सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

हिन्दीटीकासहित १११
तथा मध्येऽस्य चत्वारि तेष्वभ्यर्चासनं पृथक् ।
केशवादींस्तंत्र तत्र वासुदेवादिकांस्तथा ॥१९॥
प्रत्येकञ्च यथारूपं ध्यात्वा नामभिरावहेत् ।
हरिरत्तैस्तथार्घ्याद्यैरर्चयेत तान्यथाक्रमम् ॥२०॥
इस स्थण्डिल पर बालुका (रेती) से या वर्णचूर्ण से पूर्व से लेकर बारह
ऊर्ध्वपुण्ड्रस्थानों को बनावे जिनमें परस्पर दूरी एक समान रखी जावे। इस स्थण्डिल
के मध्य चार स्थान रखे तथा इस प्रकार इन सोलह स्थानों का प्रथम गन्धादि से
अर्चन कर पृथक् आसनों पर केशवादि तथा वासुदेव आदि प्रत्येक का ध्यान कर
उनके नामोच्चारण से आवाहन करे तथा बीच में रखे गये चार स्थानों पर
वासुदेवादि चतुर्व्यूह का ध्यान कर उनका नामोच्चारण द्वारा आवाहन करे तथा
बाद में इन सभी का यथाक्षण क्रमशः अर्ध्यादि समर्पण कर अर्चन करे तथा अन्त में हवि
प्रस्तुत करे॥१८-२०॥
परीत्य सहशिष्येण सर्वांस्तान् प्रणिपत्य च ।
उपविश्याथ शिष्याय प्रणिपत्योपसीदते ॥२१॥
एषां नामानि रूपाणि यथावदुपदर्शयेत् ।
शिष्यो हृदि समावेश्य तान् सर्वान् क्रमयोगतः ॥२२॥
निर्घृष्य मृत्स्नां विधिवन्मूलमन्त्राभिमन्त्रिताम् ।
आदायाङ्गुलिभिर्दद्याल्ललाटाद्यूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥२३॥
इसके पश्चात् अर्चित कर इन सभी केशवादि देवगण की दीक्षितेच्छु शिष्य के साथ
प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे तथा उनके सम्मुख बैठ जावे। फिर देवता को प्रमाण
कर बैठे हुए समीपवर्ती शिष्य को केशवादि नाम तथा उनके स्वरूप या विग्रहरूप का
यथावत् परिचय वर्णनादि करे जिससे शिष्य के हृदय में इन देवों का ज्ञान हो जाए।
तब शिष्य उन सभी को विधिवत् क्रमशः तिलकोपयोगी गोपीचन्दनादि (श्वेत)
मृत्तिका को घिसकर मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित करते हुए ललाटादि स्थानों पर
अंगुलि के द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्रों को लगावे॥२१-२३॥
त्रयोदश द्वादश वा चतुरो चैकमेव वा ।
नमोन्तैर्नामभिर्ध्यात्वा स्थापयेत् तत्र तत्र च ॥२४॥
केशवादीन् द्वादशसु वासुदेवं त्रयोदशे ।
केशवं वासुदेवं वा ललाटे केवलं न्यसेत् ॥२५॥
व्यूहांश्चतुर्षु तान्नत्वा सदा सान्निध्यमर्थयेत् ।
अतो हि वैष्णवस्याङ्गं विष्णोरायतनं विदुः ॥२६॥