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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

१०८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
परिशिष्टे
अथ द्वितीयोऽध्यायः
उपासितगुरोर्वर्षं विष्णोर्दास्यमभीप्सतः ।
विहिताः पञ्च संस्कारा युक्तस्यैकान्त्यहेतवः ॥१॥
अथ परिशिष्टे द्वितीयोऽध्याय
श्रीनारायण के दास्यभाव की इच्छा रखनेवाला अधिकारी एक वर्ष तक पूर्ण निष्ठा
से अपने प्रपत्तिदाता आचार्य की सेवाशुश्रूषादि उपासना करे। तब शिष्य के गुणों के
उपयुक्त उसे एकान्तीभाव के कारणभूत पांच विहित संस्कार (जो बतलाये हैं उन्हें)
वह आचार्य सम्पन्न करवाए॥१॥
तापः पुण्ड्रं तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः ।
अमी हि पञ्च संस्काराः पारमैकान्त्यहेतवः ॥२॥
ये पांच संस्कार है-चक्रादि से संतप्त कर अंकन रूप ताप, ऊर्ध्व पुण्ड्र का धारण,
नाम-करण, मन्त्र-ग्रहण तथा पंचम है याग। ये पाच संस्कार गर्भाधानादि संस्कारों से
विशिष्ठ है तथा इनसे शीघ्र ही मोक्षप्राप्तिका आधार ऐकान्तीभाव प्राप्त होता
है॥२॥
तापयिष्यन् गुरुः शिष्यं चक्राद्यैर्हेतिभिर्हरेः ।
पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा स्नातं मन्त्रजलाप्लुतम् ॥३॥
ऋचा दक्षिणतः कुर्याद् वैष्णव्या बद्धकौतुकम् ।
ततः समर्चेयेद देवं स्वार्चायां स्थण्डिलेऽपि वा ॥४॥
सर्वप्रथम आचार्य किसी पवित्र तिथि को नियमपूर्वक स्नान कर फिर मन्त्रोचार पूर्वक
तीर्थादि पवित्र जल में स्नान किये हुए शिष्य को श्रीनारायण के चक्र आदि आयुधों
को अग्नि में तपाकर उन्हें वैष्णवी ऋचा 'विष्णोर्नु के वीर्याणि' (शुक्ल यजु०) का
उच्चारण कर शिष्य के दाहिने बाजू में स्थापित करे या बिठलावे। इस कार्य को
व्यवस्थित रूप में करने के पश्चात् अपने इष्टदेव की स्थापित स्थण्डित पर या किसी
बाह्यबिम्ब (प्रतिमा) में अर्चना करे॥३-४॥
पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण कृत्वाग्नेः स्थापनादिकम् ।
मूलमन्त्रेण हुत्वाज्यं ततः प्रत्यक्षरारुहुतीः ॥५॥

हिन्दीटीकासहित १०९
एकां पुनश्च सर्वेण पौरुषोभिश्श्च षोडश ।
हुत्वा त्रीन् विष्णुगायत्र्या वैष्णव्या चाथ हेतिभिः ॥६॥
तदनन्तर श्रीहरि से पश्चिमभाग में स्थण्डिलादि पर अग्नि की स्थापना आदि कर्म
सम्पन्न कर मूल मन्त्र के द्वारा आज्याहुति प्रदान कर फिर मन्त्र के प्रत्यक्षरों से
आहुति करे और फिर अष्टाक्षर मन्त्र से एक आहुति देकर पुरुषसूक्त के षोडश मन्त्रों
से सोलह आहुति देकर विष्णुगायत्री-'नारायणाय विद्महे' इत्यादि से तीन आहुति देवे
और श्रीविष्णु के आयुधभूत पांच मन्त्रों से आहुति देवे॥५-६॥
हविर्निवेद्य देवाय तच्छेषेण तथाहुतीः ।
अथोपसन्ने हैमानि ताम्राणि राजतानि वा ॥७॥
प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन मन्त्रतोयाप्लुतानि च ।
बिम्बानि पूर्वहेतीनां स्वभागनिहितानि वै ॥८॥
निधाय वह्नौ प्रत्येकं तत्रावाह्य स्वमन्त्रतः ।
अर्घ्यं पाद्यं तथाचम्यं गन्धं पुष्पञ्च धूपकम् ॥९॥
दीपञ्च दत्वाथाभ्यर्च्य प्रणम्याग्निसमप्रभम् ।
आचार्यः स्वयमादाय नियुक्तो वाऽथ मन्त्रवित् ॥१०॥
प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य न्यसेद् बाहौ च दक्षिणे ।
सुदर्शनं तथा वामे पाञ्चजन्यं स्वमन्त्रतः ॥११॥
इसके पश्चात् अर्चित इष्टदेव को शेष हवि अर्पित कर उसके शेष भाग से आज्याहुति
उसी विधिक्रम में प्रदान करे। इसके पश्चात् समीप में रखी हुई स्वर्ण निर्मित,
ताम्रनिर्मित या रजत निर्मित चक्रादि मुद्राओं को पञ्चगव्यसे प्रक्षालित करे और
मन्त्र पूर्वक जल से प्रक्षालित करे और फिर अग्नि में तपाकर प्रत्येक आयुधों का अपने
मन्त्रों से आवाहन कर उनकी पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्यादि से पूजन करे। इसके बाद शिष्य अपने अग्नि के समान तेजस्वी दीक्षादाता
आचार्य को प्रणाम करे। आचार्य उस तपाये हुए हेतिमुद्राभूत श्रीहरि के आयुध को
स्वयं लेकर या किसी मन्त्रवेत्ता को नियुक्त करे तो वही पूर्व दिशा में मुख रखे हुए
शिष्य के दक्षिणबाहु पर उस मुद्रा को रखकर अंकित करे। इनमें सुदर्शन चक्र को
दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर विहित मन्त्रों के साथ अंकित करे। (इनमें
सुदर्शन चक्र को दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर अंकित करना चाहिए।)
ये दोनों आयुध समान (ही) अंकित किये जाते हैं॥७-११॥
एवं गदां धनुः खड्गं ललाटे मूर्ध्नि वक्षसि ।
चक्रं वा शङ्खचक्रे वा धारयेत् सर्वमेव वा ॥१२॥
५

११० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
इसी क्रम में पाञ्चरात्रविधान के अनुरूप क्रमशः गदा, धनुष तथा खड्ग की हेति मुद्राओं
को ललाटप्रदेश, मूर्ध्वस्थान तथा वक्षःप्रदेश पर अपने अपने मन्त्रों के साथ अंकित
करे, इस विधि में भावनानुरूप केवल चक्र ही धारण किया जावे अथवा दोनों
बाजुओं में चक्र और शंख ही धारण करे या फिर पांचों आयुधों को अंकित किया
जाता है॥१२॥
तन्त्रं समाप्य देवेशं सहशिष्यः प्रदक्षिणम् ।
कृत्वा प्रणम्य सान्निध्यं प्रार्थ्य शेषं समापयेत् ॥१३॥
इसके पश्चात् होमविधानादि की शेष विधि उत्तरार्चनादि विधान के साथ पूर्ण कर
और अपने ही नवदीक्षित शिष्य के साथ इष्टदेव नारायण की प्रदक्षिणा कर
सान्निध्य की प्रार्थना कर क्षमायाचना के साथ इस यज्ञादि कार्य को सम्पन्न कर
समाप्त करे॥१३॥
कुर्यात् सर्वत्र कर्मान्ते द्विजैः पुण्याहवाचनम् ।
आचार्यस्यार्चनञ्चैव वासःस्रग्भूषणादिभिः ॥१४॥
सर्वमङ्गलसंयुक्तमिति चिह्नानि शार्ङ्गिणः ।
धारयित्वा यथोत्साहं वैष्णवानभितर्पयेत् ॥१५॥
वह इस कर्म के अन्त में सर्वत्र ब्राह्मणादि के द्वारा पुण्याहवाचन सम्पन्न करे और आचार्य
का वस्त्र, पुष्पमाला, भूषणादि से पूजन तथा सम्मान आदि करे॥१४॥
इस प्रकार श्रीविष्णु के आयुधरूप चिन्हों को सभी मांगलिक कर्म तथा भावना से
युक्त रहकर उत्साह के अनुरूप धारण करना चाहिए तथा शक्ति के अनुसार
वैष्णवजन को प्रसाद, भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिए॥१५॥
धारयिष्यंस्ततः शिष्यमूर्ध्वपुण्ड्रान् यथाविधि ।
पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा पूर्ववद्बद्धकौतुकम् ॥१६॥
उपवेश्याथ देवेशं भोगैर्दीपान्तमर्चयेत् ।
स्थण्डिलं कल्पयेत् पश्चात् पुरुषस्य प्रमाणतः ॥१७॥
इसके बाद आचार्य विधिवत् शिष्य को ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करवाते हुए आगे किसी
पुण्यपर्व या पवित्र उत्सवादि तिथि को उस नियमानुचारी शिष्य को (पूर्ववत्
पवित्र होकर) समीप बिठावें तथा अपने इष्टदेव श्रीहरि की विविध उपचारों से
दीपदान तक अर्चना करे। इसके उपरान्त यज्ञकर्ता पुरुष के हस्त के प्रमाणानुरूप
यथोचित् स्थण्डिल का निर्माण करें॥१६-१७॥
स्थानानि सैकतान्यत्र वर्णचूर्णमयानि वा ।
कुर्याद् द्वादश पूर्वादिचतुर्दिक्षु समान्तरम् ॥१८॥

हिन्दीटीकासहित १११
तथा मध्येऽस्य चत्वारि तेष्वभ्यर्चासनं पृथक् ।
केशवादींस्तंत्र तत्र वासुदेवादिकांस्तथा ॥१९॥
प्रत्येकञ्च यथारूपं ध्यात्वा नामभिरावहेत् ।
हरिरत्तैस्तथार्घ्याद्यैरर्चयेत तान्यथाक्रमम् ॥२०॥
इस स्थण्डिल पर बालुका (रेती) से या वर्णचूर्ण से पूर्व से लेकर बारह
ऊर्ध्वपुण्ड्रस्थानों को बनावे जिनमें परस्पर दूरी एक समान रखी जावे। इस स्थण्डिल
के मध्य चार स्थान रखे तथा इस प्रकार इन सोलह स्थानों का प्रथम गन्धादि से
अर्चन कर पृथक् आसनों पर केशवादि तथा वासुदेव आदि प्रत्येक का ध्यान कर
उनके नामोच्चारण से आवाहन करे तथा बीच में रखे गये चार स्थानों पर
वासुदेवादि चतुर्व्यूह का ध्यान कर उनका नामोच्चारण द्वारा आवाहन करे तथा
बाद में इन सभी का यथाक्षण क्रमशः अर्ध्यादि समर्पण कर अर्चन करे तथा अन्त में हवि
प्रस्तुत करे॥१८-२०॥
परीत्य सहशिष्येण सर्वांस्तान् प्रणिपत्य च ।
उपविश्याथ शिष्याय प्रणिपत्योपसीदते ॥२१॥
एषां नामानि रूपाणि यथावदुपदर्शयेत् ।
शिष्यो हृदि समावेश्य तान् सर्वान् क्रमयोगतः ॥२२॥
निर्घृष्य मृत्स्नां विधिवन्मूलमन्त्राभिमन्त्रिताम् ।
आदायाङ्गुलिभिर्दद्याल्ललाटाद्यूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥२३॥
इसके पश्चात् अर्चित कर इन सभी केशवादि देवगण की दीक्षितेच्छु शिष्य के साथ
प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे तथा उनके सम्मुख बैठ जावे। फिर देवता को प्रमाण
कर बैठे हुए समीपवर्ती शिष्य को केशवादि नाम तथा उनके स्वरूप या विग्रहरूप का
यथावत् परिचय वर्णनादि करे जिससे शिष्य के हृदय में इन देवों का ज्ञान हो जाए।
तब शिष्य उन सभी को विधिवत् क्रमशः तिलकोपयोगी गोपीचन्दनादि (श्वेत)
मृत्तिका को घिसकर मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित करते हुए ललाटादि स्थानों पर
अंगुलि के द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्रों को लगावे॥२१-२३॥
त्रयोदश द्वादश वा चतुरो चैकमेव वा ।
नमोन्तैर्नामभिर्ध्यात्वा स्थापयेत् तत्र तत्र च ॥२४॥
केशवादीन् द्वादशसु वासुदेवं त्रयोदशे ।
केशवं वासुदेवं वा ललाटे केवलं न्यसेत् ॥२५॥
व्यूहांश्चतुर्षु तान्नत्वा सदा सान्निध्यमर्थयेत् ।
अतो हि वैष्णवस्याङ्गं विष्णोरायतनं विदुः ॥२६॥

११२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
हविर्निवेद्य देवाय गुरुः शेषं समापयेत् ।
तत्र त्वाचार्यमभ्यर्च्य भोजयेद् वैष्णवानपि ॥२७॥
इनको त्रयोदश, द्वादश, चार अथवा एक ही संख्या में ऊर्ध्वपुण्ड्रों को अंत में नमः
कहकर (ध्यान कर) लगाना चाहिए। तथा बाद में अपने अपने स्थानों पर इनकी
स्थापना की जावे। यहां बारह ऊर्ध्वपुण्ड्रों पर केशव आदि देवों को स्थापित क
तथा यदि सभी देवों को एक ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया हो तो केशव को ललाट प
और वासुदेव को गले के प्रदेश में एक ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया जाता है, तथा च
ऊर्ध्वपुण्ड्र के लगाने के पक्ष में चारों ऊर्ध्वपुण्ड्रों को व्यूहों पर लगावे। इसके उपरा
उन सभी केशवादि को प्रणाम कर सदा सान्निध्य के लिये प्रार्थना करे। इसी कार
वैष्णव का शरीर श्रीविष्णु का निवास स्थान माना जाता है। इतना होने पर आचा
उन देवों को हवि निवेदन करे तथा अर्चन की शेष विधि को पूर्ण कर समाप्त क
इसके पश्चात् शिष्य आचार्य की सम्भावनापूर्वक पूजन करे। उत्सव के उपलक्ष
अन्त में वैष्णवों को प्रसादादि देकर भोजन करवाया जाए॥२४-२७॥
करिष्यन् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा ।
पुण्येऽहनि गुरुः स्नात्वा पूजयित्वा जगद्गुरुम् ॥२८॥
पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा पूर्ववत् सिकतामये ।
षोडशे पीठमभ्यर्च्यवाहयेन्नामदेवताम् ॥२९॥
नाम संस्कार की दशा में वैष्णव नाम को अथवा वैष्णवाश्रय के अर्थ वाले नाम
करने की कामना से आचार्य किसी पुण्यदिन अथवा शुभमुहूर्त में प्रथम स्नान क
तथा जगद्गुरु श्रीनारायण का अर्चन करे। तत्पश्चात् पूर्वकथित विधि के अनुसा
स्थण्डिलादि का निर्माण कर उस पर सिकतादि स्थानों को तैयार कर षोड़श प
पर देवतादि का स्थापनादि करे तथा उनकी अर्चना कर नाम देवताओं का आवाह
करे॥२८-२९॥
भगवद्रूपिणं ध्यात्वा हविरन्तमथार्चयेत् ।
उपपन्ने ततः शिष्ये कौपीनं कटिबन्धनम् ॥३०॥
निवेद्य वस्त्रे च नवे तस्मै तं ग्राहयेद्गुरुः ।
तच्छेषं गन्धमाल्यादि तथा चान्नं निवेदितम् ॥३१॥
नाम दासादिसिद्धान्तं श्रावयेत् केवलं तु वा ।
परित्य प्रणतोऽम्यर्च्य देवतां हृदि निक्षिपेत् ॥३२॥
तब गुरु अपने शिष्य से कौपीन तथा कटिबन्धन दो नवीन वस्त्रों को प्राप्त कर
शिष्य बनाए और उसी शिष्य को कौपीन आदि पहनवाये। और जो शिष्य कौ

हिन्दीटीकासहित ११३
तथा कटिबन्ध धारण कर ले तो शिष्य भी कौपीनादि गुरु को प्रदान कर ग्रहण
करवावे। नामाधिदेवता की पूजा से बचे हुए गन्ध तथा पुष्प आदि के साथ निवेदित
अन्नादि भी गुरु उसे दिलवाए। और उसे दासादि शब्द के अन्तवाले नाम को (जैसे
अनन्तदास आदि) शिष्य को सुनवाए अथवा केवल श्रीहरि के नाम को सुनावे
(जैसे-केशव, वकुलभरण आदि) फिर नामाधिदेवता की प्रदक्षिणा कर प्रणाम करे
और उसकी पूजन कर नामाधिदेवता को शिष्य के हृदयप्रदेश पर रखवाना
चाहिए॥३०-३२॥
हविर्निवेद्य देवाय तन्त्रशेषं समापयेत् ।
शिष्यो देशिकमभ्यर्च्य वैष्णवम् परितोषयेत् ॥३३॥
इस प्रकार इष्ट देव को हवि अर्पित कर शेष कर्म को पूर्ण करे। तब शिष्य अपने
दीक्षादाता गुरु का अर्चन कर समागत वैष्णवों का प्रसादादि देकर परितोष
करे॥३३॥
स्वयं ब्रह्मणि निक्षिप्तान् जातानेव मन्त्रतः ।
विनीतानथ पुत्रादीन् संस्कृत्य प्रतिबोधयेत् ॥३४॥
इस प्रकार नामसंस्कार के पश्चात् स्वयं आचार्य मन्त्रसंस्कारों से नवीन (दूसरा)
जन्म प्राप्त करनेवाले तथा ब्रह्म के प्रति निक्षिप्त या पुत्रशिष्यादि को संस्कारों से
संस्कृत कर मन्त्रार्थ का ज्ञान करवाए (अतएव मन्त्र संस्कार के होने पर मन्त्रार्थ का
ज्ञान करवाया जाना यहां इष्ट है)॥३४॥
अनुकूलेऽहनि शुभे गुरुः स्नात्वा समाहितः ।
हुताग्निः पूर्ववच्छिष्यं निष्पाद्य कृतकौतुकम् ॥३५॥
ततः सम्पूज्य देवेशं पश्चादग्निं निधाय वै ।
स्वेन तन्त्रेण तत्राथ हुत्वा पूर्ववदाहुतीः ॥३६॥
मन्त्रसंस्कार अनुकूल नक्षत्रादि से युक्त मुहूर्तवाले दिवस में सर्वप्रथम मन्त्रप्रदाता
आचार्य (गुरु) स्वयं स्नान करे तथा समाहित चित्त से वह स्थण्डिल पर
अग्निस्थापनादि कर विधिवत् हवन करे तथा पूर्वविधि से शिष्य को निर्धारित प्रदेश
पर बिठलाकर उसके हस्त में मंगलसूत्र को बांधकर कंकणधारी बनावे। इसके
पश्चात् देवाधिदेव नारायण की अर्चना कर अपने गृह्योक्तविधान से अग्नि का
स्थापन करे तथा अपने तन्त्रादि के अनुसार विधिवत् पूर्वविधि से आहुति देवे।
(पूर्वकथित-'मूलमन्त्रेण' इत्यादि के अनुसार आहुति देवे)॥३५-३६॥
स्थाने हेत्याहुतीनाञ्च मूलमन्त्राहुतीः पुनः ।
हविर्निवेद्य देवाय तच्छेषेण तथाहुतीः ॥३७॥

११४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
स शिष्योऽथ गुरुः कृत्वा साग्निं देवं प्रदक्षिणाम् ।
प्रणम्य पुनरासीनः प्रणिपत्योपसेदुषः ॥३८॥
संहारादिक्रमं कुर्याद् विधिवच्छोषणादिकम् ।
अस्त्रमन्त्रेण रक्षाञ्च प्रणमय्य गुरुंस्ततः ॥३९॥
न्यासाख्यं परमं मन्त्रं वाचयित्वाऽथ बोधयेत् ।
इसके पश्चात् श्रीविष्णु के शस्त्रों की नामोच्चारपूर्वक मन्त्रादि से की जानेवाली
आहुति के स्थान पर यहां मूलमंत्र से आहुति देनी चाहिए फिर इष्टदेव को हवि का
अर्पण करे और शेष को भी इसी मूलमन्त्र से हवि के रूप में आहुति देकर आचार्य
अपने शिष्य के साथ अग्नि तथा पूजित इष्टदेव की प्रदक्षिणा कर फिर प्रणाम करे
और समीप बिठलाकर शिष्य का संहारादिक्रम से न्यास को विधिवत् सम्पन्न करे
तथा शोषणादि कर्म (दाह को प्रशान्त या दबाने आदि) को करने के पश्चात् अस्त्र
मन्त्रों के द्वारा रक्षण क्रिया करे। तब शिष्य को आचार्य परंपरागतविधि से प्रणाम
करवाकर न्यासनामक परममन्त्र का उससे वाचन करवाए तथा उस मन्त्र का
उच्चारण करवाकर उसका ज्ञान करवाए॥३७-३९॥
श्रीमन्नारायणः स्वामी दासस्त्वमसि तस्य वै ॥४०॥
परमीप्सुस्तमेवार्थमनुकूलो विसर्जयेत् ।
प्रातिकूल्यं सुविस्रब्धः सम्प्रार्थ्य शरणं हरिम् ॥४१॥
व्रज तस्यैव चरणौ तत्रैवात्मानमर्पय ।
इति सम्बोधितस्त्वेवं मन्त्रेणात्मानमर्पयेत् ॥४२॥
आचार्य शिष्य को इस मन्त्र का पारंपरिक आशय बतलाते हुए उसे उपदेश दे कि
श्रीमन्नारायण महालक्ष्मी से युक्त नित्यभूत तथा स्वामी है तथा तुम उस देव के
किङ्कर (दास) हो। उसी नारायण को प्राप्त करने के इच्छुक होकर तुम अनुकूल
सङ्कल्पविशिष्ट या आग्रह रखकर आचरण करो तथा प्रतिकूल बुद्धि का नियन्त्रण
तथा विवर्जना रखो। इस प्रकार अपने रक्षण में समर्थ श्रीहरि पर विश्वास रखकर
उन्हीं के चरणों की शरण प्राप्त करो। इस प्रकार श्रीहरि की प्रार्थना कर एवं गुरु से
सम्बोधित उपदेश सुनकर वह शिष्य इसी मन्त्र से स्वयं को श्रीहरि को समर्पित
करे॥४०-४२॥
ततश्च व्यापकान् मन्त्रानन्यांश्चाङ्गैः समन्वितान् ।
दत्त्वाऽस्मै पुनरेवैवं गृहीत्वा वृत्तिमादिशेत् ॥४३॥
तब व्यापक कर छः अक्षरों तथा द्वादश अक्षरों वाले मन्त्रों को न्यासादि अंगों के
साथ तथा अन्य अव्यापक संज्ञक मन्त्र इसी शिष्य को उपदेश देवे तथा इसे शिष्यरूप

में मान्य कर वृत्ति का पारंपरिक उपदेश इसे प्रदान करें॥४३॥
नित्यं विष्णुपरं कर्म कुरु निन्द्यानि मा कृथाः ।
सदात्मानं विबुध्यस्व मा कामेषु मनः कृथाः ॥४४॥
तुम सदा श्रीविष्णु के अनुगत इष्ट कर्मों को करते रहो तथा निन्द्य कर्मों का आचरण
छोड़ो। अपने आत्मा को सदा जागृत रखते हुए रहो तथा किसी कामना से युक्त
अनुष्ठानों को मन से दूर रखो॥४४॥
यजस्व नित्यमात्मेशं मा नंक्षीरन्यदेवताः ।
लक्ष्यस्व लक्षणैर्भर्तुर्लक्ष्णिष्टा मान्यलक्षणैः ॥४५॥
आत्माधिपति जीवेश श्रीनारायण का नित्य ही यज्ञादि से यजन (अर्चन) करना
चाहिए तथा अन्य देवताओं की उपासना से दूर रहना चाहिए। अपने इष्ट का ज्ञान
उनके धारण किये जानेवाले चक्रादि चिन्हों से रखो तथा इससे भिन्न अन्य लक्षणों से
उन्हें मन में भी मत लाओ या इनकी कल्पना मत करो॥४५॥
उपास्व वैष्णवान्नित्यमसतो मोपसीदस्रः ।
गुरुं प्रणम्योमित्युक्त्वा ह्यात्मानञ्च निवेदयेत् ॥४६॥
प्रतिदिनं (नित्य) ही वैष्णवजन की सेवा सुश्रुषादि के द्वारा उपासना किया करो
तथा एकान्त्यविमुख अवैष्णवजन का ससर्ग छोड़ो (अथवा उनकी संगति मत
रखो)। अपने उपदेष्टा गुरु को प्रणाम करो तथा ओम् का उच्चारण करते हुए गुरु
को अपने आने को निवेदित करना चाहिए॥४६॥
ततः समापिते शेषे देवमात्मनि निक्षिपेत् ।
गुरुं विधिवदभ्यर्च्य वैष्णवान् परितोषयेत् ॥४७॥
इस उपदेश को ग्रहण कर होमशेष की समाप्ति विधि होने के पश्चात् श्रीनारायण को
अपने हृदय में स्थापित करे। यही 'न्यासविधि' है। तब अपने उपदेष्टा आचार्य की
विधिवत् अर्चना करने के बाद वैष्णवजन को भी भोजन तथा दक्षिणादि देते हुए
संतुष्ट करे॥४७॥
योजयिष्यन् गुरुः शिष्यं नित्यार्चनविधौ हरेः ।
शोभनेऽहनि नक्षत्रे देवमभ्यर्च्य पूर्ववत् ॥४८॥
मन्त्रवत्तु हुतं हुत्वा निष्ठायाथोपसादितम् ।
यथोक्तविधिना पूर्वं स्थापितं शुभविग्रहम् ॥४९॥
श्रीभूमिलीलासहितं परिवारैः समन्वितम् ।
अव्यक्तपरिवारं वा देवं सङ्ग्राह्य याजयेत् ॥५०॥
अब योगसंस्कार के लिये गुरु (आचार्य) अपने शिष्य को श्रीनारायण के नित्य

११६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
अर्चन करने की विधि में लगाने के लिये किसी शुभ दिन तथा नक्षत्र को देखकर तथा
पूर्वविधि के अनुसार श्रीनारायण की पूजन करे। फिर मंत्रसंस्कार में किये गये
विधान के अनुसार अग्नि में होम करने के बाद नित्य उपासना करने के बाद संस्कार
के लिये उक्त विधि के साथ आज्याहुति तथा अन्नाहुति का होम करने के पश्चात्
आवरण से उत्पन्न प्रतिष्ठाशास्त्र के अनुसार स्थापित परमेश का शुभविग्रह श्रीदेवी
तथा भूमि देवी की लीला से युक्त तथा भूषणों, आयुधों एवं परिजन, परिच्छदादि के
रूप में संग्रह कर फिर यज्ञ करवाये॥४८-५०॥
श्रौतदिव्यार्षकल्पानामिष्टेनान्यतमेन च ।
स्थापनं यजनं वापि मिश्रा ह्यत्राधिकारिणः ॥५१॥
श्रौतादि कल्प में मिश्रव्यामिश्र (दिव्य) अथवा आर्ष-कल्पों के मध्य किसी एक
विधि को इष्ट समझकर उसी के अनुसार स्थापना तथा यजन विधि की जावे। मिश्र
अर्थात् व्यामिश्र तथा आर्ष दोनों अधिकारी हो सकते हैं। अतः किसी भी विधि को
इष्टतम मानकर उसी के द्वारा स्थापनादि कार्य किया जा सकता है॥५१॥
ततः परिगृहीतेन गुरुभिर्येन केनचित् ।
विधिना याजयित्वैवमथ शेषं समापयेत् ॥५२॥
और आचार्य अपने सम्प्रदाय के अनुरूप भी इन विधियों में से किसी एक विधि को
इष्टतम मानकर उसी से स्थापना तथा यजन करवाकर शेष (उत्तर) विधि को
पूर्ण करवाए॥५२॥
ततः स्वकाले स्वाध्यायं ततो योगञ्च कारयेत् ।
इज्यान्ते गुरुपूजाञ्च वैष्णवानाञ्च तर्पणम् ॥५३॥
इसके बाद उसे आचार्य के द्वारा स्वाध्याय के नियत समय पर स्वाध्याय तथा योग के नियत
समय पर योग करवाना चाहिए। यजन के अन्त में अपने गुरु की पूजा और
वैष्णवजन को भोजनादि से तृप्त करना भी अभीष्ट है॥५३॥
केचिच्चतुर्णां पूर्वेषां क्रमं नेच्छन्ति कर्मणाम् ।
सहैकदिवसे वा द्वे त्रीणि चत्वारि पञ्च वा ॥५४॥
कुछ मुनियों का मत है कि इन पूर्वकथित ताप, पुण्ड्र, नाम तथा मंत्रसंस्कार नामक
इन चार कर्मों में कोई क्रम नहीं माना जाए। एक दिन में भी दो संस्कार या एक वर्ष
में तीन, चार तथा पांच संस्कार भी किये जा सकते हैं॥५४॥
तदान्यतमहोमान्ते कृत्वाग्न्याद्युपसम्मुखम् ।
समापयेत् प्रधानञ्च न मन्त्रस्यान्यशेषता ॥५५॥
यदि एक दिन में एक साथ अनेक संस्कारगत अनुष्ठान की स्थिति हो तो किसी एक

हिन्दीटीकासहित ११७
अग्नि की उपस्थापना अधिक विस्तृत स्थण्डिलादि पर रखते हुए अग्निस्थापनादि होम
कर्म करते हुए किसी अन्यतम संस्कार (जो सबके बाद क्रम में रहे उस) के होम को
समाप्त करना चाहिए। (क्योंकि संस्कारों में सभी के सहैकभाव में सम्पन्न होने के
बाद ही होम कार्य सम्पन्न होता है)॥५५॥
यद्येकदिवसे पञ्च तथा मन्त्राहुतेः परम् ।
कृत्वा यागाद्यमखिलं तन्त्रशेषं समापयेत् ॥५६॥
यदि एक ही दिवस में पांच संस्कार किये जाए तो मन्त्राहुति के पश्चात् (एक ही
अग्नि में) यागादि सभी कार्य किये जाएं तथा एक साथ सभी शेष कर्म पूर्ण किये जाएं
(अथवा एक साथ सभी संस्कारों की समाप्ति होनी चाहिए।॥५६॥
एकदेशयुतोऽप्यन्यसंस्काराणां गुणान्वितः ।
युक्तः परमसंस्कारैः स वै भागवतः स्मृतः ॥५७॥
अन्यथा सभी वर्णादि समुचित संस्कारों में कुल संस्कारों के सम्पन्न होने की स्थिति
वाला रहने पर तथा पांच संस्कारों से युक्त होनेवाला गुणकारी या उत्तम माना
जाता है क्योंकि वह उत्तम पांच संस्कारों से पूर्ण है तथा उसे ही 'भागवत' समझना
चाहिए॥५७॥
तापस्तपांसि तीर्थानि पुण्ड्रं नाम नमस्क्रिया ।
आम्नायाः सकला मन्त्राः क्रतवः पूजनं हरे ॥५८॥
इनमें ताप तप रूप है, पुण्ड्र तीर्थभूत है (जिसका फल समस्त तीर्थों का स्नान करने
जैसा है), नाम ही इष्ट की नमस्क्रिया है, मन्त्र का जप समस्त वेदों का आम्नायभूत
है तथा नारायण का पूजन ही यज्ञ का सम्पादन है॥५८॥
वृत्तिर्भागवतानां हि सर्वा भगवतः क्रियाः ।
प्रायश्चित्तिरियं तस्याः सैव यत् क्रियते पुनः ॥५९॥
भागवत जन की विहित आचार वाली सभी वृत्ति श्रीमन्नारायण की सेवा रूप है। इस
सेवावृत्ति के बार बार अनुष्ठान करते रहने से दोषरूप आचरणों का प्रायश्चित्त हो
जाता है। (अर्थात् प्रमाद या क्रिया लोप रूप दोष के होने पर सेवावृत्ति को दोहराने
से ही प्रायश्चित होकर कर्ता की शुद्धि हो जाती है)॥५९॥
तस्मादाराधनं विष्णोः शान्तिकर्म विधीयते ।
तथैव विष्णुभक्तानां पूजनं शान्तिरुत्तमा ॥६०॥
इसलिये श्रीमन्नारायण की आराधना ही समस्त प्रत्यवायों को दूर करने का
शान्तिकर्म है और उसे ही सदा बार बार करते रहना इष्ट है। इसी प्रकार
विष्णु-भक्त-जन की अर्चनादि धर्म-कर्म उत्तम शान्ति कर्म है (क्योंकि इससे

११८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
श्रीभगवान् की पूजन ही होती है) ॥६०॥
मन्त्रसंस्कारयुक्तस्य न चेत् तापादिकं तदा ।
परमाख्या भवेच्छान्तिरविभागे सतामपि ॥६१॥
यदि मन्त्र संस्कार से युक्त पुरुष के तापादि संस्कार न हुए हों, परमशान्ति के हेतु
परमशान्तिभूत अनुष्ठान बिना क्रम तथा विभाग के पांच संस्कार को सम्पन्न
करनेवाली परमशान्ति विधि ही की जाना उचित है॥६१॥
परमाख्याथ वैयूही मूर्त्याख्या वैभवीति च ।
आनन्ती गारुडी चैव वैष्वक्सेनी सुदर्शनी ॥६२॥
इस परमशान्ति के क्रम में परमनामकशान्ति, वैयूही शान्ति, मूर्ति शान्ति,
वैभव-शान्ति, आनन्ती-शान्ति, गारुडी-शान्ति, वैष्वक्सेनी-शान्ति तथा सुदर्शनी-
शान्ति आती हैं॥६२॥
चतुष्टयी महाशान्तिरुपशान्तिश्चतुष्टयी ।
यथानिमित्तं कर्त्तव्यास्तथान्यः श्रीभुवादयः ॥६३॥
इनमें परमाख्य, वैयूही, मूर्त्याख्या तथा वैभवी ये चार महाशान्ति कहलाती है तथा
आनन्त, गारुडी, वैष्वक्सेनी तथा सुदर्शना ये चार उपशान्ति हैं। जिन्हें जैसा कारण
या अपेक्षा ही तदनुसार इन्हें करना चाहिए। इसी के समान भूशान्ति आदि अन्य
शान्तिकर्म भी हैं जिन्हें यथानिमित्त करना चाहिए॥६३॥
दानहोमजपार्चानामेकाद्वित्र्यखिलान्वयात् ।
नैकभेदविभिन्नास्ताः पात्रोत्कर्षश्च शक्तितः ॥६४॥
ये शान्ति, कर्म, दान, होम, जप, पूजा आदि में एक, दो, तीन तथा चारों के साथ
सम्बद्ध होकर अनेक भेदों से युक्त हो जाती हैं जिनमें पांचों के शक्ति के अनुसार
वरण करने से शक्ति के अल्प बहुत्व के कारण उत्कर्ष हो जाता है॥६४॥
हीना परमसंस्कारैर्देवतान्तरबुद्धयः ।
ऋत्विजौ यजमानाश्च च्यावयन्ति परस्परम् ॥६५॥
क्योंकि जो तापादि पांच परम संस्कार हैं उनमें जो हीन होते हैं तथा अनेक दूसरे
देवताओं की अर्चना तथा उनके यज्ञों को जो सम्पन्न करनेवाले होते हैं तो ऐसे
याजक ऋत्विकगण तथा उनके अनुगत यजमान थे दोनों ही परस्पर (श्रीविष्णु के
विमुख होने से) एक दूसरे को लक्ष्य से गिराकर (उन्हें) पतित बनाते
हैं॥६५॥
अपराधेषु सर्वेषु वृत्यङ्गानां यथाविधि ।
वृत्तेश्च परिपोषाय शान्तिं शाश्वत् प्रयोजयेत् ॥६६॥

हिन्दीटीकासहित १९९
इस प्रकार के सभी वृत्ति तथा उनके अंगो के न करने या उनके विरुद्ध आचरण जैसे
वृत्ति के परिपोष के लिये विधिवत् प्रतिबन्धक दुरित की निवृत्ति के लिये वृत्ति की
ही शान्ति हेतु आधारभूत अनुष्ठान करना उचित है॥६६॥
करणे प्रतिषिद्धानां विहिताकरणे तथा ।
विधेया महती शान्तिर्विज्ञाय गुरुलाघवम् ॥६७॥
विहित कर्मों के आचरण न करने पर तथा प्रतिषिद्ध आचरणों के करने पर उनके
द्वारा होनेवाले कारण के अल्पमात्रा में या विस्तृत रहने पर उनके गुरुलाघव का
विचार कर परम आदि महाशान्ति में से जो भी उपयुक्त हो उसको सम्पन्न करना
चाहिए॥६७॥
अवैष्णवेभ्यो यत्किञ्चित् प्रतिगृह्य प्रदाय वा ।
कृत्वोपशान्तिं शुद्ध्येत् परिवादे सतामपि ॥६८॥
जो वैष्णव न हों उन्हें किसी वस्तु आदि को देने अथवा उनसे किसी पदार्थ के ग्रहण
करने पर गारुडी आदि उपशान्ति में से जो भी उपयुक्त या विहित हो उस शान्ति को
करने पर दोष से शुद्धि होती है, किन्तु एकान्ती वैष्णव की निन्दा के अपराध पर
उन्हें महाशान्ति कर्म के बाद गारुडी आदि उपशान्ति भी करना
चाहिए॥६८॥
असतः प्रतिगृह्णीयात् पुत्रदारादिकं यदि ।
विधाय परमां शान्तिं वृत्तिमाचारयेन्निजाम् ॥६९॥
यदि अवैष्णवजन से पुत्र अथवा स्त्री आदि का सम्बन्धादि का योग हो तो ऐसे सम्बन्ध
के हो जाने पर परमाशान्ति का कर्म करवाये तथा अपनी वैष्णव वृत्ति को उन पुत्र
तथा दास आदि से भी करवाए और उन्हें अपने आचार से समान कार्यवाले बना
ले॥६९॥
भजने चान्यदेवानामपचारे च शार्ङ्गिणः ।
वैयूहीं परमां वापि कुर्याच्छान्तिं विशुद्धये ॥७०॥
अन्य देवता के प्रति भक्ति रखने तथा श्रीविष्णु की इष्टदेव के रूप में उपासना में
कमी कर देने पर इस उपचार (दोष) की शुद्धि के लिये वैयूही अथवा परमा नामक
शान्ति कर्म को किया जाता है॥७०॥
लक्षणानामकरणे धारणे चान्यलक्ष्मणाम् ।
मूर्तिं कुर्यान्महाशान्तिमपि सौदर्शनीं तथा ॥७१॥
तापादि वैष्णव चिन्हों के धारण न करने तथा तदनुरूप कर्म से अन्य चिन्हों के
धारणादि से विमुख रहने की वृत्ति में रहने पर मूर्ति नामक महाशान्ति अथवा

१२० नारदपञ्चरात्रं भारद्वाजसंहिता
सौदर्शनी नामक उपशान्ति कर्म को गुरु लाघव का विचार कर करना
चाहिए॥७१॥
अपचारे गुरूणाञ्च वैष्णवानाञ्च सर्वशः ।
वैष्वक्सेन्यथ वानन्ती कार्या चासन्निषेवणे ॥७२॥
वैष्णव गुरु तथा वैष्णवों के साथ होने वाले असन्निषेवणरूप उपचार होने पर
वैष्वकसेनी या आनन्ती नामक शान्तिकर्म को विचार कर करना
चाहिए॥७२॥
असच्छास्त्राभियोगे तु सच्छास्त्राणां निराकृतौ ।
कर्तव्या गारुडी शान्तिर्दुर्निमित्तेषु वैभवी ॥७३॥
वैष्णवशास्त्रों के विरोधी शास्त्रों के अध्ययन करने तथा वेद एवं वैष्णवादि असत्
शास्त्रों के निराकरण करने पर गारुडी शान्ति कर्म करना चाहिए तथा दुर्निमित्तोंके
या बुरे शकुनों के दिखाई देने पर वैभवी नामक शान्ति की जाए॥७३॥
अवैष्णवस्य भुक्त्वान्नमनिवेदितमेव वा ।
पीत्वा पादोदकं भक्त्या वैष्णवानां विशुद्ध्यति ॥७४॥
श्रीनारायण को निवेदित या अर्पण न किया गया अवैष्णवजन का अन्न खा लेने पर
वैष्णवों के पादोदक को पीकर प्रायश्चित करने पर शुद्धि हो जाती है॥७४॥
सर्वपातकसम्प्राप्तौ श्रियं वा गुरुमेव वा ।
समभ्यर्च्य विधानेन तच्छेषं प्राश्य शुद्ध्यति ॥७५॥
सभी प्रकार के पातकों के किये जाने पर शान्ति के कारणीभूत अन्य पातकादि के
होने पर श्री लक्ष्मी, पृथ्वी तथा अपने आचार्य का विधि पूर्वक अर्चन कर उनको
अर्पित अन्नाद्रि का शेष भाग प्रसादरूप में प्राशन करने से (श्रीशान्ति एवं भूशान्ति
को ऐसे कारणों के होने पर करने से) शुद्धि हो जाती है॥७५॥
देवतान्तरशेषन्तु भुक्त्वा स्पृष्ट्वापि वा पुनः ।
वैष्वकसेनीं क्रियां कृत्वा तच्छेषं प्राश्य शुद्ध्यति ॥७६॥
(यदि) अन्य देवता के प्रसाद रूप शेषान्न को स्पर्श करने या उसे भक्षण करने का
कार्य हो गया हो वैष्वकसेनी शान्तिकर्म को कर उसका शेष प्रसाद का प्राशन करने
से शुद्धि हो जाती है॥७६॥
पीत्वाऽनैकान्तिनां सोमं सह पङ्क्तौ प्रभुज्य च ।
कृतञ्च तेन भुक्त्वाऽन्नं वैयूहीं प्राप्य शुद्ध्यति ॥७७॥
अवैष्णव यज्ञों में ऋत्विक् बन कर पंक्ति के साथ बैठकर सोम का पान करने और
उन वैदिक ब्राह्मणों के साथ भोजन करने पर अथवा उन (अवैष्णव) ब्राह्मणों के

हिन्दीटीकासहित १२१
द्वारा पक्व अन्नादि भोजन को ग्रहण करने पर वैयूह ही शान्तिकर्म कर शेषान्न ग्रहण
करने से शुद्धि हो जाती है॥७७॥
विप्रानैकान्तिनः प्राज्ञानृत्विजः शान्तिकर्मसु ।
गो-भू-धान्यहिरण्याद्यैः प्रभूतैः परितोषयेत् ॥७८॥
प्राज्ञ तथा एकान्तिक वैष्णव ब्राह्मणों को शान्तिकर्म में आमंत्रित करे तथा
शान्तिकर्म के पूर्ण करवाने के पश्चात् उन्हें गोप्रदान, धान्य तथा हिरण्य आदि प्रभूत
मात्रा में देकर संतुष्ट करना चाहिए॥७८॥
अन्ते चैषां प्रकुर्वीत सर्वेषां शान्तिकर्मणाम् ।
नारायणस्य परमां प्रपत्तिं सर्वपूरणीम् ॥७९॥
इस प्रकार पूर्व में कथित सभी शान्तिकर्मों की समाप्ति कर सभी न्यूनाधिक कर्मों
की पूरक तथा समृद्धिकारक श्रीनारायण की प्रपत्ति को सम्पन्न करना
चाहिए॥७२॥
शान्तिं पुण्येषु देशेषु स्वक्षेत्रे स्वगृहेऽपि वा ।
कुर्यात् पुण्येषु कालेषु स्वजन्मादिषु वा पुनः ॥८०॥
ये शान्तिकर्म पुण्य तीर्थ तथा प्रदेशों में, अपने तीर्थ या क्षेत्रों में, अपने निवास पर,
किसी पुण्य काल, पुण्यकारी मुहूर्त में तथा अपने जनमनक्षत्र अथवा जन्मदिवसादि के
समय भी करना चाहिए॥८०॥
ध्यायन्नाधारशक्त्यादिपारिषद्यान्तदेवताः ।
नामभिर्वरयेद् विद्वान् परमायां विपश्चितः ॥८१॥
परमा शान्ति कर्म के अवसर पर विद्वान् आचार्य के द्वारा आधार-शक्ति से आरम्भ
कर पारिषद्-देवता तक के देवगणों का ध्यान करते हुए उनके नामादि को बतलाते
हुए उनकां वरणादि करना चाहिए॥८१॥
आसनेषु यथाकाममुपवेश्य यथाक्रमम् ।
पाद्यमर्घ्यं तथा भोगान् दद्यात् तेभ्यश्च मन्त्रतः ॥८२॥
स्नातेभ्यश्च यथाकामं वस्त्रभूषानुलेपनम् ।
माल्यानि धूपदीपौ च दद्याद् भक्त्या धनानि च ॥८३॥
अष्टोत्तरशतावृत्त्या जपं होमञ्च कारयेत् ।
स्थण्डिले तत्तदर्चाञ्च सर्वं कुर्वीत् वा स्वयम् ॥८४॥
आधारशक्ति आदि स्थानों पर वरण किये गये ब्राह्मणों के द्वारा उन उन मन्त्रों की
एक सौ आठ बार आवृत्ति से होम करवाया जाता है। आधारशक्ति आदि के
स्थण्डिल पर उन सभी की अर्चा का कार्य भी स्वयं अथवा ब्राह्मणादि से करवाना

१२२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
चाहिए। (यह सभी जप तथा होमादि कार्य यजमान शिष्य स्वयं भी कर सकता
है)॥८२-८४॥
सर्वत्राग्निमुखस्यान्ते समिदन्नघृताहुतीः ।
भोजयित्वा द्विजवरान् समभ्यर्च्य विसर्जयेत् ॥८५॥
अष्टोत्तर शत आवृत्ति को देते हुए किया जानेवाला होम अग्निस्थापन के बाद
अग्निमुख होने पर समिधा, अन्न, घृतादि की आहुति प्रदान कर करते हैं (अर्थात्
अष्टोत्तरशत संख्या में समिधायें, अन्न तथा घृत की आहुतियां प्रदान करते हैं।)
होम की समाप्ति पर उत्तम ब्राह्मणों को भोजन करवाकर तथा उनकी यथोत्साह
अर्चना कर उन्हें प्रस्थान करवाए। ८५॥
चतुरो वासुदेवादीन् वैयूह्यां वरयेद् द्विजान् ।
मूर्त्याख्यायां द्वादशैव केशवादीननुक्रमात् ॥८६॥
वैयूही शान्तिकर्म में वासुदेवादि चार व्यूह देवों के नाम पर चार ब्राह्मणों का वरण
करना चाहिए। मूर्तिनामक शान्ति कर्म में केशवादि क्रम के बारह ब्राह्मणों का
वरण करे॥८६॥
मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च नृसिंहं वामनं तथा ।
वैभव्यां वरयेद् विप्रान् यथेच्छमितरानपि ॥८७॥
वैभवी शान्तिकर्म में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन नामक पांच ब्राह्मणों का
वरण करे तथा इच्छानुसार अन्य वरण कर इसे परशुरामादि दस संख्या तक किया
जा सकता है॥८७॥
आनन्त्याञ्चतुरोऽनन्तशेषनागेन्द्रभूधरान् ।
गारुडयाङ्गरुडं तार्क्ष्यं वैनतेयं पतत्पतिम् ॥८८॥
आनन्ती शान्तिकर्म में अनन्त, शेष, नागेन्द्र तथा भूधर नामक चार (संख्या में)
ब्राह्मणों का वरण करे तथा गारुडी शांतिकर्ममें तार्क्ष्य, वैनतेय तथा पतत्पति नामक
तीन ब्राह्मणों का वरण करें॥८८॥
गजाननाद्यैः सहितं विष्वक्सेनं तदर्चने ।
सौदर्शिन्‍यां शङ्खगदाशार्ङ्गखड्‌गैः सुदर्शनम् ॥८९॥
विष्वक्सेनी शान्तिकर्म में गजानन आदि (गजानन, जयत्सेन, हरिवक्त्र, काल,
प्रकृति, संज्ञादि) पार्षद सहित विष्वक्सेन का वरण करे तथा सौदर्शिनी
शान्तिकर्म में शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग के साथ सुदर्शन नाम से वरण करना
चाहिए॥८९॥

हिन्दीटीकासहित १२३
ऋद्ध्या समृद्ध्या कीर्त्या च श्रीशान्त्यां वरयेच्छ्रियम् ।
क्षमां प्रतिष्ठां बहुलां भुवञ्चाथ भुवोऽर्चने ॥९०॥
श्री शान्तिकर्म में ऋद्धि, समृद्धि तथा कीर्ति के सहित श्री लक्ष्मी देवी का वरण तथा
भूशान्ति के कर्म में क्षमा, प्रतिष्ठा तथा बहुला के साथ श्रीपृथ्वी देवी का वरण किया
जावे॥९०॥
गुरुँस्तदर्च्यान् विप्रान् वा विधिनाभ्यर्च्य शक्तितः ।
यद्दद्यात् सा परां शान्तिः सर्वपातकनाशिनी ॥९१॥
अपने गुरुभूत, आचार्य, उनके द्वारा मान्य विद्वान् ब्राह्मणों की विधिपूर्वक अर्चना
करते हुए उन्हें जो भी दक्षिणादि प्रदान की जाती है वह सभी पातकों का विनाश
कर परमशान्तिकर्म (विशिष्ट रूप में) मानी गयी है॥९१॥
प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये महावेद्यां प्रकल्पयेत् ।
प्रत्यङ्मुख प्राङ्मुखः सन् सर्वञ्च परिकल्पयेत् ॥९२॥
महावेदी पर प्रधान स्थण्डिल सदा पश्चिमाभिमुखी बनाया जावे तथा अन्य सभी
पूर्व-मुख के रहने चाहिए॥९२॥
इत्येवं शान्तयः प्रोक्ताः संस्काराश्च द्विजन्मनाम् ।
यथार्हमितरेषाञ्च योजनीयः क्रियाविधिः ॥९३॥
इस प्रकार मैंने द्विजों के लिये किये जाने वाले संस्कारों तथा शान्ति कर्मों का कथन
किया। इनकी योजना योग्यतानुसार इनमें तथा इसी प्रकार अन्य जन में रखी जाए
तथा अनुष्ठानादि की विधि भी तदनुरूप रहे॥९३॥
इति संस्कारसम्पन्नः सम्प्राप्य गुरुवश्यताम् ।
आराधनं हरेरेव कुर्वाणः कर्म चोदितम् ॥९४॥
इस प्रकार बतलाये गये विधान से सभी संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने
आचार्य की आज्ञा में स्थित रहते हुए उनका सान्निध्य प्राप्त करते हुए श्रीनारायण
का ही समाराधन रूप विहित कर्मों का पालन करना चाहिए॥९४॥
तदप्रीतिकराण्याशु प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् ।
पश्यन् सदागमैः स्वेशफलोपायविरोधिनः ॥९५॥
तथा कुदृष्टिकृपणशास्त्राणि परिवर्जयेत् ।
भक्त्या परमया नित्यमर्चयेत् पुरुषोत्तमम् ॥९६॥
कुदृष्टिकल्पितान् देवान् कामजाँश्च विवर्जयेत् ॥९७॥
ऐसे कर्म जो श्रीहरि के चित्त को कलुषित करते हों तथा जो प्रतिषिद्ध कर्म हों तो
ऐसे कर्मों का आचरण नहीं करना चाहिए। आगमादि वैष्णवशास्त्रों के द्वारा अपने

१२४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
इष्ट तथा फल की प्राप्ति के प्रतिकूल एवं अशुद्ध दृष्टि से परिकल्पित शास्त्रों का
भी परित्याग करना उचित है। अतएव परमश्रद्धा भक्ति से नित्य ही श्रीपुरुषोत्तम
विष्णु की अर्चना करे तथा दृष्टिको या पुरुषोत्तम से भिन्न देवगण की उपासना को
वर्जित करे तथा विशेष कर काम्य कर्मों की ओर अभिमुख न
हो॥९५-९७॥
धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्राद्यैरङ्कितो हरिलाञ्छनैः ।
मुद्रापुण्ड्राङ्कनादीनि तामसानि विवर्जयेत् ॥९८॥
वह स्वयं ऊर्ध्वपुण्ड्र को तथा श्रीहरि के चक्रादि आयुधों से अंकित शरीर का रहता
है। अतः तामस गुणवाले शास्त्रों में परिकल्पित मुद्रादि तथा अन्य देवता के पुण्ड्रादि
का धारण करना भी छोड़ दे। (जो कि लक्ष्यविरुद्ध आचरण के हों)॥९८॥
आचार्यप्रमुखांन्नित्यं विशेषेण प्रसादयेत् ।
प्रच्युतान् प्राकृतांश्चैव सर्वत्र परिवर्जयेत् ॥९९॥
वह अपने आचार्य आदि प्रमुख वैष्णव जन को विशेष रूप से प्रसन्न रखता रहे तथा
वृत्ति को छोड़ने या उपेक्षा करनेवाले और अन्य प्राकृतजन की सदा ही उपेक्षा करे तथा
उनकी संगति में न रहे॥९९॥
आतिष्ठेत् पारमैकान्त्यमपायानपमार्जयन् ।
अपायवद्धिहैकान्त्यमशुद्धकरणान्वयात् ।
निरापाय भवेत् प्राप्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१००॥
इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे
द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
अपने उपायुक्त दोषों का परिमार्जित करते हुए पारमैकान्त्य भाव में स्थित रहे
क्योंकि अशुद्ध कर्मादि के आचरण से तथा उनसे सम्बन्ध रखने से अपाय के समान
दोषवता आ जाती है। अतएव सदा अपायों से रहित होकर यदि रहेगा तो यही कर्म
श्रीनारायण के परमपद को प्राप्त स्थिति निर्माण करेगा॥१००॥
नारदपंचरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्ट भाग की तत्त्वप्रकाशिकाहिन्दीव्याख्या का
द्वितीय अध्याय समाप्त

हिन्दीटीकासहित १२५
परिशिष्टे
तृतीय अध्याय
भूयः स्फुटतरं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनिसत्तमाः ।
सनातनीं सतां वृत्तिं परेषां लक्षणानि च ॥१॥
हे मुनियो! अब मैं पुनः आपको अविच्छिन्न सम्प्रदाय वाली सनातनभूत सन्तों की
वृत्ति तथा असन्तों के लक्षणों को बतलाता हूं॥१॥
सर्वभूतान्तरात्मानमीशमाराध्यमच्युतम् ।
बुद्ध्वा चरन्ति सुधियो धर्मांस्तत्प्रीतये परम् ॥२॥
जो सन्त या ज्ञानीजन हैं वे सभी जीवों के अन्तराल में स्थित रहनेवाले तथा उन
सभी के स्वामी श्रीनारायण की आराधना को जानकर उनकी प्रीति के सम्पादनार्थ
केवल स्वधर्मादि का आचरण करते हैं॥२॥
व्यामुग्धमतयः केचित् क्षुद्राः नानाफलार्थिनः ।
तमेव हि यजन्त्यन्ये तथान्या अपि देवताः ॥३॥
अज्ञभाववाले (कुछ) अनेक (दृष्ट तथा आनुश्रविक) फलों की आकांक्षा करने वाले
होकर कुछ व्यक्तियों के अन्य देवताओं का भजन करने पर भी उनमें सभी में स्थित
अच्युत का ही अर्चन करते हैं। (इसी प्रकार अन्य देवता का भजन भी अन्तःस्थित
अच्युत भाव से करने से वे भी सन्त हैं।)॥३॥
कल्पिताः कर्मबन्धेन विष्णुमायाविमोहिताः ।
अपि देवा न जानन्ति स्वात्मानं किमुतापरे ॥४॥
अपने संस्कार तथा कर्मों के बन्धन से कल्पित और श्रीविष्णु की माया से मोह प्राप्त
रहने के कारण जब देवगण की आत्मा के अन्तस्थ श्रीविष्णु का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त
करने में असमर्थ हो तो फिर मनुष्य आदि अन्यों को यह तत्व कैसे जानने में आ
सकता है॥४॥
वदन्ति धर्मान् व्यामिश्रान् वेदाः स्कन्धमयाः किल ।
श्रुतिर्मोक्षमयी प्राह शुद्धं मोक्षैकलक्षणम् ॥५॥

१२६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
अनुवाकादि स्कन्ध तथा उपनिषदात्मक वेद भी देवतान्तर्यामिभूत आराधना वाले
मिश्रित (धर्मों का) काम्य धर्मों का कथन करते हैं तथा मोक्षमयी (मोक्षपुण्य)
श्रुति मोक्षप्रयोजन रूप धर्म को ही शुद्ध (भी) कहती है॥५॥
प्रायेण धर्मान् व्यामिश्रानूचुर्मन्वत्रिपूर्वकाः ।
शुद्धाँस्तु वयमन्ये च पञ्चरात्रपथानुगाः ॥६॥
मनु तथा अत्रि जैसे शास्त्र एवं धर्मवेत्ता तथा पुरातन स्मृतिकारों ने प्राय इसी प्रकार
के वेदानुगत व्यामिश्र धर्मों के प्रतिपादन करते हुए धर्मविषयक बातें बतलाई हैं। पांचरात्र
आगम के अनुगत धर्म के अनुगामी हम तथा हमारे जैसे अन्य अनुगत विद्वानों ने शुद्ध
धर्म का प्रतिपादन कर धर्मतत्व को बतलाया॥६॥
व्यामिश्रः पञ्चरात्रेऽपि धर्मः क्वाप्यनुकृष्यते ।
तत्र चागमसिद्धान्ते शुद्ध एवोपदिष्यते ॥७॥
पंचरात्र आगम में भी कहीं कहीं व्यामिश्र धर्म का अनुकर्षण कर धर्म का
आगमानुमत प्रतिपादन किया है पर सिद्धान्तरूप में इस आगम में शुद्ध धर्म का
उपदेश ही रखा गया है॥७॥
हरेः शुद्धतनोः शुद्धं व्यामिश्रं कल्पितात्मनः ।
अशुद्धं कल्पितानान्तु केवलं यजनादिकम् ॥८॥
इनमें रज तथा तमोगुण से कल्पित शरीरों से भिन्न देवताओं के अन्तः स्थित
अन्तर्यामीभाववाले सत्वमय शुद्धशरीर श्रीहरि के आराधनात्मक धर्म को शुद्ध, रज
तथा तम गुणों से कल्पित इंद्राग्निदेवगणों को अन्तर्यामिभूत हरि से व्यामिश्र, केवल
यजनादि कर्म हेतु शुद्ध तथा रज आदि गुणों से कल्पित अन्य देवता का मात्र यजनादि
आराधन अशुद्ध होता है॥८॥
ते ह्यशुद्धतमाः सर्वे तमोनिष्ठतया स्मृताः ।
श्रीकण्ठप्रमुखैरुक्ता ये धर्माः कामकामिनाम् ॥९॥
श्रीकण्ठ आदि के द्वारा तामस तन्त्रादि में प्रसिद्ध तम गुणों से कल्पित यजनादि कर्म
होने के कारण ऐसे धर्म अशुद्धतम माने गये हैं जिनमें किसी विशिष्ट कामना को
लेकर अनुष्ठानादि विहित हों (तथा वेदबाह्य होने से कुदृष्टि निर्माण करती हैं अतः
ये निष्फल भी हैं)॥९॥
त्रैविद्यानां सदा मिश्राः प्रायेण विहिताः क्रियाः ।
ज्ञानं भक्तिश्च वैराग्यं सर्वं शुद्धमुदाहृतम् ॥१०॥
त्रैविद्य वेदनिष्ठ प्रायुर्चेण मिश्ररूप की क्रियाएं करते हैं तथा विहित भी हैं
परंतु जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के अनुगत क्रियादि हैं वे 'शुद्ध' होती हैं क्योंकि

हिन्दीटीकासहित १२७
इनमें परमैकान्तभाव से अन्तर्यामी रूप का आराधन कर्म होता है॥१०॥
न्यासनिर्धूतपाप्मानः प्रियैः प्रियतमैरपि ।
मिश्रैः शुद्धैश्च नियमैर्विष्णुमाराधयन्ति ये ॥११॥
प्रपत्तिरूप बल के परिग्रह से न्यासयोग के द्वारा जिसने अपने समस्त पातकों को
समाप्त कर दिया वे त्रैविद्य जन भी क्रमशः प्रिय, प्रियतम तथा मिश्र और शुद्ध
कर्मोंवाले नियमों से श्रीहरि की आराधना करते हैं॥११॥
निन्दितक्रियया हानाद्धिहीनानाञ्च कुप्यति ।
ऐच्छैरपि पुनः शुद्धैः परं तुष्यति माधवः ॥१२॥
विहित कर्मों के परित्याग करने से तथा निषिद्ध कर्मों के आचरण करने से
श्रीनारायण अप्रसन्न होते हैं परंतु किसी इच्छा के अधीन किये जाने वाले
अनुष्ठानादि शुद्ध कर्मों से श्रीनारायण संतुष्ट होते हैं॥१२॥
विशुद्धपरिवारस्य नित्यं शुद्धा हरेः क्रिया ।
तयैव शुद्धकर्मेति त्रैविद्योऽपि न गद्यते ॥१३॥
रजस्तमः गुणों से अस्पष्टः विशुद्ध सात्विक गुणों से परिवृत श्रीहरि की आराधना
क्रिया भी शुद्ध रूपवाली होती है तथा इसी प्रकार नित्यार्चनात्मक क्रिया के द्वारा
त्रैविद्य व्यामिश्र धर्म का अनुष्ठान करनेवाला भी शुद्ध कर्म का अनुष्ठाता माना
जाता है॥१३॥
शुद्धो मिश्रस्तथान्यो वा समर्पितभरो हि यः ।
सद्यः स वासुदेवस्य कैङ्कर्यानन्दमश्नुते ॥१४॥
तथा जो शुद्ध कर्म का व्यामिश्र कर्म तथा अन्य अशुद्ध कर्म के अनुष्ठान करने पर
श्रीहरि की प्रपत्ति को न्यासयोग के द्वारा धारण करता हो तो शीघ्र ही वह
श्रीनारायण के कैंकर्यभाव तथा मुक्ति के परमानन्द का सुख प्राप्त करता
है॥१४॥
शुद्धादीनान्तु धर्माणामधिकारादियोगतः ।
क्रियते पुरुषादीनां व्यपदेशस्तथाविधः ॥१५॥
शुद्ध आदि धर्मों का अधिकारादि के योग के आधार पर पुरुषों का उनके उपयुक्त
आचारों के पौर्वापर्य तथा गुणावगुण के परामर्श को विचार कर इस प्रकार
शुद्धधर्माधिकारी आदि के रूप में व्यवहार रखा गया है॥१५॥
एकायने ह्यधिकृताः सर्वे यान्त्यञ्जसा हरिम् ।
ये च नानापथेऽन्यत्र प्रतिबुद्धास्तु केचन ॥१६॥
अतएव जो मूलवेदों के अधिकृत ब्राह्मणादि वर्ण हैं वे सभी अविलम्ब श्रीहरि को