स्यातामन्यस्त्वात्मविदात्कृत् ॥५८॥
यदि जन्म प्रदान करनेवाला पिता ही मन्त्र का प्रदाता भी हो जाए ऐसी कभी
स्थिति नहीं हो पाती है क्योंकि जो मन्त्रवेत्ता विद्वान है वही उपनयन आदि संस्कार
का सम्पादन करनेवाला आचार्य नहीं हो पाता है और पिता तथा सँस्कार और
मन्त्र का संपादन करनेवाला आचार्यरूप में रहकर भी ये ब्रह्म या आत्मतत्व के
विद्वान् नहीं हो पाते। अतः यदि ब्रह्मवेत्ता पिता ही मन्त्रवेत्ता हो तो वहीं संस्कार का
सम्पादन करनेवाला आचार्य भी होना उचित है॥५८॥
न चक्राद्यङ्कनं नेज्या न ज्ञानं न विरागता ।
न मन्त्रः पारमैकान्त्यं तैर्युक्ता गुरुवश्यता ॥५९॥
केवल चक्रादि का शरीर पर अंकन मात्र और न ही इष्ट के प्रति उपपादित यज्ञादि,
न केवल दृष्टि या ज्ञान तथा न ही वैराग्य भाव, न दीक्षा में प्राप्त मन्त्र ही
'पारमैकान्त्यम्' होता है। किन्तु इन सभी के साथ अपने मन्त्रादि उपदेष्टा आचार्य
(गुरु) के अधीन रहकर भगवदाराधना कर्म ही 'पारमैकान्त्य' होता
है॥५९॥
विद्या विभूषणं पुंसस्तस्या वृत्तं विभूषणम् ।
विष्णुभक्तिर्विभूषाऽस्य सा चक्राद्यङ्कभूषणा ॥६०॥
पुरुष की विद्या के अर्जन से प्राप्त दृष्टि अलंकार या भूषण होती है और विद्या से
विहित वृत्त या आचार विभूषण होता है। इस वृत्त का विभूषण श्रीनारायण की
भक्ति है तथा इसका विभूषण शरीर पर श्रीविष्णु के चक्रादि का अंकन (कार्य)
होता है॥६०॥
ध्यानेन मन्त्रयोगेन पूजनेनाङ्कनेन च ।
तोषयन्ति जगन्नाथं वासुदेवं युगक्रमात् ॥६१॥
१०० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
आराधकजन अपने इष्ट श्रीहरि को अपने ध्यानयोग के द्वारा मन्त्र के जपस्म
अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः युगों में तुष्ट करते हैं। (इनमें कृतयुग में ध्यान, त्रेतायुग
मन्त्र योग, द्वापर में पूजन तथा कलियुग में चक्राद्यंकन कार्य नारायण की प्रसन्नता
अतिशय आपादक है। यह तत्व दिखलाया गया) ॥६१॥
अष्टमात् षोडशाद्वाद्वा धार्यं चक्रादिभूषणम् ।
प्रतप्तैरङ्कनं पश्चात् सदा वा भूषणं स्त्रियः ॥६२॥
आठ वर्ष की आयु से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक का काल विहित रहने से इसने
चक्रादि पञ्च आयुध के भूषण का धारण किया जा सकता है। (जो ब्राह्मण के
उपनयनकाल का आरम्भ तथा गौण उपनयन का अन्तिम अवधि का काल है) इन
मुहूर्त में प्रतप्त चक्रादि से अंकन किया जावे, अथवा स्त्रीजन के लिये भी इनका सद
धारण या भूषणरूप में इनका धारण भी अभीष्ट (होता) है॥६२॥
शिष्यपुत्रकलत्राणां भृत्यानाञ्च गवामपि ।
कुर्यादचेतनानाञ्च वैष्णवं नाम लक्ष्म च ॥६३॥
इसके अतिरिक्त अपने शिष्य, पुत्र, भार्या तथा अपने सेवकजन का तथा अपने द्वारा
संगृहीत पशु में गौ आदि का तथा अचेतनभूत स्वगृह तथा अन्य पदार्थों का नाम भी
श्रीविष्णु से सम्बन्ध रखना चाहिए तथा इनमें चेतन जीवों के शरीर पर चक्रादि क
अंकन भी करवाना चाहिए॥६३॥
आमा ह्यतप्ततनवस्तप्ताङ्गाः हरिलाञ्छनैः ।
सुभृता भोग्यतां प्राप्य भुज्यन्ते परमात्मना ॥६४॥
जो शरीर तप्तचक्र से अंकित नहीं किये गये वे अपक्व या पापों को दग्ध न
करनेवाले होते हैं तथा श्रीहरि के चिन्ह चक्रादि से तप्ताङ्ग होने पर उनके सभी
पातक दग्ध हो जाने से परमात्मा श्रीहरि के द्वारा भोगयोग्य होकर उनके द्वारा
उपभोग के योग्य बन जाते हैं॥६४॥
ऊर्ध्वपुण्ड्रान्तरालस्थाँश्चक्रादीन् धारयेत् सदा ।
बहिष्कृता ह्यतिक्रुद्धाः पदात् प्रच्यावयन्ति ते ॥६५॥
इसलिये शरीर पर उचित प्रदेशों पर चक्रादि चिन्ह तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र को सदा धारण
करना चाहिए (चक्रादि चिन्ह से अंकित या ऊर्ध्वपुण्ड्रादि पूर्व निर्दिष्ट स्थानों प
धारण करते हैं)। यदि इन चक्रादि तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण कर इन्हें उपेक्षित
करेंगे तो वे उन्हें अपने स्थान से गिरा देंगे॥६५॥
प्रातर्माध्यन्दिने सायमूर्द्धपुण्ड्रेण केशव ।
अकृतैर्वापि सुकृतैस्तैस्तैः प्रीणाति कर्मभिः ॥६६॥
हिन्दीटीकासहित १०१
यदि प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सायंकाल त्रिसन्ध्य वेला में ऊर्ध्वपुण्ड्र ही शरीर पर
धारण किया जाए (और अन्य नित्यादि कर्मों के अनुष्ठान में कमी भी आ जाए)
तो भी श्रीनारायण की प्रीति रहने से ऐसे प्रत्यवाय की शान्ति शीघ्र हो जाती है।।६६।।
प्रभाते दिव्यलोकस्थं मध्याह्ने चार्कमध्यगम् ।
तोषयन्त्यूर्ध्वपुण्ड्रेण सायं स्वात्मगतं हरिम् ॥६७॥
यदि प्रभातकालमें ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे तो दिव्यलोक स्थित श्रीनारायण की
मध्याह्नकाल में आदित्य में स्थित नारायण की तथा सायंकाल आत्मस्थ नारायण
की प्रसन्नता प्राप्त होती है।।६७।।
सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति दर्शनादेव लक्ष्मभिः ।
त्यजन्त्यन्ये तदुभयं मुख्यमैकान्त्यकारणम् ॥६८॥
वैष्णव सन्त चक्रादि चिन्हों को देखने मात्र से उन्हें आत्मीय समझ कर उन पर
अनुग्रह करते हैं तथा जो असन्त या अवैष्णवजन हैं वे इन वैष्णव चिन्हों को देखते ही
उनसे दूर हट जाते हैं। ये दोनों ही एकान्त्य भाव में कारणभूत होते हैं अतः लक्ष्म
(चिन्ह) तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण आवश्यक है।।६८।।
क्रमाप्तभगवन्मन्त्रः कल्पविच्छुद्धमानसः ।
धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्रादिलाञ्छितो हरिमर्चयेत् ॥६९॥
सम्प्रदाय (के क्रम) के अनुसार दीक्षित होकर भगवन्मन्त्र को प्राप्त कर मन्त्र तथा
भगवतस्समाराधन के विधान को जानकर ऊर्ध्वपुण्ड्र को धारण कर चक्रादि लक्ष्म से
युक्त रहकर वैष्णव श्रीनारायण की अर्चना करे।।६९।।
यथापूर्वाकृतिन्नित्यान् मुक्ताँश्चैव यथागमम् ।
यथावतारदेहञ्च पूजयेद्धरिमिच्छया ॥७०॥
श्रीहरि का अर्चन पञ्चरात्र आगम के अनुगत यथावत् आकृति में युक्त तथा
नित्यरूपवाले अवतार के अनुरूप देहादि विग्रह वाले श्री हरि की ध्यानादि के पश्चात्
अपनी इच्छा के अनुरूप विधिवत् अर्चना करे।।७०।।
अवैष्णवाद्द्वैष्णवाद्वा चेतनं वाप्यचेतनम् ।
यदवाप्तं समस्तं तद्विष्णवे विनिवेदयेत् ॥७१॥
वैष्णव अथवा अवैष्णव से प्राप्त होनेवाली चेतना चेतनात्मक भाव की जो भी
सामग्री प्राप्त हो उस सभी को श्रीनारायण को अर्पित कर उन्हें निवेदित
करे।।७१।।
वासः स्रग्गन्धभूषादि भक्ष्यभोज्यादिकं तथा ।
न किञ्चिदुपभोक्तव्यमनिवेद्य श्रियः पतेः ॥७२॥
१०२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
यह सामग्री वस्त्र, पुष्पादि की मालाएं, गन्ध, धूप, भूषणादि तथा भक्ष्य
भोज्यादिरूप में होती है अतः प्राप्त ऐसी सभी सामग्री को श्रीनारायण को बिन
निवेदित या अर्पित किये उनका उपभोग या ग्रहण नहीं करन
चाहिए।।७२।।
वेदवेदाङ्गतत्वज्ञो वेदान्तपरिनिष्ठितः ।
मीमांसान्याय-निपुणो धर्मशास्त्रविशारदः ॥७३॥
इतिहासपुराणज्ञः पञ्चरात्रार्थतत्ववित् ।
परं भगवदैकान्त्यं ज्ञात्वा धर्मं समाचरेत् ॥७४॥
अतएव वेद तथा वेदाङ्गों के तत्वों का पूर्ण ज्ञान करनेवाला, वेदान्तादि शास्त्रों में
पारंगत, मीमांसा तथा न्याय शास्त्रों में निपुण विद्वान्, धर्मशास्त्रादि का पूर्णज्ञाता,
इतिहास तथा पुराणों का अनुशीलन किया हुआ तथा पांचरात्र आदि वैष्णवागमों के
तत्वों का विशेषज्ञान रखनेवाला विद्वान् नारायण की अनन्यता को समझ कर
स्वधर्म का पालन करे।।७३-७४।।
सर्वसंस्कारसंस्कारो ज्ञानं भागवतं परम् ।
तत्संस्कृता हि संस्काराः कल्पन्ते मुक्तिहेतवः ॥७५॥
भगवद्विषयक ज्ञान परमोत्तम है क्योंकि वही सभी वर्णाश्रमनियत संस्कारों का
अतिशय आपादक संस्कार होता है तथा अतिशय संस्कृत रूप के कारण (यह ज्ञान
संस्कृत संस्कार) मुक्ति में कारणभूत हो जाते हैं। (इसलिए भगवद्विषयक ज्ञान ही
सर्व संस्कारभूत है)।।७५।।
परमात्मा हरिः स्वामी स्वतोऽहं तस्य किङ्करः ।
कैङ्कर्यमखिला वृत्तिरित्येष ज्ञानसङ्ग्रहः ॥७६॥
भागवत ज्ञान को यदि संग्रह रूप में देखें तो यह है कि समस्त आत्माओं के
अन्तरात्मास्वरूप परमात्मा हरि ही स्वामी हैं तथा अहंवृत्तिवेद्य प्रत्यगात्मरूप में
स्वयं इन हरि का दासभूत किंकर मैं हूं तथा मेरे सभी वृत्तिभूत व्यापार कैंकर्यभूत हैं
यही इसका संग्राहक संग्रह है।।७६।।
नित्यमर्चाजपध्यानस्नानदानव्रतादिकम् ।
विशुद्धमेव कर्तव्यमनन्यैर्न विमिश्रितम् ॥७७॥
(वृत्ति के विहिताचारों में) नित्य ही इष्टदेव श्रीहरि की अर्चना करना, निष्ठा मन्त्र
का नित्यजप, उनका ही स्मरणरूप ध्यान धरना, नित्य स्नान, दान तथा एकादश
आदि साम्प्रदायिक व्रत उपवास आदि रखना, ये सभी अर्चादि तत्व तथ
एकान्तीभाव से विशुद्धरूप में करना चाहिए। अर्थात् अन्य देवगण की अर्चनादि
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साथ इन्हें मिलाकर नहीं करना चाहिए॥७७॥
सद् ब्रह्म वासुदेवाद्यैर्विविक्तैर्यत्र नामभिः ।
प्रोच्यते भगवान् विष्णुस्तद्विशुद्धमुदाहृतम् ॥७८॥
जिस कर्म में केवल श्रीहरि के वाचक सद्ब्रह्म वासुदेवादि नामों से भगवान् श्रीहरि
अभिहित होते हैं, वही कर्म विशुद्ध तथा जहाँ साक्षात् भगवद्देवता विषयक केवल
कर्म हो वह भी विशुद्ध है॥७८॥
यत्राविविक्तैः शब्दैस्तु प्रोच्यते पुरुषोत्तमः ।
देवादीनामशुद्धानां व्यामिश्रं तत् प्रचक्षते ॥७९॥
तथा जहाँ सद्ब्रह्मादि से भिन्न देवादि शब्दों से परमेश्वर को अभिहित किया जाता
है तो ऐसा अर्चनादि कर्म 'मिश्र' (व्यामिश्र) होता है॥७९॥
दुर्निमित्तमये पापे ग्रहादीनां विपर्यये ।
विष्णुतद्भक्तपूजाभिः शान्तिं कुर्वीत् नान्यथा ॥८०॥
दुर्निमित्तादि से युक्त भयोत्पादक किसी पातक के कारण या सूर्य, शनि आदि के
जन्मादि से द्वादशादि स्थान में आने से अनिष्टकारक योग रहने के कारण या आ
जाने पर उन्हें श्री विष्णु तथा उनके परिवारभूत देवादि की पूजनादि अनुष्ठानों
(विष्णुपूजा के पारम्परिक परमादि रूपों से तथा उपशान्तिरूप परिवारभूत
अनुष्ठानों) के द्वारा इसकी शान्ति की जाए। अन्यथारूप में केवल ग्रहयज्ञादि के
द्वारा इस शान्ति को नहीं करें॥८०॥
प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैर्विशेषेण जनार्दनम् ।
आराधयेन्निमित्तेषु वैष्णवाँश्च विशेषतः ॥८१॥
वैष्णवोत्सवादि निमित्तों के अवसर पर श्रेष्ठ तथा प्रियभाव के रूप में स्वेष्ट गन्ध,
पुष्प, धूप, दीप, सूप तथा अपूपादि पदार्थों से विशेषतः परमेश नारायण की
आराधना की जाए तथा विशेष रूप में वैष्णवजन की भी प्रसन्नतापादक आराधना
प्रसादादि के प्रदानरूप में रखी जाए॥८१॥
कुर्वन्ति वैष्णवार्थाय स्वधर्माणाञ्च सिद्धये ।
शान्तिकर्म हरेः केचित् प्रपत्तिं केवलं हरेः ॥८२॥
ग्रहादि शान्ति के हेतु कुछ वैष्णव लोग श्रीविष्णु के उद्देश से तथा अपने साम्प्रदायिक
धर्मों की सिद्धि के लिये श्रीहरि की पूजनादि के अनुष्ठान से शान्तिकर्म करते हैं तथा
अन्य केवल (दुर्निमित्त तथा ग्रहादि के भय के प्राप्त होने पर) श्रीहरि की प्रपत्ति या
शरण का ही कार्य करते हैं (जो शान्ति आदि कर्मों में असमर्थ या अधिकारी नहीं
होते हैं)॥८२॥
१०४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
यास्तत्र तत्र श्रूयन्ते पुंसां काम्यतया श्रुतौ ।
ताः किलैकान्तिना दिव्या भगवद्भोगसम्पदः ॥८३॥
वेदादि में जो जो क्रियाएं पुरुषों के लिये काम्यरूप में बतलाई गयी है एकान्ती
वैष्णव विद्या से विशुद्ध ऐसी दिव्य क्रियाओं को श्रीनारायण की अभिमत या
प्रियरूप में भगवदाराधनरूप किंकरभाव से सम्पन्न होकर सम्पादन
करे॥८३॥
आरम्भे कर्मणां सिद्धयै विघ्नानां प्रशमाय च ।
कुर्यात् सपरिवारस्य विष्वक्सेनस्य पूजनम् ॥८४॥
इन क्रियाओं के आरम्भ में कर्म की सिद्धि के लिये तथा विघ्नों की शान्ति के लिए
विष्वक्-सेन श्रीविष्णु का परिवार सहित पारम्परिक अर्चन करना
चाहिए॥८४॥
स्वल्पापि हन्ति भूयांसं स्वधर्मं निन्दिता क्रिया ।
दृष्टिं कुदृष्टिर्भक्तिन्तु देवतान्तरसम्भवः ॥८५॥
थोड़ी भी इष्टादि की निन्दा से युक्त किया बड़े से बड़े धार्मिक अर्चनादि के
अनुष्ठानों का विघात कर देती है तथा अश्रद्धा या कुदृष्टि अपने इष्ट की गौण
दृष्टि का तथा ऐसी भक्ति अन्य देवता को उपासना का आश्रय ग्रहण करती
है॥८५॥
सत्सेवनमसत्सेवा लक्षणं चान्यलक्ष्माता ।
तस्माद् विरुद्धान्येकान्ती विशेषेण विवर्जयेत् ॥८६॥
और जैसे असत् सेवा सत्सेवा का विघात करती है इसी तरह अन्य देवताओं के
चिन्हभूत (तिलकादि का) धारणरूप लक्ष्म से अपना लक्ष्य विनष्ट हो जाता है
अतः विरुद्ध कार्यभूत ऐसे लक्ष्मादि का धारण अनन्य या एकान्ती वैष्णव को नहीं
रखना चाहिए॥८६॥
एकस्यापि हि धर्मस्य विनाशे च विरोधिभिः ।
अनन्वयापचारेण नश्यत्येकान्तिवृत्तिता ॥८७॥
एक भी विहिताचारावि संपन्न धर्म की विरोधी भूत निन्दित क्रियाओं के अनुष्ठान
से नष्ट हो जाने पर धर्म के न करने पर दोष से एकांती वृत्ति का विनाश हो जात
है॥८७॥
परमैकान्तिनां धर्मः कृते पूर्णः प्रवर्तते ।
क्षीयमाणः क्रमेणायं कलौ स्यास्यन्ति वा न वा ॥८८॥
परमैकान्तितारूप धर्म कृतयुग में पूर्णरूप में स्थित रहेगा तथा युगादि क्रम में क्रमशः
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क्षीण होते हुए यही परमैकान्तिता धर्म कलियुग आने पर स्थित रहेगा अथवा नहीं
(अर्थात् कलियुग में यह नैष्ठिक धर्म विरलरूप में हो जाएगा) ॥८८॥
नानाकामह्तज्ञाना नानादैवतयाजिनः ।
नरा भगवदैकान्त्ये न स्थास्यन्ति कलौ युगे ॥८९॥
अनेक कामना या अभिलाषाओं को रखने से जिनकी बुद्धि नष्ट हो गयी हो, ऐसे
लोग जो अनेक देवगण का इष्ट रखते हुए उनकी पूजा करनेवाले होते हैं वे मनुष्य
कलियुग में भगवदेकान्त्य कि परमैकान्त्यभाव में स्थित नहीं रहेंगे॥८९॥
परं भागवतं वर्त्म दृष्ट्वापि कलिमोहिताः ।
प्रभवन्ति न विद्वांसस्त्यक्तुं पूर्वान्धवर्त्मनीम् ॥९०॥
कलियुग के प्रभाव से मोह को प्राप्त ऐसे मनुष्य परमश्रेष्ठ भागवत मार्ग को जानने
वाले एवं विद्वान् होकर भी वे अपने पूर्वजों के द्वारा अनुसृत एवं रूढ़ मार्ग को छोड़ने में
समर्थ नहीं होंगे॥९०॥
भविष्यन्ति कलौ केचित् क्वचिदेकान्तिनो हरेः ।
मोहयिष्यन्ति च परे कुतकैँस्तान् कुदृष्टयः ॥९१॥
अतएव कलियुग में श्रीनारायण के भक्तिभाव से एकान्ती-जन किसी स्थान पर कुछ
ही बचे होंगे। (अल्पमात्रा में ही प्राप्त होंगे) और उन्हें भी कुछ तार्किक या
हेतुवादी जन अपनी अपनी बुद्धि से किये गये कुतर्कों से भटका कर मोह में डाल देंगे
(भ्रान्त बना डालेंगे) ॥९१॥
निरीश्वराः कर्मफला निष्क्रिया ब्रह्मवादिनः ।
परावरविमूढाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे ॥९२॥
उस समय कलियुग में कर्मादि अनुष्ठान में लगे हुए तथा ईश्वर की भक्ति न
करनेवाले नास्तिकजन होंगे और कुछ ब्रह्मवादीजन क्रियादि-अनुष्ठान से हीन
(राहुमीमांसक) होंगे तथा कुछ पर (श्रेष्ठ) तथा अपर (हीन) ज्ञान से रहित
होंगे॥९२॥
क्षीणायुर्ज्ञानशक्तित्वान्मनुष्याणां कलौ युगे ।
विद्यानां परमा विद्या न्यास एव परायणम् ॥९३॥
कलियुग में जब पुरुषों की आयु क्षयशील या अल्पायु रहने से बहुकाल साध्य उपाय
करने में अशक्त होने तथा ज्ञानशक्ति के भी क्षीण या अल्प रहने के कारण उस समय
विद्याओं में उत्तम विद्या कहलाने वाला केवल 'न्यासयोग' ही उनके लिये उपयुक्त
उपायभूत (सहायक) होगा (अन्य दूसरा कोई नहीं) ॥९३॥
१०६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
कर्म ज्ञानञ्च भक्तिश्च साधनानि मनीषिणाम् ।
न्यास एवाचिरात् सिद्धिं वाञ्छतां सर्वदेहिनाम् ॥९४॥
ज्ञानीजन के कर्म, ज्ञान तथा भक्तियोग ही साध्यभूत मोक्ष के साधन (द्वारभूत)
माने गये हैं परन्तु सभी शरीरधारी प्राणियों के लिये शीघ्र सिद्धि को देनेवाला
केवल एक 'न्यास-योग' ही है॥९४॥
ज्ञानानन्दमयो नित्यः शुद्धो देहान्तरं हरेः ।
जीवोऽयं संसरत्यस्य माययैव विमोहितः ॥९५॥
यह ज्ञान तथा आनन्दमय स्वरूपवाला जीव जो नित्य तथा शुद्ध श्रीहरि का दूसरा
शरीरभूत माना जाता है परन्तु यह उसी हरि की अधीन माया से विमोहित होकर
जन्म मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है ॥९५॥
अनीश्वरोऽहमीशोऽहमिति धीर्मायया हरेः ।
भवेत् सा संसृतेर्मूलं तं प्रपद्यैव तां त्यजेत् ॥९६॥
मेरा कोई ईश्वर नहीं अथवा मैं ईश से रहित या उसे न माननेवाला हूं अथवा मैं ही
ईश्वर हूँ ऐसी श्रीहरि की माया से विमोहित होने पर बुद्धि हो जाती है। यही बुद्धि
संसार का मूल है अतः श्रीहरि की प्रपत्ति का न्यासयोग धारण कर इस माया का
अन्त किया जाता है जिससे माया का त्याग (मोहनाश) संभव होता
है॥९६॥
ज्ञानानन्दमयोऽनन्तो दिव्यात्मगुणविग्रहः ।
नारायणो जगद्योनिः प्राप्यो लक्ष्मीपतिः स्वयम् ॥९७॥
इस प्रकार नारायण भगवान् जो ज्ञान तथा आनन्दमय रूपवाला है, जो दिव्य
आत्मा, गुण तथा शरीर वाला है जो संसार की सृष्टिका आधार है वही लक्ष्मीपति
स्वयं ही प्राप्य हो जाता है॥९७॥
आब्रह्मलोकाल्लोकानां यदैश्वर्यं न तद्ध्रुवम् ।
अथ नित्यं महत्साधु यद्दास्यं परमात्मनः ॥९८॥
(सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव के) ब्रह्मलोक से लेकर सभी सातों लोकों का जो ऐश्वर्य या
सम्पत्ति है वह सभी स्थिर रहनेवाली (शाश्वत) नहीं है। केवल जो नित्य, महान्
तथा उपयुक्त वस्तु है वह परमात्मा श्रीहरि की दास्यभाव में स्थिति ही
है॥९८॥
एवं-विधस्वधर्मेण युक्तस्यानन्यचेतसः ।
नित्यमाराधनं विष्णोर्यत् तद्दास्यमिहोच्यते ॥९९॥
अतएव इस प्रकार अपने नित्य तथा नियत दास्य धर्म में अवस्थित रहनेवाले तथा
हिन्दीटीकासहित १०७
एकान्ती (अनन्य चित्तवाले) का जो नित्य ही श्रीहरि की आराधना में रत (दास्य
भाव में स्थित) रहना है वही 'दास्य' या कैङ्कर्य भाव है॥९९॥
अनुज्ञाताः स्त्रियश्चैवमर्चयन्त्यो जगद्गुरुम् ।
यथार्हमपि शूद्राद्याः सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥१००॥
इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
भगवान् के आराधना कर्म दास्यभाव में स्थित होकर उनकी अर्चना करने में स्त्री
शूद्र आदि को भी आचार्यों ने मान्यता दी है।अतएव इस प्रपत्ति को उपयुक्त रूप में
प्रयुक्त या अनुष्ठित करनेवाले ये स्त्री शूद्रादि सभी जन परमगति मोक्ष को प्राप्त कर
लेते हैं॥१००॥
नारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः
नारदपञ्चरात्र में भारद्वाजसंहिता के परिशिष्ट के प्रथमाध्याय की
तत्वप्रकाशिका नामक हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण
१०८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
परिशिष्टे
अथ द्वितीयोऽध्यायः
उपासितगुरोर्वर्षं विष्णोर्दास्यमभीप्सतः ।
विहिताः पञ्च संस्कारा युक्तस्यैकान्त्यहेतवः ॥१॥
अथ परिशिष्टे द्वितीयोऽध्याय
श्रीनारायण के दास्यभाव की इच्छा रखनेवाला अधिकारी एक वर्ष तक पूर्ण निष्ठा
से अपने प्रपत्तिदाता आचार्य की सेवाशुश्रूषादि उपासना करे। तब शिष्य के गुणों के
उपयुक्त उसे एकान्तीभाव के कारणभूत पांच विहित संस्कार (जो बतलाये हैं उन्हें)
वह आचार्य सम्पन्न करवाए॥१॥
तापः पुण्ड्रं तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः ।
अमी हि पञ्च संस्काराः पारमैकान्त्यहेतवः ॥२॥
ये पांच संस्कार है-चक्रादि से संतप्त कर अंकन रूप ताप, ऊर्ध्व पुण्ड्र का धारण,
नाम-करण, मन्त्र-ग्रहण तथा पंचम है याग। ये पाच संस्कार गर्भाधानादि संस्कारों से
विशिष्ठ है तथा इनसे शीघ्र ही मोक्षप्राप्तिका आधार ऐकान्तीभाव प्राप्त होता
है॥२॥
तापयिष्यन् गुरुः शिष्यं चक्राद्यैर्हेतिभिर्हरेः ।
पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा स्नातं मन्त्रजलाप्लुतम् ॥३॥
ऋचा दक्षिणतः कुर्याद् वैष्णव्या बद्धकौतुकम् ।
ततः समर्चेयेद देवं स्वार्चायां स्थण्डिलेऽपि वा ॥४॥
सर्वप्रथम आचार्य किसी पवित्र तिथि को नियमपूर्वक स्नान कर फिर मन्त्रोचार पूर्वक
तीर्थादि पवित्र जल में स्नान किये हुए शिष्य को श्रीनारायण के चक्र आदि आयुधों
को अग्नि में तपाकर उन्हें वैष्णवी ऋचा 'विष्णोर्नु के वीर्याणि' (शुक्ल यजु०) का
उच्चारण कर शिष्य के दाहिने बाजू में स्थापित करे या बिठलावे। इस कार्य को
व्यवस्थित रूप में करने के पश्चात् अपने इष्टदेव की स्थापित स्थण्डित पर या किसी
बाह्यबिम्ब (प्रतिमा) में अर्चना करे॥३-४॥
पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण कृत्वाग्नेः स्थापनादिकम् ।
मूलमन्त्रेण हुत्वाज्यं ततः प्रत्यक्षरारुहुतीः ॥५॥
हिन्दीटीकासहित १०९
एकां पुनश्च सर्वेण पौरुषोभिश्श्च षोडश ।
हुत्वा त्रीन् विष्णुगायत्र्या वैष्णव्या चाथ हेतिभिः ॥६॥
तदनन्तर श्रीहरि से पश्चिमभाग में स्थण्डिलादि पर अग्नि की स्थापना आदि कर्म
सम्पन्न कर मूल मन्त्र के द्वारा आज्याहुति प्रदान कर फिर मन्त्र के प्रत्यक्षरों से
आहुति करे और फिर अष्टाक्षर मन्त्र से एक आहुति देकर पुरुषसूक्त के षोडश मन्त्रों
से सोलह आहुति देकर विष्णुगायत्री-'नारायणाय विद्महे' इत्यादि से तीन आहुति देवे
और श्रीविष्णु के आयुधभूत पांच मन्त्रों से आहुति देवे॥५-६॥
हविर्निवेद्य देवाय तच्छेषेण तथाहुतीः ।
अथोपसन्ने हैमानि ताम्राणि राजतानि वा ॥७॥
प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन मन्त्रतोयाप्लुतानि च ।
बिम्बानि पूर्वहेतीनां स्वभागनिहितानि वै ॥८॥
निधाय वह्नौ प्रत्येकं तत्रावाह्य स्वमन्त्रतः ।
अर्घ्यं पाद्यं तथाचम्यं गन्धं पुष्पञ्च धूपकम् ॥९॥
दीपञ्च दत्वाथाभ्यर्च्य प्रणम्याग्निसमप्रभम् ।
आचार्यः स्वयमादाय नियुक्तो वाऽथ मन्त्रवित् ॥१०॥
प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य न्यसेद् बाहौ च दक्षिणे ।
सुदर्शनं तथा वामे पाञ्चजन्यं स्वमन्त्रतः ॥११॥
इसके पश्चात् अर्चित इष्टदेव को शेष हवि अर्पित कर उसके शेष भाग से आज्याहुति
उसी विधिक्रम में प्रदान करे। इसके पश्चात् समीप में रखी हुई स्वर्ण निर्मित,
ताम्रनिर्मित या रजत निर्मित चक्रादि मुद्राओं को पञ्चगव्यसे प्रक्षालित करे और
मन्त्र पूर्वक जल से प्रक्षालित करे और फिर अग्नि में तपाकर प्रत्येक आयुधों का अपने
मन्त्रों से आवाहन कर उनकी पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्यादि से पूजन करे। इसके बाद शिष्य अपने अग्नि के समान तेजस्वी दीक्षादाता
आचार्य को प्रणाम करे। आचार्य उस तपाये हुए हेतिमुद्राभूत श्रीहरि के आयुध को
स्वयं लेकर या किसी मन्त्रवेत्ता को नियुक्त करे तो वही पूर्व दिशा में मुख रखे हुए
शिष्य के दक्षिणबाहु पर उस मुद्रा को रखकर अंकित करे। इनमें सुदर्शन चक्र को
दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर विहित मन्त्रों के साथ अंकित करे। (इनमें
सुदर्शन चक्र को दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर अंकित करना चाहिए।)
ये दोनों आयुध समान (ही) अंकित किये जाते हैं॥७-११॥
एवं गदां धनुः खड्गं ललाटे मूर्ध्नि वक्षसि ।
चक्रं वा शङ्खचक्रे वा धारयेत् सर्वमेव वा ॥१२॥
५
११० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
इसी क्रम में पाञ्चरात्रविधान के अनुरूप क्रमशः गदा, धनुष तथा खड्ग की हेति मुद्राओं
को ललाटप्रदेश, मूर्ध्वस्थान तथा वक्षःप्रदेश पर अपने अपने मन्त्रों के साथ अंकित
करे, इस विधि में भावनानुरूप केवल चक्र ही धारण किया जावे अथवा दोनों
बाजुओं में चक्र और शंख ही धारण करे या फिर पांचों आयुधों को अंकित किया
जाता है॥१२॥
तन्त्रं समाप्य देवेशं सहशिष्यः प्रदक्षिणम् ।
कृत्वा प्रणम्य सान्निध्यं प्रार्थ्य शेषं समापयेत् ॥१३॥
इसके पश्चात् होमविधानादि की शेष विधि उत्तरार्चनादि विधान के साथ पूर्ण कर
और अपने ही नवदीक्षित शिष्य के साथ इष्टदेव नारायण की प्रदक्षिणा कर
सान्निध्य की प्रार्थना कर क्षमायाचना के साथ इस यज्ञादि कार्य को सम्पन्न कर
समाप्त करे॥१३॥
कुर्यात् सर्वत्र कर्मान्ते द्विजैः पुण्याहवाचनम् ।
आचार्यस्यार्चनञ्चैव वासःस्रग्भूषणादिभिः ॥१४॥
सर्वमङ्गलसंयुक्तमिति चिह्नानि शार्ङ्गिणः ।
धारयित्वा यथोत्साहं वैष्णवानभितर्पयेत् ॥१५॥
वह इस कर्म के अन्त में सर्वत्र ब्राह्मणादि के द्वारा पुण्याहवाचन सम्पन्न करे और आचार्य
का वस्त्र, पुष्पमाला, भूषणादि से पूजन तथा सम्मान आदि करे॥१४॥
इस प्रकार श्रीविष्णु के आयुधरूप चिन्हों को सभी मांगलिक कर्म तथा भावना से
युक्त रहकर उत्साह के अनुरूप धारण करना चाहिए तथा शक्ति के अनुसार
वैष्णवजन को प्रसाद, भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिए॥१५॥
धारयिष्यंस्ततः शिष्यमूर्ध्वपुण्ड्रान् यथाविधि ।
पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा पूर्ववद्बद्धकौतुकम् ॥१६॥
उपवेश्याथ देवेशं भोगैर्दीपान्तमर्चयेत् ।
स्थण्डिलं कल्पयेत् पश्चात् पुरुषस्य प्रमाणतः ॥१७॥
इसके बाद आचार्य विधिवत् शिष्य को ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करवाते हुए आगे किसी
पुण्यपर्व या पवित्र उत्सवादि तिथि को उस नियमानुचारी शिष्य को (पूर्ववत्
पवित्र होकर) समीप बिठावें तथा अपने इष्टदेव श्रीहरि की विविध उपचारों से
दीपदान तक अर्चना करे। इसके उपरान्त यज्ञकर्ता पुरुष के हस्त के प्रमाणानुरूप
यथोचित् स्थण्डिल का निर्माण करें॥१६-१७॥
स्थानानि सैकतान्यत्र वर्णचूर्णमयानि वा ।
कुर्याद् द्वादश पूर्वादिचतुर्दिक्षु समान्तरम् ॥१८॥
हिन्दीटीकासहित १११
तथा मध्येऽस्य चत्वारि तेष्वभ्यर्चासनं पृथक् ।
केशवादींस्तंत्र तत्र वासुदेवादिकांस्तथा ॥१९॥
प्रत्येकञ्च यथारूपं ध्यात्वा नामभिरावहेत् ।
हरिरत्तैस्तथार्घ्याद्यैरर्चयेत तान्यथाक्रमम् ॥२०॥
इस स्थण्डिल पर बालुका (रेती) से या वर्णचूर्ण से पूर्व से लेकर बारह
ऊर्ध्वपुण्ड्रस्थानों को बनावे जिनमें परस्पर दूरी एक समान रखी जावे। इस स्थण्डिल
के मध्य चार स्थान रखे तथा इस प्रकार इन सोलह स्थानों का प्रथम गन्धादि से
अर्चन कर पृथक् आसनों पर केशवादि तथा वासुदेव आदि प्रत्येक का ध्यान कर
उनके नामोच्चारण से आवाहन करे तथा बीच में रखे गये चार स्थानों पर
वासुदेवादि चतुर्व्यूह का ध्यान कर उनका नामोच्चारण द्वारा आवाहन करे तथा
बाद में इन सभी का यथाक्षण क्रमशः अर्ध्यादि समर्पण कर अर्चन करे तथा अन्त में हवि
प्रस्तुत करे॥१८-२०॥
परीत्य सहशिष्येण सर्वांस्तान् प्रणिपत्य च ।
उपविश्याथ शिष्याय प्रणिपत्योपसीदते ॥२१॥
एषां नामानि रूपाणि यथावदुपदर्शयेत् ।
शिष्यो हृदि समावेश्य तान् सर्वान् क्रमयोगतः ॥२२॥
निर्घृष्य मृत्स्नां विधिवन्मूलमन्त्राभिमन्त्रिताम् ।
आदायाङ्गुलिभिर्दद्याल्ललाटाद्यूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥२३॥
इसके पश्चात् अर्चित कर इन सभी केशवादि देवगण की दीक्षितेच्छु शिष्य के साथ
प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे तथा उनके सम्मुख बैठ जावे। फिर देवता को प्रमाण
कर बैठे हुए समीपवर्ती शिष्य को केशवादि नाम तथा उनके स्वरूप या विग्रहरूप का
यथावत् परिचय वर्णनादि करे जिससे शिष्य के हृदय में इन देवों का ज्ञान हो जाए।
तब शिष्य उन सभी को विधिवत् क्रमशः तिलकोपयोगी गोपीचन्दनादि (श्वेत)
मृत्तिका को घिसकर मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित करते हुए ललाटादि स्थानों पर
अंगुलि के द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्रों को लगावे॥२१-२३॥
त्रयोदश द्वादश वा चतुरो चैकमेव वा ।
नमोन्तैर्नामभिर्ध्यात्वा स्थापयेत् तत्र तत्र च ॥२४॥
केशवादीन् द्वादशसु वासुदेवं त्रयोदशे ।
केशवं वासुदेवं वा ललाटे केवलं न्यसेत् ॥२५॥
व्यूहांश्चतुर्षु तान्नत्वा सदा सान्निध्यमर्थयेत् ।
अतो हि वैष्णवस्याङ्गं विष्णोरायतनं विदुः ॥२६॥
११२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
हविर्निवेद्य देवाय गुरुः शेषं समापयेत् ।
तत्र त्वाचार्यमभ्यर्च्य भोजयेद् वैष्णवानपि ॥२७॥
इनको त्रयोदश, द्वादश, चार अथवा एक ही संख्या में ऊर्ध्वपुण्ड्रों को अंत में नमः
कहकर (ध्यान कर) लगाना चाहिए। तथा बाद में अपने अपने स्थानों पर इनकी
स्थापना की जावे। यहां बारह ऊर्ध्वपुण्ड्रों पर केशव आदि देवों को स्थापित क
तथा यदि सभी देवों को एक ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया हो तो केशव को ललाट प
और वासुदेव को गले के प्रदेश में एक ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया जाता है, तथा च
ऊर्ध्वपुण्ड्र के लगाने के पक्ष में चारों ऊर्ध्वपुण्ड्रों को व्यूहों पर लगावे। इसके उपरा
उन सभी केशवादि को प्रणाम कर सदा सान्निध्य के लिये प्रार्थना करे। इसी कार
वैष्णव का शरीर श्रीविष्णु का निवास स्थान माना जाता है। इतना होने पर आचा
उन देवों को हवि निवेदन करे तथा अर्चन की शेष विधि को पूर्ण कर समाप्त क
इसके पश्चात् शिष्य आचार्य की सम्भावनापूर्वक पूजन करे। उत्सव के उपलक्ष
अन्त में वैष्णवों को प्रसादादि देकर भोजन करवाया जाए॥२४-२७॥
करिष्यन् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा ।
पुण्येऽहनि गुरुः स्नात्वा पूजयित्वा जगद्गुरुम् ॥२८॥
पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा पूर्ववत् सिकतामये ।
षोडशे पीठमभ्यर्च्यवाहयेन्नामदेवताम् ॥२९॥
नाम संस्कार की दशा में वैष्णव नाम को अथवा वैष्णवाश्रय के अर्थ वाले नाम
करने की कामना से आचार्य किसी पुण्यदिन अथवा शुभमुहूर्त में प्रथम स्नान क
तथा जगद्गुरु श्रीनारायण का अर्चन करे। तत्पश्चात् पूर्वकथित विधि के अनुसा
स्थण्डिलादि का निर्माण कर उस पर सिकतादि स्थानों को तैयार कर षोड़श प
पर देवतादि का स्थापनादि करे तथा उनकी अर्चना कर नाम देवताओं का आवाह
करे॥२८-२९॥
भगवद्रूपिणं ध्यात्वा हविरन्तमथार्चयेत् ।
उपपन्ने ततः शिष्ये कौपीनं कटिबन्धनम् ॥३०॥
निवेद्य वस्त्रे च नवे तस्मै तं ग्राहयेद्गुरुः ।
तच्छेषं गन्धमाल्यादि तथा चान्नं निवेदितम् ॥३१॥
नाम दासादिसिद्धान्तं श्रावयेत् केवलं तु वा ।
परित्य प्रणतोऽम्यर्च्य देवतां हृदि निक्षिपेत् ॥३२॥
तब गुरु अपने शिष्य से कौपीन तथा कटिबन्धन दो नवीन वस्त्रों को प्राप्त कर
शिष्य बनाए और उसी शिष्य को कौपीन आदि पहनवाये। और जो शिष्य कौ
हिन्दीटीकासहित ११३
तथा कटिबन्ध धारण कर ले तो शिष्य भी कौपीनादि गुरु को प्रदान कर ग्रहण
करवावे। नामाधिदेवता की पूजा से बचे हुए गन्ध तथा पुष्प आदि के साथ निवेदित
अन्नादि भी गुरु उसे दिलवाए। और उसे दासादि शब्द के अन्तवाले नाम को (जैसे
अनन्तदास आदि) शिष्य को सुनवाए अथवा केवल श्रीहरि के नाम को सुनावे
(जैसे-केशव, वकुलभरण आदि) फिर नामाधिदेवता की प्रदक्षिणा कर प्रणाम करे
और उसकी पूजन कर नामाधिदेवता को शिष्य के हृदयप्रदेश पर रखवाना
चाहिए॥३०-३२॥
हविर्निवेद्य देवाय तन्त्रशेषं समापयेत् ।
शिष्यो देशिकमभ्यर्च्य वैष्णवम् परितोषयेत् ॥३३॥
इस प्रकार इष्ट देव को हवि अर्पित कर शेष कर्म को पूर्ण करे। तब शिष्य अपने
दीक्षादाता गुरु का अर्चन कर समागत वैष्णवों का प्रसादादि देकर परितोष
करे॥३३॥
स्वयं ब्रह्मणि निक्षिप्तान् जातानेव मन्त्रतः ।
विनीतानथ पुत्रादीन् संस्कृत्य प्रतिबोधयेत् ॥३४॥
इस प्रकार नामसंस्कार के पश्चात् स्वयं आचार्य मन्त्रसंस्कारों से नवीन (दूसरा)
जन्म प्राप्त करनेवाले तथा ब्रह्म के प्रति निक्षिप्त या पुत्रशिष्यादि को संस्कारों से
संस्कृत कर मन्त्रार्थ का ज्ञान करवाए (अतएव मन्त्र संस्कार के होने पर मन्त्रार्थ का
ज्ञान करवाया जाना यहां इष्ट है)॥३४॥
अनुकूलेऽहनि शुभे गुरुः स्नात्वा समाहितः ।
हुताग्निः पूर्ववच्छिष्यं निष्पाद्य कृतकौतुकम् ॥३५॥
ततः सम्पूज्य देवेशं पश्चादग्निं निधाय वै ।
स्वेन तन्त्रेण तत्राथ हुत्वा पूर्ववदाहुतीः ॥३६॥
मन्त्रसंस्कार अनुकूल नक्षत्रादि से युक्त मुहूर्तवाले दिवस में सर्वप्रथम मन्त्रप्रदाता
आचार्य (गुरु) स्वयं स्नान करे तथा समाहित चित्त से वह स्थण्डिल पर
अग्निस्थापनादि कर विधिवत् हवन करे तथा पूर्वविधि से शिष्य को निर्धारित प्रदेश
पर बिठलाकर उसके हस्त में मंगलसूत्र को बांधकर कंकणधारी बनावे। इसके
पश्चात् देवाधिदेव नारायण की अर्चना कर अपने गृह्योक्तविधान से अग्नि का
स्थापन करे तथा अपने तन्त्रादि के अनुसार विधिवत् पूर्वविधि से आहुति देवे।
(पूर्वकथित-'मूलमन्त्रेण' इत्यादि के अनुसार आहुति देवे)॥३५-३६॥
स्थाने हेत्याहुतीनाञ्च मूलमन्त्राहुतीः पुनः ।
हविर्निवेद्य देवाय तच्छेषेण तथाहुतीः ॥३७॥
११४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
स शिष्योऽथ गुरुः कृत्वा साग्निं देवं प्रदक्षिणाम् ।
प्रणम्य पुनरासीनः प्रणिपत्योपसेदुषः ॥३८॥
संहारादिक्रमं कुर्याद् विधिवच्छोषणादिकम् ।
अस्त्रमन्त्रेण रक्षाञ्च प्रणमय्य गुरुंस्ततः ॥३९॥
न्यासाख्यं परमं मन्त्रं वाचयित्वाऽथ बोधयेत् ।
इसके पश्चात् श्रीविष्णु के शस्त्रों की नामोच्चारपूर्वक मन्त्रादि से की जानेवाली
आहुति के स्थान पर यहां मूलमंत्र से आहुति देनी चाहिए फिर इष्टदेव को हवि का
अर्पण करे और शेष को भी इसी मूलमन्त्र से हवि के रूप में आहुति देकर आचार्य
अपने शिष्य के साथ अग्नि तथा पूजित इष्टदेव की प्रदक्षिणा कर फिर प्रणाम करे
और समीप बिठलाकर शिष्य का संहारादिक्रम से न्यास को विधिवत् सम्पन्न करे
तथा शोषणादि कर्म (दाह को प्रशान्त या दबाने आदि) को करने के पश्चात् अस्त्र
मन्त्रों के द्वारा रक्षण क्रिया करे। तब शिष्य को आचार्य परंपरागतविधि से प्रणाम
करवाकर न्यासनामक परममन्त्र का उससे वाचन करवाए तथा उस मन्त्र का
उच्चारण करवाकर उसका ज्ञान करवाए॥३७-३९॥
श्रीमन्नारायणः स्वामी दासस्त्वमसि तस्य वै ॥४०॥
परमीप्सुस्तमेवार्थमनुकूलो विसर्जयेत् ।
प्रातिकूल्यं सुविस्रब्धः सम्प्रार्थ्य शरणं हरिम् ॥४१॥
व्रज तस्यैव चरणौ तत्रैवात्मानमर्पय ।
इति सम्बोधितस्त्वेवं मन्त्रेणात्मानमर्पयेत् ॥४२॥
आचार्य शिष्य को इस मन्त्र का पारंपरिक आशय बतलाते हुए उसे उपदेश दे कि
श्रीमन्नारायण महालक्ष्मी से युक्त नित्यभूत तथा स्वामी है तथा तुम उस देव के
किङ्कर (दास) हो। उसी नारायण को प्राप्त करने के इच्छुक होकर तुम अनुकूल
सङ्कल्पविशिष्ट या आग्रह रखकर आचरण करो तथा प्रतिकूल बुद्धि का नियन्त्रण
तथा विवर्जना रखो। इस प्रकार अपने रक्षण में समर्थ श्रीहरि पर विश्वास रखकर
उन्हीं के चरणों की शरण प्राप्त करो। इस प्रकार श्रीहरि की प्रार्थना कर एवं गुरु से
सम्बोधित उपदेश सुनकर वह शिष्य इसी मन्त्र से स्वयं को श्रीहरि को समर्पित
करे॥४०-४२॥
ततश्च व्यापकान् मन्त्रानन्यांश्चाङ्गैः समन्वितान् ।
दत्त्वाऽस्मै पुनरेवैवं गृहीत्वा वृत्तिमादिशेत् ॥४३॥
तब व्यापक कर छः अक्षरों तथा द्वादश अक्षरों वाले मन्त्रों को न्यासादि अंगों के
साथ तथा अन्य अव्यापक संज्ञक मन्त्र इसी शिष्य को उपदेश देवे तथा इसे शिष्यरूप
में मान्य कर वृत्ति का पारंपरिक उपदेश इसे प्रदान करें॥४३॥
नित्यं विष्णुपरं कर्म कुरु निन्द्यानि मा कृथाः ।
सदात्मानं विबुध्यस्व मा कामेषु मनः कृथाः ॥४४॥
तुम सदा श्रीविष्णु के अनुगत इष्ट कर्मों को करते रहो तथा निन्द्य कर्मों का आचरण
छोड़ो। अपने आत्मा को सदा जागृत रखते हुए रहो तथा किसी कामना से युक्त
अनुष्ठानों को मन से दूर रखो॥४४॥
यजस्व नित्यमात्मेशं मा नंक्षीरन्यदेवताः ।
लक्ष्यस्व लक्षणैर्भर्तुर्लक्ष्णिष्टा मान्यलक्षणैः ॥४५॥
आत्माधिपति जीवेश श्रीनारायण का नित्य ही यज्ञादि से यजन (अर्चन) करना
चाहिए तथा अन्य देवताओं की उपासना से दूर रहना चाहिए। अपने इष्ट का ज्ञान
उनके धारण किये जानेवाले चक्रादि चिन्हों से रखो तथा इससे भिन्न अन्य लक्षणों से
उन्हें मन में भी मत लाओ या इनकी कल्पना मत करो॥४५॥
उपास्व वैष्णवान्नित्यमसतो मोपसीदस्रः ।
गुरुं प्रणम्योमित्युक्त्वा ह्यात्मानञ्च निवेदयेत् ॥४६॥
प्रतिदिनं (नित्य) ही वैष्णवजन की सेवा सुश्रुषादि के द्वारा उपासना किया करो
तथा एकान्त्यविमुख अवैष्णवजन का ससर्ग छोड़ो (अथवा उनकी संगति मत
रखो)। अपने उपदेष्टा गुरु को प्रणाम करो तथा ओम् का उच्चारण करते हुए गुरु
को अपने आने को निवेदित करना चाहिए॥४६॥
ततः समापिते शेषे देवमात्मनि निक्षिपेत् ।
गुरुं विधिवदभ्यर्च्य वैष्णवान् परितोषयेत् ॥४७॥
इस उपदेश को ग्रहण कर होमशेष की समाप्ति विधि होने के पश्चात् श्रीनारायण को
अपने हृदय में स्थापित करे। यही 'न्यासविधि' है। तब अपने उपदेष्टा आचार्य की
विधिवत् अर्चना करने के बाद वैष्णवजन को भी भोजन तथा दक्षिणादि देते हुए
संतुष्ट करे॥४७॥
योजयिष्यन् गुरुः शिष्यं नित्यार्चनविधौ हरेः ।
शोभनेऽहनि नक्षत्रे देवमभ्यर्च्य पूर्ववत् ॥४८॥
मन्त्रवत्तु हुतं हुत्वा निष्ठायाथोपसादितम् ।
यथोक्तविधिना पूर्वं स्थापितं शुभविग्रहम् ॥४९॥
श्रीभूमिलीलासहितं परिवारैः समन्वितम् ।
अव्यक्तपरिवारं वा देवं सङ्ग्राह्य याजयेत् ॥५०॥
अब योगसंस्कार के लिये गुरु (आचार्य) अपने शिष्य को श्रीनारायण के नित्य