मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६७
पाठान्तर १;
सजन घर आवो जी मीठां बोला¹।
बिन देखे मोहे कल न पडत है, कर धर रही कपोला।
आवो निसक सक नहि कीजे, हिलमिल के रग घोला।
तेरे कारण सब सब रग तजिया, काजल तिलक तमोला।
मीराँ दासी जनम जनम की, दिल की घुंडी खोला।
पाठान्तर २,
साजन घर आवो जी मीठां बोला।
कब की ठाढी पथ निहारू, कर धर रही कपोला।
तन मन बार हिलमिल के रग घोला।
आतुर बिरहनी बिलब नही करना, आयां ही रग रहेला।
मीराँ तो गिरधर बिन देख्यां, छिन मासा छिन तोला।
५
राणा जी म्हारी प्रीत पुरबली, मै काई करू।
राम नाम बिन घड़ी न सुहावै, राम मिले म्हारा हियरा ठर्याय²।
भोजनिया नहि भावै, म्हाने नीदड़ली नही आय।
विष को प्यालो भेजियो जी, जावो मीराँ पास।
कर चरणामृत पी गई रे, म्हांरे राम जी को विस्वास।
विष का प्याला पी गई रे, भजन करै उस ठौर।
थारी मारी ना मरू, राखणहार और।
छापा तिलक बनाविया जी, मन में निश्चय धार।
राम जी काज संवारिया, म्हांने भावे गरदन मार।
पेट्या बासक भेजिया जी, यो छै मोतिडारो हार।
१ मधुर भाषी, २ ठढा होय
१६८ मीरां-बृहद्-पद-संग्रह
नाग गले पहरिया, म्हांरे महलां भयो उजार।
राठौड़ा री धीहडी जी, सिसोद्यां रे साथ।
ले जाती बैकुठ कूँ, म्हांरी नेक न मानी बात।
मीराँ दासी राम की जी, राम गरीब निवाज।
जन मीराँ को राखज्यो, कोई बांह गहे की लाज। ॥२६४॥
उपर्युक्त पद की कुछ पंक्तिया "विष को प्यालो भेजियो जी
म्हांरी नेक न मानी बात" और एक अन्य पद "मीराँ बैठी महल में उठत
बैठत राम" की पंक्तियां हूबहू है। इन पंक्तियो की अभिव्यक्ति भी
प्रथम तीन पक्तियो की अभिव्यक्ति से सर्वथा भिन्न पड़ती है। इस
पद की कुछ पंक्तियो मे निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता है। "राम
नाम बिन नही भावै, हिवडो झोला खाय" पद की पाचवी पंक्ति मे
"राम जी" के बदले "गोविन्द" शब्द का प्रयोग मिलता है। इसी
तरह अन्तिम दो पंक्तियो मे भी "राम" के बदले "श्याम" का प्रयोग
मिलता है। "मीराँ दासी" और "जन मीराँ" का एक ही साथ
प्रयोग इस पद की विशेषता है, जो विचारणीय है।
६
म्हांरा ओलगिया १ घर आज्यो जी।
सुख दुख खोलि कहूं अतर की, बेगा २ बदन ३ बताज्यो जी।
च्यार पहर च्यारू जुग बीत्या, नैणा नीद न आवै जी।
पूरण ब्रह्म अखंड अविनासी, तुम बिन बिरह सतावै जी।
नैणा नीर आम ज्यूँ झरण, ज्यूँ मेघ झरण लाया जी।
रतवती इत राम कत बिन, फिरत बदन बिलखाया जी।
साधू सजन मिलै सिर साटै, तन मन करूं बधाई जी।
जन मीराँ नै मिलौ कृपा करि, जनमि जनमि मितराई जी।
॥२६५॥
१ परदेशवासी प्रीयतम, २ शीघ्र, ३ मुख।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६९
७
जोगिया म्हांने दरस दियां सुख होइ।
नातरि दुखी जग माहि जीवडो, निसि दिन झूरै¹ तोइ।
दरस दिवानी भई बावरी, डोली सब ही देस।
मीराँ दासी भई है पडर,² पलट्ट्या काला केस। ॥२६६॥
८
तुम आवो जी प्रीतम मेरे, नित बिरहणी मारग हेरे।
दुख मेटण सुख दाइक³ तुम हौ, किरपा करिल्यौ नेरे⁴।
बहुत दिना की जोऊ मारग, अब क्यूँ कुरो रे अबेरे⁵।
आतर⁶ अधिक कहू किस आगे, आज्यौ मित⁷ सबेरे।
मीराँ दासी चरनन की, हम तेरे तुम मेरे। ॥२६७॥
९
प्यारे दरसन दीज्यौ रे, आइ रे आइ।
तुम बिन रह्यौ न जाइ रे जाइ।
जल बिन कंवल, चन्द बिन रजनी।
ऐसे तुम देख्या बिन सजनी।
किरपा करि कै बेग पधारो।
बिरह करेजा खाइ रे खाइ।
दिवस न भूख नीद नही नैना।
मुख सूँ कहत न आवै बैना।
१ किसी की विरह स्मृति मे शनै. शनै क्षीण होते जाना, २-सफ़ेद, ३ देने
वाले, ४ निकट, ५ देर, ६ आतुरता, ७ मित्र, राजस्थानी मे 'मीत' प्रणय
जनित मित्रता को ही कहते हैं।
४. राणा प्रबोध एवं विष-पान प्रसंग
१७० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन।
मिलि करि ताप बुझाइ रे बुझाइ।
क्यूं तरसावो अतरजामी।
आण मिलो किरपा करि स्वामी।
मीराँ दासी जनम जनम की।
पडूँगी तुम्हारे पांइ रे पाइ ॥२६८॥†
इस पद की शैली “आइं रे आइ” आदि प्रयोग अन्य पदो से
सर्वथा विभिन्न पड़ती है। पद की चतुर्थ पंक्ति मे “सजनी” शब्द का
प्रयोग भी विचारणीय है। हिन्दू दर्शन के आधार पर कही भी आराध्य
को “सजनी” के रूप मे नही देखा गया है। पद मे व्यक्त भावना भी
प्रायः इन्ही शब्दो मे अन्य पदो मे मिल जाती है। मेरे विचार से ऐसे
पदो को विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से बना हुआ लोकगीत ही समझना
अधिक उपर्युक्त प्रतीत होता है। डा० श्री कृष्ण लाल के मतानुसार
यह पद सम्भवत रैदास का हो सकता है।
१०
माई म्हारी हरी हू न बूझी¹ बात।
पिंड मा² सूं³ प्राण पापी, निकसी क्यूं नहि जात।
पाट न खोल्या मुखां न बोल्या, साझ भई परभात।
अबोलणाँ⁴ जुग बीतण लागे, हो काहे की कुसलात।
सावण आवण कह गया रे, हरि आवन की आस।
रैण अधेरी, बीज चमकै, तारा गिणत निरास।
लेइ कटारी कठ सारू, मरूंगी विष खाइ।
मीराँ दासी राम राती, लालच ही ललचाइ। ॥२६९॥
१ पूछी, हरि ने मेरी परवाह नही की, २ मे, ३ से, ४ अनबोले, बिना
बोले हुए।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७१
पाठान्तर १,
माई म्हांरी हरि न बूझी बात।
पिंडं मे से प्राण पापी, निकस क्यूं नही जात।
रैण अधेरी, बिरह घेरी, तांरा गिणत निसी जात।
ले कटारी कठ चीरू, करूगी अपघात¹।
पाट² न खोल्या, मुखा न बोल्या, साझि लग परभात।
अबोलना मे अवधि बीती, काहे की कुसलात।
सुपन मे हरि दरस दीन्हो, मै न जाण्यो हरि जात।
नैना म्हारा उघडि आया, रही मन पछतात।
आवण आवण होय रह्यो री, नही आवण की बात।
मीराँ व्याकुल बिरहणी रे बाल ज्यो बिललात।
पद विशेष महत्वपूर्ण है। अभिव्यक्ति के आधार पर पद को दो
अंशो मे बाटा जा सकता है। “माई ... कुसलात” अर्द्धांश
से आराध्य की निकटता और अप्रसन्नता ही सिद्ध होती है।
परन्तु “सावण आवण तारा गिणत निरास” से वियोग की ही
स्थिति स्पष्ट हो उठती है। प्रथम पाठ की अन्तिम दोनो पक्तियो
को उपर्युक्त दोनो ही अभिव्यक्तियो के साथ घटाया जा सकता है।
द्वितीय पद की आठवी पंक्ति की भावना विशेष विचारणीय है।
पश्चात्ताप की अभिव्यक्ति दो एक अन्य पदो मे भी मिलती है।
पद की प्रमुख भावना के अनुसार आराध्य की निकटता और
अप्रसन्नता ही व्यक्त होती है। इस अप्रसन्नता से ऊबकर मीराँ
आत्महत्या का भी निश्चय कर लेती है, परन्तु आराध्य दर्शन के लोभ मे
वह भी नही कर पाती । ऐसी अभिव्यक्ति किसी भी अन्य पद मे
नही प्राप्त होती। अत उपर्युक्त पद विशेष रूप से विचारणीय है।
१ आत्महत्या, २ दरवाजा या पर्दा, ।
१७२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
११
कुण१ बांचे पाती , प्रभु बिन कुण बांचे पाती ।
कागद लै ऊधौ जी आए, कहा रहै साथी ।
आवत जावत पांव घिसा रे, (वा'ला) अखियां भई राती ।
कागद लै राधा बांचण बैठी, भर आई छाती ।
नैन नीरज अब बहै, (वा'ला) गंगा बहि जाती ।
पानां ज्यूं पीली पड़ी रे, (वा'ला) अन्न नही खाती ।
हरि बिन जिवड़ो यूँ जलै रे, (वा'ला) ज्यू दीपक संग बाती ।
साचां कुछ चकोर चंद, धोलै बहि जाती ।
ब्रज नारी की बिनती रे, (वा'ला) राम मिले मिलजाती ।
मनै भरोसा राम को रे, (वा'ला) डूबत नार्यै हाथी ।
दास मीरां लाल गिरधर, सांकड़ारो२ साथी । ॥२७०॥†
इस पद मे जगह जगह 'हरि' शब्द का प्रयोग हुआ है। 'हरि'
शब्द के बदले कही 'राम' और कही 'कृष्ण' प्रयोगयुक्त पाठान्तर भी
मिलते है। 'रे', 'वा'ला', 'जी' आदि शब्दो का प्रयोग अधिकांश राजस्थानी
लोक-गीतो मे होता है। लय की पूर्ति ही इनका एकमात्र उदेश्य है।
पद के प्रारम्भ मे ऊधव के पत्र लेकर आने का वर्णन है, परन्तु शेष
पद मे ऊधव की कोई चर्चा नही है। पद विचारणीय है।
१२
रावलौ बिडद मोहि रूड़ो३ लागे, पीड़ित पराये प्राण ।
सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान ।
ग्राह गह्यो गजराज उबार्यो, बूड न दियो छै जान४ ।
मीराँ दासी अरज करत है, नाही जी सहारो आन । ॥२७१॥
'बैरी सकल जहान" जैसी अभिव्यक्ति विचारणीय है। तयाकथित
मीराँ के पदों मे यही एक पद ऐसा है जिसमें 'हारे को हरिनाम' जैसी
भावना व्यक्त होती है।
१ कौन, २ बुरे दिन, ३ अच्छा, ४ ब़ारात ।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७३
१३
तुम जीमों गिरधर लाल जी।
मीराँ दासी अरज करै छे, सुनिए परम दयाल जी।
छप्पन भोग छतीसो विजन,¹ पावो जन प्रतिपाल जी।
राज भोग आरोगो² गिरधर, सनमुख राखो थाल जी।
मीराँ दासी चरण उदासी, कीजै बेग निहाल जी। ॥२७२॥
पद के प्रारम्भ और अन्त मे मीराँ दासी का प्रयोग हुआ है।
एक ही पद मे ऐसी पुनरुक्ति युक्त पद यह एक ही है। अन्तिम चरण मे
“चरण उदासी” प्रयोग सम्भवत उदासी सम्प्रदाय के प्रभाव का
द्योतक है।
१४
तुम जीमो गिरधर लाल जू।
मीराँ दासी अरज करै छै, मोकूँ करों निहाल जू।
या बिरियां² है बालबोग की, लीज्यो चित मे धार जू।
केसर अतर पुष्प के हरवा, इण विध करो सिणगार जू।
छप्पन भोग छतीसो विंजन, लाई भर भर थाल जू।
पान गिलोरी सुगध मिलाकर, कीनी है सब त्यार जू।
मीराँ दासी परिक्रमा की, मौकूँ करौ निहाल जू। ॥२७३॥†
उपर्युक्त दोनो पदो का गहरा साम्य विचारणीय है। सम्भवत
दोनों ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर हो।
१५
पिया तेरे नाम लुभाणी हो।
नाम लेत तिरता सुण्या, जैसे पाहण पाणी हो।
सुगिरत कोइ न कियो, बहु करम कुमाणी हो।
१ भोजन करो, २ समय।
१७४ मीरॉँ-बृहद्-पद-संग्रह
गणिका कीर पढांवता, बैकुठ बसाणी१ हो।
अरध नाम कुजर लियो, बाकी अवध घटाणी हो।
गरुड़ छाडि हरि धाइया, पसु जून२ मिटाणी हो।
नाम महातम गुरु दियो, परतीत३ पिछाणी हो।
मीराँ दासी रावली, अपणी कर जाणी हो। ॥२७४॥
इस पद मे गुरु की चर्चा और पौराणिक गाथाओ का वर्णन मिलता
है जिससे सत और वैष्णव , दोनो ही मतो का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।
१६
कहो तो गुण गाऊ रे, भजै राम राम सुवा, कहो तो गुण गांऊ रे।
सार की सलियाँ४ को सूवा, पींजरो बणाऊ रे।
पींजरा मे आव सूवा, हाथ सूं हलाऊं रे।
घीव कर घबिर सूवा, मो लापसी५ रधाऊं६ रे।
आम ही को रस सूवा, घोल घोल पाऊ रे।
कचन कोटि महल मन्दिर, मालिया झुकाऊ रे।
मालिया मे आव सूवा, मोतिडा बधाऊ रे।
बैठक करो तो सूवा, चादणी बिछाऊं रे।
प्रेम ही प्रताप सूवा, झाझरी बजाऊं रे।
जाई जाबूं केतकी सूवा, फूलडा सुंघावूं रे।
केसर भरियो बाटको सूवा, अक चरचाऊ रे।
मीराँ दासी सूवा राम की राती, चरणा ही चित लगाऊ रे।
॥२७५॥†
१ बसा दिया, २ योनि, ३ विश्वास, ४ सीक, ५ गेहूँ से बनाया गया
मीठा दलिया, ६ बना पाऊँ।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७५
१७
नहि जाऊ सासरे, माई, म्हाने मिलिया छै सिरजणहार।
सासू हरी सुमरना रे, सुसरो परम संतोष,
जेठ जुगा रो राजवी, रे, पिंव रह्यो निरदोष।
देवर के दोय डीकरी रे, दौन्यौ ही राजकुमारी,
एकै सब जग मोह्यो री, एक रही ब्रह्मचारी।
लाख चौरासी चुडलो रे वा'ला, पहिरियो पिया जी रे काज।
बॉह पकड़ी हरी लै चाल्या, मोहि दिना छै अविचल राज।
साधां मे म्हारो सासरो रे, पिया को बैकुठा बास।
फेरि न काल मे आवस्यां जी, यूं गावै छै मीरा दास ॥२७६॥†
इस तरह का एक पद गुजराती मे भी मिलता है। 'डीकरी'
(पुत्री) जैसे शब्द से भी इस पद की भाषा पर गुजराती प्रभाव स्पष्ट
हो जाता है।
१८
दीजो म्हाने द्वारिका को बास, रूड़ा रणछोड़ जी हो।
सुथान बासो नाम हरि को, माला लिये गुणकार।
सकल तीरथ गोमती रे वा'ला, सावरियां सिरदार।
पपैया ने मेघ पियारो, माछरी मध¹ नीर।
म्हांनै तो गिरिधर ही पियारो, छाड़यो जगत सूं सीर।
तजियो पीहर, सासरो तजियो, सहियो उपहास।
राणा जी रो बस तजियो, राखो रावल² पास।
मथुरा मे हरि जन्म लिया जी, कियो द्वारका बास।
सहस गोप्या रे, बालमो, गावै मीरां दास् ॥२७७॥
१ बीच, २ तुम्हारे।
१७६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
द्वारका रो बास दीज्यो, म्हाने द्वारका रो बास ।
सुथान बासो नाम हरिको, जिन रो भोज न पार ।
सकल तीरथ गोमती रे वाँ'ला, सावलिया सिरदार ।
पपीया ने मेघ प्यारो, मछली जल पास नीर ।
म्हाने तो म्हारो साहिब प्यारो, छाड़चो जगत को आस (पास) ।
तजियो पीहर, सासरो तज्यो, सब उपवास ।
राणा जी रो पासँ तजियो, राख्यो रावल पास ।
गोकुल सूं प्रभु मथुरा आये, भये द्वारिका बास ।
सहस गोप्या रो बालमो रे, गावै मीराँ दास ।
१९
द्वारिका को बास हो, मोहि द्वारका को बास ।
संख चक्र पद्म हूं ते, मिटे जग त्रास ।
सकल तीरथ गोमती मे करत निवास ।
सख झालरि झांझ बाजै, सदा सुख की रास ।
तजियो देसोबेस, पति गृह तज्यो, सम्पत्ति राजि ।
दासी मीराँ सरन आई, तुम्हे अब सब लाजि । ॥२७८॥
पाँचवी पंक्ति के द्वितीयार्द्ध का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त
होता है .— “तजियो राणा राज” ।
उपर्युक्त दोनों पदो मे साम्य विचारणीय है ।
स्व० पुरोहित जी के शिष्य और सहयोगी पंडित सूर्य नारायण
जी चतुर्वेदी के अनुसार यह पद किसी “मीराँ दास” कवि का प्रतीत
होता है। इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सम्भवत ऐसे
“मीराँ दास” या “दासी मीराँ” प्रयोग युक्त सभी पद इन्ही उप-
र्युक्त कवि के हो। यह “मीराँ दास” कवि कौन और कहा के थे ?
इनका रचना काल क्या था ? आदि बातें जाने बिना इस विषय पर कुछ
"दासी" और "जन" प्रयोग युक्त पद १७७
कहना सर्वथा ही भ्रामक होगा। पद स० १७ और १८ तथा इनके पाठा-
न्तर तथा और भी कुछ पद ऐसे मिलते है जिनमे (मीरा दास)
प्रयोग मिलता है। अत इन्ही के आधार पर किसी नवीन सिद्धान्त
का प्रतिपादन नही किया जा सकता।
२०
म्हाँरा सतगुरु बेगा आज्यो जी, म्हाँरी सुख री सीर¹ बुहावज्यो² जी ।
तुम बिछडियाँ दुख पाऊँ जी, मेरा मन माही मुरझाऊँ जी ।
मै कोयल ज्यूँ कुरलाऊँ जी, कुछ बाहर कहि न जगाऊँ जी ।
मोहि बाधण³ बिरह सतावै जी, कोई कहिया पार न पावै जी ।
ज्यूँ जल त्याग्या मीना जी, तुम दरसन बिन खीना जी ।
ज्यूँ चकवी रैण भावै जी, वा ऊगो⁴ भाण⁵ सुहावै जी ।
ऊ दिन कबै करोला जी, म्हाँरे ऑगण पाँव धरोलाँ जी ।
अरज करै मीराँ दासी, गुरु पद रज की मै प्यासो जी ॥२७९॥†
पद की भाषा शुद्ध जोधपुरी बोली है ।
१ वह धार विशेष जो सन्तान प्रेम के कारण माता के स्तनौ से स्वत
फूट निकलती है, २ बहा देना, ३ बाघिन, ४ उदित हुआ, ५ सूर्य ।
१२
१७८
मीरां-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
ऐसो पिया जान न दीजै हो।
सब सखिया मिलि राखिल्यो, नैनां सुख लीजै हो।
स्याम सलोनी सावरो, मुख देखत जीजै हो।
जिण जिण विधियां हरि मिलै, सोही विधी कीजै हो।
चन्दन काला नाग ज्यूँ, लपटाइ रहीजै हो।
चलो सखी री वहां जइयै, वाको दरसन कीजै हो।
बाहु काधै मेलिकै, तन लूमि रहीजै हो।
प्यालो आयो जहर को चरणोदक लीजै हो।
मीरां दासी वारणै, अपनी कर लीजै हो। ॥२८०॥†
“प्यालो लीजै हो” पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही
होता। यह पद अधिकाश कीर्तन-मडली के पदो की लय पर ही है।
२
हे मेरो मन मोहना।
आयो नाहि सखी री, हे मेरो मन मोहना।
कै कहूं काज किया सतन का कै कहू गैल भुलावना।
कहा करू कित जाऊं मोरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना।
मीरा दासी दरसण प्यासी, हरि चरणो चित लावणा ॥२८१॥
३
वारी वारी हो रामा हू वारी, तुम आज्यौ गली हमारी।
तुम देख्यां बिन कल न पड़त है, जोऊ बाट तुम्हारी।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७९
कुण१ सखी सू तुम रगराते, हम सू अधिक पियारी।
किरपा कर मोहि दरसण दीज्यो, सब तकसीर बिसारी।
तुम सरणागत परम दयाला, भव जल तार मुरारी।
मीराँ दासी तुम चरणन कों, बार बार बलिहारी। ॥२८२॥
४
वैद को सारो२ नहि रे माई, वैद को नही सारो।
कहित ललिता वैद बुलाऊ, आवैं नन्द को प्यारो।
वो आया दुख नाहि रहैगो, मोहि पतियारो।
वैद आय कर हाथ जो पकड़्यो, रोग है भारो।
परम पुरुष की लहर व्यापी, डस गयो कारो। ॥२८३॥†
इस पद मे मीराँ का नाम कही भी नही आया है। कही कही
निम्नाकित दो और पक्तिया भी उपर्युक्त पद मे ही जुडी मिलती है।
जिसमे “दासी मीरा लाल गिरधर” का प्रयोग हुआ है।
“मोर चन्दो हाथ ले हरि, देत है झारी।
दासी मीराँ लाल गिरधर, विष कियो न्यारी।”
५
अच्छे मीठे चाख चाख, बेर लाई भीलणी।
ऐसी कहा अचाखती ,रूप नही एक रती।
नीच कुल ओछी जात, अति ही कुचालणी।
झूठे फल लीन्हे राम, प्रेम की प्रतीत३ जाण।
हरिजू सो बाँध्यो हेत, बैकुण्ठ मे फूलणी।
ऐसी प्रीत करे सोई, दरस मीराँ तेरे जोई।
पतित पावन प्रभु गोकुल, अहीरणी ॥२८४॥* •
१ कौन, २ बूता, ३ विश्वास।,
१८० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
६
्रभू, मेरा बेड़ा पार बाधान्यो जी।
मै निगुनी मे गुन नाही प्रभु जी, औगुण चित्त मत लाज्यो जी ।
काड़ खडग राणा जी कोप्या, गरुढ चढ् या हरि आज्यो जी ।
विषरा प्याला राणा जी भेज्या, चरणामृत करि पीज्यो जी ।
काया नगर मे घेर पड़्या छै, ऊपर आयर कीज्यो जी ।
मीराँ दासी जनम जनम की, कठ लगाया कर लीज्यो जी ॥२८५॥†
पदभिव्यक्ति असगत है। राणा जी के द्वारा 'खडग' प्रहार की
कथा पद की प्रामाणिकता मे विशष सदेह उपस्थित करती है। पद
की शैली भी इस सदेह.का समर्थन करती है।
७
मेरी कानां१ सुणज्यो जी करुणा निधान।
रावरो विरद मोय खांड रे, सो लागै परत पराये प्राण।
सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान ।
ग्रह ग्रह्यो गजराज उबार्यो, बूड न दीनो न जान ।
मीराँ दासी अरज करत है, नही जी सहारो आन ॥२८६॥
द्वितीय पक्ति की अभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। इस पक्ति मे प्रयुक्त
'परत' शब्द के बदले कही कही पीडित शब्द मिलता है।
८
[ जोगिया के कहज्यो जी आदेस।
जोगिया चतुर सुजाण सजनी, ध्याव२ सकर सेस।
आवूँगी मै नाह रहूगी, रे म्हांरा' पिव बिन परदेस।
१ कानो से सुनो, ध्यान देकर सुनो, २ ध्यान लगाता है।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८१
करि किरपा प्रतिपाल मो परि, रखो न आपण देस ।
माला मुद्रा भेखला¹ रे, बाला खप्पर लूँगी हाथ ।
जोगिण होय जुग ढूँढसूं रे,म्हारा रावलिया² री साथ ।
सावण आवण कहि गया रे, कर गया कौल अनेक ।
गिणता गिणता घस गई रे, म्हांरा आंगलियारी रेख ।
पिव कारण पीली पडी रे, बाला जोबन वाली बेस³ ।
दास मीराँ राम भजि कै, तन मन कीन्हौ पेस ॥२८७॥
पद की भाषा प्रमुखत राजस्थानी है। परन्तु अधिकाश क्रिया
पदो पर खड़ी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। सम्भवत गेय परम्परा ही
इसके लिये उत्तरदायी हो।
९
जोगिया ने कहियो रे आदेस ।
आऊँगी मै नाही रहू रे, कर जटाधारी भेस ।
चीर को फोडू ँ कथा पहिरू, लेऊगी उपदेस ।
गिणते गिणते घिस गई रे, ऊगलियो की रेख ।
मुद्रा माला भेखलू, रे खप्पड लेऊ हाथ ।
जोगिन होय जुग ढूँढसँ रे, रावलिया के साथ ।
प्राण हमारा वहाँ बसत है, यहाँ तो खाली खोड़ ।
बात पिता परिवार सूं रे, रही तिनका तोड़ ।
पाँच पचीसो बस किए, मेरा पल्ला न पकड़े कोय ।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, कोई आय मिलावै मोय ॥२८८॥
इस पद पर खडी बोली का प्रभाव और भी स्पष्ट हो जाता है।
उपर्युक्त पाठ की द्वितीय पक्ति के उत्तरार्द्ध मे निम्नाकित पाठ भेद
भी मिलता है :--
“कर जोगन को भेस ।”
१ पहन लूँ, वेष धारण कर लूँ, २ पति, .३ वयस।
१८२ मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
१०
जोगिया ने कहजो जी आदेस।
आऊगी पण नही रहू, बाला, कर जोगिन को भेस।
प्राण हमारा वहा बसत है, यहा तो खाली खोड।
मात पिता अरु सकल कुटुम्ब सो, रही तिणका ज्यूँ तोड।
दड कमडल गूदड़ी रे बाला, कियो नबेलो सनेह।
प्रीतम अजहू न आइया, म्हारे योही¹ बडो सनेस²।
गुरु को सबद कान मे पहिरू, अग विभूति रमाके।
जा कारण मै जगत न जोरै बाला, बालावा रे फसि मै जाके।
पाच पचीसूँ बस कर राखूँ, म्हारी पल्ली न पकड़ो कोय।
मीराँ व्याकुल विरहणी रे बाला, हरि मिलीया सुख होय ॥२८९॥
उपर्युक्त तीनो पदो के प्रथम अर्द्धाश मे गहरा साम्य हो उठता है।
परन्तु जहाँ प्रथम दो पद मे सिर्फ नाथ प्रभाव ही स्पष्ट हो उठता
है, वहाँ इस तीसरे पद पर सतमत का ही प्रभाव है। इस पद की भाषा
पर खडी बोली का प्रभाव भी अधिक है।
११
राख कमडल गूदडी रे बाला, कियो नेवलो भेष।
प्रीतम ओज्यूँ³ नै आइया, यो है बडो अनेस।
गुरु को शब्द कान मे पहिरू, अग विभूति रमाय।
जा कारण मै जगत तज्यो है, भौरे लागी आय।
पाच पचीसा बस करू, पलो न पकडे कोय।
मीराँ व्याकुल विरहणी, हरि मिल्या सुख होय ॥२९०॥†
यह पद उपर्युक्त तीनो पदो के सम्मिश्रण से बना हुआ गेय रूपा-
न्तर प्रतीत होता है। इस पाठ की प्रथम पक्ति विशेष विचारणीय है।
१ यही, २ आशका, ३ फिर से अर्थात् लौटकर।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८३
१२
जोगिया जी दरसण दीजंयो आइ।
तेरे कारण सकल जग ढूँढया, घर घर अलख जगाइ।
खान पान सब फीको लागै, नैणां नीर न माइ१।
बहुत दिनां के बिछुरे प्यारे, तुम देख्यां सुख पाइ।
मीराँ दासी तुम चरणां की, मिलज्यो कंठ लगाइ ॥२९१॥
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
सखी मन स्याम सूरत बसी।
मुकुट कुडल करन बसी, मंद मुख पर हँसी।
बावरी कोऊ कहै मो को, कोई कहै कुलनासी।
हस्ती की असवारी२, पाछै लाख कुतिया भुसी।
तजियो घूँघट लई गाती, सत देख्या खुसी।
सील चोल पहन गल मे, भक्त मारग घुसी।
ओस पानी नाहि पियो, छांह बादर किसी।
दासि मीराँ लाल गिरधर, प्रेम फंदे फँसी ॥२९२॥
२
पिया अब घर आज्यो मोरे, तुम मेरे३ हू तोरे।
मै जन तेरा पथ निहारूं, मारग चितवत तोरे।
अवध बदीती अजहूं न आये, दुतियन सूं नेह जोरे।
मीराँ कहै प्रभु कब रे मिलोगे, दरसन बिन दोरे४ ॥२९३॥
१ समाय, २ सवारी का राजस्थानी अपभ्रंश, ३ में, ४ दुखमय।
१८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है, यद्यपि दो एक राजस्थानी
शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद के बीच मे ही “मै जन” का प्रयोग
अन्य पदो से सर्वथा पृथक पडता है।
३
कैसे जिऊ री माई, हरि बिन कैसे जिऊ री।
उदक दादुर पीनवत है, जल से ही उपजाई।
पल एक जल कूँ मीन बिसरे, तलफत मर जाई।
पिया बिन पीली भई रे, ज्यो काठ घुन खाय।
औषध भूल न सचरै रे, बाला, बैद फिरि जाय।
उदासी होय बन बन फिरू, रे बिथा तन छाई।
दासी मीराँ लाल गिरधर, मिल्या है सुखदाई ॥२९४॥
सम्पूर्ण पद से वियोग ही लक्षित होता है, तथापि अतिम पक्ति
से मिलन की ही अभिव्यक्ति होती है।
४
मै हरि बिन क्यो जिऊ री माय।
पिय कारण बौरी भयी, जस काठ ही घुन खाय।
औषद भूल न सचरे, मोहि लागो बौराय।
कमठ दादुर बसत जल मह, जल ही ते उपजाय।
मीन जल के बिछुरे तन, तलफि के मर जाय।
पिय ढूँढन बन बन गई, कहु मुरली धुन पाय।
मीराँ के प्रभु लाल गिरधर, मिल गए सुखदाय ॥२९५॥
इस पद की तुलना मे प्रथम पद से पूर्वापर सगति अधिक है।
५
प्रभु बिन ना सरै माई।
मेरा प्राण निकस्या जात, हरि बिन ना सरै माई।
कमठ दादुर बसत जल में, जल से उपजाई।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८५
मीन जल से बाहर कीन्हा, तुरत मर जाई।
काठ लकरी बन परी, काठ घुन खाईं।
ले अगन प्रभ डारि आए, भेसम हो जाई।
बन बन ढूंढत मै फिरी, आली सुध नहि पाई।
एक बेर दरसण दीजैं, सब कसर मिटि जाई।
पात ज्यूँ पीरी परी, अरु विपत तन छाई।
दासि मीराँ लाल गिरधर, मिल्या सुख छाई॥२९६॥
उपर्युक्त दोनो सम्मिश्रण से बना हुआ पद ही कुछ परिवर्त्तन के
साथ स्वतंत्र पद के रूप मे चल पडा है। शेष पदाभिव्यक्ति से समन्वय
नही होता, यह एक विशेष विचारणीय बात है।
६
मै अपने सैया सग साची।
अब काहे की लाज सजनी, परगट हूवै नाची।
दिवस भूख न चैन कबहिन, नीद निसु नासी।
बेध वार को पार हवैगो, ज्ञान गुह गासी।
कुल कुटुम्ब सब आनि बैठे, जैसे मधुमासी।
दास मीराँ लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी॥२९७॥
उपर्युक्त पद का समर्पण द्योतक पद (स० १) से गहरा साम्य
है। दोनो ही पदो पर सत-मत का गहरा प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।
परिवार और समाज का गहरा विरोध कई पदो से अत्यन्त
सुस्पष्ट हो उठता है तथापि उनके लौट आने की अभिव्यक्ति इस पद की
विशेषता है।
७
राणा जी, सांवरे रग राची।
कोई निरखत कोई हरखत है जी।
१८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
कोई करत है हासी, कोई साची।
ताल मृदग बाजै मन्दिर मे, हौ हरि आगे नाची।
मीराँ दासी गिरधर जू की, जनम जनम की जाची ॥२९८॥
पदाभिव्यक्ति से वैष्णव परम्परा का प्रभाव ही सुस्पष्ट हो उठता है।
८
माई मे तो गिरधर के रग राची।
माई हू स्याम केृ रग राची।
मेरे बीच परो मत कोऊ, बात चहु दिसी माची।
जागत रैनि रहै उर ऊपर, ज्यूँ कंचन मणि खाची।
होय रही सब जग मे जाहर, फेरि प्रगट होय नाची।
मिलि निसान बजाय कृष्ण सूं, ज्यो कछु कहो सो साची।
जन मीराँ गिरधर की प्यारी, मोहबत है नाहि काची ॥२९९॥†
उपर्युक्त पद की भाषा और अभिव्यक्ति दोनो ही विचारणीय है।
अभिव्यक्ति मे वह सरस गाम्भीर्य नही जो मीराँ के पदो की विशेषता
है। पद की तृतीय पक्ति अर्थ-हीन है। 'जन मीराँ' का प्रयोग पद की
प्रामाणिकता मे सदेह की पुष्टि करता है।
९
माई मे तो गिरधर रंग राची।
मेरे बीच पडो मत कोई बात चहू दिस माची।
जो मन सार मेरे मन उपज्यो, ज्यो कंचन मणि साँचो।
और सब हीरो हो सिर ऊपर, मै परगट होय नाची।
मुलक¹ निसान बजावा कृष्ण के, जे कोई कहो सोई सांची।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मो मति नही कांची ॥३००॥†
१ हँस कर, खुश होकर ।