सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 365 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

१७० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन।
मिलि करि ताप बुझाइ रे बुझाइ।
क्यूं तरसावो अतरजामी।
आण मिलो किरपा करि स्वामी।
मीराँ दासी जनम जनम की।
पडूँगी तुम्हारे पांइ रे पाइ ॥२६८॥†
इस पद की शैली “आइं रे आइ” आदि प्रयोग अन्य पदो से
सर्वथा विभिन्न पड़ती है। पद की चतुर्थ पंक्ति मे “सजनी” शब्द का
प्रयोग भी विचारणीय है। हिन्दू दर्शन के आधार पर कही भी आराध्य
को “सजनी” के रूप मे नही देखा गया है। पद मे व्यक्त भावना भी
प्रायः इन्ही शब्दो मे अन्य पदो मे मिल जाती है। मेरे विचार से ऐसे
पदो को विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से बना हुआ लोकगीत ही समझना
अधिक उपर्युक्त प्रतीत होता है। डा० श्री कृष्ण लाल के मतानुसार
यह पद सम्भवत रैदास का हो सकता है।
१०
माई म्हारी हरी हू न बूझी¹ बात।
पिंड मा² सूं³ प्राण पापी, निकसी क्यूं नहि जात।
पाट न खोल्या मुखां न बोल्या, साझ भई परभात।
अबोलणाँ⁴ जुग बीतण लागे, हो काहे की कुसलात।
सावण आवण कह गया रे, हरि आवन की आस।
रैण अधेरी, बीज चमकै, तारा गिणत निरास।
लेइ कटारी कठ सारू, मरूंगी विष खाइ।
मीराँ दासी राम राती, लालच ही ललचाइ। ॥२६९॥
१ पूछी, हरि ने मेरी परवाह नही की, २ मे, ३ से, ४ अनबोले, बिना
बोले हुए।