मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
१७६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
द्वारका रो बास दीज्यो, म्हाने द्वारका रो बास ।
सुथान बासो नाम हरिको, जिन रो भोज न पार ।
सकल तीरथ गोमती रे वाँ'ला, सावलिया सिरदार ।
पपीया ने मेघ प्यारो, मछली जल पास नीर ।
म्हाने तो म्हारो साहिब प्यारो, छाड़चो जगत को आस (पास) ।
तजियो पीहर, सासरो तज्यो, सब उपवास ।
राणा जी रो पासँ तजियो, राख्यो रावल पास ।
गोकुल सूं प्रभु मथुरा आये, भये द्वारिका बास ।
सहस गोप्या रो बालमो रे, गावै मीराँ दास ।
१९
द्वारिका को बास हो, मोहि द्वारका को बास ।
संख चक्र पद्म हूं ते, मिटे जग त्रास ।
सकल तीरथ गोमती मे करत निवास ।
सख झालरि झांझ बाजै, सदा सुख की रास ।
तजियो देसोबेस, पति गृह तज्यो, सम्पत्ति राजि ।
दासी मीराँ सरन आई, तुम्हे अब सब लाजि । ॥२७८॥
पाँचवी पंक्ति के द्वितीयार्द्ध का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त
होता है .— “तजियो राणा राज” ।
उपर्युक्त दोनों पदो मे साम्य विचारणीय है ।
स्व० पुरोहित जी के शिष्य और सहयोगी पंडित सूर्य नारायण
जी चतुर्वेदी के अनुसार यह पद किसी “मीराँ दास” कवि का प्रतीत
होता है। इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सम्भवत ऐसे
“मीराँ दास” या “दासी मीराँ” प्रयोग युक्त सभी पद इन्ही उप-
र्युक्त कवि के हो। यह “मीराँ दास” कवि कौन और कहा के थे ?
इनका रचना काल क्या था ? आदि बातें जाने बिना इस विषय पर कुछ
"दासी" और "जन" प्रयोग युक्त पद १७७
कहना सर्वथा ही भ्रामक होगा। पद स० १७ और १८ तथा इनके पाठा-
न्तर तथा और भी कुछ पद ऐसे मिलते है जिनमे (मीरा दास)
प्रयोग मिलता है। अत इन्ही के आधार पर किसी नवीन सिद्धान्त
का प्रतिपादन नही किया जा सकता।
२०
म्हाँरा सतगुरु बेगा आज्यो जी, म्हाँरी सुख री सीर¹ बुहावज्यो² जी ।
तुम बिछडियाँ दुख पाऊँ जी, मेरा मन माही मुरझाऊँ जी ।
मै कोयल ज्यूँ कुरलाऊँ जी, कुछ बाहर कहि न जगाऊँ जी ।
मोहि बाधण³ बिरह सतावै जी, कोई कहिया पार न पावै जी ।
ज्यूँ जल त्याग्या मीना जी, तुम दरसन बिन खीना जी ।
ज्यूँ चकवी रैण भावै जी, वा ऊगो⁴ भाण⁵ सुहावै जी ।
ऊ दिन कबै करोला जी, म्हाँरे ऑगण पाँव धरोलाँ जी ।
अरज करै मीराँ दासी, गुरु पद रज की मै प्यासो जी ॥२७९॥†
पद की भाषा शुद्ध जोधपुरी बोली है ।
१ वह धार विशेष जो सन्तान प्रेम के कारण माता के स्तनौ से स्वत
फूट निकलती है, २ बहा देना, ३ बाघिन, ४ उदित हुआ, ५ सूर्य ।
१२
१७८
मीरां-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
ऐसो पिया जान न दीजै हो।
सब सखिया मिलि राखिल्यो, नैनां सुख लीजै हो।
स्याम सलोनी सावरो, मुख देखत जीजै हो।
जिण जिण विधियां हरि मिलै, सोही विधी कीजै हो।
चन्दन काला नाग ज्यूँ, लपटाइ रहीजै हो।
चलो सखी री वहां जइयै, वाको दरसन कीजै हो।
बाहु काधै मेलिकै, तन लूमि रहीजै हो।
प्यालो आयो जहर को चरणोदक लीजै हो।
मीरां दासी वारणै, अपनी कर लीजै हो। ॥२८०॥†
“प्यालो लीजै हो” पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही
होता। यह पद अधिकाश कीर्तन-मडली के पदो की लय पर ही है।
२
हे मेरो मन मोहना।
आयो नाहि सखी री, हे मेरो मन मोहना।
कै कहूं काज किया सतन का कै कहू गैल भुलावना।
कहा करू कित जाऊं मोरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना।
मीरा दासी दरसण प्यासी, हरि चरणो चित लावणा ॥२८१॥
३
वारी वारी हो रामा हू वारी, तुम आज्यौ गली हमारी।
तुम देख्यां बिन कल न पड़त है, जोऊ बाट तुम्हारी।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७९
कुण१ सखी सू तुम रगराते, हम सू अधिक पियारी।
किरपा कर मोहि दरसण दीज्यो, सब तकसीर बिसारी।
तुम सरणागत परम दयाला, भव जल तार मुरारी।
मीराँ दासी तुम चरणन कों, बार बार बलिहारी। ॥२८२॥
४
वैद को सारो२ नहि रे माई, वैद को नही सारो।
कहित ललिता वैद बुलाऊ, आवैं नन्द को प्यारो।
वो आया दुख नाहि रहैगो, मोहि पतियारो।
वैद आय कर हाथ जो पकड़्यो, रोग है भारो।
परम पुरुष की लहर व्यापी, डस गयो कारो। ॥२८३॥†
इस पद मे मीराँ का नाम कही भी नही आया है। कही कही
निम्नाकित दो और पक्तिया भी उपर्युक्त पद मे ही जुडी मिलती है।
जिसमे “दासी मीरा लाल गिरधर” का प्रयोग हुआ है।
“मोर चन्दो हाथ ले हरि, देत है झारी।
दासी मीराँ लाल गिरधर, विष कियो न्यारी।”
५
अच्छे मीठे चाख चाख, बेर लाई भीलणी।
ऐसी कहा अचाखती ,रूप नही एक रती।
नीच कुल ओछी जात, अति ही कुचालणी।
झूठे फल लीन्हे राम, प्रेम की प्रतीत३ जाण।
हरिजू सो बाँध्यो हेत, बैकुण्ठ मे फूलणी।
ऐसी प्रीत करे सोई, दरस मीराँ तेरे जोई।
पतित पावन प्रभु गोकुल, अहीरणी ॥२८४॥* •
१ कौन, २ बूता, ३ विश्वास।,
१८० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
६
्रभू, मेरा बेड़ा पार बाधान्यो जी।
मै निगुनी मे गुन नाही प्रभु जी, औगुण चित्त मत लाज्यो जी ।
काड़ खडग राणा जी कोप्या, गरुढ चढ् या हरि आज्यो जी ।
विषरा प्याला राणा जी भेज्या, चरणामृत करि पीज्यो जी ।
काया नगर मे घेर पड़्या छै, ऊपर आयर कीज्यो जी ।
मीराँ दासी जनम जनम की, कठ लगाया कर लीज्यो जी ॥२८५॥†
पदभिव्यक्ति असगत है। राणा जी के द्वारा 'खडग' प्रहार की
कथा पद की प्रामाणिकता मे विशष सदेह उपस्थित करती है। पद
की शैली भी इस सदेह.का समर्थन करती है।
७
मेरी कानां१ सुणज्यो जी करुणा निधान।
रावरो विरद मोय खांड रे, सो लागै परत पराये प्राण।
सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान ।
ग्रह ग्रह्यो गजराज उबार्यो, बूड न दीनो न जान ।
मीराँ दासी अरज करत है, नही जी सहारो आन ॥२८६॥
द्वितीय पक्ति की अभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। इस पक्ति मे प्रयुक्त
'परत' शब्द के बदले कही कही पीडित शब्द मिलता है।
८
[ जोगिया के कहज्यो जी आदेस।
जोगिया चतुर सुजाण सजनी, ध्याव२ सकर सेस।
आवूँगी मै नाह रहूगी, रे म्हांरा' पिव बिन परदेस।
१ कानो से सुनो, ध्यान देकर सुनो, २ ध्यान लगाता है।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८१
करि किरपा प्रतिपाल मो परि, रखो न आपण देस ।
माला मुद्रा भेखला¹ रे, बाला खप्पर लूँगी हाथ ।
जोगिण होय जुग ढूँढसूं रे,म्हारा रावलिया² री साथ ।
सावण आवण कहि गया रे, कर गया कौल अनेक ।
गिणता गिणता घस गई रे, म्हांरा आंगलियारी रेख ।
पिव कारण पीली पडी रे, बाला जोबन वाली बेस³ ।
दास मीराँ राम भजि कै, तन मन कीन्हौ पेस ॥२८७॥
पद की भाषा प्रमुखत राजस्थानी है। परन्तु अधिकाश क्रिया
पदो पर खड़ी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। सम्भवत गेय परम्परा ही
इसके लिये उत्तरदायी हो।
९
जोगिया ने कहियो रे आदेस ।
आऊँगी मै नाही रहू रे, कर जटाधारी भेस ।
चीर को फोडू ँ कथा पहिरू, लेऊगी उपदेस ।
गिणते गिणते घिस गई रे, ऊगलियो की रेख ।
मुद्रा माला भेखलू, रे खप्पड लेऊ हाथ ।
जोगिन होय जुग ढूँढसँ रे, रावलिया के साथ ।
प्राण हमारा वहाँ बसत है, यहाँ तो खाली खोड़ ।
बात पिता परिवार सूं रे, रही तिनका तोड़ ।
पाँच पचीसो बस किए, मेरा पल्ला न पकड़े कोय ।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, कोई आय मिलावै मोय ॥२८८॥
इस पद पर खडी बोली का प्रभाव और भी स्पष्ट हो जाता है।
उपर्युक्त पाठ की द्वितीय पक्ति के उत्तरार्द्ध मे निम्नाकित पाठ भेद
भी मिलता है :--
“कर जोगन को भेस ।”
१ पहन लूँ, वेष धारण कर लूँ, २ पति, .३ वयस।
१८२ मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
१०
जोगिया ने कहजो जी आदेस।
आऊगी पण नही रहू, बाला, कर जोगिन को भेस।
प्राण हमारा वहा बसत है, यहा तो खाली खोड।
मात पिता अरु सकल कुटुम्ब सो, रही तिणका ज्यूँ तोड।
दड कमडल गूदड़ी रे बाला, कियो नबेलो सनेह।
प्रीतम अजहू न आइया, म्हारे योही¹ बडो सनेस²।
गुरु को सबद कान मे पहिरू, अग विभूति रमाके।
जा कारण मै जगत न जोरै बाला, बालावा रे फसि मै जाके।
पाच पचीसूँ बस कर राखूँ, म्हारी पल्ली न पकड़ो कोय।
मीराँ व्याकुल विरहणी रे बाला, हरि मिलीया सुख होय ॥२८९॥
उपर्युक्त तीनो पदो के प्रथम अर्द्धाश मे गहरा साम्य हो उठता है।
परन्तु जहाँ प्रथम दो पद मे सिर्फ नाथ प्रभाव ही स्पष्ट हो उठता
है, वहाँ इस तीसरे पद पर सतमत का ही प्रभाव है। इस पद की भाषा
पर खडी बोली का प्रभाव भी अधिक है।
११
राख कमडल गूदडी रे बाला, कियो नेवलो भेष।
प्रीतम ओज्यूँ³ नै आइया, यो है बडो अनेस।
गुरु को शब्द कान मे पहिरू, अग विभूति रमाय।
जा कारण मै जगत तज्यो है, भौरे लागी आय।
पाच पचीसा बस करू, पलो न पकडे कोय।
मीराँ व्याकुल विरहणी, हरि मिल्या सुख होय ॥२९०॥†
यह पद उपर्युक्त तीनो पदो के सम्मिश्रण से बना हुआ गेय रूपा-
न्तर प्रतीत होता है। इस पाठ की प्रथम पक्ति विशेष विचारणीय है।
१ यही, २ आशका, ३ फिर से अर्थात् लौटकर।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८३
१२
जोगिया जी दरसण दीजंयो आइ।
तेरे कारण सकल जग ढूँढया, घर घर अलख जगाइ।
खान पान सब फीको लागै, नैणां नीर न माइ१।
बहुत दिनां के बिछुरे प्यारे, तुम देख्यां सुख पाइ।
मीराँ दासी तुम चरणां की, मिलज्यो कंठ लगाइ ॥२९१॥
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
सखी मन स्याम सूरत बसी।
मुकुट कुडल करन बसी, मंद मुख पर हँसी।
बावरी कोऊ कहै मो को, कोई कहै कुलनासी।
हस्ती की असवारी२, पाछै लाख कुतिया भुसी।
तजियो घूँघट लई गाती, सत देख्या खुसी।
सील चोल पहन गल मे, भक्त मारग घुसी।
ओस पानी नाहि पियो, छांह बादर किसी।
दासि मीराँ लाल गिरधर, प्रेम फंदे फँसी ॥२९२॥
२
पिया अब घर आज्यो मोरे, तुम मेरे३ हू तोरे।
मै जन तेरा पथ निहारूं, मारग चितवत तोरे।
अवध बदीती अजहूं न आये, दुतियन सूं नेह जोरे।
मीराँ कहै प्रभु कब रे मिलोगे, दरसन बिन दोरे४ ॥२९३॥
१ समाय, २ सवारी का राजस्थानी अपभ्रंश, ३ में, ४ दुखमय।
१८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है, यद्यपि दो एक राजस्थानी
शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद के बीच मे ही “मै जन” का प्रयोग
अन्य पदो से सर्वथा पृथक पडता है।
३
कैसे जिऊ री माई, हरि बिन कैसे जिऊ री।
उदक दादुर पीनवत है, जल से ही उपजाई।
पल एक जल कूँ मीन बिसरे, तलफत मर जाई।
पिया बिन पीली भई रे, ज्यो काठ घुन खाय।
औषध भूल न सचरै रे, बाला, बैद फिरि जाय।
उदासी होय बन बन फिरू, रे बिथा तन छाई।
दासी मीराँ लाल गिरधर, मिल्या है सुखदाई ॥२९४॥
सम्पूर्ण पद से वियोग ही लक्षित होता है, तथापि अतिम पक्ति
से मिलन की ही अभिव्यक्ति होती है।
४
मै हरि बिन क्यो जिऊ री माय।
पिय कारण बौरी भयी, जस काठ ही घुन खाय।
औषद भूल न सचरे, मोहि लागो बौराय।
कमठ दादुर बसत जल मह, जल ही ते उपजाय।
मीन जल के बिछुरे तन, तलफि के मर जाय।
पिय ढूँढन बन बन गई, कहु मुरली धुन पाय।
मीराँ के प्रभु लाल गिरधर, मिल गए सुखदाय ॥२९५॥
इस पद की तुलना मे प्रथम पद से पूर्वापर सगति अधिक है।
५
प्रभु बिन ना सरै माई।
मेरा प्राण निकस्या जात, हरि बिन ना सरै माई।
कमठ दादुर बसत जल में, जल से उपजाई।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८५
मीन जल से बाहर कीन्हा, तुरत मर जाई।
काठ लकरी बन परी, काठ घुन खाईं।
ले अगन प्रभ डारि आए, भेसम हो जाई।
बन बन ढूंढत मै फिरी, आली सुध नहि पाई।
एक बेर दरसण दीजैं, सब कसर मिटि जाई।
पात ज्यूँ पीरी परी, अरु विपत तन छाई।
दासि मीराँ लाल गिरधर, मिल्या सुख छाई॥२९६॥
उपर्युक्त दोनो सम्मिश्रण से बना हुआ पद ही कुछ परिवर्त्तन के
साथ स्वतंत्र पद के रूप मे चल पडा है। शेष पदाभिव्यक्ति से समन्वय
नही होता, यह एक विशेष विचारणीय बात है।
६
मै अपने सैया सग साची।
अब काहे की लाज सजनी, परगट हूवै नाची।
दिवस भूख न चैन कबहिन, नीद निसु नासी।
बेध वार को पार हवैगो, ज्ञान गुह गासी।
कुल कुटुम्ब सब आनि बैठे, जैसे मधुमासी।
दास मीराँ लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी॥२९७॥
उपर्युक्त पद का समर्पण द्योतक पद (स० १) से गहरा साम्य
है। दोनो ही पदो पर सत-मत का गहरा प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।
परिवार और समाज का गहरा विरोध कई पदो से अत्यन्त
सुस्पष्ट हो उठता है तथापि उनके लौट आने की अभिव्यक्ति इस पद की
विशेषता है।
७
राणा जी, सांवरे रग राची।
कोई निरखत कोई हरखत है जी।
१८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
कोई करत है हासी, कोई साची।
ताल मृदग बाजै मन्दिर मे, हौ हरि आगे नाची।
मीराँ दासी गिरधर जू की, जनम जनम की जाची ॥२९८॥
पदाभिव्यक्ति से वैष्णव परम्परा का प्रभाव ही सुस्पष्ट हो उठता है।
८
माई मे तो गिरधर के रग राची।
माई हू स्याम केृ रग राची।
मेरे बीच परो मत कोऊ, बात चहु दिसी माची।
जागत रैनि रहै उर ऊपर, ज्यूँ कंचन मणि खाची।
होय रही सब जग मे जाहर, फेरि प्रगट होय नाची।
मिलि निसान बजाय कृष्ण सूं, ज्यो कछु कहो सो साची।
जन मीराँ गिरधर की प्यारी, मोहबत है नाहि काची ॥२९९॥†
उपर्युक्त पद की भाषा और अभिव्यक्ति दोनो ही विचारणीय है।
अभिव्यक्ति मे वह सरस गाम्भीर्य नही जो मीराँ के पदो की विशेषता
है। पद की तृतीय पक्ति अर्थ-हीन है। 'जन मीराँ' का प्रयोग पद की
प्रामाणिकता मे सदेह की पुष्टि करता है।
९
माई मे तो गिरधर रंग राची।
मेरे बीच पडो मत कोई बात चहू दिस माची।
जो मन सार मेरे मन उपज्यो, ज्यो कंचन मणि साँचो।
और सब हीरो हो सिर ऊपर, मै परगट होय नाची।
मुलक¹ निसान बजावा कृष्ण के, जे कोई कहो सोई सांची।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मो मति नही कांची ॥३००॥†
१ हँस कर, खुश होकर ।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८७
यह पद उपर्युक्त पद (स० ९) का ही गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत
होता है। पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संगति का अभाव है, इतना ही
नही पद की अन्य पंक्तिया अर्थहीन भी सिद्ध होती हैं।
१०
राणाजी मै तो सावरे रंग राची।
साजि सिगार बाध पग घूघरु, लोक लाज तजि नाची।
गई कुमति लई साधु की संगति, भगत रूप भई साँची।
गाय गाय हरि के गुण निसदिन, काल व्याल सो बाची।
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची।
मीराँ श्री गिरधरलाल सूं भगति रसीली जाची॥३०१॥†
भाव और भाषा दोनो ही के विचार से पद अपने मे पूर्ण है “मीराँ
श्री गिरधरलाल” जैसी अभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। ऐसा
प्रयोग और भी कुछ पदो मे मिलता है, परन्तु ऐसे पदो की प्रामाणिकता
विशष संदिग्ध है।
११
मै तो रंगराती गुँसाइयां, मै तेरे रंगराती।
औरो के पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजती पाती।
मेरे पिया मेरे निकट बसत है, कह ना सकूँ सरमाती।
सुवा सुवा चोला पहर सखी, मै झरमट खेलन जाती।
खेलत खेलत मिले सांवरे, खोल मिली हिय गाती।
मदवा मी पी सब मदमाती, मै विन पिया मदमाती।
प्रेम मदी का मै इषचाष्या, मै छकी रहू दिन राती।
वह दूल्हा मोहि व्याहन आवै, आप कृश्न ब्रजवासी।
मीराँ के गिरधर मन मान्यो, मै स्याम सुन्दर की दासी ॥३०२॥
इस पद पर सतमत का गहरा प्रभाव सुस्पष्ट है।
१८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
१२
में गिरधर रग राती, सैया मै।
पचरग चोला पहर सखी मै झिरमिट खेलन जाती।
ओह झिरमिट मा मिल्यो साव रो खोल मिली तन गाती।
जिन का पिया परदेस बसत है, लिख लिख भेजे पाती।
मेरा पिया मेरे हीय बसत है, ना कहू आती जाती।
चदा जायगा सूरज जायगा, जायगी धरणी अकासी।
पवन पाणी दोनूँ हीँ जा येगे, अटल रहै अविनासी।
सुरत निरत का दिवला सजोले, मनसा की करले बाती।
प्रेम हटी का तेल मगा ले, जगे रह्या दिन राती।
सतगुरु मिलिया सासा भाग्या, सैन बताई साची।
ना घर तेरा न घर मेरा, गावै मीराँ दासी ॥३०३॥
१३
सखी री मै तो गिरधर के रग राती।
पचरग मेरा चोला रगा दे, मै झुरमट खेलन जाती।
झुरमुट मे मेरा साई मिलेगा, खोल आडम्बर गाती।
चदा जायगा सूरज जायगा, जायगा धरण अकासी।
पावन पाणी दोनो ही जायगे, अटल रहे अविनासी।
सुरत निरत का दिवला सजोले, मनसा की कर बाती।
प्रेम हटी का तेल बना ले, जगा करे दिन राती।
जिनके पिय परदेस बसत है, लिख लिख भेजे पाती।
मेरे हिय मो माहि बसत है, कहूँ न आती जाती।
पी हर बसूँ न बसूँ सास घर, सतगुरु शब्द सगाती।
ना घर मेरा ना घर तेरा, मीराँ हरि रग राती ॥३०४॥
उपर्युक्त तीनो पदो की भाषा व अभिव्यक्ति विशेष विचार-
णीय है। तीनो ही पदो की भाषा अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक है
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८९
और तीनो पर ही सत मत का प्रभाव विशेष रूप से स्पष्ट हो उठा है ।
यह पद उपर्युक्त दोनो पदो (स० ३०२ और ३०३) के सम्मिश्रण से
बना हुआ एक नया रूपान्तर मात्र प्रतीत होता है ।)
*१४
सांवरे रग राची, राणाजी हू तो ।
बाध घूघरा प्रेम का, हू हरि आगे नाची ।
एक निरखत है एक परखत है, एक करत मोरी हासी ।
और लोग म्हारो काई करसी, हू हरि जी की दासी ।
राणो विष को प्यालो भेज्यो, हू तो हिम्मत काची ।
मीराँ चरणा लाग रही छै, साची ॥३०५॥
यह पाठ पहले चार पाठो के ही अधिक निकट पडता है। इसकी
भाषा मिश्रित है तथापि राजस्थानी की ओर ही विशेषत झुकी हुई
है। भावाभिव्यक्ति मे एक नूतनता है, “हू तो हिम्मत की काची” ।
जैसी अभिव्यक्ति अन्य प्राय प्राप्त पदो मे मीराँ पीवत हासी” जैसी
अभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है।
विभिन्न पदो का सम्मिश्रण ही इस पद का आधार प्रतीत होता है ।
१५
राणाजी हो मै साधुन रग राती ।
काहू को पिया परदेस बसत है, लिख लिख भेजती पाती ।
मेरो पियो मेरे माहि बसत है, कहि न सकूँ सरमाती ।
सहो कसूमी ओढ दुपट्टी, झुरमुट खेलन जाती ।
झुरमुट खोल मिले यदुनन्दन, खोल मिली मिल साती ।
और सखी मद पीवन भाई, मै मद की मदमाती ।
मै मद पियो पचवटी को, छकी रहूँ दिन -राती ।
सुन्न सिखर के द्वारे आके, मोहि मिले अविनासी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जनम जनम की दासी ॥३०६॥
१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
इस पद को विभिन्न भी कुछ परिवर्तन के साथ चला हुआ पदो
का सम्मिश्रण ही कहा जा सकता है।
१६
राम तने रग राची, राणा मै तो सावलिया रग राची।
ताल पखावज मिरदग बाजा, साधो आगे नाची रे।
कोई कहे मीराँ भई बावरी, कोई कहै मदमाती रे।
विष का जो प्याला राणा भर भेज्या, अमृत कर आरोगी१ रे।
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर जनम जनम की दासी रे।
॥३०७॥
विभिन्न पदो का सम्मिश्रण ही इस पद का भी आधार प्रतीत
होता है।
१७
गोपाल रग राची, मै श्याम रग राची।
कहा भयो जल विषय के खाये, तिनहुते बॉची।
तात मात लोग कुटुम्ब तिन कीनी उपहासी।
नन्द नन्दन गोपी ग्वाल तिनके आगे मै नाची।
और सकल छाँडे के मै भक्ति काछ कॉची।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जानत झूठी साँची ॥३०८॥
उपर्युक्त दस पदो मे एक गहरा साम्य है। यहाँ तक कि सरसरी
दृष्टि से देखने पर ये सभी पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर से प्रतीत
होते हैं। परन्तु इन पर विचार करने से दो शैलियाँ सर्वथा स्पष्ट
दीखती है। "राँची", "साँची", "नाची" आदि तुकान्त पद एक
शैली विशेष के है। ऐसे पदो पर कही कही सतमत का हल्का सा प्रभाव
मिल जाता है, फिर भी इनकी भावाभिव्यक्ति प्रधानत वैष्णव-
परम्परा से ही प्रभावित है। ऐसे पदो की भाषा भी कुछ राजस्थानी
१ खा लिया, यहा होगा पी लिया।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६१
की ओर झुकी हुई है। “राती”, “माती”, “पाती” आदि तुकान्त
पद दूसरी शैली के हैं। इनकी भावाभिव्यक्ति पूर्वोक्त पदो की अभि-
व्यक्ति से सर्वथा भिन्न पड़ती है। इन पर सतमत का ही स्पष्ट प्रभाव
है इनकी भाषा भी खडी बोली से प्रभावित ब्रजभाषा है।
१८
भीड छाडि बीर बैद मेरे पीर न्यारी है।
करक कलेजे मारी ओखद न लागै कारी।
तुम घरि जावो बैद मेरे पीर भारी है।
बिरहित बिरह बाढयो, तातै दुख भयो गाढो।
बिरह के बान ले बिरहनि मारी है।
चित ही पिया की प्यारी नेक हूँ न होवे न्यारी।
मीराँ तो आजार बाँध बैद गिरधारी है। ॥३०९॥
सूर्यनारायण जी चर्तुवदी के अनुसार यह पद मीराँ का नही अपितु
“मीराँ लीला” करन वालो का है। पद की शैली को देखते हुए मै भी
निसकोच उनका समर्थन करती हूँ।
१९
हरि बिन कूँण¹ गति मेरी।
तुम मेरे प्रतिपाल कहिये, मे रावरी चेरी।
आदि अत निज नाव तेरो, हिया मे फेरी।
बरि बेरि पुकारि कहू, प्रभु आरति है तेरी।
यो ससार बिकार सागर, बीच मे घेरी।
नाव फाटी प्रभु पाल बाधो, बूडत है बेरी।
विरहणी पिव की बाट जोवै, राखिल्यो नेरी²।
दासी मीराँ राम रटत है, मै सरण हूँ तेरी ॥३१०॥
१ कौण, २ निकट।
१६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा प्रमुखत ब्रजभाषा है। परन्तु “कूँण” “नेरी” आदि
दो एक राजस्थानी शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद की छठी पक्ति
मे “बेरी” शब्द का अर्थ स्पष्ट नही होता। बहुत संभव है कि बार बार
के अर्थ मे यहां “बेरी” का प्रयोग हुआ हो ।
२०
हरि तुम हरो जनु की भीर।
द्रौपदी की लाज राख्यो, तुम बढ़ायो चीर।
भक्त कारन रूप नरहरि, धार्यो आप सरीर।
हरिनकस्यप मार लीन्हो, धर्यो नाहि न धीर।
बूडते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दास मीरा लाल गिरधर, दुख जहाँ तहाँ पीर। ।।३११।।
अन्तिम पक्ति के उत्तरार्द्ध मे प्रयुक्त “पीर” शब्द निरर्थक
ही प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि “सीर” शब्द का एतदर्थ
द्योतक किसी अन्य शब्द का प्रयोग हुआ हो। “सीर” राजस्थानी
भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “साथ” या “साथ देने वाला”। अत
अर्थ देखते हुए “सीर” का प्रयोग उपयुक्त ही लगता है। पाठान्तर मे
“सीर” का प्रयोग मिलता भी है।
पाठान्तर १,
हरी तुम हरौ जन की भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुरत बढायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरी धार्यो नोहिन धीर।
बूडतो गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, करण कँवल पै सीर।
पाठान्तर मे “सीर” शब्द “सिर” या “मस्तक” के ही अर्थ मे
आया है। कहना सम्भव नही कि कौन पाठ प्रामाणिक है।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १९३
२१
मन रे परसि हरि के चरण।
सुभग सीतल कवल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण।
जिण चरण प्रहलाद परसे, इन्द्र पदवी धरण।
जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हे, राखी अपनी शरण।
जिण चरण ब्रह्मांड प्रभु परसि लीणो, तरी गौतम धरण।
जिण चरण काली नाग नाथ्यो, गोपी लीला करण।
जिण चरण गोबरधन धार्यो, इन्द्र को गर्व हरण।
दासी मीराँ लाल गिरधर, अगम तारण तरण। ॥३१२॥
पद की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है। अत प्रत्येक पंक्ति का प्रथम शब्द
“जिण” न होकर “जिन” होना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
२२
मै तो तेरी सरण परी रे, राम, ज्यूँ जाणे ज्यूँ तार।
अड़ेसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आयो, मन नाहि मानि हार।
या जग मे कोई नही आपणा, सुणियौ श्रवण मुरार।
मीरां दासी राम भरोसे, जग का फंदा निबार। ॥३१३॥
पद की तृतीय पंक्ति का उत्तरार्द्ध अर्थहीन है। बहुत सम्भव है
कि “सुणियौ कृष्ण मुरार” पाठ हो। ऐसा होने पर सम्बोधन की
पुनरुक्ति अवश्य हो जाती है, तथापि अर्थ संगति बैठ जाती है।
२३
नहि ऐसो जनम बारम्बार।
का जाणूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुसा अवतार।
बढत छिन छिन घटत पल पल, जात न लागे बार।
बिरछ के ज्यूँ पात टूटे, बहुरि न लागे, डार।
१३
१६४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
भौ सागर अति जोर कहिए, अनत उडी बार।
राम नाम का बाध बड़ो उतर परले पार।
ज्ञान चोसर, मडी चोहट्ट, सुरत पासा सार।
या दुनियाँ मे रची बाजी, जीत भावै हार।
साधु सन्त महन्त ज्ञानी, चलत करत पुकार।
दास मीराँ लाल गिरधर, जीवणाँ दिन च्यार। ॥३१४॥
पाठन्तर १,
नहि ऐसो जनम बारम्बार।
क्या जानूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुषा अवतार।
बढ़त पल पल, घटत छिन छिन, जात न लागे बार।
बिरछे के ज्यूँ पात टूटे, लगे नहि पुनि डार।
भव सागर अति जोर कहिए‘ विषम औखी धार।
सुरत का नर बाध बेड़ा, बेग उतरो पार।
साधु सन्ता ते गहन्ता, चलत करत पुकार।
दासी मीराँ लाल गिरधर, जी वणो दिन चार।
उपर्युक्त पद सूरदास जी के पद का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है
(देखिये “मीराँ, एक अध्ययन”)। पाठान्तर पर सन्त-मत का प्रभाव
स्पष्ट है।
२४
यहि विधि भक्ति कैसे होय।
मन की मैल हिये से न छूटी, दियो तिलक सिर धोय।
काम कूकर लोभ डोरी, बाधि मोहि चडाल।
क्रोध कसाई रहत घट मे कैसे मिले गोपाल।
बिर्लार विषया लालची रे, ताहि भोजन देत।
दीन हीन ह्वै क्षुधा तरसै, राम नाम न लेत।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६५
आप ही आप पुजाय कै रे, फूलै अंग न समात ।
अभिमान टीला किए बहु, कहु जल कहां ठहरात ।
जा तेरे हिय अन्तर की जाणे, तासो कपट न बनै ।
हिरदे हरि को नाव न आवे, मुख ते मणिया गणै ।
हरि हितु सो हेत कर, संसार आसा त्याग ।
दासी मीराँ लाल गिरधर, सहज कर वैराग ।॥३१५॥
इस पद पर सन्त-मत का प्रभाव बहुत स्पष्ट है।
२५
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बन्धु, अपना र्नहि कोई।
छाडि दई कुल की कान, क्या करेगा कोई।
सतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई।
चुनरी के किए टूक टूक, ओढ़ लीन्ही लोई।
मोती मूँगे उतार, बन माला पोई।
अंसुवन जल सीचि सीचि, प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैलि गई, आनन्द फल होई।
दूध की मथनिया, बडे प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढि लियो, छांछ पिये कोई।
आई मै भक्ति काज, जगत देखि रोई।
दासी मीराँ गिरधर प्रभु, तारो अब मोहि। ॥३१६॥
“दासी मीराँ गिरधर प्रभु” प्रयोग इस पद की विशेषता है।
२६
मेरे तो राम नाम, दूसरा न कोई।
दूसरा न कोई, सकल लोक जोई।