नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १०३
साथ इन्हें मिलाकर नहीं करना चाहिए॥७७॥
सद् ब्रह्म वासुदेवाद्यैर्विविक्तैर्यत्र नामभिः ।
प्रोच्यते भगवान् विष्णुस्तद्विशुद्धमुदाहृतम् ॥७८॥
जिस कर्म में केवल श्रीहरि के वाचक सद्ब्रह्म वासुदेवादि नामों से भगवान् श्रीहरि
अभिहित होते हैं, वही कर्म विशुद्ध तथा जहाँ साक्षात् भगवद्देवता विषयक केवल
कर्म हो वह भी विशुद्ध है॥७८॥
यत्राविविक्तैः शब्दैस्तु प्रोच्यते पुरुषोत्तमः ।
देवादीनामशुद्धानां व्यामिश्रं तत् प्रचक्षते ॥७९॥
तथा जहाँ सद्ब्रह्मादि से भिन्न देवादि शब्दों से परमेश्वर को अभिहित किया जाता
है तो ऐसा अर्चनादि कर्म 'मिश्र' (व्यामिश्र) होता है॥७९॥
दुर्निमित्तमये पापे ग्रहादीनां विपर्यये ।
विष्णुतद्भक्तपूजाभिः शान्तिं कुर्वीत् नान्यथा ॥८०॥
दुर्निमित्तादि से युक्त भयोत्पादक किसी पातक के कारण या सूर्य, शनि आदि के
जन्मादि से द्वादशादि स्थान में आने से अनिष्टकारक योग रहने के कारण या आ
जाने पर उन्हें श्री विष्णु तथा उनके परिवारभूत देवादि की पूजनादि अनुष्ठानों
(विष्णुपूजा के पारम्परिक परमादि रूपों से तथा उपशान्तिरूप परिवारभूत
अनुष्ठानों) के द्वारा इसकी शान्ति की जाए। अन्यथारूप में केवल ग्रहयज्ञादि के
द्वारा इस शान्ति को नहीं करें॥८०॥
प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैर्विशेषेण जनार्दनम् ।
आराधयेन्निमित्तेषु वैष्णवाँश्च विशेषतः ॥८१॥
वैष्णवोत्सवादि निमित्तों के अवसर पर श्रेष्ठ तथा प्रियभाव के रूप में स्वेष्ट गन्ध,
पुष्प, धूप, दीप, सूप तथा अपूपादि पदार्थों से विशेषतः परमेश नारायण की
आराधना की जाए तथा विशेष रूप में वैष्णवजन की भी प्रसन्नतापादक आराधना
प्रसादादि के प्रदानरूप में रखी जाए॥८१॥
कुर्वन्ति वैष्णवार्थाय स्वधर्माणाञ्च सिद्धये ।
शान्तिकर्म हरेः केचित् प्रपत्तिं केवलं हरेः ॥८२॥
ग्रहादि शान्ति के हेतु कुछ वैष्णव लोग श्रीविष्णु के उद्देश से तथा अपने साम्प्रदायिक
धर्मों की सिद्धि के लिये श्रीहरि की पूजनादि के अनुष्ठान से शान्तिकर्म करते हैं तथा
अन्य केवल (दुर्निमित्त तथा ग्रहादि के भय के प्राप्त होने पर) श्रीहरि की प्रपत्ति या
शरण का ही कार्य करते हैं (जो शान्ति आदि कर्मों में असमर्थ या अधिकारी नहीं
होते हैं)॥८२॥