मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
१८८ मयमतम्
का प्रयोग करना चाहिये। इसके विपरीत सन्धि करने पर विपत्ति आती है।।४२।।
अन्तर्मूलं बहिश्चाग्रं पार्श्वद्रव्येषु योजयेत्।
अन्तरग्रं बहिर्मूलं स्वामिनश्च विनाशनम् ॥४३॥
(सन्धि करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि) मूल भाग भीतर की
ओर एवं अग्र भाग बाहर की ओर रहे। यदि अग्र भाग भीतर एवं मूल भाग बाहर रहता
है तो वह स्वामी के विनाश का कारण बनता है।।४३।।
✺ विद्धं कीलं च ✺
शिखा दन्तं च शूलं च विद्धं पर्यायमीरितम्।
शल्यं च शङ्कुराणिश्च कीलं पर्यायमुच्यते ॥४४॥
अष्टसप्तकषडंशकेऽङ्घ्रिके भागतारमथ शूलकीलयोः।
विद्ध एवं कील—शिखा, दन्त, शूल एवं विद्ध—ये सभी (चूली, चूल के)
पर्याय हैं तथा शल्य, शङ्कु, आणि तथा कील—ये सभी शब्द (कील के) पर्याय हैं।
शूल एवं कील का माप स्तम्भ की चौड़ाई का आठ, सात या छठवें भाग के बराबर
होता है।।४४।।
✺ सन्धिदोषाः ✺
कीलपार्श्वमथ पादमध्यमं योजयेत् समुदग्रबुद्धिमान् ॥४५॥
सन्धि के दोष—बुद्धिमान (स्थपति) को चाहिये कि कील का पार्श्व स्तम्भ के
मध्य में लगाये।।४५।।
स्तम्भान्तं दन्तान्तकं चेद्विनाशं
दन्तान्तं चेत् स्तम्भमध्यं तदेव।
स्तम्भान्तं चेत् सन्धिमध्यं सरोगं
सन्धेर्मध्यं पादमध्यं क्षयं स्यात् ॥४६॥
स्तम्भ का अन्तिम भाग एवं दन्त (शिखा, चूल) का अन्तिम भाग यदि आपस
में जुड़ें तो विनाश के कारण बनते हैं। इसी प्रकार यदि दन्त का अन्तिम भाग स्तम्भ
के मध्य में पड़े तो भी वही परिणाम होता है। यदि स्तम्भ का अन्तिम भाग सन्धि के
मध्य पड़े तो वह रोगकारक होता है तथा सन्धि का मध्य एवं पाद का मध्य यदि एक
साथ हो तो वह क्षय का कारण होता है।।४६।।
दिग्विदिग्द्वारदेवांशं सर्वं त्यक्त्वा प्रयोजयेत्।
अर्कार्किवरुणेन्दूनां स्थानं दिगिति कीर्तितम् ॥४७॥
सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८९
दिक्, विदिक् एवं द्वार के देवताओं के सभी भागों को छोड़कर सन्धि का प्रयोग
करना चाहिये। अर्क ( सूर्य ), अर्कि ( यम ), वरुण एवं इन्दु देवों का स्थान दिक्
कहलाता है ( ये दिशायें क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर हैं )।४७।।
अग्निराक्षसवाय्वीशस्थानं विदिगिति स्मृतम्।
गृहक्षतश्च पुष्पाख्यो भल्लाटश्च महेन्द्रकः ।।४८।।
एतेषामंशकद्वारं तत्र सन्धिं न सन्ध्येत् ।
शल्यञ्च दन्तं त्यक्त्वैव पूर्वोक्तानाञ्च सम्मतम् ।।४९।।
अग्नि, राक्षस, वायु एवं ईश देवता का स्थान विदिक् ( कोण ) कहलाता है।
गृहक्षत, पुष्पाख्य, भल्लाट एवं महेन्द्र देवों का भाग द्वारभाग है। इन स्थानों पर सन्धि
नहीं करनी चाहिये। पूर्व-वर्णित स्थानों पर शल्य ( कील ) एवं दन्त ( चूल ) का
प्रयोग नहीं करना चाहिये ।।४८-४९।।
मध्यार्धमध्यमध्यं च त्यक्त्वा युञ्जीत बुद्धिमान् ।
द्रव्यमध्यस्थसूत्रस्य वामेऽवामे तु दन्तकम् ।।५०।।
इसी प्रकार दन्त का प्रयोग मध्य अथवा मध्यार्ध के मध्य ( चतुर्थांश भाग के
बिन्दु ) को छोड़ कर करना चाहिये। दन्त का प्रयोग पदार्थ के केन्द्र-सूत्र के दाहिने
एवं बाँयें भाग में करना चाहिये।।५०।।
द्रव्यविस्तारमध्यस्था शिखा शीघ्रविनाशिनी ।
अन्योन्यसन्धिविद्धं च शिखा कीलस्य वेधनम् ।।५१।।
पदार्थ के विस्तार के मध्य में स्थित शिखा ( चूल ) शीघ्र ही विनाश करती है।
शिखा के लिये निर्मित स्थान में कील लगाना तथा कील के स्थान में शिखा का प्रयोग
करना वेधन होता है।।५१।।
धर्मार्थकामसौख्यानां विपत्तिं नित्यमादिशेत् ।
वामदक्षिणयोगेन प्रतिसन्धिं परित्यजेत् ।।५२।।
( उपर्युक्त वेधन ) धर्म, अर्थ, काम एवं सुख का नाश करती है। बाँयें स्थान में
होने वाली सन्धि दाहिने एवं दाहिने स्थान की सन्धि बाँयें हो तो इसका ( प्रतिसन्धि
का ) परित्याग करना चाहिये।।५२।।
तारतीर्वान्तरस्थं यत् कल्प्यशल्यमिति स्मृतम् ।
पूर्ववद् विधिना सन्ध्यायाममध्ये तु योजयेत् ।।५३।।
पदार्थ की चौड़ाई के बराबर स्थान पर लम्बाई में हुई सन्धि कल्प्यशल्य कहलाती
१९० मयमतम्
है। पूर्ववर्णित विधि से पदार्थ के मध्य स्थान को छोड़ कर सन्धि करनी चाहिये॥५३॥
अज्ञानात् त्वरयानुक्तस्थाने वा योजयेद् यदि ।
सर्वेषामपि वर्णानां सर्वसम्पत्क्षयो भवेत् ॥५४॥
अज्ञानता अथवा शीघ्रता के कारण वर्जित स्थान पर यदि सन्धि की जाय तो सभी
वर्ण वाले गृहस्थों की सभी सम्पत्तियों का नाश होता है॥५४॥
पुराणैर्न नवद्रव्यैर्न पुराणैर्नवैरपि।
नवैर्नवानां द्रव्याणां योगो जीर्णैश्च जीर्णिनाम् ॥५५॥
पुराने पदार्थों की नये पदार्थ से तथा नये पदार्थों की पुराने पदार्थों के साथ सन्धि
नहीं करनी चाहिये। नये पदार्थों की नये से एवं पुराने पदार्थों का पुराने पदार्थ से सन्धि
करनी चाहिये॥५५॥
युक्त्यैव द्रव्यसन्धानं सम्पदामास्पदं सदा।
विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥५६॥
उचित रीति से पदार्थों की सन्धि सम्पत्तिकारक होती है। इसके विपरीत करने से
निश्चय ही विनाश होता है॥५६॥
ऊर्ध्वद्रव्याणि सर्वाणि वाजनादीनि यान्यपि।
सशिखान्यशिखान्येतान्युक्त्या योज्यानि पूर्ववत् ॥५७॥
( स्तम्भ के ) ऊपर के सभी वाजन आदि पदार्थ शिखा के साथ अथवा विना
शिखा के पूर्ववर्णित विधि के अनुसार उचित रीति से जोड़ना चाहिये॥५७॥
पादोपरि भवेत् सन्धिरन्तरे नैव कारयेत् ।
ब्रह्मस्थलोर्ध्वगद्रव्यसन्धानं विपदां पदम् ॥५८॥
सन्धि स्तम्भ के ऊपर होती है। उनके मध्य में सन्धि नहीं करनी चाहिये।
ब्रह्मस्थल ( मध्य स्थान ) के ऊपर पदार्थों की सन्धि विपत्तिकारक होती है॥५८॥
ब्रह्मस्थानस्थितः स्तम्भः स्वामिनश्च विनाशनम्।
तुलादीन्युपरिद्रव्याणामत्र दोषो न विद्यते ॥५९॥
ब्रह्मस्थान पर स्थित स्तम्भ गृहस्वामी का विनाश करता है। तुला आदि यदि ऊपर
स्थित पदार्थ वहाँ पड़ें तो दोष नहीं होता है॥५९॥
पुंस्त्रीनपुंसकमहीरुहसन्धिकार्ये
पुंसा च पुंविहितमेव तथैव पुंस्त्री।
नैवोभयेन च नपुंसकस्सङ्गमः स्या-
ज्जात्यैकया शुभद उक्तविधिक्रमं वा॥६०॥
सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १९१
पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुसंकलिङ्ग वृक्षों के काष्ठों के सन्धि की समय इस बात
का ध्यान रखना चाहिये कि पुरुष-काष्ठ से पुरुष-काष्ठ का एवं इसी प्रकार स्त्री-काष्ठ
से स्त्रीकाष्ठ का ही सन्धिकर्म हो। इनके साथ नपुंसक काष्ठ की सन्धि नहीं होनी
चाहिये। नपुंसक काष्ठ का सजातीय काष्ठ से संयोग होना चाहिये। एक जाति के
काष्ठों की सन्धि शुभ परिणाम देती है।।६०।।
एवं युक्त्या द्रव्यसन्धानयोगं प्रोक्तं नृणां तैतिलानां निवासे ।
युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तद्युक्त्यायुक्तं सर्वसम्पत्क्षयं स्यात् ॥६१॥
इस विधि से मनुष्यों एवं देवों के आवास में पदार्थों की सन्धि करनी चाहिये।
इस रीति से की गई सन्धि सम्पत्ति प्रदान करती है। इसके विपरीत रीति से हुई सन्धि
सभी सम्पत्तियों का नाश करती है।।६१।।
छिद्रं स्वल्पतरं विधेयमधुना दीर्घान्वितच्छेदं
स्थूलं काष्ठशिलेभदन्तमुदितं निम्नं हि पक्वेष्टकम् ।
पक्वं निर्गमनं सुधाभिरनिशं कुर्यात्तनुत्वं यथा
पूर्वं मानसमुन्नयेत्तदपरं शिल्प्युत्तमः शातधीः ॥६२॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे सन्धिकर्मविधानो
नाम सप्तदशोऽध्यायः
अच्छे स्थपति को छोटा, किन्तु गहरा छिद्र बनाना चाहिये। कील काष्ठ, प्रस्तर
या गजदन्त निर्मित से होना चाहिये। पकी ईंट में छिद्र छोटा एवं कम गहरा होना
चाहिये। इसके छिद्र को सुधा के प्रयोग से पतला एवं उचित घेरे वाला बनाना चाहिये।
जिनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है, उनके योग को बुद्धिमान स्थपति को अपनी
बुद्धि द्वारा युक्तिपूर्वक करना चाहिये।।६२।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
१. सन्धि ( श्लोक २ )
मानसार ( १७.२ ) में काष्ठखण्डों में की जाने वाली सन्धियों का वर्णन इस
प्रकार किया गया है—
वृक्षमूले बलं युक्तं वृक्षाग्रे बलहीनकम्।
तस्मात्तु बन्धयेत्सर्वं दारुसम्मूलतः सुधीः ।।
१९२ मयमतम्
२. सन्धिभेद ( श्लोक ३ )
सन्धिभेदों का वर्णन विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६१ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता
है—
करनिम्नं भूमिनिम्नं कुम्भनिम्नं क्वचिन्मतम्।।
खड्गनिम्नं महानिम्नं निम्नं नानाविधं क्वचित्।
कल्पनाहं प्रकर्तव्यं शैलदार्विष्टिकास्वपि।। (१३-१४)
३. सन्धिविधि ( श्लोक ४-९ )
सन्धिविधि का वर्णन वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता है—
सन्धिकर्माभिधानानि संक्षिप्य प्रवदाम्यहम्।
ह्रस्वद्रव्यं तथा वामे दीर्घद्रव्यं तु दक्षिणे।।
यथाक्रमं प्रयोक्तव्यं कीलपार्श्वं तु दक्षिणे।
सन्धिखण्डस्य दैर्घ्यं तु स्वव्याससममुच्यते।।
अर्ध वा पादहीनं वा योग्यायोग्यं च कारयेत्।
महीरुहाङ्घ्रिसन्धौ च खण्डं कार्यं घनांशकैः।।
एकेनापि तथा द्वाभ्यां त्रितयेनापि दृश्यते।
स्तम्भाग्रात् तद्द्रुतिस्तम्भादाधारेऽधः शिखान्तरी।। (३८-४१)
४. मेषयुद्ध सन्धि ( श्लोक २९ )
(क) इस सन्धि का प्रयोग वंश या अग्रधानी के मूल शिखा से कूट को जोड़ने
में किया जाता है। इसे कूट के पार्श्व रन्ध्र से जोड़ा जाता है—
वंशाग्रमूलशिखया यदि कूटपार्श्वरन्ध्रप्रवेशकृतसन्धिरिहाजयुद्धः।
आधारभेदकृतसन्धिवशेन कूटस्याधोगतं भवति मूलमिहापि नित्यम्।।
( मनुष्यालयचन्द्रिका-६.१३ )
(ख) मानसार ( १७ अ. ) में मेषयुद्ध का वर्णन प्राप्त होता है। शिलास्तम्भों में
इसका प्रयोग करना चाहिये—
शिलास्तम्भं तु सर्वेषां मेषयुद्धं प्रकल्पयेत्। (१७.५७)
मेषयुद्ध सन्धि में चारो दिशाओं में चार शूल बने रहते हैं—
मेषयुद्धे चतुर्दिक्षु चतुःशूलं तु संयुतम्। (१७.५४)
इसमें कर्ण कोने के नीचे एवं मध्य भाग में छिद्र बनाना चाहिये—
अधः कर्ण मध्ये छिद्रं मेषयुद्धं हि योजयेत्। (१७.४७)
अथाष्टादशोऽध्यायः
( प्रासादोर्ध्ववर्गाः )
गलभूषणमेतेषां शिरश्छन्दमथाधुना ।
लुपामानं च वक्ष्येऽहं स्तूपिकालक्षणं क्रमात् ॥१॥
प्रासाद के ऊर्द्ध वर्ग—अब मैं ( मय ऋषि ) इन ( प्रासादों ) के गले के अलङ्करणों
का, शीर्ष-भाग के आच्छादन का, लुपा के प्रमाण का एवं स्तूपिका के लक्षण का
क्रमशः वर्णन करता हूँ।।१।।
✺ गललक्षणम् ✺
वेदिकाद्विगुणोत्सेधं कन्धरं शिखरोदयम् ।
तद्द्वित्रिगुणतुङ्गं वा वेदिकोच्चं तु वा गलम् ॥२॥
गल का लक्षण—भवन का गल वेदिका की ऊँचाई का दुगुना ऊँचा होना
चाहिये। उसके ऊपर शिखरोदय गल का दुगुना अथव तीन गुना ऊँचा होना चाहिये।
अथवा गल की ऊँचाई वेदिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये।।२।।
गर्भभित्तित्रिभागैकमङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिवेशनम् ।
ग्रीवावेशं ततस्तावदेवं दैवे च मानवे ॥३॥
गर्भ-भित्ति ( कक्ष की दीवार ) के तीन भाग के एक भाग के बराबर अङ्घ्रि ( पाद,
चरण, स्तम्भ ) की वेदी में अङ्घ्रि का निवेश होना चाहिये। इसी प्रकार भित्ति के ऊपरी
भाग में ग्रीवा ( कण्ठ, गल ) का निवेश होना चाहिये। यह विधान देवालय एवं
मनुष्यगृह—दोनों के लिये कहा गया है।।३।।
पञ्चांशे भित्तिविष्कम्भे भागो वेद्यङ्घ्रिवेशनम् ।
ग्रीवावेशं ततस्तावच्चतुरंशे तथैव च ॥४॥
( अथवा ) भित्ति-विष्कम्भ के पाँचवें भाग के बराबर पाद-निवेश की वेदिका एवं
ग्रीवावेश ( कण्ठ-निवेश ) होता है। इसी प्रकार ये दोनों भित्ति-विष्कम्भ के चौथे भाग
के बराबर भी हो सकते हैं।।४।।
एवं त्रिविधनीत्या तु ग्रीवा साध्या प्रयत्नतः ।
उत्तरं वाजनं चैव मुष्टिबन्धं मृणालिका ॥५॥
मय०-१३
१९४ मयमतम्
दण्डिकावलयं चैव गलभूषणमिष्यते ।
मुष्टिबन्धोपरि क्षिप्तव्यालनाटकमूर्ध्वतः ॥६॥
दण्डिका च विधातव्या तदूर्ध्वे शिखरक्रिया ।
इस प्रकार इन तीन प्रकारों से ( किसी एक नियम से आवश्यकतानुसार )
प्रयत्नपूर्वक कण्ठ निर्मित करना चाहिये। उत्तरवाजन, मुष्टिबन्ध, मृणालिका, दण्डिका
एवं वलय गल के भूषण होते हैं। मुष्टिबन्ध के ऊपर व्याल एवं नाट्य-दृश्य ऊपर
से ( नीचे तक ) होते हैं। दण्डिका का निर्माण ( इस प्रकार ) होना चाहिये ( जिसमे )
उसके ऊपर शिखर-निर्माण हो सके॥५-६॥
✵ शिखरभेदाः ✵
शिखरोत्सेधमात्तोच्चा भागमानवशेन वा ॥७॥
दण्डिकावधिविस्तारं पञ्चांशं द्वयंशमानकम् ।
सप्तनन्दशिवांशे तु त्रयोदशतिथौ तथा ॥८॥
सप्तदशांशके बन्ध्वेदभूतषडंशकम् ।
सप्ताष्टांशं तु तारार्धमित्यष्टौ शिखरोदयाः ॥९॥
पाञ्चालं चापि वैदेहं मागधं चापि कौरवम् ।
कौसलं शौरसेनं च गान्धारावन्तिकं तथा ॥१०॥
शिखर के भेद—शिखर की ऊँचाई वर्णित भाग के मान के अनुसार होती है।
अथवा दण्डिका के मध्य के विस्तार के अनुसार रखी जाती है। इसका माप इस
प्रकार होता है—पाँच भाग में दो भाग, सात भाग में तीन भाग, नौ भाग में चार भाग,
ग्यारह भाग में पाँच भाग, तेरह भाग में छः भाग, पन्द्रह भाग में सात भाग, सत्रह
भाग में आठ भाग अथवा दण्डिका की मोटाई का आधा भाग। इस प्रकार शिखर के
आठ भेद बनते हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पाञ्चाल, वैदेह, मागध, कौरव,
कौसल, शौरसेन, गान्धार एवं आवन्तिक। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है—
१. पाँच भाग में दो भाग—पाञ्चाल
२. सात भाग में तीन भाग—वैदेह
३. नौ भाग में चार भाग—मागध
४. ग्यारह भाग में पाँच भाग—कौरव
५. तेरह भाग में छः भाग—कौसल
६. पन्द्रह भाग में सात भाग—शौरसेन
७. सत्रह भाग में आठ भाग—गान्धार
८. दण्डिका मोटाई का आधा भाग—आवन्तिक ॥७-१०॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९५
यथाक्रमेण नामानि ज्ञातव्यानि विचक्षणैः ।
जघनाद् बहिरेवैते एकाः सर्वे समाहिताः ।।११।।
सर्वे ते तैतलानां स्युरर्धादधस्तु मानुषम् ।
ज्ञानियों द्वारा इनका ( पाञ्चाल आदि का ) नाम क्रमशः जानना चाहिये। ये सभी
जङ्घा के बाहर निकले होते हैं। इन शिखरों में नीचे वाला ( आवन्तिक ) शिखर मनुष्य
के आवास के योग्य एवं शेष सभी देवालय के योग्य होते हैं।।११।।
तद्दशाद्यासप्तदशभागादेकांशवर्धनात् ।।१२।।
आवन्तिका प्रभृत्यूर्ध्वमष्टाविष्टलुपोदयाः ।
व्यामिश्रं च कलिङ्गं च तथा कौशिकमेव च ।।१३।।
वराटं द्राविडं चैव बर्बरं कोल्लकं पुनः ।
तथा शौण्डिकमित्येते व्यामिश्रादिलुपोदयाः ।।१४।।
इन आवन्तिक आदि शिखरों पर लुपा-संयोजन के लिये दश भाग से प्रारम्भ कर
एक-एक अंश बढ़ाते हुये सत्रह भाग पर्यन्त आठ प्रकार की ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं।
इनके नाम इस प्रकार हैं—व्यामिश्र, कलिङ्ग, कौशिक, वराट, द्राविड, बर्बर,
कोल्लक तथा शौण्डिक।।१२-१४।।
✺ शिखराकृतिः ✺
देवानां प्रथितान्येव पाषण्ड्याश्रमिणामपि ।
चतुरस्रं च वृत्तं च षडस्राष्टास्रमेव च ।।१५।।
द्वादशास्रं द्विरष्टास्रं पद्मकुङ्मलसन्निभम् ।
तथामलकपक्वाभं दीर्घवृत्तं च गोलकम् ।।१६।।
शिखर की आकृति—देवों एवं साधुओं-संन्यासियों का भवन के शिखरों के
आकार चौकोर, वृत्ताकर, षट्कोण, अष्टकोण, द्वादश कोण, षोडश कोण, पद्माकार,
पके आँवले के आकार का, लम्बी गोलाई के आकार का और गोलाकार होता है।
अष्टास्राद्यष्टधाराणि हर्म्यादीनां शिरांसि हि ।
षडाद्याषष्टिकर्णं च सम्मतं शिखराकृतिः ।।१७।।
हर्म्यों ( महलों ) के शिखर आठ कोण एवं आठ धाराओं वाले होते हैं; किन्तु
ये छः कोण से लेकर साठ कोणपर्यन्त हो सकते हैं।।१७।।
✺ स्थूपिकोत्सेधः ✺
तदुच्छ्रयचतुष्पञ्चभागं स्यात् पञ्चतुङ्गकम् ।
तत्समोच्चत्रिभागा वा तदूर्ध्वे स्थूपिकायतः ।।१८।।
१९६ मयमतम्
शिखर की ऊँचाई के चौथे या पाँचवें भाग के बराबर ऊँचा कमल होना चाहिये।
उसके ऊपर पद्म के बराबर अथवा उसके तीसरे भाग के बराबर लम्बी स्थूपिका
( स्तूपिका ) होती है।।१८।।
अल्पीयसी शिरोर्धा वा भागोच्चा वा त्रिभागिके ।
सङ्क्षेपात् स्थूपिकाभूषा ह्युपरिष्टात् प्रकाश्यते ।।१९।।
अत्यन्त छोटे भवन में स्थूपिका ( स्तूपिका ) का प्रमाण शिखर का आधा अथवा
तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में स्थूपिका के अलङ्करणों का
वर्णन ऊपर किया गया।।१९।।
✵ लुपासंख्या ✵
पञ्चाद्येकादशान्ताश्च चतुराद्या दशान्तकाः ।
चतुर्विधा लुपासंख्या देवेऽदेवे निकेतने ।।२०।।
देवों एवं मनुष्यों के भवन में चार प्रकार के लुपाओं ( लट्ठे, लकड़ी के पट्टे )
की संख्या होती है। यह पाँच से लेकर ग्यारह पर्यन्त ( पाँच, सात, नौ, ग्यारह )
अथवा चार से लेकर दस तक ( चार, छः, आठ, दश ) होती है।।२०।।
✵ पुष्करम् ✵
पूर्वोक्तं ह्यन्तरोच्चं तु व्यामिश्रं नाम पुष्करम् ।
ऊर्ध्वस्थान्यप्यधस्थानि पुष्कराण्यर्धमानतः ।।२१।।
पूर्व-वर्णित अन्तर की ऊँचाई व्यामिश्र नामक पुष्कर ( शिखर का एक भाग )
की है। ऊर्ध्व-स्थित एवं अधोभाग में स्थित पुष्कर का माप आधे प्रमाण से रखना
चाहिये।।२१।।
अर्धमारभ्य संवर्त्य पश्चादुक्तोच्चसीमयुक् ।
आरोहाण्यवरोहाणि गुह्यमेतदुदाहृतम् ।।२२।।
आधे प्रमाण से प्रारम्भ कर सबसे ऊँचे प्रमाण तक जाना चाहिये। इसके पश्चात्
वापस ( नीचे तक ) लौटना चाहिये। आरोह एवं अवरोह का यह गोपनीय क्रम इस
प्रकार वर्णित है।।२२।।
✵ लुपामानम् ✵
दण्डिकावधि तारार्धं चतुरस्त्रीकृतं समम् ।
कोष्णीषासनसीमाख्यसूत्रयुक्तं खलं नयेत् ।।२३।।
( दो ) दण्डिकाओं के मध्य की मोटाई ( चौड़ाई ) के आधे माप के बराबर एक
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९७
सम चतुर्भुज बनाना चाहिये। इस चतुर्भुज के चारो भुजाओं ( सूत्रों ) की संज्ञा क,
उष्णीष, आसन एवं सीम होती है॥२३॥
दण्डिकोत्तरबाहुल्यं सूत्रयेदासनादधः ।
आसने चतुरंशाद्याद्दशांशं बिन्दु विन्यसेत् ॥२४॥
आसन सूत्र के नीचे दण्डिका एवं उत्तर के बराबर सूत्र फैलाना चाहिये ( रेखा
बनानी चाहिये )। इसके पश्चात् आसनसूत्र पर चार से प्रारम्भ कर दश भागपर्यन्त
( चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दश ) बिन्दु चिह्नित करना चाहिये॥२४॥
कोष्णीषसन्धेस्तद्विन्दु सीमच्छायाोच्चमावहेत् ।
छायोच्चायतमानानि कमूलादासने न्यसेत् ॥२५॥
क सूत्र एवं उष्णीष सूत्र की सन्धि से उस बिन्दु को सीम की छाया ( शिखर का
एक भाग ) की ऊँचाई तक ले जाना चाहिये। छाया की ऊँचाई तक लम्बाई के मान
को क सूत्र के मूल से आसनसूत्र पर न्यस्त करना चाहिये॥२५॥
तान्येव दण्डिकादीनां पर्यन्तानि भवन्ति हि।
कोष्णीषसङ्गात् पर्यन्तबिन्द्वन्तं तल्लुपायतम् ॥२६॥
ये ही सूत्र दण्डिका आदि तक होते हैं। लुपाओं की लम्बाई क एवं उष्णीष सूत्र
के सन्धिस्थल से बिन्दु के अन्त तक होती है॥२६॥
तत्तत्पर्यन्तविस्तारं कसूत्रे विन्यसेत् पुनः।
स्वस्वकर्णगतच्छायामानैः सर्वान् विमानयेत् ॥२७॥
क सूत्र पर उनका ( लुपाओं का ) विस्तार पुनः विन्यस्त करना चाहिये ( अर्थात्
लुपायें कहाँ-कहाँ लगनी हैं—इसे चिह्नित करना चाहिये )। सभी को अपने कर्ण से
छायामान तक मापना चाहिये॥२७॥
तत्तत्पर्यन्तसूत्राणि मल्लपर्यन्तसूत्रवत् ।
एवं मध्यलुपासीम्नो वर्धन्ते वर्णसंख्यया ॥२८॥
वे पर्यन्त सूत्र मल्ल ( शिखर के एक भाग ) तक सूत्र की भाँति होते हैं। इस
प्रकार मध्य में स्थित लुपा अन्य लुपाओं ( पार्श्व में स्थित लुपा ) की संख्या के अनुसार
बढ़ सकते हैं॥२८॥
एवमावर्त्य तत्पश्चादारोहैर्वावरोहा च।
तत्तत्पुष्करसञ्जातं तत्तन्मल्लायतं विदुः ॥२९॥
इस प्रकार ( लुपा-संयोजन ) करने से तथा आरोह एवं अवरोह से पुष्कर निर्मित
१९८ मयमतम्
होता है एवं इससे मल्ल की लम्बाई ज्ञात होती है।।२९।।
- पञ्चलुपाभेदाः *
समध्यं च विमध्यं च लुपाकलनमेव हि।
मध्यं च मध्यकर्णं चाप्याकर्णमनुकोटिकम् ।।३०।।
कोटिरित्येवमुच्यन्ते पञ्च वर्णलुपाः क्रमात्।
युग्मांशेऽयुग्मसंख्याभिरयुग्मे युग्मसंख्यया ।।३१।।
लुपायें (अपनी स्थिति के अनुसार दो प्रकार की) समध्य (मध्य में लगने
वाली) एवं विमध्य (मध्य से हट कर लगने वाली) होती हैं। लुपायें पाँच प्रकार
की क्रमशः इस प्रकार होती हैं—मध्य, मध्यकर्ण, आकर्ण, अनुकोटिक एवं कोटि।
यदि रेखा का विभाजन सम भागों में हुआ हो तो लुपा की संख्या विषम होती है एवं
विषम भागों में सम संख्या में लुपायें होती हैं।।३०-३१।।
कान्तान्तरासिकोष्णीषसीमन्तं स्वांशसंख्यया।
चूलिका भ्रमणीया हि समयासमया च सा ।।३२।।
तत्तत्सूत्रात् स्थिता दन्तस्तनसूत्राणि सूत्रयेत्।
शयितसूत्रादधः पृष्ठवंशसूत्राणि सूत्रयेत् ।।३३।।
कान्ता, अन्तरा, असिका, उष्णीष, सीमान्त, चूलिका, भ्रमणीया, समया एवं
असमया उन सूत्रों से स्थित होकर दन्त एवं स्तन संज्ञक सूत्रों को सूत्र में बाँधती हैं
(दन्त से स्तन संज्ञक सूत्र के मध्य उपर्युक्तों की स्थिति होती है)। नीचे स्थित शयित
सूत्र (क्षैतिज सूत्र) पृष्ठवंश (लुपायें जिस पर टिकती हैं) को सूत्र में बाँधते हैं।
शयितस्थितसूत्रान्तः कीलं तत्कूटमूर्धनि।
निधायार्धेन्दुवत् सर्वाश्चूलिका विलिखेत् समाः ।।३४।।
शयित सूत्र के भीतरी भाग में स्थित कील के ऊर्ध्व भाग में कूट को अर्धचन्द्र
की भाँति स्थापित कर सभी सम चूलिकाओं को चिह्नित करना चाहिये।।३४।।
लुपाविलुपमध्यान्तर्गता सा चूलिकाकृतिः।
एवं स्याद् ऋजुकार्यं हि तथा कुक्कुटपक्षवत् ।।३५।।
लुपा एवं विलुप के मध्य में भीतर स्थित चूलिका की आकृति निर्मित होती है।
इस प्रकार ऋजु निर्मित होता है एवं इसकी आकृति कुक्कुट पक्षी के पंख के समान
होती है।।३५।।
बालकूटस्य विस्तारस्थितसूत्रस्तनान्तरे।
कूटमध्यमसूत्रं तु वलयच्छिद्रमध्यगम् ।।३६।।
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९९
बालकूट के विस्तार में स्थित सूत्रस्तन के मध्य में, वलय के छिद्र के मध्य में
स्थित कूट का मध्यम सूत्र होता है।।३६।।
पर्यन्तसूत्रकादन्तर्दण्डिकोत्तरजा ततिः ।
तदन्तर्जानुकव्यासस्तदन्तश्शूलिकास्थितिः ॥३७॥
पर्यन्त-सूत्र से अन्तर-दण्डिका के वाम भाग में जो विस्तार होता है, वहाँ
अन्तर्जानुक का व्यास एवं उसके मध्य में चूलिका की स्थिति होती है।।३७।।
☀ शिखरावयवमानानि ☀
लुपातारं तु दण्डं वा सपादं सार्धमेव वा ।
विस्तारत्रिचतुष्पञ्चभागेकांशं तु तद्धनम् ॥३८॥
शिखर के अङ्गों के प्रमाण—लुपा की चौड़ाई एक दण्ड, सवा दण्ड या डेढ़
दण्ड होती है तथा इसकी मोटाई का माप विस्तार का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ भाग
होता है।।३८।।
जानुव्यासं चोत्तरार्धचूलिकार्धार्धमेव वा ।
दण्डिकाविपुलं तावत् त्रिपादार्थं तु तद्धनम् ॥३९॥
जानु का व्यास उत्तर का आधा अथवा चूलिका के आधे का आधा ( चतुर्थांश )
होना चाहिये। इसकी मोटाई दण्डिका के बराबर, तीन चौथाई अथवा आधी होनी
चाहिये।।३९।।
वलयं जानुनीव्रं च दण्डिकाविपुलार्धतः ।
मल्लमध्यादिचामीली जानुकालम्बनं च यत् ॥४०॥
पर्यन्तजानुकान्तं च चूलिकाभाग एव सः ।
शयनात् तावदेव स्यान्नीव्रीवालम्बनसूत्रकम् ॥४१॥
वलय एवं जानु के नीव्र ( किनारा ) का माप दण्डिका के विस्तार का आधा होना
चाहिये। मल्ल का मध्य एवं आदि अमीली एवं जानु के आलम्बन से जानु के अन्त
तक चूलिका का अंश होता है। नीव्री का आलम्बन-सूत्र शयन से होता है।
कुठारिकाललाटं च जघनं च समं मतम् ।
पादविष्कम्भकर्णो वा विष्कम्भद्विगुणोऽथ वा ॥४२॥
कुठारिका, ललाट एवं जघन का मान एक समान होता है। पाद-विष्कम्भ एवं
कर्ण का माप समान होता है अथवा विष्कम्भ का दुगुना होता है।।४२।।
कूटव्यासो लुपापिण्डी कर्णस्तद्द्विगुणायतः ।
तदर्धं नालिकालम्बमूर्ध्वे मल्लाग्रसङ्गतिः ॥४३॥
२०० मयमतम्
कूट के व्यास के बराबर लुपा की पिण्डी होती है एवं कर्ण की लम्बाई उसकी
दुगुनी होती है। उसके आधे माप का नालिका-लम्ब होता है। इसके ऊपर मल्ल के
अग्र भाग को जोड़ा जाता है।।४३।।
छिद्रं तत्तीव्रमात्रं स्यान्मल्लानां तु प्रवेशनम्।
जानुकं च लुपामध्यं मध्यपृष्ठस्थवंशकम् ॥४४॥
समं स्यात् तीव्रताराभ्यां चूल्यंशो वा लुपान्तरम् ।
लुपातीव्राष्टगुणं वा वलयो वंशविस्तरः ॥४५॥
छिद्र उसकी मोटाई के अनुसार होना चाहिये, जिससे उसमें मल्लों का प्रवेश हो
सके। जानुक, लुपामध्य एवं मध्य पृष्ठ पर स्थित वंश समान माप के होते हैं। उनकी
मोटाई चूली के भाग अथवा लुपा के मध्य भाग के बराबर होती है। अथवा लुपा की
मोटाई के आठवें भाग के बराबर वलय एवं वंश का विस्तार होता है।।४४-४५।।
✵ छादनम् ✵
तदर्धं वेशनं तीव्रं फलकैलौहलोष्टकैः ।
मृण्मयैस्तु यथास्थैर्यमिच्छया छादयेत् पुनः ॥४६॥
लुपोर्ध्वे फलकान् न्यस्य वाष्टबन्धमधोध्वर्तः ।
आच्छादन, छाजन—उपर्युक्त माप का आधा मोटा (आच्छादन होना चाहिये)।
काष्ठ के फलकों, धातु के लोष्टकों (धातुनिर्मित पट्ट) अथवा मृत्तिका-निर्मित लोष्टकों
से इच्छानुसार (भवन के शीर्ष को) इस प्रकार आच्छादित करना चाहिये, जिससे
आच्छादन स्थिर रहे। लुपा के ऊपर फलकों (या लोष्टकों) को रखकर नीचे एवं ऊपर
अष्टबन्ध (विशिष्ट गारा) लगाना चाहिये।।४६।।
✵ वलयसन्धिः ✵
लुपामध्यादधश्छिद्रं वलयस्य विधीयते ॥४७॥
क्रियायां परलेखास्तु कल्प्याः षोडशसंख्यया ।
कुक्षिव्यासाष्टभागैकं मात्रामानमिति स्मृतम् ॥४८॥
वलय की सन्धि—वलय के छिद्र लुपा के मध्य के नीचे होता है। इसके लिये
सोलह संख्या में परलेखायें (विशिष्टरेखायें) निर्मित करनी चाहिये। इसका प्रमाण
कुक्षि के व्यास के आठवें भाग के अङ्गुलिमान के बराबर होनी चाहिये।।४७-४८।।
तेन भागेन सप्तार्थाद् द्वयर्धभागविवर्धनात् ।
आपञ्चदशसंख्यान्ताः परलेखास्तु षोडश ॥४९॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०१
उस भाग से साढ़े सात से प्रारम्भ कर ढ़ाई भाग बढ़ाते हुये पन्द्रह संख्या तक
ले जाना चाहिये। इस प्रकार सोलह परलेखायें बनती हैं॥४९॥
लुपाध ऊर्ध्वबिन्द्रादि मध्ये विन्यस्य तद्विधिम् ।
तद्विन्द्रादि विलोक्या हि परलेखा विचक्षणैः ॥५०॥
लुपा के नीचे एवं ऊपर बिन्द्रादि को मध्य में करना चाहिये। उस बिन्द्रादि से
बुद्धिमान ( स्थपति ) को परलेखा का अवलोकन करना चाहिये॥५०॥
प्रासादानामिमाः प्रोक्ता गृहादीनां च षोडश।
लुपायामाद्याद्विगुणं तन्मानं तेन बुद्धिमन् ॥५१॥
प्रासादों ( महलों, देवालयों ) की ये परलेखायें गृहों में सोलह संख्याओं में होती
हैं। लुपाओं में प्रथम से दुगुना मान करते हुये उनका मान बुद्धिमान ( स्थपति ) को
स्वीकार करना चाहिये॥५१॥
कोष्णीषासनसूत्राभ्यामधः शफरमालिखेत् ।
तस्मादुपरि मल्लस्य लेखयेत् तद्विचक्षणः ॥५२॥
क, उष्णीष तथा आसन सूत्र के नीचे शफर को अङ्कित करना चाहिये। उसके
ऊपर बुद्धिमान ( स्थपति ) को मल्ल का अङ्कन करना चाहिये॥५२॥
मल्लायतादधोभागे त्रिःपञ्चांशीकृतेः क्रमात्।
तत्तदंशावसानं तु मत्स्यं तत्तत् समुल्लिखेत् ॥५३॥
मल्ल के नीचे लम्बाई के पन्द्रह भाग करने चाहिये। उन-उन भागों के अन्त से
मत्स्य की आकृति बनानी चाहिये॥५३॥
सर्वासां परलेखानां क्रमोऽयं परिकीर्तितः ।
पाञ्चालादिलुपानां च प्रत्येकं प्रोच्यते बुधैः ॥५४॥
सभी परलेखाओं का यही क्रम कहा गया है। पाञ्चाल आदि लुपाओं में से प्रत्येक
के विषय में बुद्धिमानों ने वर्णन किया है॥५४॥
ऋजाकार्य्युता मल्लाद् या लेखासनकाग्रयोः ।
मध्ये परं हि सा प्राज्ञैः परलेखा प्रकीर्तिता ॥५५॥
आसन एवं क सूत्र के अग्रभाग से एवं मल्ल से संयुक्त, मध्य भाग एवं उसके
बाद सीधी रेखा को बुद्धिमानों ने परलेखा कहा है॥५५॥
✵ घटिका ✵
लुपाबाहुल्यमानेन घटिकां चतुरश्रिकाम् ।
वितस्त्यायामिनीमृज्वीं कृतमध्यमसूत्रिताम् ॥५६॥
२०२ मयमतम्
लुपा की चौड़ाई के मान से चौकोर घटिका का निर्माण करना चाहिये। यह एक
वितस्ति ( बित्ता, बालिशत ) लम्बी, सीधी, मध्यम सूत्र से युक्त होती है॥५६॥
चूलिकान्तर्वर्णलुपातिर्यक् सूत्रस्वमध्यमात्।
विन्यस्य घटिकां पश्चाच्छिद्रां शमनसूत्रवत् ॥५७॥
चूलिका, अन्तर्वर्ण, लुपा एवं तिर्यक् सूत्र के मध्य में घटिका को स्थापित करना
चाहिये। इसके पश्चात् इसे शमन सूत्र के समान छिद्रयुक्त करना चाहिये॥५७॥
प्रतिवर्णं तु घटिकां तद्वर्णे तां निधापयेत्।
क्षिप्तसूत्रस्य शेषांशच्छिद्रे वर्णलुपोदरे ॥५८॥
दण्डिकोत्तरवलयस्थितसूत्रसमं लिखेत्।
उदरायाममध्ये तु लिखिते ककरं भवेत् ॥५९॥
प्रत्येक वर्ण की घटिका को उसके वर्ण पर स्थापित करना चाहिये। क्षिप्त सूत्र
के शेष भाग के वर्ण लुपा के उदर भाग पर दण्डिका, उत्तर एवं वलय पर स्थित सम-
सूत्र का आलेखन करना चाहिये। उदर भाग की लम्बाई के मध्य भाग में सम-सूत्र के
अङ्कन से ककर निर्मित होता है॥५८-५९॥
घटिकाललाटमध्यं ककरं च समं यथा।
तथा निधाय घटिकां लुपोदरवशायताम् ॥६०॥
तल्ललाटाकृतिच्छेद्या वलयाद्या लुपोदरे।
इष्टपार्श्वे क्षिपेच्छायां छिद्रैश्च वलयस्य तु ॥६१॥
जिस प्रकार घटिका ललाट के मध्य में हो तथा ककर सम हो, उस विधि से
लुपा के उदर भाग में लम्बाई में रखकर उसे ललाट की आकृति में काटना चाहिये।
वलय आदि को लुपा के उदर भाग में इच्छित भाग रखना चाहिये। वलय के छिद्रों
के साथ छाया को स्थापित करना चाहिये॥६०-६१॥
तत्तद्धटिकया तत्तन्मध्यसंहितमध्यया।
या ललाटगतच्छाया तासां तासां तु सा भवेत् ॥६२॥
उस-उस घटिका के साथ तथा मध्य में स्थित उनके मध्य भाग से संयुक्त जो
ललाट से सम्बद्ध छाया है, वह उन-उन ( घटिकाओं ) की होती है॥६२॥
दण्डिकावलयच्छिद्रस्तनजानूत्तरादिषु ।
शिरोमध्येऽर्धमध्ये च न्यसेन्मुण्डतुलोपरि ॥६३॥
दण्डिका, वलय, छिद्र, स्तन, जानु एवं उत्तर आदि पर, शिर के मध्य भाग में
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०३
तथा अर्ध के मध्य में तुला के ऊपर मुण्ड ( सजावटी अङ्ग ) स्थापित करना चाहिये।
विटभागशिखोपेततुलापादः सवंशहृत्।
सवर्णा मत्स्यबन्धाश्च खर्जूरपत्रसन्निभाः ॥६४॥
विट भाग ( शीर्ष भाग ) शिखा से युक्त, तुला-पाद से युक्त, वंश से युक्त, वर्ण
से युक्त, मत्स्य-बन्ध एवं खर्जूर-पत्र के समान आकृति से युक्त होती है॥६४॥
⁕ पुनश्छादनम् ⁕
सवलयक्षो विधातव्या लुपाः शिखरकान्तरे ।
लुपोर्ध्वं फलकं वोर्ध्वं तस्याः कम्पं विधाय च ॥६५॥
इष्टकासुधया वाऽपि प्रच्छादनमलङ्क्रियात्।
पुनः आच्छादन—शिखर के भीतरी भाग में वलयक्ष के साथ लुपा रखनी चाहिये।
लुपा के ऊपर फलक अथवा कम्प रखना चाहिये तथा सुधा ( गारा ) एवं ईंटों से
आच्छादन को सुन्दर बनाना चाहिये ( अर्थात् उन्हें सही एवं सुन्दर बनाना चाहिये ) ।
⁕ स्थूपिकाकीलम् ⁕
स्थूपिकाकीले दीर्घं च पादोत्सेधसमं मतम् ॥६६॥
अर्धार्धमग्रविस्तारं दण्डार्धं मूलविस्तृतम्।
आशङ्कुमूलमुण्डान्तं तस्य मूलस्य वेधनम् ॥६७॥
स्तूपिका की कील—स्थूपिका ( स्तूपिका ) के कील की लम्बाई स्तम्भ की
लम्बाई के बराबर होनी चाहिये। इसके शीर्ष भाग की चौड़ाई चौथाई दण्ड एवं मूल
की चौड़ाई आधा दण्ड होनी चाहिये। इसके मूल का वेधन शङ्कु के मूल से लेकर मुण्ड
पर्यन्त होना चाहिये॥६६-६७॥
वंशाधस्तान्निधातव्या मण्डनागाग्रपट्टिका।
बालकूटस्तनं शङ्कुमूलमुण्डकमेव च ॥६८॥
वंश के नीचे मण्डनाग, अग्रपट्टिका, बालकूट, स्तन, शङ्कुमूल एवं मुण्डक
स्थापित करना चाहिये॥६८॥
अन्तःस्थवलयं वर्णपट्टिका च सनालिका।
मत्स्यबन्धनखर्जूरपत्रमल्लनिबन्धनात् ॥६९॥
वलक्षस्वस्तिधाराभिः शिखरान्तरलङ्क्रियात्।
शिखर के भीतरी भाग की सज्जा अन्तःस्थ वलय, नालियों से युक्त वर्णपट्टिका,
मत्स्यबन्धन, खर्जूरपत्र, मलय, वलक्ष तथा स्वस्ति धाराओं से करनी चाहिये॥६९॥
२०४ मयमतम्
विस्तारो मुखपट्ट्याश्च दण्ड्यो वाध्यर्ध एव वा ॥७०॥
नीप्रं षडष्टभागं वा कर्णिकोच्चं तु तत्ततिः ।
शक्तिध्वजस्य मूलस्य विपुलं दण्डमानतः ॥७१॥
तत्कण्ठं तावदेवोच्चं सपादं सार्धमेव वा ।
ग्रीवान्तगग्रपत्रं तु स्तम्भव्यासार्धतुङ्गवत् ॥७२॥
मुखपट्टी का विस्तार एक दण्ड या डेढ़ दण्ड होना चाहिये। नीप्र का माप उसके
छठवें या आठवें भाग के बराबर होना चाहिये एवं उसकी चौड़ाई कर्णिका की ऊँचाई
के बराबर होनी चाहिये। शक्तिध्वज के मूल की चौड़ाई एक दण्ड होनी चाहिये। उसका
कण्ठ उसके बराबर, उसका सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होना चाहिये। ग्रीवा के
अन्त तक जाने वाले गग्रपत्र का मान स्तम्भ की चौड़ाई का आधा ऊँचा होना चाहिये।
द्विदण्डादित्रिदण्डान्तमन्तरं गग्रपत्रयोः ।
वाताहतचलच्चारुलतावत् कर्णिकाक्रिया ॥७३॥
दो गग्रपत्रों के मध्य का भाग दो दण्ड से प्रारम्भ कर तीन दण्ड तक होना चाहिये।
कर्णिका वायु के वेग से हिलती हुई लता की भाँति होनी चाहिये।।७३।।
अर्धकर्णमधस्तस्माच्छिरोऽधार्धेन चानतिः ।
ग्रीवोपरि कपोलान्तं त्रिदण्डं सार्धमेव वा ॥७४॥
नीचे अर्धकर्ण होना चाहिये एवं उसके ऊपर शिर होना चाहिये। डेढ़ भाग से
अनति होनी चाहिये। ग्रीवा के ऊपर कपोल-पर्यन्त का भाग तीन या साढ़े तीन दण्ड
होना चाहिये।।७४।।
तावच्छक्तिध्वजान्तं स्यात् सपत्रं वा सशूलकम् ।
नेत्रसंश्लिष्टमल्लं तु चूलिकास्तनमण्डलम् ॥७५॥
उससे पत्र एवं शूल से युक्त शक्तिध्वज लगा होना चाहिये। वहाँ नेत्र से युक्त
मल्ल, चूलिका एवं स्तनमण्डल आदि निर्मित होना चाहिये।।७५।।
शयितस्थितपट्टाभ्यां मृणाल्यादिविभूषितम् ।
अर्धकर्णोर्ध्वपट्टोर्ध्वप्रत्यूर्ध्वे मुष्टिबन्धनम् ॥७६॥
क्षैतिज स्थित पट्ट कमल आदि से अलङ्कृत होना चाहिये। अर्धकर्ण, ऊर्ध्वपट्ट
एवं ऊर्ध्वप्रति के ऊपर मुष्टिबन्ध निर्मित होना चाहिये।।७६।।
यथोशोभननिष्क्रान्तं त्रिमुखं स्यात् तदूर्ध्वतः ।
शूलाभं मतलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम् ॥७७॥
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०५
शोभा के अनुसार निष्क्रान्त होना चाहिये। उसके ऊपर त्रिमुख होना चाहिये, जो
शूल के समान, मतल के सदृश, व्याल ( गज अथवा सर्प ) के सदृश अथवा नृत्यादि
के दृश्यों से युक्त हो।।७७।।
❋ ललाटभूषणम् ❋
तदूर्ध्वे कूटकोष्ठादिमण्डितं स्याद् विमानवत्।
सपट्टक्षुद्रकम्पाङ्गं मध्यतोरणमेव वा ॥७८॥
ललाट के अलङ्करण—उसके ऊपर कूट एवं कोष्ठ आदि से अलङ्कृत
विमान ( मन्दिर ) के सदृश रचना होनी चाहिये, जो पट्ट, क्षुद्रकम्प आदि अङ्गों अथवा
मध्य तोरण से युक्त हो।।७८।।
तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासिका।
एवंविधैरथान्यैश्च मण्डनीया ललाटिका ॥७९॥
तोरण के मध्य में लक्ष्मी अङ्कित होनी चाहिये, जिनका ( गजों द्वारा ) अभिषेक
किया जा रहा हो एवं हाथ में कमल-पुष्प हो। इस प्रकार अथवा अन्य विधि से
ललाटिका को सजाना चाहिये।।७९।।
ललाटवंशसंविद्धमध्यशूलदृढीकृता ।
स्तम्भविस्तारविस्तीर्णा विधातव्या कुठारिका ॥८०॥
तत्कर्णं पत्रमकरं मण्डितं चावलम्बितम्।
अर्धकर्णेन चार्धं वा यथायुक्ति यथारुचि ॥८१॥
ललाट के वंश विद्ध, मध्य के शूल से दृढ़ बनाई गई, एक दण्ड विस्तृत
कुठारिका होनी चाहिये। इसका कर्ण पत्र एवं मकर से अलङ्कृत तथा उस पर टिका
होना चाहिये। अथवा पत्र तथा मकर मध्य में या अर्धकर्ण पर रुचि एवं योजना के
अनुसार निर्मित करना चाहिये।।८०-८१।।
❋ स्तूपिका ❋
अन्तर्गतलुपातिर्यगग्रबन्धनविष्टकम् ।
तदूर्ध्वे तेन निर्विद्धं स्तूपिका यूपमिष्यते ॥८२॥
स्तूपिका—अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) में जोड़े गये ईंटों के मध्य में तिरछी लुपायें
प्रविष्ट होती हैं। उसके ऊपर उनको भेद कर स्थूपिका-यूप निकली होती है।।८२।।
पूर्वोक्तं स्तूपिकामानमलङ्कारमथोच्यते।
सार्धमर्धं तदूर्ध्वेऽर्धमर्धमंशं शरांशकम् ॥८३॥
२०६ मयमतम्
अंशमर्धं च भागं स्यादर्धमंशं तथार्धकम् ।
भागमर्धं तथाधार्शमंशमर्धं यथार्धकम् ॥८४॥
चतुरर्धं क्रमेणैवोत्तङ्गे द्वाविंशदंशके ।
पद्मं च क्षेपणं वेत्रं क्षेपणं पङ्कजं घटम् ॥८५॥
पङ्कजं क्षेपणं धृक् च क्षेपणं वेत्रमूर्ध्वतः ।
क्षेपणं धृक् च कम्पं तु पद्मं फलकमम्बुजम् ॥८६॥
वेत्रं च मुकुलं चैव क्रमेणोक्तवशान्नयेत् ।
स्थूपिका के प्रमाण का पहले वर्णन किया जा चुका है। अब उसके अलङ्करणों
के बाईस भागों का ( प्रमाणसहित ) वर्णन किया जा रहा है; जो इस प्रकार है—पद्म :
डेढ़, क्षेपण : आधा, वेत्र : आधा, क्षेपण : आधा, पङ्कज : एक, घट : पाँच, पङ्कज :
एक, क्षेपण : आधा, धृक् : एक, क्षेपण : आधा, वेत्र : एक, क्षेपण : आधा, धृक् :
एक, कम्प : आधा, पद्म : आधा, फलक : एक, अम्बुज : आधा, वेत्र : आधा तथा
मुकुल : साढ़े चार ॥८३-८६॥
सप्तद्व्यंशत्रिकद्व्यंशैः पञ्चनन्देन्द्रियत्रिकैः ॥८७॥
द्वित्रिवेदत्रिकद्व्यंशैर्गुणपञ्चर्तुपञ्चभिः ।
द्वित्रिभागैः क्रमाद् व्यासं मूलपद्मादिषु न्यसेत् ॥८८॥
पद्म से प्रारम्भ कर मुकुल पर्यन्त ( ऊपर वर्णित क्रम से अङ्गों ) की चौड़ाई इस
प्रकार होनी चाहिये—पद्म : सात भाग, क्षेपण : दो, वेत्र : तीन, क्षेपण : दो, पङ्कज :
पाँच, घट : नौ, पङ्कज : पाँच, क्षेपण : तीन, धृक् : दो, क्षेपण : तीन, वेत्र : चार,
क्षेपण : तीन, धृक् : दो, कम्प : तीन, पद्म : पाँच, फलक : छः, अम्बुज : पाँच, वेत्र :
दो एवं मुकुल : तीन भाग ॥८७-८८॥
मुकुलाग्रमंशमर्धार्धं यथाशोभवशान्नयेत् ।
चतुरष्टद्विरष्टास्त्रं साधारं वर्तुलं तु वा ॥८९॥
मुकुल के अग्र भाग को शोभा के अनुसार एक या डेढ़ भाग बढ़ाया जा सकता
है। इसका आकार चार, आठ या सोलह कोण वाला अथवा गोल रक्खा जा सकता
है। जिस आकार से ऊपरी भाग को सहारा दे सके ( वही आकृति चुनी जानी चाहिये ) ।
तदाकृतिः शिरश्छन्दमलङ्कारवशात्तु वा ।
तदाकृतिः सुरोर्वीशविप्राणां च विशां मतम् ॥९०॥
अथवा इसकी आकृति भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण के अनुसार रखनी
अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०७
चाहिये। ये आकृतियाँ देवों, राजाओं, ब्राह्मणों एवं वैश्यों के अनुकूल होती हैं।।९०।।
सुरद्विजनृपाणां तु वैश्यानां नैव शूद्रके।
तत्सम्बन्धं समापाद्य ध्वजदण्डं तदूर्ध्वगम् ।।९१।।
एवं लक्षणसम्पन्नं विमानं सम्पदां पदम्।
देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिये तो यह अनुकूल है; किन्तु शूद्रों के
लिये नहीं है। इन अङ्गों को ( यथोचित रीति से ) नियोजित कर ध्वजदण्ड को उसके
ऊपर रखना चाहिये। इन लक्षणों से युक्त विमान ( देवालय, ऊँचा भवन ) सम्पत्ति-
कारक होता है।।९१।।
✵ लेपः सुधाकर्म च ✵
करालमुद्री गुल्माषकल्कचिक्कणसाह्वयाः ।।९२।।
चूर्णोपयुक्ताः पञ्चैते सर्वकर्मसनातनाः ।
अभयाक्षबीजमात्रशर्कराः स्युः करालकाः ।।९३।।
लेप एवं गारा—कराल, मुद्री, गुल्माष, कल्क एवं चिक्कण—ये पाँचों चूर्ण
सभी ( निर्माण ) कार्यों के लिये उचित होते हैं। कराल अभया ( हर्र, हरीतकी ) अथवा
अक्ष ( बहेड़ा, बिभीतक ) के बीज के बराबर आकार के कङ्कड़ होते हैं।।९२-९३।।
मुद्गबीजसमा क्षुद्रशर्करा मुद्गमिष्यते ।
सार्धत्रिपादद्विगुणकिञ्जल्कसिकतान्वितम् ।।९४।।
चूर्णस्य शर्कराशुक्त्योर्यद् गुल्माषं तदुच्यते ।
करालं चापि मुद्रीं च तेन मानेन योजयेत् ।।९५।।
मूंग के दाने के बराबर छोटे कङ्कड़ को मुद्ग कहते हैं। डेढ़ भाग, तीन चौथाई
अथवा दुगुने माप में बालू से युक्त किञ्जल्क ( कमल के सूत्र, रेशे ) में शर्करा
( कङ्कड़ ) एवं सीपियों ( के चूर्ण के साथ ) चूना मिलाने पर गुल्माष ( एक प्रकार
का गारा ) तैयार होता है। कराल एवं मुद्री को भी इसी माप से तैयार किया जाता
है।।९४-९५।।
पूर्वोक्तमात्रसिकताचणकश्चूर्णमानतः ।
क्रियार्थं पेषितं कल्कं चिक्कणमस्तु केवलम् ।।९६।।
पूर्व-वर्णित माप में बालू के साथ चणक ( चने के आकार का चूना ) को एक
साथ पीसना चाहिये। यह कल्क होता है। चिक्कण केवल ( सादा, इसमें कुछ नहीं
मिलाया जाता ) होता है।।९६।।