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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

with म, and right next to it is a vertical line!
Then comes नां (a न with a vertical line and a dot)!
Wait, look at सद्मानां:
Wait, does it say सद्मानां?
Let's look at सद्मानां vs सद्मनां:
Wait, look at the character after द्:
Is it म?
Wait, look at the bottom: it has a loop of म.
And then a vertical stroke.
Then another letter: नां.
Wait, or is it सद्मनां?
Either सद्मानां or सद्मनां. Let's look at the width:
"सद्मानां" has about the same width as "स्तम्भानां" in line 15.
In line 15: स्तम्भानां has 4 glyphs (स्त, म्भा, नां).
In line 24: the first word has स, द्, म, ा, न, ा... it takes almost the same space!
Wait, look at the length of सद्मानां vs परिवाराणां:
परिवाराणां has 5 letters.
The first word has 3 letters.
It looks like सद्मानां!
Wait, let's search if `सद्मानां

प्रथमोऽध्यायः 卐 संग्रहाध्यायः ३
यानानां शयनानां च लक्षणं लिङ्गलक्षणम् ।
पीठस्य लक्षणं सम्यगनुकर्मविधिं तथा ॥१०॥
तदनन्तर यान के लक्षण, शयन के लक्षण, लिङ्ग ( देवलिङ्ग ) एवं उनके पीठ
के लक्षण एवं उसके अनुरूप उचित कर्म की विधि वर्णित है।।१०।।
प्रतिमालक्षणं देवदेवीनां मानलक्षणम्।
चक्षुरुन्मीलनं चैव संक्षिप्याह यथाक्रमम् ॥११॥
देवालय के प्रसङ्ग में मूर्ति के लक्षण, देवता एवं देवियों के प्रमाण का लक्षण,
नेत्रों के उन्मीलन की विधि क्रमानुसार संक्षेप में वर्णित है।।११।।
✵ ग्रन्थप्रामाण्यकथनम् ✵
पितामहाद्यैरमरैर्मुनीश्वरै-
र्यथा यथोक्तं सकलं मयेन तत्।
तथा तथोक्तं सुधियां दिवौकसां
नृणां च युक्त्याखिलवस्तुलक्षणम् ॥१२॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे संग्रहाध्यायः प्रथमः
ब्रंह्मा आदि देवों ने एवं श्रेष्ठ मुनियों ने जिस प्रकार विद्वानों, देवों एवं मनुष्यों के
सम्पूर्ण भवनलक्षणों का उपदेश किया है, उसी प्रकार मय ऋषि ने उन सभी लक्षणों
का वर्णन प्रस्तुत किया है।।१२।।

अथ द्वितीयोऽध्यायः
( वस्तुप्रकारः )
✹ वस्तुभेदाः ✹
अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि।
तद् वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदं च वदाम्यहम् ॥१॥
आवास एवं भूमि के प्रकार—अमर ( देव ) एवं मरणधर्मा ( मनुष्य ) जहाँ-
जहाँ निवास करते हैं, विद्वज्जन उसे वस्तु ( वास्तु ) कहते हैं। उन निवासस्थलों के
भेदों का मैं ( मय ऋषि ) वर्णन करता हूँ॥१॥
भूमिप्रासादयानानि शयनं च चतुर्विधम्।
भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥२॥
वास्तु चार प्रकार के होते हैं—भूमि, प्रासाद ( देवालय ), यान एवं शयन। इनमें
प्रधान वास्तु भूमि ही है; क्योंकि शेष इसी से उत्पन्न होते हैं॥२॥
प्रासादादीनि वास्तूनि वस्तुत्वाद् वस्तुसंश्रयात्।
वस्तून्येव हि तान्येव प्रोक्तान्यस्मिन् पुरातनैः ॥३॥
प्रासाद आदि वास्तु प्रधान वस्तु ( वास्तु ) भूमि से उत्पन्न होने एवं उस पर आश्रित
होने के कारण वास्तु ही हैं। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने इन्हें वास्तु की संज्ञा प्रदान
की है॥३॥
वर्णगन्धरसाकारदिक्शब्दस्पर्शनैरपि ।
परीक्ष्यैव यथायोग्यं गृहीतावधिनिश्चिता ॥४॥
( चारो वास्तुओं में प्रथमतः प्रधान वास्तु पर विचार करना चाहिये। ) भवन-
प्रासादादि के निर्माण के लिये भूमि की परीक्षा वर्ण ( रंग ), गन्ध, रस ( स्वाद ),
आकृति, दिशा, शब्द एवं स्पर्श के द्वारा करनी चाहिये। परीक्षा के पश्चात् ही निर्माण-
कार्य की आवश्यकता के अनुसार भूमि-ग्रहण करना चाहिये॥४॥
✹ भूमिभेदाः ✹
या सा भूमिरिति ख्याता वर्णानां च विशेषतः।
द्विविधं तत् समुद्दिष्टं गौणमङ्गीत्यनुक्रमात् ॥५॥

द्वितीयोऽध्यायः 卐 वस्तुप्रकारः ५
प्रत्येक वर्ण ( ब्राह्मणादि ) के अनुसार भूमि का वर्णन किया गया है। इस दृष्टि
से भूमि क्रमशः दो प्रकार की होती है—गौण एवं अङ्गी ( प्रधान ) ॥५॥
ग्रामादीन्येव गौणानि भवन्त्यङ्गी मही मता।
सभा शाला प्रपा रङ्गमण्डपं मन्दिरं तथा ॥६॥
भूमि अङ्गी होती है तथा ग्रामादि गौण के अन्तर्गत आते हैं। सभागार, शाला,
प्रपा ( प्याऊ ), रङ्गमण्डप एवं मन्दिर ( प्रासाद होते हैं ) ॥६॥
प्रासाद इति विख्यातं शिबिका गिल्लिका रथम्।
स्यन्दनं चैवमानीकं यानमित्युच्यते बुधैः ॥७॥
इन्हें प्रासाद कहते हैं। शिबिका, गिल्लिका, रथ, स्यन्दन एवं आनीक को यान
कहा जाता है॥७॥
मञ्चं मञ्चिलिका काष्ठं पञ्जरं फलकासनम्।
पर्यङ्कं बालपर्यङ्कं शयनं चैवमादिकम् ॥८॥
शयन के अन्तर्गत मञ्च ( सिंहासन ), मञ्चिलिका ( दीवान ), काष्ठ ( काठ के आसन ),
पञ्जर ( पिंजरा ), फलकासन ( बेञ्च ), पर्यङ्क ( पलंग ), बालपर्यङ्क आदि ग्रहण किये
जाते हैं॥८॥
☀ भूप्राधान्ये हेतुः ☀
चतुर्णामधिकाराणां भूरेवादौ प्रवक्ष्यते।
भूतानामादिभूतत्वादाधारत्वाज्जगत्स्थितेः ॥९॥
उपर्युक्त चारो में प्रथम स्थान भूमि का कहा जाता है; क्योंकि भूतों ( पञ्च महा-
भूतों ) में प्रथम स्थान भूमि का है, संसार की स्थिति इसी पर है एवं यही सबका आधार
है॥९॥
☀ वर्णानुरूपा भूमिः ☀
चतुरस्रं द्विजातीनां वस्तु श्वेतमनिन्दितम्।
उदुम्बरद्रुमोपेतमुत्तरप्रवणं वरम् ॥१०॥
ब्राह्मणों के लिये प्रशस्त भूमि के लक्षण इस प्रकार हैं—भूमि चौकोर ( लम्बाई-
चौड़ाई का प्रमाण सम ) हो, मिट्टी का रंग श्वेत हो, उदुम्बर के वृक्ष से ( गूलर ) युक्त
हो एवं भूमि का ढलान उत्तर दिशा की ओर रहे॥१०॥
कषायमधुरं सम्यक् कथितं तत् सुखप्रदम्।
व्यासाष्टांशाधिकायामं रक्तं तिक्तरसान्वितम् ॥११॥

६ मयमतम्
कषाय-मधुर स्वाद वाली भूमि ( ब्राह्मणों के लिये ) सुखद कही गयी है। क्षत्रियों
के लिये श्रेष्ठ भूमि के लक्षण इस प्रकार हैं—भूमि लम्बाई में चौड़ाई से आठ भाग
अधिक हो, मिट्टी का रंग लाल हो एवं स्वाद में तिक्त हो।। ११।।
प्राङ्निम्नं तत् प्रविस्तीर्णमश्वत्थद्रुमसंयुतम्।
प्रशस्तं भूभृतां वस्तु सर्वसम्पत्करं सदा ॥१२॥
पूर्व की ओर ढलान वाली, विस्तृत, पीपल के वृक्ष से समन्वित भूमि राजाओं
( क्षत्रियों ) के लिये शुभ एवं सर्वदा सभी प्रकार की सम्पत्ति प्रदान करने वाली कही
गई है।। १२।।
षडंशेनाधिकायामं पीतमम्लरसान्वितम्।
प्लक्षद्रुमयुतं पूर्वावनतं शुभदं विशाम् ॥१३॥
लम्बाई चौड़ाई से छः भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग पीला हो, उसका स्वाद खट्टा
हो, प्लक्ष ( पाकड़ ) के वृक्ष से युक्त हो एवं पूर्व दिशा की ओर ढलान हो—ऐसी
भूमि वैश्य वर्ण के लिये प्रशस्त कही गई है।।१३।।
चतुरंशाधिकायामं वस्तु प्राक्प्रवणान्वितम्।
कृष्णं तत् कटुकरसं न्यग्रोधद्रुमसंयुतम्।
प्रशस्तं शूद्रजातीनां धनधान्यसमृद्धिदम् ॥१४॥
लम्बाई चौड़ाई से चार भाग अधिक हो, पूर्व दिशा की ओर ढलान हो, मिट्टी का
रंग काला हो तथा स्वाद कड़वा हो, भूमि पर बरगद के वृक्ष हों। इस प्रकार की भूमि
शूद्र वर्ण वालों को धन-धान्य एवं समृद्धि प्रदान करती है।।१४।।
एवं प्रोक्तो वस्तुभेदो द्विजानां भूपानां वै वैश्यकानां परेषाम्।
योग्यं सर्वं भूसुराणां सुराणां भूपानां तच्छेषयोरुक्तनीत्या ॥१५॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे वस्तुप्रकारो
नाम द्वितीयोऽध्यायः
इस प्रकार ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों के अनुरूप वास्तु ( भूमि ) के प्रकार
का वर्णन किया गया है। देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये सभी प्रकार की भूमियाँ
प्रशस्त होती हैं ( यह उपर्युक्त मत का विकल्प है ); किन्तु शेष दो ( वैश्य एवं शूद्र )
को अपने अनुरूप भूमि का ही चयन करना चाहिये।। १५।।

द्वितीयोऽध्यायः 卐 वस्तुप्रकारः ७
व्याख्यात्मक टिप्पणी
वास्तु के प्रकार ( श्लोक-१-३ )
वास्तु के अन्तर्गत जिन विषयों का अध्ययन अभिप्रेत है, उनका उल्लेख अन्य
वास्तुग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। उनमें से कुछ उल्लेखनीय प्रसङ्ग इस प्रकार हैं—
(क) मानसार के अनुसार पृथिवी, भवन, यान एवं पर्यङ्क ( आसन ) वस्तु अथवा
वास्तु हैं—
तैतिलाश्र नराश्चैव यस्मिन्यस्मिन् परिस्थिताः।
तद्वस्तु सूरिभिः प्रोक्तं तथा वै वक्ष्यतेऽधुना।।
धराहर्म्यादि यानं च पर्यङ्कादि चतुर्विधम्।
धरा प्रधानवस्तु स्यात्तत्तज्जातिषु सर्वशः।। ( ३.१-२ )
(ख) समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार देश, पुर, निवास, सभा तथा वेश्मासन वास्तु
के अन्तर्गत परिगणित हैं—
देशः पुरं निवासश्च सभा वेश्मासनानि च।
यद्यदीदृशमन्यच्च तत्तच्छ्रेयस्करं मतम्।।
वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लक्षणनिश्चयः।
तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमेतदुदीर्यते।। ( १.४-५ )
(ग) विश्वकर्मा के अनुसार देवों, मनुष्यों एवं गज आदि पशुओं की निवास-भूमि
एवं भवन-निर्माण में प्रयुक्त इष्टका तथा शिला आदि वास्तु पद से अभिहित हैं—
देवतानां नराणाञ्च गजगोवाजिनामपि।
निवासभूमिशिल्पज्ञैर्वास्तुसंज्ञमितीर्यते ।।१।।


इष्टिका च शिला दारुरयःकीलादयोऽप्यमी।
वास्तुकर्मणि चान्यत्र वास्तुसंज्ञमुदीरितम्।।६१।।
( विश्वकर्मवास्तुशास्त्र-७ )
इनके अतिरिक्त ( २.३२-४० ) वास्तु के शिल्पगत भेदों में ग्राम, पुरी, खेट,
कर्वट, दुर्ग, प्रासाद, हर्म्य, न्यायशाला, सभा, कोशागार, अन्तःपुर, शस्त्रागार, क्रीडागृह,
तोरण, मञ्चिक, अधिष्ठान, उपपीठ, गोपुर, सङ्कीर्णभवन, पताका, पारिभद्रक, चारों
वर्णों के गृह, वेदिका, पोतिका, स्तम्भ, मण्डप, विमान एवं प्राकार आदि का वर्णन
प्राप्त होता है।

अथ तृतीयोऽध्यायः
( भूपरीक्षा )
✺ अनिन्द्या भूः ✺
देवानां तु द्विजातीनां चतुरस्रायताः श्रुताः ।
वस्त्वाकृतिरनिन्द्या सावाक्प्रत्यग्दिक्समुन्नता ॥१॥
देवों एवं ब्राह्मणों के लिये आयताकार भूमि भी प्रशस्त होती है। भूमि की आकृति
अनिन्दनीय होनी चाहिये एवं उसे दक्षिण तथा पश्चिम में ऊँची होनी चाहिये ।। १ ।।
हयेभवेणुवीणाब्धिदुन्दुभिध्वनिसंयुता ।
पुन्नागजातिपुष्पाब्जधान्यपाटलगन्धकैः ॥२॥
भूमि अश्व, गज, वेणु, वीणा, समुद्र ( जल ) एवं दुन्दुभि वाद्य की ध्वनि से युक्त
होनी चाहिये तथा पुन्नाग ( नागकेसर ), जाति-पुष्प ( चमेली ), कमल, धान्य एवं
पाटल ( गुलाब ) के सुगन्ध से सुवासित होनी चाहिये ।। २ ।।
पशुगन्धसमा श्रेष्ठा सर्वबीजप्ररोहिणी ।
एकवर्णा घना स्निग्धा सुखसंस्पर्शनान्विता ॥३॥
पशु के गन्ध के समान एवं जिस पर सभी प्रकार के बीज उगें, ऐसी भूमि श्रेष्ठ
होती है। भूमि एक रंग की, सघन, कोमल एवं छूने में सुख प्रदान करने वाली होनी
चाहिये ।। ३ ।।
बिल्वो निम्बश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः ।
सहकारश्च षड्वृक्षैरारूढा या समस्थला ॥४॥
जिस समतल भूमि पर बेल, नीम, निर्गुण्डी, पिण्डित, सप्तपर्णक ( सप्तच्छद )
एवं सहकार ( आम )—ये छः वृक्ष हों एवं भूमि समतल हो ।।४।।
श्वेता रक्ता च पीता च कृष्णा कापोतसन्निभा ।
तिक्ता च कटुका चैव कषायलवणाम्लका ॥५॥
रंग में श्वेत, लाल, पीली तथा कपोत के समान काली, स्वाद में तिक्त, कड़वी,
कसैली, नमकीन, खट्टी—।।५।।

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ९
मधुरा षड्रसोपेता सर्वसम्पत्करी धरा।
प्रदक्षिणोदकवती वर्णगन्धरसैः शुभा ॥६॥
एवं मीठी—इन छः स्वादों वाली भूमि सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ प्रदान करती
है। रंग, गन्ध एवं स्वाद से युक्त जिस भूमि पर जलधारा का प्रवाह दाहिनी ओर हो,
वह भूमि शुभ होती है।।६।।
पुरुषाञ्जलिमात्रे तु दृष्टतोया मनोरमा।
निष्कपाला निरुपला कृमिवल्मीकवर्जिता ॥७॥
(उत्खनन करने पर) पुरुषाञ्जलि-प्रमाण (पुरुष-प्रमाण) पर जल दिखाई पड़े,
मन को अच्छी लगने वाली, कपालास्थि-विहीन, कंकड़-पत्थररहित, कीटों एवं
दीमक की बाँबी आदि से विहीन—।।७।।
अस्थिवर्ज्या नसुषिरा तनुवालुकसंयुता।
अङ्गारैर्वृक्षमूलैश्च शूलैश्चापि पृथग्विधैः ॥८॥
हड्डी आदि से रहित, छिद्ररहित, महीन बालू वाली, जले कोयले, वृक्ष के मूल
एवं किसी प्रकार के शूल से रहित—।।८।।
पङ्कसङ्करकूपैश्च दारुभिलोष्टकैरपि।
शर्कराभिरयुक्ता या भस्माद्यैस्तु तुषैरपि ॥९॥
कीचड़, धूल, कूप, काष्ठ, मिट्टी के ढेले एवं बालू, राख आदि से तथा भूसे
से रहित—।।९।।
निन्द्या भूः
सा शुभा सर्ववर्णानां सर्वसम्पत्करी धरा।
दध्याज्यमधुगन्धा च तैलासृग्गन्धिका च या ॥१०॥
भूमि सभी वर्ण वालों के लिये शुभ एवं समृद्धि प्रदान करने वाली होती है। जो
भूमि दधि, घृत, मधु (मद्य), तेल तथा रक्त गन्ध वाली होती है (वह भी प्रशस्त
होती है) ।।१०।।
शवमीनपक्षिगन्धा सा धरा निन्दिता वरैः।
सभाचैत्यसमीपस्था नृपमन्दिरसंश्रिता ॥११॥
शव, मछली एवं पक्षी के गन्ध वाली भूमि अग्राह्य होती है। इसी प्रकार सभागार,
चैत्य (ग्राम का प्रधान वृक्ष) एवं राजभवन के निकट की भूमि गृहनिर्माण की दृष्टि
से त्याज्य होती है।।११।।

१० मयमतम्
देवालयसमीपस्था कण्टकिद्रुमसंयुता ।
वृत्तत्रिकोणविषमा वज्राभा कच्छपोन्नता ॥१२॥
देवालय के निकट, काँटेदार वृक्ष से युक्त, वृत्ताकार, त्रिकोण, विषम ( जिसकी
आकृति असमान हो ), वज्र के सदृश ( कई कोण वाली ) तथा कछुये के समान आकृति
( बीच में ऊँची ) वाली भूमि गृहनिर्माण के लिये प्रशस्त नहीं होती है।।१२।।
चण्डालावासगच्छाया चर्मकारालयाश्रिता ।
एकद्वित्रिचतुर्मार्गा तरिताव्यक्तमार्गका ॥१३॥
जिस भूमि पर चाण्डाल ( शव आदि से आजीविका चलाने वाले ) के गृह की
छाया पड़े, चर्म द्वारा आजीविका चलाने वाले के गृह के पास, एक, दो, तीन एवं
चार मार्गों पर ( एक-दो राजमार्गों, तिराहे एवं चौराहे ) पर स्थित तथा जहाँ ठीक मार्ग
न हों, ऐसे स्थान पर गृह-निर्माण प्रशस्त नहीं होता।।१३।।
निम्नं यत् पणवाकारं पक्षीव मुरजोपमम् ।
मत्स्याभं तु चतुष्कोणे महावृक्षसमायुतम् ॥१४॥
मध्य में दबी, पणव ( ढोल के सदृश एक वाद्य ), पक्षी, मुरज ( एक वाद्य )
तथा मछली के समान आकार की भूमि तथा जहाँ चारो कोनों पर महावृक्ष लगे हों,
ऐसी भूमि गृहनिर्माण के लिये उचित नहीं होती है।।१४।।
चैत्यवृक्षयुतं सालचतुष्कोणसमाश्रितम् ।
भुजङ्गनिलयं चैव सङ्गाराममेव च ॥१५॥
ग्रामादि के प्रधान वृक्ष, जिसके चारो कोनों पर साल वृक्ष हों, सर्प के आवास
के निकट एवं मिश्रित जाति के वृक्षों के बाग के पास की भूमि गृह-निर्माण के लिये
अप्रशस्त होती है।।१५।।
श्मशानं चाश्रमस्थानं कपिसूकरसन्निभम् ।
वनोरगनिभं टङ्कं शूर्पोलूखलसन्निभम् ॥१६॥
श्मशान के क्षेत्र, आश्रमस्थान, बन्दर एवं सुअर के आकार की, वनसर्प के
सदृश, कुठार की आकृति वाली, शूर्प एवं ऊखल की आकृति वाली भूमि त्याज्य
होती है।।१६।।
शङ्खाभं शङ्कुनाभं च बिडालकृकलासवत् ।
ऊषरं कृमिभिर्जुष्टं गृहगौलिसमाकृति ॥१७॥
शङ्ख, शङ्कु, विडाल, गिरगिट तथा छिपकली की आकृति वाली, ऊसर एवं कीड़े

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ११
लगी भूमि गृह-निर्माण के लिये त्याज्य होती है।।१७।।
अन्यदेवंविधं वस्तु निन्दितं वस्तुपाठकैः ।
बहुप्रवेशमार्गं च मार्गविद्धं च गर्हितम् ।।१८।।
इसी प्रकार अन्य आकृति वाली भूमि, बहुत से प्रवेशमार्ग वाली एवं मार्ग से विद्ध
भूमि विद्वानों द्वारा निन्दित है।।१८।।
यत् कर्म विहितं मोहादेवम्भूते तु वस्तुनि ।
तन्महादोषहेतुः स्यात्सर्वथा तद्विवर्जयेत् ।।१९।।
यदि अज्ञानतावश ऐसी भूमि पर गृह बन भी जाय तो इससे महान् दोष उत्पन्न
होता है। अतः सभी प्रकार से ऐसी भूमि का परित्याग करना चाहिये।।१९।।
✺ सर्वोत्कृष्टा भूः ✺
श्वेतासृक्पीतकृष्णा हयगजनिनदा षड्रसा चैकवर्णा
गोधान्याम्भोजगन्धोपलतुषरहितावाक्प्रतीच्युन्नता या।
पूर्वोदग्वारिसारा वरसुरभिसमा शूलहीनास्थिवर्ज्या
सा भूमिः सर्वयोग्या कणदररहिता सम्मताद्यैर्मुनीन्द्रैः ।।२०।।
इति मयमते वास्तुशास्त्रे भूपरीक्षा नाम तृतीयोऽध्यायः
श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण वर्ण वाली, अश्व एवं गज के निनाद से युक्त, मधुर
आदि छः स्वादों वाली, एक वर्ण की, गो-धान्य एवं कमल के गन्ध से युक्त, पत्थर
एवं भूसे से रहित, दक्षिण एवं पश्चिम में ऊँची, पूर्व एवं उत्तर में ढलान वाली, श्रेष्ठ
सुरभि के सदृश, शूल एवं अस्थि से रहित, कणद ( धूल, बालू आदि ) रहित भूमि
सभी के लिये अनुकूल होती है, ऐसा सभी श्रेष्ठ मुनियों का विचार है।।२०।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
भूमि के प्रकार ( श्लोक १-२० )
(क) शिल्परत्न पूर्वभाग, तृतीय अध्याय में भूमिपरिग्रह के प्रसङ्ग में चार प्रकार
की भूमि—पूर्णा, सुपा ( सुपद्मा ), भद्रा एवं धूम्रा का उल्लेख प्राप्त होता है—
पूर्णा सुपद्मा च तथैव भद्रा धूम्रा च भूमिर्विहिता चतुर्धा।
वक्ष्ये च तासामपि लक्षणानि संक्षेपतो भूमिपरिग्रहार्थम्।। ( ३.४ )

१२ मयमतम्
पूर्णा भूमि—
प्लक्षन्यग्रोधनिम्बार्जुनवकुलकुलस्थापनसाशोकनिष्पा-
वाङ्कोलैर्मालतीचम्पकतिलखदिरैः कोद्रवैर्मुद्रिता वा।
भूमिर्या भूधराधीश्वरशिखरगता पार्श्वसंस्थाथवाद्रेः
पूर्णा सा पुष्टिदात्री सुरनिलयसमा कल्पने स्वल्पतोया।। ( ३.५ )
सुपद्मा भूमि—
कर्पूरागरुनालिकेरतिलकैटैर्भैः कदम्बार्जुनै-
र्मलियैः क्रमुकेक्षुकेतककुरशैः कुन्दारविन्दोत्पलैः।
पूर्वोदक्प्लवशालिनी बहुजला वा या दरीदृश्यते
सेयं शान्तिकरी सुरेशयजने सूक्ता सुपद्मा मही।। ( ३-६ )
भद्रा भूमि—
तीरं वारिनिधेः श्रिताथ सरितस्तीर्थस्य वा दक्षिणे
व्रीहिक्षेत्रविचित्रिताप्यदिशि यज्ञार्हाङ्घ्रिपैरङ्किता।
कीर्णा पुष्पफलप्रवालतरुभिर्योद्यानहृद्यापि वा
भद्रा सा परिगीयते वसुमती प्रीतिप्रदा यज्वनाम्।। ( ३-७ )
धूम्रा भूमि—
अर्कैर्वेणुविभीतकैः स्नुहियुतैः श्लेष्मातकैः पीलुभिः
सङ्कीर्णा बहुशर्करा च कठिना गर्भान्विता सोषरा।
गृध्रश्येनवराहवायसशवाशाखामृगैः सन्ततं
जुष्टा यष्टुरनिष्टदा निगदिता धूम्रा मही सूरिभिः।। ( ३-८ )
इसके अतिरिक्त भूमि के चार भेद और प्राप्त होते हैं—वारुणी, ऐन्द्री, आग्नेयी
एवं वायवी—
वारुण्यैन्द्री तथाग्नेयी वायवी भूश्चतुर्विधा। ( ३-९ )
वारुणी भूमि—
या कोमलतरुव्राता स्वतः पुष्पितकानना।
जलाशयाैश्च सर्वत्र युक्ता भूर्वारुणी स्मृता।। ( ३-१० )
माहेन्द्री भूमि—
या क्षीरवृक्षबहुला सौम्ये यस्या जलं महत्।
व्रीहिक्षेत्रं च याम्यायां सा माहेन्द्री क्षितिः स्मृता।। ( ३-११ )
आग्नेयी भूमि—

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा १३
गृध्रकङ्कवराहर्क्षश्येनगोमायुवायसैः ।
संयुक्ता दूरपानीया भूराग्नेयी विनिन्दिता।। ( ३-१२ )
वायवी भूमि—
अक्षस्नुहिकलिङ्गार्कपीलुश्लेष्मातकण्टकैः ।
युक्ता या निर्जला भूमिरशुभा वायवी स्मृता।। ( ३-१३ )
वर्ण, गन्ध स्वाद के अनुसार भूमि—
विप्रादिक्रमतः कुशेषुवनदूर्वाकाशयुक्ता भुव-
स्तुल्यातानवितानसिन्धुररसाब्ध्यंशाधिदीर्घा अपि।
श्वेतापाटलपीतमेचकरुचश्चाज्यासृगन्नासवा-
मोदाः स्वादुकषायतिक्तकटुकास्वादान्विताश्च स्मृताः।। ( ३-१४ )
(ख) विष्णुसंहिता ( द्वादश पटल ) में भी सुपद्मा, भद्रिका, पूर्णा एवं धूम्रा भूमि
की चर्चा प्राप्त होती है तथा गुण के अनुसार तीन भेद—उत्तमा, अधमा एवं मध्यमा
प्राप्त होते हैं—
त्रिधोत्तमाधमा मध्या चतुर्धा जातिभेदतः ।
सुपद्मा भद्रिका पूर्णा धूम्रेत्यपि तथैव भूः ।।२।।
वर्ण, गन्ध एवं स्वादादि के अनुसार भूमि—
विप्रादीनां स्मृता भूमिः सर्वेषा वोत्तमस्य या।
सिता रक्ता च पीता च कृष्णा विप्रादिभूस्तथा ।।७।।
मधुरा च कषाया च तिक्ता च कटुका क्रमात् ।
घृतासृक्चरुविड्गन्धा बहुवर्णा तु वर्जिता ।।८।।
ग्रन्थकार ने ( श्लोक-१०-१४ ) निन्दित भूमि के दोषों की भी चर्चा की है, जो
मयमत के वर्णन की पुष्टि करता है।
(ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( पञ्चम अध्याय ) में गुणभेद के अनुसार उत्तमा, मध्यमा
एवं अधमा ( श्लोक-६ ) तीन प्रकार की भूमि का उल्लेख प्राप्त होता है। रस, वर्ण,
स्पर्श, गन्ध एवं अन्य लक्षणों के अनुसार भूमि के भेद इस प्रकार प्राप्त होते हैं—
ब्राह्मणी भूमि—
माधुर्यमृत्तिका भूमिर्देवविप्रहितप्रदा।
तथोदुम्बरवृक्षाढ्या श्वेतवर्णा च भूरपि ।।८।।
( उदीच्याञ्च जलोपेता भूरियं चोत्तमा मता । )
क्षत्रिया भूमि—
कषायमृत्तिका भूमी रक्तवर्णा च भूरपि ।।९।।

१४ मयमतम्
पूर्वभागजलोपेता तथाश्वत्थद्रुमान्विता।
विपुला लोहयुग्भूमिः क्षत्रियाणां हितप्रदा।।१०।।
वैश्यवर्णा भूमि—
नातिकृष्णा न रक्ता च प्लक्षद्रुमसमन्विता।
दक्षिणायां जलोपेता नातिनिम्नोन्नतस्थला।।११।।
भूरियं वैश्यजातीनां बलसम्पत्करा मता।
शूद्रा भूमि—
कटुमृत्स्ना कृष्णवर्णा वटवृक्षसमन्विता।।१२।।
वारुण्यामुदकोपेता शूद्राणां क्षेमकारिणी।
इनके अतिरिक्त भूमि के उत्तम गुणों का वर्णन ( १४-२१ ) प्राप्त होता है एवं
इसी के साथ भूमि के दोष ( २३-२७ ) भी वर्णित हैं, जिनमें भूकम्प से प्रभावित एवं
अग्नि से दग्ध भूमि का परित्याग विशेष रूप से उल्लेखनीय है—
कम्पेन भेदिता भूमिरग्निदग्धा च सर्वतः। ( ५-२७ )
अप्रशस्त भूमि की चर्चा समराङ्गणसूत्रधार ( ८.५२-६२ ) में विस्तार से प्राप्त
होती है। अन्य वास्तुग्रन्थों में भी इस विषय पर प्रकाश डाला गया है।

अथ चतुर्थोऽध्यायः
( भूपरिग्रहः )
✺ भूग्रहणे कर्त्तव्यानि ✺
आकारवर्णशब्दादिगुणोपेतं भुवः स्थलम् ।
संगृह्य स्थपतिः प्राज्ञो दत्त्वा देवबलिं पुनः ॥१॥
निर्माण-हेतु भूमि का ग्रहण—आकार, रंग एवं शब्द आदि गुणों से युक्त भूमि
का चयन करने के पश्चात् बुद्धिमान स्थपति को देवबलि ( वास्तुदेवों की पूजा ) करनी
चाहिये। इसके पश्चात्—॥१॥
स्वस्तिवाचकघोषेण जयशब्दादिमङ्गलैः ।
अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सराक्षसाः॥२॥
वह स्वस्तिवाचक घोष एवं जय आदि मंगलकारी शब्दों के साथ इस प्रकार
कहे—राक्षसों के साथ देवता एवं भूत ( मानवेतर प्राणी ) दूर हो जायँ।।२।।
वासान्तरं व्रजन्त्वस्मात् कुर्या भूमिपरिग्रहम्।
इति मन्त्रं समुच्चार्य विहिते भूपरिग्रहे ॥३॥
वे इस भूमि से अन्यत्र स्थान पर जाकर अपना निवास बनायें। हम इस भूमि को
( .गृहनिर्माण-हेतु ) ग्रहण कर रहे हैं। इस मन्त्र का उच्चारण करते हुये ग्रहण की गई
भूमि पर ( अधोलिखित कार्य करना चाहिये )॥३॥
कृष्ट्वा गोमयमिश्राणि सर्वबीजानि वापयेत् ।
दृष्ट्वा तानि विरूढानि फलपक्वगतानि च ॥४॥
उस भूमि में हल चलवा कर गोबरमिश्रित सभी प्रकार के बीजों को उसमें बो देना
चाहिये। उन बीजों को उगा हुआ एवं उनमें पके हुये फल देख कर—।।४।।
सवृषाश्च सवत्साश्च ततो गास्तत्र वासयेत्।
यतो गोभिः परिक्रान्तमुपघ्राणैश्च पूजितम् ॥५॥
वृषभ एवं बछड़ों के साथ गायों को वहाँ बसा देना चाहिये; क्योंकि गायों के वहाँ
चलने एवं सूंघने से वह भूमि पवित्र हो जाती है।।५।।

१६ मयमतम्
संहृष्टवृषनादैश्च निर्धौतकलुषीकृतम्।
वत्सवक्त्रच्युतैः फेनैः संस्कृतं प्रस्रवैरपि ॥६॥
प्रसन्न वृषों के नाद से एवं बछड़ों के मुख से गिरे हुये फेन से भूमि परिष्कृत हो
जाती है एवं उसके सभी दोष धुल जाते हैं।।६।।
स्नातं गोमूत्रसेकैश्च गोपुरीषैः सलेपनम्।
च्युतरोमन्थनोद्गारैर्गोष्पदैः कृतकौतुकम् ॥७॥
गोमूत्र से सींची गई तथा गोबर से लीपी हुई, शरीर रगड़ने से गिरे हुये रोमों से
युक्त तथा गायों के पैरों द्वारा किये गये खेल से भूमि ( शुद्ध हो जाती है।)।।७।।
गोगन्धेन समाविष्टं पुण्यतोयैः शुभं पुनः।
तथा पुण्यतिथोपेत नक्षत्रविषये शुभे ॥८॥
गाय के गन्ध से युक्त, इसके पश्चात् पुण्यजल से पुनः पवित्र की गई भूमि पर
( निर्माणकार्य के लिये ) शुभ तिथि से युक्त नक्षत्र का विचार करना चाहिये ॥८॥
करणे च सुलग्ने च मुहूर्

चतुर्थोऽध्यायः 卐 भूपरिग्रहः १७
पयसा तु ततः प्राज्ञो निशादौ परिपूरयेत् ।
तस्य कूपस्य चाभ्याशे शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥१३॥
भूमौ दर्भावकीर्णायां संविशेत् प्राक्शिरा बुधः ।
बुद्धिमान् मनुष्य को रात्रि के प्रारम्भ में गड्ढे में डालते हुये उसे जल से पूर्ण करना
चाहिये। इसके पश्चात् पवित्र होकर सावधान मन से गड्ढे के पास भूमि पर कुश बिछा
कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाना चाहिये॥१३॥
अयं मन्त्रः—
अस्मिन् वस्तुनि वर्धस्व धनधान्येन मेदिनि! ॥१४॥
उत्तमं वीर्यमास्थाय नमस्तेऽस्तु शिवा भव ।
उपवासमुपक्रामेदेतं मन्त्रं जपंस्ततः ॥१५॥
उपवास करते हुये इस मन्त्र का जप करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—हे
पृथिवी, इस भूमि पर उत्तम समृद्धि स्थापित कर इसे धन-धान्य से वृद्धि प्रदान करो।
तुम कल्याणकारी बनो, तुम्हें प्रणाम॥१४-१५॥
❋ उत्तमादिभूलक्षणम् ❋
अह्न आदौ परीक्षेत तं कूपं स्थपतिर्बुधः ।
सावशेषं जलं दृष्ट्वा तद् ग्राह्यं सर्वसम्पदे ॥१६॥
बुद्धिमान् स्थपति को दिन होने पर प्रथमतः उस गड्ढे की परीक्षा करनी चाहिये।
इसमें जल बचा हुआ देख कर सभी प्रकार की सम्पत्तियों के लिये उस भूमि को
निर्माणहेतु ग्रहण करना चाहिये॥१६॥
क्लिन्ने वस्तुविनाशाय शुष्के धान्यधनक्षयः ।
पूरिते तन्मृदा खाते समता मध्यमा मता ॥१७॥
भूमि यदि गीली रहे तो उस पर निर्मित गृह में विनाश होता है। यदि शुष्क रहे
तो उस गृह में धन-धान्य की हानि होती है। यदि उस गड्ढे के खोदने से निकली मिट्टी
से उसे भरा जाय एवं पूरी मिट्टी उसमें समा जाय तो भूमि को मध्यम श्रेणी का समझना
चाहिये॥१७॥
उत्तमा भूर्मृदाधिक्या हीना हीना मृदा मही ।
तन्मध्यावटसन्दृष्टप्रदक्षिणावरोदकाम् ।
सुरभिप्रतिमां भूमिं गृह्णीयात् सर्वसम्पदे ॥१८॥
यदि मिट्टी से गड्ढा भर जाय एवं मिट्टी बच भी जाय अर्थात् मिट्टी अधिक हो तो
मय०-२

१८ मयमतम्
भूमि उत्तम, यदि गड्ढा भी न भरे एवं मिट्टी समाप्त हो जाय अर्थात् मिट्टी गड्ढा भरने
में कम पड़े तो भूमि हीन कोटि की होती है। उस गड्ढे के मध्य में यदि जल दाहिनी
ओर घूम कर बहे तो इस प्रकार की सुरभि की मूर्ति के सदृश वाली भूमि सर्वसम्पत्ति-
कारक होती है।।१९८।।
एवं यथोक्तविधिना विविधं विदित्वा
ग्रामाग्रहारपुरपत्तनखर्वटानि ।
स्थानीयखेटनिगमानि तथेतराणि
यः संविविक्षुरवनीग्रहणं विदध्यात् ।।१९९।।
इति मयमते वस्तुशास्त्रे भूपरिग्रहो
नाम चतुर्थोऽध्यायः
इसे निर्माण-हेतु ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार पूर्वोक्त विधि से विविध प्रकार
की भूमियों का ज्ञान कर व्यक्ति को ग्राम, अग्रहार, पुर, पत्तन, खर्वट, स्थानीय, खेट,
निगम एवं अन्य की स्थापना के लिये भूमि का ग्रहण करना चाहिये।।१९९।।

अथ पञ्चमोऽध्यायः
( मानोपकरणम् )
सर्वेषामपि वास्तूनां मानेनैव विनिश्चयः ।
तस्मान्मानोपकरणं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥१॥
भूमि-मापन के उपकरण—सभी प्रकार के वास्तुओं ( भूमि एवं भवन ) का
निर्धारण मान या प्रमाण से ही किया जाता है; अतः मैं ( मय ऋषि ) संक्षेप में मापन
के उपकरणों के विषय में बतलाता हूँ।।१।।
परमाणुक्रमाद् वृद्धं मानाङ्गुलमिति स्मृतम् ।
परमाणुरिति प्रोक्तं योगिनां दृष्टिगोचरम् ॥२॥
( मापन की प्रथम इकाई ) अङ्गुल-माप परमाणुओं के क्रमशः वृद्धि से होती है।
परमाणुओं का दर्शन योगी-जनों को होता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।।२।।
परमाणुभिरष्टाभी रथरेणुरुदाहृतः ।
रथरेणुश्च वालाग्रं लिक्षायूकायवास्तथा ॥३॥
आठ परमाणुओं के मिलने से एक 'रथरेणु' ( धूल का कण ), आठ रथरेणुओं
के मिलने से एक 'बालाग्र' ( बाल की नोक ), आठ बालाग्र से एक 'लिक्षा', आठ
लिक्षा से एक 'यूका' एवं आठ यूका से एक 'यव' रूपी माप बनता है।।३।।
क्रमशोऽष्टगुणैः प्रोक्तो यवाष्टगुणितोऽङ्गुलम् ।
अङ्गुलं तु भवेन्मात्रं वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलम् ॥४॥
उपर्युक्त माप क्रमशः आठ गुना बढ़ते हुये 'यव' बनते हैं। यव का आठ गुना
'अङ्गुल' माप होता है। बारह अङ्गुल माप को 'वितस्ति' ( बित्ता ) कहते हैं।।४।।
तद्द्वयं हस्तमुद्दिष्टं तत् किष्क्विति मतं वरैः ।
पञ्चविंशतिमात्रं तु प्राजापत्यमिति स्मृतम् ॥५॥
दो वितस्ति का एक 'हस्त' होता है, जिसे 'किष्कु' भी कहा गया है। पच्चीस
हाथ का एक 'प्राजापत्य' होता है।।५।।
षड्विंशतिर्धनुर्मुष्टिः सप्तविंशद्धनुर्ग्रहः ।
याने च शयने किष्कुः प्राजापत्यं विमानके ॥६॥

मयमतम्
२०
छब्बीस हाथ की एक 'धनुर्मुष्टि' तथा सत्ताईस हाथ से एक 'धनुर्ग्रह' माप बनता
है। यान (वाहन) तथा शयन (आसन एवं शय्या) में किष्कु माप तथा विमान में
प्राजापत्य माप का प्रयोग होता है॥६॥
वास्तूनां तु धनुर्मुष्टिर्ग्रामादीनां धनुर्ग्रहः ।
सर्वेषामपि वास्तूनां किष्कुरे वाथवा मतः ॥७॥
वास्तुनिर्माण में 'धनुर्मुष्टि' माप का तथा ग्रामादि के मापन में 'धनुर्ग्रह' प्रमाण का
प्रयोग होता है। अथवा सभी प्रकार के वास्तु-कर्म में 'किष्कु' प्रमाण का प्रयोग किया
जा सकता है॥७॥
रत्निश्चैवमरत्निश्च भुजो बाहुः करः स्मृतः ।
हस्ताश्चतुर्धनुर्दण्डो यष्टिश्चैव प्रकीर्तितः ॥८॥
हस्त माप को 'रत्नि', 'अरत्नि', 'भुज', 'बाहु' एवं 'कर' कहते हैं। चार हस्त
से 'धनुर्दण्ड' माप बनता है। इसी को 'यष्टि'

पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २१
एवमेवं विदित्वा तु स्थपतिर्मानयेद् दृढम्।
इस प्रकार माप का ज्ञान करने के पश्चात् स्थपति को दृढ़तापूर्वक ( सावधानी
पूर्वक ) मापनकार्य करना चाहिये।।
☀ शिल्पिलक्षणम् ☀
भवन्ति शिल्पिनो लोके चतुर्धा स्वस्वकर्मभिः ॥१३॥
संसार में अपने-अपने कार्यों के अनुसार चार प्रकार के शिल्पी होते हैं।।१३।।
स्थपतिः सूत्रग्राही च वर्धकिस्तक्षकस्तथा।
प्रसिद्धदेशसङ्कीर्णजातिजोऽभीष्टलक्षणः ॥१४॥
चार प्रकार के शिल्पी—स्थपति, सूत्रग्राही, वर्धकि ( बढ़ई ) एवं तक्षक ( छीलने,
काटने एवं आकृतियाँ उकेरने वाले ) होते हैं। ये सभी ( स्थापत्यादि कर्म के लिये )
प्रसिद्ध स्थान वाले, सङ्कीर्ण जाति से उत्पन्न एवं अपने कार्यों के लिये अभीष्ट गुणों
से युक्त होते हैं।।१४।।
☀ स्थपतिः ☀
स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात् सर्वशास्त्रविशारदः ।
न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः ॥१५॥
‘स्थपति’संज्ञक शिल्पी को भवन की स्थापना में योग्य एवं ( गृह-निर्माण के
सहायक ) अन्य शास्त्रों का भी ज्ञाता होना चाहिये। शारीरिक दृष्टि से सामान्य से न
कम अङ्गों वाला तथा न ही अधिक अङ्गों वाला ( अर्थात् सम्पूर्ण रूप से स्वस्थ ),
धार्मिक वृत्ति वाला एवं दयावान होना चाहिये।।१५।।
अमात्सर्योऽनसूयश्चातन्द्रितस्त्वभिजातवान् ।
गणितज्ञः पुराणज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥१६॥
स्थपति को द्वेषरहित, ईर्ष्यारहित, सावधान, आभिजात्य गुणों से युक्त, गणित
तथा पुराणों का ज्ञाता, सत्यवक्ता एवं इन्द्रियों को वश में रखने वाला होना चाहिये।।१६।।
चित्रज्ञः सर्वदेशज्ञश्चान्नदश्चाप्यलुब्धकः ।
अरोगी चाप्रमादी च सप्तव्यसनवर्जितः ॥१७॥
स्थपति को चित्रकर्म ( गृह के नक्शा आदि बनाने ) में निपुण, सभी देशों का
ज्ञाता ( स्थान के भूगोल का ज्ञाता ), ( अपने सहायकों को ) अन्न देने वाला, अलोभी,
रोगरहित, आलस्य एवं भूल न करने वाला तथा सात प्रकार के व्यसनों ( वाचिक
आघात पहुँचाना, सम्पत्ति के लिये हिंसा का मार्ग अपनाना, शारीरिक चोट पहुँचाना,