मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६९
७
जोगिया म्हांने दरस दियां सुख होइ।
नातरि दुखी जग माहि जीवडो, निसि दिन झूरै¹ तोइ।
दरस दिवानी भई बावरी, डोली सब ही देस।
मीराँ दासी भई है पडर,² पलट्ट्या काला केस। ॥२६६॥
८
तुम आवो जी प्रीतम मेरे, नित बिरहणी मारग हेरे।
दुख मेटण सुख दाइक³ तुम हौ, किरपा करिल्यौ नेरे⁴।
बहुत दिना की जोऊ मारग, अब क्यूँ कुरो रे अबेरे⁵।
आतर⁶ अधिक कहू किस आगे, आज्यौ मित⁷ सबेरे।
मीराँ दासी चरनन की, हम तेरे तुम मेरे। ॥२६७॥
९
प्यारे दरसन दीज्यौ रे, आइ रे आइ।
तुम बिन रह्यौ न जाइ रे जाइ।
जल बिन कंवल, चन्द बिन रजनी।
ऐसे तुम देख्या बिन सजनी।
किरपा करि कै बेग पधारो।
बिरह करेजा खाइ रे खाइ।
दिवस न भूख नीद नही नैना।
मुख सूँ कहत न आवै बैना।
१ किसी की विरह स्मृति मे शनै. शनै क्षीण होते जाना, २-सफ़ेद, ३ देने
वाले, ४ निकट, ५ देर, ६ आतुरता, ७ मित्र, राजस्थानी मे 'मीत' प्रणय
जनित मित्रता को ही कहते हैं।