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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 176 में से

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पृष्ठ 129

हिन्दीटीकासहित १२७
इनमें परमैकान्तभाव से अन्तर्यामी रूप का आराधन कर्म होता है॥१०॥
न्यासनिर्धूतपाप्मानः प्रियैः प्रियतमैरपि ।
मिश्रैः शुद्धैश्च नियमैर्विष्णुमाराधयन्ति ये ॥११॥
प्रपत्तिरूप बल के परिग्रह से न्यासयोग के द्वारा जिसने अपने समस्त पातकों को
समाप्त कर दिया वे त्रैविद्य जन भी क्रमशः प्रिय, प्रियतम तथा मिश्र और शुद्ध
कर्मोंवाले नियमों से श्रीहरि की आराधना करते हैं॥११॥
निन्दितक्रियया हानाद्धिहीनानाञ्च कुप्यति ।
ऐच्छैरपि पुनः शुद्धैः परं तुष्यति माधवः ॥१२॥
विहित कर्मों के परित्याग करने से तथा निषिद्ध कर्मों के आचरण करने से
श्रीनारायण अप्रसन्न होते हैं परंतु किसी इच्छा के अधीन किये जाने वाले
अनुष्ठानादि शुद्ध कर्मों से श्रीनारायण संतुष्ट होते हैं॥१२॥
विशुद्धपरिवारस्य नित्यं शुद्धा हरेः क्रिया ।
तयैव शुद्धकर्मेति त्रैविद्योऽपि न गद्यते ॥१३॥
रजस्तमः गुणों से अस्पष्टः विशुद्ध सात्विक गुणों से परिवृत श्रीहरि की आराधना
क्रिया भी शुद्ध रूपवाली होती है तथा इसी प्रकार नित्यार्चनात्मक क्रिया के द्वारा
त्रैविद्य व्यामिश्र धर्म का अनुष्ठान करनेवाला भी शुद्ध कर्म का अनुष्ठाता माना
जाता है॥१३॥
शुद्धो मिश्रस्तथान्यो वा समर्पितभरो हि यः ।
सद्यः स वासुदेवस्य कैङ्कर्यानन्दमश्नुते ॥१४॥
तथा जो शुद्ध कर्म का व्यामिश्र कर्म तथा अन्य अशुद्ध कर्म के अनुष्ठान करने पर
श्रीहरि की प्रपत्ति को न्यासयोग के द्वारा धारण करता हो तो शीघ्र ही वह
श्रीनारायण के कैंकर्यभाव तथा मुक्ति के परमानन्द का सुख प्राप्त करता
है॥१४॥
शुद्धादीनान्तु धर्माणामधिकारादियोगतः ।
क्रियते पुरुषादीनां व्यपदेशस्तथाविधः ॥१५॥
शुद्ध आदि धर्मों का अधिकारादि के योग के आधार पर पुरुषों का उनके उपयुक्त
आचारों के पौर्वापर्य तथा गुणावगुण के परामर्श को विचार कर इस प्रकार
शुद्धधर्माधिकारी आदि के रूप में व्यवहार रखा गया है॥१५॥
एकायने ह्यधिकृताः सर्वे यान्त्यञ्जसा हरिम् ।
ये च नानापथेऽन्यत्र प्रतिबुद्धास्तु केचन ॥१६॥
अतएव जो मूलवेदों के अधिकृत ब्राह्मणादि वर्ण हैं वे सभी अविलम्ब श्रीहरि को