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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 804 में से

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पृष्ठ 556

५०२ मीमांसादर्शनम् [ सू०
कर्मधर्मो वा प्रवणवत् ॥ २२ ॥
शा० भा०—अथ कस्मान्न कर्माङ्गं देशः १। यः कृष्णमृत्तिकाप्रायः, स आह्नी-
नैबुकादीनाम् । यथा प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत' इति ॥ २२ ॥ आशङ्का ॥
भा० वि०—ननु कर्तृविशेषणश्यामत्वाविवदेशविशेषणप्राप्तत्वकृष्णमृत्तिका-
प्रायत्वादेरपि व्यभिचाराविशेषात् कथमियमाशङ्केत्याशङ्क्य व्याचष्टे—अथ
कस्मादिति । कर्तॄणामानन्त्यादेकविशेषणासंभवेऽपि देशस्यैकत्वादेकविशेषणोप-
पदस्यैव कर्मधर्मता कस्मान्न भवेदित्येतावानेवाभिप्राय इत्यर्थः । किं विशेषण-
विशिष्टोऽसौ देशः कर्माङ्गमिति तत्राह—य इति । यश्च प्राक्तत्वादि विशेषणविशिष्टस्य
होलाकादीनामित्यादि द्रष्टव्यम् । देशविशेषस्य कर्माङ्गत्वे दृष्टान्तं दर्शयन्
प्रवणवदिति व्याचष्टे—यथेति ॥ २२ ॥
त० वा०—इदानीं कर्तृविशेषणविशिष्टविध्यनुमानात्प्रतिहतः कर्माङ्गभूत-
प्राग्देशादिविध्यनुमानसभवं मन्यमान आह—‘कर्मधर्मो वा प्रवणवत्' इति ।
प्रागुदक्प्रवणो यद्वत्प्राचीनप्रवणोऽपि वा ।
देशो भवति कर्माङ्गं प्राग्देशादिस्तथा भवेत् ॥ इति ॥ ६७८
न्या० सु०-सूत्रं कर्माङ्गदेशविशेषणवाच्युपपदशङ्कार्थत्वेनाऽथेत्यादिभाष्येण व्याख्यातम् ।
तथा मन्वादिकर्तृविशेषणवत् कृष्णमृत्तिकाप्रायत्वादेर्दे शविशेषणस्यापि व्यभिचारेण
·निरस्तत्वात्, प्राच्यादिवच्च प्राक्तत्वादेरपि निरस्तत्वात्, केन विशेषेणोपन्यस्त इत्या-
शङ्कयाह—इदानीमिति । कर्तॄणामानन्त्यादसम्भवे प्राक्तत्वादेरपि देशस्यैक्यादेव विशेषणोप-
पत्तेरित्येतावानाशयः ॥ २२ ॥
मा० प्र० — देश आदि सम्बन्ध के द्वारा कर्ता की विशेष व्यवस्था न होने पर भी
देश आदि के संयोग को कर्म का विशेषण मानकर होलाका आदि कर्मों का देश विशेष में
आबद्ध कर प्रतिपादन करने के लिए पूर्वपक्षियों ने कहा है कि "प्राचीनप्रवणे देशे
वैश्वदेवेन यजेत” जिस स्थान में प्राचीन प्रवण अर्थात् जिस स्थान में पूर्व दिशा में जल
गिरता है उस स्थान में वैश्वदेव यज्ञ करें। इत्यादि स्थलों में जैसे प्राक् प्रवण देश आदि
को विशेषण मानने से वह कर्म अन्य स्थान में करणीय नहीं होता है, उसी प्रकार जिस
देश की मिट्टी प्रायः कृष्ण वर्ण की ही रहती है, उस स्थान के व्यक्ति आह्नीनैबुक आदि
यज्ञ का अनुष्ठान करें—इस रूप में देश व्यवस्था की जाय तो ऐसी स्थिति में उस
विशेष देश को छोड़कर यह अन्य स्थान में वह करणीय नहीं हो सकता है।
कर्मधर्मं=देश विशेष कर्म का धर्म अर्थात् विशेषण, वा=आशङ्का अर्थ में,
प्रवणवत्=प्राचीन प्रवण आदि के समान नहीं ॥ २२ ॥
१. ब. देशः कृष्ण ।