मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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(पैदल भी चलते) हो, मोटरपर भी चलते हो और वायुयानपर भी चलते हो,
तो भी उनके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई भी परिवर्तन नहीं होता है। इतना ही
नहीं, कितने ही आधुनिक विचारक अतिप्राचीन वैदिक अध्यात्मवाद एवं धर्म-
नियन्त्रित रामराज्यवादको पसंद करते है। अनाग्रह बुद्धिका फल है—'बुद्धेः
फलमनाग्रहः।' और तत्त्वका पक्षपात बुद्धिका स्वभाव होता है—'तत्त्वपक्षपातो हि
धियां स्वभावः।' जैसे पर्वत, कन्दरामें स्थित लाखो वर्षोंका गाढान्धकार भी प्रदीप-
प्रभाके प्रकट होते ही नष्ट हो जाता है, वैसे ही भीषण से-भीषण विपरीत वातावरण-
में भी प्रमाणके द्वारा संशय-विपर्ययादिरहित निर्दोष तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता ही है।
इसमें चाहे हाथकी चक्कीसे आटा पीसा जाय, चाहे भापकी चक्कीसे। जब किन्ही
कारणोसे, परिस्थितियोसे या प्रमादसे सत्समागम, सच्छिक्षामें गडबडी आती है, तब
सद्विचार, सत्सिद्धान्तसे प्रच्युति होती है और तभी धार्मिक, सामाजिक अधोगति
होती है। यही धर्मग्लानि एवं अधर्माभ्युत्थान कहा जाता है; परन्तु यह अवस्था
स्थिर नही रहती है। गीताके आचार्य दार्शनिकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके
अनुसार जब-जब धर्मग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान बढता है, तब-तब परमेश्वर
अवतार ग्रहण करके धर्मका प्रतिष्ठापन करते है।
इतिहास और व्यक्ति
स्टालिनका कहना है कि 'इतिहास विज्ञानको वास्तविक विज्ञान बनाता
है तो सामाजिक इतिहासके विकासको सम्राटो, सेनापतियो, विजेताओ तथा
शासकोके कृत्योकी परिधिके अन्तर्गत सीमित नही किया जा सकता। इतिहास-
विज्ञानके लिये आवश्यक है कि भौतिक मूल्योके निर्माता लाखो, करोडो मजदूरोके
इतिहासके चिन्तनको अपना मूल विषय बनाये। द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृतिके
सभी बाह्य रूपों एव पदार्थोंमें आन्तरिक असंगतियाँ सहजरूपसे विद्यमान है। इन
पदार्थों और रूपोंमें भावपक्ष तथा अभावपक्ष दोनो ही हैं। उनका अतीत है तो
अनागत भी है। एक अश मरणशील है तो दूमरा विकासोन्मुख। इन दो
विरोधी अंगों—पुरातन और नवीन, मरणशील और विकासोन्मुख, निर्वाण
और निर्माण—का सघर्ष ही विकास-क्रमकी आन्तरिक प्रक्रिया है।' इस
आधारपर कम्युनिष्ट, मार्क्सवादी सदा ही नवीन एव विकासोन्मुख विचारधारा
या दलका साथ देता है, चाहे वह बाह्यरूपसे कितनी ही बलहीन दशामें क्यो
न हो। वह कभी पुरातन एव मरणशील विचारवारा या दलके साथ सहानुभूति
नहीं रखता, चाहे वह कितना ही समृद्ध दृष्टिगोचर क्यो न हो। इसी पृष्ठभूमिके
आधारपर मार्क्सवादियोका कहना है कि 'सर्वहाराके अधिनायकत्वद्वारा नयी
सभ्यता, नयी संस्कृतिका जन्म होगा। वह नयी सभ्यता मानवकी सब देनोको
ग्रहण करेगी और उन्हे जनवादी रूप देगी। साथ ही विज्ञान एवं उत्पादनकी प्रगतिसे
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३७
नयी मानवताका जन्म होगा ।' कहा जाता है कि 'रूसके परिवर्तनसम्बन्धी
साहित्योंसे यह स्पष्ट है ।' वेब दम्पतिका कहना है कि 'रूसके नागरिक उसी
जीवनको आदर्श जीवन मानते हैं, जिसका ध्येय बन्धुओंका हित हो, चाहे वे बन्धु
किसी भी आयु, लिङ्ग, धर्म या जातिके हों ।' जॉनसनके अनुसार 'ईसाइयोंकी
तरह कम्युनिष्ट भी समाज-हितको ही जीवनका लक्ष्य मानते हैं । कम्युनिष्ट
ईसामसीहके सच्चे उत्तराधिकारी हैं । सभी धार्मिक नेताओने मानवके सामने जो
आदर्श रक्खे हैं, रूसके नागरिक ही उन आदेशोंके अनुसार जीवन-निर्वाह करते
हैं ।' इन सबका कारण मार्क्सवादीके मतानुसार 'उत्पादन-शक्तियों एवं उत्पादन-
सम्बन्धोंमें परिवर्तन ही है । रूसमें उत्पादन-शक्तियोंपर जनताका राज्यद्वारा
एकाधिकार है और उत्पादन सम्बन्ध समाजवादी है । इसीलिये वहीं नयी सभ्यता-
का जन्म हो सकता है ।' मेक्सिम गोर्कीके अनुसार 'सोवियेट कारखाना एक
समाजवादी शिक्षाकेन्द्र है, न कि पूँजीवादी कमाईखाना ।'
जहाँ किसी पक्षविशेषके समर्थनके लिये ही साहित्यिक तैयार किये जाते
हैं और इसी ढङ्गका इतिहास गढ़ा जाता है, वहाँके साहित्य एवं इतिहाससे किसी
सत्य घटना या सत्य सिद्धान्तका निर्णय असम्भव ही होता है । आजके मार्क्सवादी
इतिहासमें भी लाखो, करोड़ों मजदूरो, किसानोंको कोई नहीं पूछता है । हाँ, उनके
नामपर कुछ राजनीतिक चालबाजोकी ही इतिहास एव साहित्यमे प्रशसाके पुल
बाँधे जाते हैं और उन्हींका स्वागत-सत्कार होता है । लेनिन, स्टालिन आदि ही
ऐतिहासिक व्यक्ति कहलाये जाते हैं, मिल-मजदूरो, किसानोंको कौन जानता है ?
द्वन्द्ववादी विचार तर्ककी कसौटीपर अव्यभिचरित नहीं निकलते, यह दिखलाया
जा चुका है। ह्रास-विकास, निर्वाण-निर्माणके सिद्धान्तकी कहानी नयी नहीं, पुरानी
ही है । परन्तु इन सबमे अनुस्यूत, अविनाशी आत्माको भुलाकर इसका दुरुपयोग
किया गया है। अनाचार, पापाचार एव अन्याय भी विकासोन्मुख हो सकते हैं,
विविध प्रकारके रोग भी विकासोन्मुख होते हैं । सद्भावना, सद्गुण और स्वास्थ्य
भी ह्रासोन्मुख एव निर्वाणोन्मुख होते हैं । मार्क्सवादियोके अनुसार विकासोन्मुख-
का साथ देकर और ह्रासोन्मुखको दो धक्के देकर उसे शीघ्र ही खतम कर देनेकी
कल्पना अवसरवादिता, स्वार्थ-परायणता और दानवताके अतिरिक्त और कुछ नहीं
है । फिर तो मरणोन्मुख अपने साथीकी भी सहायता करना मूर्खता ही कही जायगी
और फिर चिकित्सा पद्धतिका विकास भी व्यर्थ ही समझा जायगा । इसके अतिरिक्त
बाह्यरूपसे बलहीन दशामें विद्यमान व्यक्ति या समूहकी विकासोन्मुखता भी किस
तरह विदित हो सकेगी ? मार्क्स तथा लेनिनने किसानोंको विकासोन्मुख नहीं समझा
था, परन्तु चीनमें ठीक उसके विपरीत अनुभव हुआ । इसीसे मार्क्सवादी अटकल-
का मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है । मार्क्सवादी असंगतियाँ काल्पनिक हैं । वे ऐसी
नहीं हैं जिनका समाधान ही न हो । अन्यथा किसी भी व्यक्ति, समुदाय,
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जीवन या व्यवस्थाको इकाई मानकर उसीमें अन्तर्विरोध या असंगतियोंकी कल्पना
करके उसे विकासोन्मुख मानकर आगन्तुक विघ्नोंके हटानेका प्रयत्न न करके
उसके विनाशके लिये ही दो धक्के देना ठीक समझा जायगा । फिर तो विनश्वर
वस्तु अवसरसे पहले ही नष्ट हो जायगी । यही बात कम्युनिष्ट नेताके शरीर,
स्वास्थ्य एवं वर्गहीन समाज तथा नयी सभ्यताके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है ।
यदि उत्पादन-शक्तियो एवं उत्पादन-सम्बन्धोंके आधारपर नयी सभ्यता,
नयी मानवता और नयी संस्कृतिका जन्म हो सकता, तब तो जिस पूँजीवादके द्वारा
इन शक्तियोंका विकास हुआ है, पहले उस पूँजीवादका ही इसके द्वारा कल्याण
होता और फिर वे सद्गुण जिनकी कल्पना कम्युनिष्टोंमें की जा रही है, पूँजीवादमें
भी हो सकते थे । अतः 'यन्त्रों, मशीनो एव उत्पादनके बढनेसे मनुष्यता तथा
सद्गुण बढ़ जायँगे' यह कल्पना आकाशकुसुम-जैसी ही है। यदि ऐसा ही होता
तो मानवता-सम्पादनार्थ बडे-बड़े धनपति, कुबेरपति एवं सम्राट् धन तथा
साम्राज्य छोड़कर अकिंचन बनकर अरण्यवासी होनेका प्रयत्न न करते । वेव
दम्पति तथा जॉनसनकी दृष्टिसे रूसी कारखाने समाजवादी शिक्षाके केन्द्र हैं और
रूसके नागरिक ईसाके उत्तराधिकारी हैं। परंतु भूतपूर्व विभिन्न देशोंके प्रसिद्ध
कम्युनिष्टोंद्वारा ही लिखे हुए उनके अनुभवोंके संकलन—'पत्थरके देवता'
पुस्तक—पढनेसे तो रूसी नागरिकोंका दूसरा ही रूप मालूम पडता है । हंगरी तथा
पोलैंडकी घटनाओंने तो तथाकथित रूसी कसाईखानेको भी विश्वके सम्मुख रख
दिया। कम्युनिष्ट अपने दलके सदस्यों या स्वमतसे अविरुद्ध लोगोंके लिये भले ही कुछ
करते हो, परंतु उनसे मतभेद रखनेवालोंको रूसमें जीवित रहनेका भी अधिकार
नहीं है। कितने ही वैज्ञानिकोंको इसलिये मौतके घाट उतार दिया गया कि उनके
सिद्धान्तोंमें कुछ चेतन कारणवादकी झलक आती थी । कम्युनिष्ट कहते हैं कि
'रूसमें दूसरी पार्टी इसलिये आवश्यक नहीं है कि वहाँ कोई दूसरे वर्ग हैं ही
नहीं, फिर उनका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टीकी क्या आवश्यकता है ? कम्युनिष्ट-
सरकारविरोधी विचार व्यक्त करना रूसमें राष्ट्रविरोधी विचार प्रकट करना
समझा जाता है।' परंतु यह स्पष्ट है कि जब गैर-सरकारी विचार व्यक्त करनेका
किसीको अधिकार ही नहीं है, तब फिर यह मालूम भी कैसे हो कि रूसमें मतभेद,
वर्गभेद है या नहीं ? फिर यदि वहाँ मतभेद है ही नहीं तो प्रबल पुलिस एवं
गुप्तचर-विभाग वहाँ किस लिये है और वर्गसफाया फिर किसका होता है ?
राष्ट्रीयताका भाव
मार्क्सवादके अनुसार 'राष्ट्रयता भी पूँजीवादसे ही सम्बन्धित है । यूरोपमें
पूँजीवादके साथ-साथ राष्ट्रियताका उदय हुआ था । व्यापारिक स्पर्धाके फल-
स्वरूप पूँजीपतियोंमें राष्ट्रियताकी चेतना जागरित हुई । १५ वीं सदीमें व्यापारियो
और मल्लाहोंके प्रोत्साहनद्वारा यूरोपके देशोंने अन्य महाद्वीपोंकी खोज की,
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४४९
अंग्रेजोंने भारतवर्षमें व्यापारिक, राजनीतिक अधिकार स्थापित किया। अन्य देशों-
के व्यापारियोंने व्यापारिक सुविधा प्राप्त न होनेके कारण अपनेको पिछड़े हुए
देशके नागरिक समझा, इसलिये उन्होंने ब्रिटेन-जैसे समृद्ध देशोंके मुकाबलेके
लिये अपने राष्ट्रको सुदृढ बनाया। राष्ट्रीयताकी भावनाका जिसका कि जन्म १४वीं
शतीमें हुआ था, उन्होंने उपयोग किया। इसी स्पर्धाके फलस्वरूप राष्ट्रीयताने
उग्र रूप धारण किया। स्टालिनके मतानुसार 'पूँजीपति राष्ट्रीयताका पाठ बाजारमें
ही सीखता है।' उसके अनुसार भाषा, प्रदेश, आर्थिक जीवन और संस्कृतिका
स्थायी सम्बन्ध राष्ट्रीयताका आधार है। एक राष्ट्रमें इन सब विशेषताओंका होना
आवश्यक है। इस दृष्टिसे इजराइलके यहूदी राष्ट्र बने। इसके पहले यहूदियोंका
कोई एक राष्ट्र नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि वे यूरोपके भिन्न देशोंमें फैले
हुए थे। मध्यकालीन साम्राज्योंको भी राष्ट्र नहीं माना जाता था। सिकंदरका
साम्राज्य या अन्य साम्राज्य भी राष्ट्रके रूपमें नहीं थे। राष्ट्रीयताकी आड़में
ही आधुनिक साम्राज्योंका जन्म हुआ। इन साम्राज्योंमें भिन्न-भिन्न जातियाँ तथा
राष्ट्र हैं। साम्राज्यवादी देश उन जातियों तथा राष्ट्रोंका शोषण करते हैं; फिर भी
इस सम्बन्धमें वे अपनेको अधिक सभ्य मानते हैं। जारशाही रूसके साम्राज्यमें
कई परतन्त्र राष्ट्र एव जातियाँ थीं। जारशाहीके रूसी शासक इनका शोषण करते
थे। यही स्थिति अन्य साम्राज्योंकी भी थी। इन परतन्त्र राष्ट्रोंमे धीरे-धीरे राष्ट्रिय
चेतना जागरित हुई, राष्ट्रिय आन्दोलन आरम्भ हुए और इनका नेतृत्व पूँजीपतियोंने
किया। १९वीं शतीमें यूरोपने और बीसवी शतीमें एशियाके राष्ट्रोंने ब्रिटेन, फ्रांस,
जर्मनी, आस्ट्रिया, हगरी, तुर्की आदिसे मुक्त होनेके लिये आन्दोलन छेडे।
रूसकी बोल्शेविक पार्टीने कहा कि 'जबतक साम्राज्यवादका अन्त
नहीं होता तबतक राष्ट्रीयताका प्रश्न हल नहीं हो सकता।' कहा जाता है कि
१९१७ की रूसी क्रान्तिके पश्चात् सोवियतराज्यकी स्थापना हुई। जारशाही
साम्राज्यके सभी राष्ट्रों एव जातियोंको आत्म-निर्णयका अधिकार मिला। कम्युनिष्ट
पार्टीके अनुसार पूँजीवादी शोषणके साथ सभी प्रकारके शोषणका अन्त होना
आवश्यक था। राष्ट्रिय-शोषण भी एक प्रकारका शोषण ही है। प्रत्येक राष्ट्रको
सोवियत समाजवादीमत तथा संघमें रहने तथा न रहनेकी स्वाधीनता मिली।
धीरे-धीरे साम्राज्यके अन्य राष्ट्रों एव जातियोंने सोवियत-संघकी सदस्यताके पक्षमें
निर्णय किया। आत्म-निर्णयके साथ-साथ प्रत्येक राष्ट्रको सास्कृतिक स्वतन्त्रता
प्राप्त हुई। स्टालिनका आदेश था कि 'कोई भी कम्युनिष्ट किसी परतन्त्र राष्ट्रमें
एक शासककी भाँति व्यवहार नहीं कर सकता। पार्टीके सदस्योंको चाहिये कि
वे पिछड़े हुए राष्ट्रोंके जागरणमें सहयोग दें।' फलस्वरूप रूसमें निरन्तर
सांस्कृतिक उन्नति हो रही है। मार्क्सके मतानुसार 'इस जागरणका मूल कारण
शोषणका अन्त ही है।'
मा० रा० २९-
४५० मार्क्सवाद और रामराज्य
इस सम्बन्धमें भी मार्क्सवादी कल्पना मनगढन्त है । कुटुम्ब, कुल,
जाति, सम्प्रदाय तथा समाजके समान ही राष्ट्रकी कल्पना भी प्राचीन है । महा-
भारतमें कई स्थलोंमें देशोंके सम्बन्धमें 'राष्ट्र' शब्दका प्रयोग आया है । वेदोंमें
भी राष्ट्र शब्दका प्रयोग देशके लिये आता है, जैसा कि—'आब्रह्मन्ब्राह्मणो
ब्रह्मवर्चसी जायताम्, आराष्ट्रे राजन्यः ।' (यजु० सं० २२ । २२) । इसीलिये
धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीमें समष्टिके अविरोधसे व्यष्टिके अभ्युदयका विधान
है । व्यक्ति कुटुम्बके अविरोधसे, कुटुम्ब कुलके अविरोधसे, कुल ग्रामके, ग्राम
प्रदेशके, प्रदेश राज्यके और राज्य विश्वके अविरोधसे आत्मोन्नतिके लिये प्रयत्न-
शील हो सकते हैं । कुलके लिये एकका, ग्रामके लिये कुलका और जनपदके
लिये ग्रामका त्याग किया जा सकता है—'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं
त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥' अवश्य ही व्यक्तिवाद
तथा जातिवादके तुल्य ही राष्ट्रवाद या देशवाद भी संघर्षसे ही उग्ररूप धारण
करता है । सीमित शक्तिवाले लोग ही यदि सीमित क्षेत्रमें प्रयत्न करते हैं, तो वह
प्रभावशाली सिद्ध होता है, अन्यथा समुद्रमें सत्तू घोलनेके तुल्य सीमित प्रयत्न
अकिंचित्कर होता है । इसीलिये व्यक्तिगत, कुटुम्बगत, मण्डलगत, राज्यगत एवं
राष्ट्रगत उत्तरोत्तर विकसित तथा विशाल प्रयत्न ही सफल होते हैं । 'वसुधैव
कुटुम्बकम्' के अनुसार विश्वके, तथा महाविराट्की उपासनाके अनुसार अनन्त
कोटि ब्रह्माण्डात्मा महाविराट्के अभ्युदयके लिये भी प्रयत्न होता है, परंतु
उसके लिये विशिष्टरूपसे उच्चकोटिकी भावनाओंका विकास अपेक्षित होता है ।
धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणालीकी सार्वभौम सत्तामें केवल समन्वय एवं
सामञ्जस्यकी स्थापनाके लिये ही सार्वभौम सत्ताद्वारा विभिन्न जातियों एवं राष्ट्रोंका
नियन्त्रण किया जाता है । फिर भी सभी धर्मों, सम्प्रदायो, जातियों तथा राष्ट्रोंको पूर्ण
विकासका अवकाश भी रहता है । उसी सार्वभौम सत्ताके द्वारा राष्ट्रो, जातियो तथा
व्यापारियोके संघर्ष रोके जाते हैं । जैसे व्यक्तिगत उन्नतिसे कुटुम्बोकी उन्नति और
कुटुम्बोंकी उन्नतिसे ग्रामो तथा नगरो की उन्नति होती है, वैसे ही ग्रामो तथा नगरो-
की उन्नतिसे मण्डलो, प्रान्तो एव राज्यकी उन्नति होती है । राज्यो एव राष्ट्रोकी
उन्नति विश्वकी उन्नतिमें अपेक्षित होती है । व्यक्तित्व एव कुलीनताका अभिमान
अनेक बार प्राणियोको बुरे कर्मोंसे बचाता है । महाभारतमें आख्यान है कि 'एक
श्वान किसी महर्षिकी कृपासे वृक ( भेड़िया ), व्याघ्र, सिंह एवं शार्दूलतक बन
गया । फिर भी श्वानके सस्कार विद्यमान होनेसे श्वानके स्वभावानुसार उससे ऐसी
दुश्चेष्टा हुई कि उसे पुनः श्वान ही बनना पडा ।' इसी तरह एक समय किसी
ऋषि ने एक मूपिकाको रूप-यौवनसम्पन्न दिव्य कन्या बना दिया । फिर उसे वर
पसन्द करनेके लिये कहा गया । उसने सबसे श्रेष्ठ वर निश्चय करते-करते सूर्यको
पसंद किया । फिर सूर्यके आच्छादक बादलको श्रेष्ठ समझा । फिर बादलोको
उड़ानेवाले वायुको, फिर वायुको रोकनेवाले पर्वतोंको और अन्तमें पर्वतोंमें भी
बिल कर देनेवाले मूषकको सर्वश्रेष्ठ समझकर उसे ही पति बनाया । निष्कर्ष यह
है कि संस्कारोंमें उच्चता धीरे-धीरे आ सकती है, एकाएक नहीं, अतः कुलीनताका
बड़ा महत्त्व है ।
भारतीय राजनीतिज्ञोंने सेनामें कुलीन योद्धाओंका संग्रह आवश्यक बतलाया
है । युद्धमन्त्री और प्रधानमन्त्रीकी नियुक्तिमें भी विशिष्टरूपसे कुलीनताका ध्यान
आवश्यक बतलाया गया है। यहाँ कुलीनता तथा शालीनताका ध्यान केवल बुरे कर्मोंसे
बचनेके लिये ही है, घमण्ड या अभिमानके लिये नहीं । दोषत्याग एवं गुणार्जनके
लिये ही गौरवका उपयोग होता है । 'श्रीमद्भागवत'में बतलाया गया है कि
'भगवद्विमुख, विविध गुणयुक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भगवद्भक्त चाण्डाल भी श्रेष्ठ है ।
भगवद्भक्त चाण्डाल अपने कुलसहित कृतार्थ हो जाता है, परन्तु घमण्डी ब्राह्मण
आत्मकल्याण करनेमें भी समर्थ नहीं होता ।' इसी अभिप्रायसे किसी शासकने
एक ही अपराधमें पकड़े गये चार अपराधियोंको उनके कुल, संस्कार, योग्यता
आदिके अनुसार चार प्रकारके दण्ड दिये । जिसे केवल सामने आते ही छोड़
दिया गया, उसकी न्यायालयसे बाहर निकलते-ही-निकलते हृदयगति अवरुद्ध
होकर मृत्यु हो गयी । जिससे यह कहा गया कि 'आप ऐसे, और आपका यह
काम !' वह अपने आप फाँसी लगाकर मर गया । जिसे कुछ भला-बुरा कहा
गया, वह देश छोड़कर चला गया और जिसे दस बेंतकी सजा दी गयी, वह दस
ही दिनोंके बाद पुनः उसी अपराधमें पकड़ा गया ।
इस तरह कुल, जाति, राष्ट्र आदिके अभिमानसे कुल, जाति एवं राष्ट्रके
गौरवस्वरूप आदर्शभूत महापुरुषोंके स्मरणसे, उनके आदर्शोंसे प्रेरणा प्राप्त
होती है । हीन पुरुषोंके चिन्तनसे हीन प्रेरणा मिलती है और उत्तम पुरुषोंके
चिन्तनसे उत्तम प्रेरणा मिलती है । यह प्रत्यक्ष है कि विशिष्ट संगीत सुनने
तथा विशिष्ट संगीतज्ञके दर्शन या माहात्म्य-श्रवणसे संगीतमें प्रवृत्ति होती है ।
विशिष्ट वीर पुरुषोंकी वीरगाथा सुननेसे मनमें वीरताका सञ्चार होता है ।
कामिनी-दर्शन या कामकलाके दर्शन, श्रवणादिसे काम-भावना जागरूक होती है ।
सर्प, व्याघ्रादि भीषण प्राणियोंके दर्शनसे भय उत्पन्न होता है । सत्पुरुषोंके दर्शन,
श्रवणादिसे सद्भावना उत्पन्न होती है । परोपकारी, दयालु, देशभक्त आदिके
दर्शन, श्रवणसे भी उस-उस ढंगके भाव उद्रिक्त होते हैं । विभिन्न राष्ट्रोंके
विभिन्न ऐतिहासिक संस्मरण होते हैं । उनसे विभिन्न महापुरुषों, अवतारों,
पैगम्बरों, तीर्थंकरों आदिके विशिष्ट सम्बन्ध होते हैं । वे स्थान, वे देश उन-उन
४५२ मार्क्सवाद और रामराज्य
अनुयायियोंके लिये तीर्थभूत होते हैं । मार्क्सवादी भी मार्क्स, एंजिल्सके चित्रों एवं
कृतियोंका आदर करते हैं । रूसी लेनिन, स्टालिनका तथा चीनी माओत्सेत्तुंग
आदिका दर्शन स्मरण तथा उनकी कृतियोंका आदर करते हैं । इन सबसे उन्हें
प्रेरणा मिलती है । भगवान् शिव, विष्णु, भगवान् रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र, बुद्ध
तथा शङ्कराचार्य आदिसे संस्कारका, विशेषरूपसे भारतभूमिका विशिष्ट सम्बन्ध है।
अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना, गङ्गा, चित्रकूट, रामेश्वर, द्वारका,
जगन्नाथ, उज्जयिनी आदि विशिष्ट तीर्थ माने जाते हैं। इन हेतुओंसे विशिष्ट देशोंमें
उन देशवासियोंकी विशिष्ट श्रद्धा होती है। उनकी रक्षा और समृद्धिके लिये उनके
द्वारा विशिष्ट प्रकारकी प्रेरणाएँ मिलती रहती हैं। शास्त्रोंमें तो कहा गया है कि
जननी और जन्मभूमि स्वर्गसे भी अधिक श्रेष्ठ होती है—'जननी जन्मभूमिश्च
स्वर्गादपि गरीयसी।'
आधुनिक इतिहास बतलाता है कि मार्क्सवादी नीतिके अनुसार बने हुए
'अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-संघ' में यद्यपि १९०७ की स्टाटगार्टकी बैठकमैं यह प्रस्ताव
स्वीकृत हुआ था कि 'आगामी होनेवाले महायुद्धोंमे मजदूरोंको भाग न लेकर
उनका जोरदार विरोध करना चाहिये और महायुद्धको गृहयुद्धके रूपमें परिणत
करके साम्राज्यवादका अन्त करके समाजवादकी स्थापना करनी चाहिये।' इसी
प्रस्तावको सन् १९१० की कोपेनहेगेनकी बैठकमे पुनः दोहराया गया । फिर भी
१९१४ में जब पहला महायुद्ध प्रारम्भ हुआ, तो सभी देशोंके मजदूरनेता
राष्ट्रियताके स्वाभाविक प्रवाहमे बह गये और उन्होने युद्धका समर्थन किया । कहावत
है कि 'पहले अपनी ही दाढीकी आग बुझायी जाती है'। दूसरे अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-
संघके बहुमतने उपर्युक्त प्रस्तावका उल्लङ्घन किया। फ्रांसके क्रान्तिकारी संघवादी
भी इस राष्ट्रियताकी लहरमें बह गये और राष्ट्रियताके आधारपर एक देशके
समाजवादी दल दूसरे देशके समाजवादी दलसे खुलकर लडे । १९१९ में अन्त-
र्राष्ट्रिय मजदूरसंघकी पुनः स्थापना करनी पड़ी और फिर उसका भी द्वितीय
महायुद्ध-कालमें अन्त कर दिया गया, अब 'कोमिन्फार्म' नामकी संस्था बनी।
ट्रटस्कीके अनुयायी तो स्टालिन एव रूसको मार्क्सवादी परम्पराके विपरीत
समझते हैं और रूसी राज्यमें नौकरशाहीका बोलबाला मानते हैं । अन्य
वामपन्थी लोग भी यही समझते हैं कि 'सोवियत रूसने मार्क्सयि विश्वक्रान्तिका
मार्ग छोड़ दिया है, उसमें नौकरशाही एवं स्टेलिनशाहीका ही एकाधिकार है; वह
दुनियाके प्रतिक्रियावादियोंसे समझौता करके उन्हें प्रोत्साहन देता है।'
मार्क्सवादी इतिहासके आधारपर कहते हैं कि 'सर्वहाराका राज्य आनेवाला
ही है, स्वागतके लिये तैयार रहो।' अराजकतावादी कहते हैं—'वह राज्यहीन
समाज आ ही गया है, स्वागतके लिये तैयार रहो।' हॉब्स, लॉक, रूसो आदि-
की भी एक ऐतिहासिक धारणा थी । कान्ट, ग्रीन, फिक्टे, हीगेल आदिकी
दूसरी ही ऐतिहासिक धारणाएँ थीं । मार्क्स, एजिल्सकी अलग ही ऐतिहासिक
धारणा है । हॉब्सके मतमें 'राज्यके जन्मसे पहले मनुष्य एक खूँखार जानवरके
तुल्य भीषण था।' लॉक एव रूसोके अनुसार 'राज्यके जन्मसे पहले मनुष्य एक
श्रेष्ठ स्थितिमें था । फिर वह राज्यके पचड़ेमें क्यो पड़ा ?' इसके भी भिन्न-भिन्न
प्रकारके उत्तर हैं । बहुतोंने अनुबन्ध या 'सोशल कन्ट्राक्ट'को ऐतिहासिक कहा
और बहुतोंने उसे सर्वथा अप्रामाणिक बतलाया । ये सभी लोग इतिहासका
ही नाम लेते हैं। भविष्यके सम्बन्धमें भी ऐसी ही विभिन्न अटकलें हैं। रूसोका
सामान्येच्छाका राज्य, ग्रीन, काण्टका आदर्श विश्वराज्य, हीगेलका आदर्श राज्य,
मार्क्सका वर्गहीन राज्य, बाकुनिनका राज्यहीन समाज एक स्वप्निल जगत्की
ही चीजे रह गयी हैं। फिर भी उनके अनुयायी अंध विश्वास लिये उन्हीं लकीरोको
पीट रहे हैं, यद्यपि वे शास्त्रवादियोंको ही अंध विश्वासी मानते हैं।
परंतु रामायण, महाभारतका इतिहास समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञापर
आधारित है। वह तार, टेलिप्रिन्टरके आधारपर या अटकलोके आधारपर नहीं बना,
और न किसी मूर्ति, शिलालेख, स्तम्भो अथवा मुद्राओंके आधारपर ही बना है।
इसीलिये रामायण, महाभारतादि इतिहास इतिवृत्तसम्बन्धी पात्रोंके हसित, भाषित,
इङ्गित, चेष्टित, स्थूल, सूक्ष्म, संनिकृष्ट, व्यवहित—सभी घटनाओका हस्तगत
आमलकके समान प्रत्यक्ष आर्ष साक्षात्कार करके ही लिखे गये हैं। इसके
अतिरिक्त आधुनिक इतिहासोंकी काल-सीमा छः हजार वर्षकी ही तो है। इसीमें
उनका ऐतिहासिक एव प्रागैतिहासिक काल आ जाता है, परंतु रामायणादिकी
दृष्टिसे तो वर्तमान सृष्टि लगभग दो अरब वर्षकी है। यदि ससारभरका एक वर्षका
इतिहास एक पन्नेमें भी लिखा जाय तो भी दो अरब पन्नेका इतिहास होता है, फिर
उसका कितने दिनोंमें अध्ययन हो सकेगा और कौन, कब तथा क्या निष्कर्ष निकाल
सकेगा और कब उसे कार्यान्वित किया जायगा ? इतिहासका अभिप्राय
भी गड़े मुर्दोंको उखाडनेके तुल्य पुरानी घटनाओंको दोहराना ही नहीं,
किंतु उन अतीत घटनाओसे धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक
अभ्युदयोपयोगी शिक्षण ( सबक ) प्राप्त करना ही होता है। अतएव सभी
घटनाओ या सभी व्यक्तियोको इतिहासमे स्थान नहीं मिलता और न सबका
उल्लेख ही इतिहासमें सम्भव है । कितने ही मनुष्य उत्पन्न होते ह कितने ही
मरते हैं, कितनी ही घटनाएँ घटती रहती हैं । उनका इतिहासमें न तो उल्लेख
ही होता है और न उल्लेख करना सम्भव ही है । नगरो, ग्रामोंमें मनुष्योके
जन्मने-मरनेका लेखा-जोखा होता है, फिर भी पशुओ, पक्षियो, मच्छरोके
जन्मने-मरनेका कोई लेखा-जोखा नहीं होता । इतिहासकी दृष्टिमें सामान्य
मनुष्यो एवं घटनाओका भी यही हाल है ।
इतिहासका वर्ण्य विषय
मार्क्सवादी कहते हैं कि 'राजाओ, महाराजाओ, वीरपुरुषोका वर्णन करना
इतिहासका लक्ष्य न होकर समष्टि जनताकी स्वाभाविक जीवनस्थिति, उत्पादन-
साधन और उनके परस्पर सम्बन्ध तथा उनके परिणामोंका निरूपण ही इतिहासका
मुख्य विषय होना चाहिये ।' तदनुसार ही मार्क्सवादी प्राथमिक वर्गहीन
समाज, फिर मालिक और गुलाम, फिर सामन्त एवं किसान-गुलाम, फिर पूँजी-
पति और मजदूर, फिर मजदूर राज्य तथा पुनः वर्गविहीन—समाजकी स्थापनाका
इतिहास सिद्ध करके दिखलाते हैं । दूसरे लोग पाषाण-युग, लौह-युग, यन्त्र-युग
आदिकी कल्पना करते हैं । इतिहासके गोरखधंधेसे अपने-अपने मतलबकी चीज
सभी निकालते हैं, विशेष प्रामाणिक आधार खोजे बिना ही कल्पनाके महल
खड़े किये जाते हैं । फिर ये सभी कल्पनाएँ हजार, दो हजार वर्षके इतिहासके
भीतर ही हैं । विशेषतः मार्क्सवादी विवेचन अधिकांश रूपसे ४०० वर्षोंकी ही
घटनाओपर निर्भर है । लाखो-करोड़ो वर्षोंके इतिहासकी कौन-कौन-सी घटनाएँ
आधुनिक कल्पनाओमे साधक हैं, कौन कौन सी बाधक हैं—इससे उनका कुछ भी
मतलब नहीं । यही स्थिति अराजकतावादियोकी भी है । घटनाएँ सब
सकारण होती हैं । फिर भी सब घटनाएँ परस्पर एक दूसरेकी कारण नहीं
होती । कई स्थलोपर तो घटनाएँ अव्यवहित होनेपर भी उनमे कार्य-कारण-भाव
नहीं माना जाता । कौवेका बैठना और ताड़का गिरना व्यवधानशून्य होनेपर भी
कार्य-कारण सम्बन्धसे शून्य होता है । इसी आधारपर बहुत-सी घटनाओके
सम्बन्धोको काकतालीय ही माना जाता है । इसके अतिरिक्त प्राणियो, देश तथा
संसारके सौभाग्य-दौर्भाग्य दोनो ही चलते हैं । दौर्भाग्यसे बुरी घटनाएँ और
सौभाग्यसे अच्छी घटनाएँ भी घटती हैं । अच्छी घटनाओके मूलमें सौभाग्यके
अतिरिक्त सत्प्रयत्नका भी हाथ होता है । बुरी घटनाओमें दुर्भाग्यके अतिरिक्त
प्रमाद, आलस्य, दुराचार, दुष्प्रयत्नका भी हाथ रहता है । रावणके हाथो भी
बहुत-सी घटनाएँ हुईं । युधिष्ठिर एवं दुर्योधनादिके द्वारा भी अनेक ढंगकी
घटनाएँ घटीं । देवो-असुरोसे सम्बन्धित घटनाओंके बारेमें भी यही बात कही
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४५५
जा सकती है। बुरी घटनाओंका वर्णन बुरे कामोंसे बचने और सावधान होनेके
लिये होता है तथा अच्छी घटनाओंका वर्णन गुणग्रहण एवं प्रोत्साहनके लिये
होता है। इसीलिये रामायणके अध्ययनसे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि राम-
भरत आदिके समान वर्तना चाहिये, रावणादिकी तरह नहीं। महाभारत पढ़कर
यह पाठ सीखना चाहिये कि युधिष्ठिरादिके समान वर्तन करना चाहिये,
दुर्योधन आदिके समान नहीं—'रामादिवद् वर्तितव्यं न तथा रावणादिवत् ।
युधिष्ठिरादिवद् वर्तितव्यं न दुर्योधनादिवत ॥'
सदाचार, सद्धर्म, सत्कर्म, सदुद्योग, सद्धनार्जन एव सदुपायोंका शिक्षण
ऐतिहासिक सद्घटनाओंसे सीखा जा सकता है। सत्पुरुषोंके भी कुत्सित आचारोंका
अनुसरण नहीं किया जा सकता । 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन.' यह स्वभा-
वोक्ति है। प्राणीकी स्वाभाविक प्रवृत्ति श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुकरण करनेकी होती है,
अतः श्रेष्ठ पुरुषोंको शास्त्रानुसारी सदाचार-पालनका विशेष ध्यान रखना चाहिये ।
प्राणियोंको भी श्रेष्ठोंके शास्त्रानुसारी सुचरितोंका ही अनुकरण करना चाहिये, दुश्चरितों-
का नहीं । इसलिये वैदिक ऋषिने कहा है कि जो हमारे सुचरित हों उन्हें ही
तुम आचरणमें लाओ, दुश्चरितोंको नहीं—'यान्यस्माक५ सुचरितानि तानि त्वयो-
पास्यानि, नो इतराणि' ( तैत्तिरीयोपनिषद् १ । ११ । २ ) । अध्यात्म-दृष्टिसे
विज्ञान-वैराग्यकी विवक्षासे ही विभिन्न महापुरुषोंकी घटनाओंका वर्णन किया जाता
है । उक्त प्रयोजनसे भिन्न वाग्विभवसे अन्य कोई परमार्थ नहीं है । श्रीशुकदेवजीने
परीक्षित्को बतलाया था कि मैंने जो संसारमें यश फैलाकर स्वर्ग जानेवाले
महापुरुषोंकी कथाएँ कहीं हैं, उनका अभिप्राय विज्ञान वैराग्यके प्रतिपादनमें ही है।
कितना ही बलवान्, बुद्धिमान्, धनवान्, सम्राट् क्यों न हो, सबको ही कालके
गालमें जाना पड़ता है । स्वधर्मानुष्ठान, परोपकार एवं साक्षात्कार ही जीवनका
सार है । प्रपञ्चका अधिष्ठान आत्मा ही सत् है । इस प्रकार वैराग्य, विज्ञान-
सम्पादनके अतिरिक्त वाग्विभवको छोड़कर कोई परमार्थता नहीं है । हाँ, जगत्कारण
सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् चेतन भगवान्की कथाओंका वर्णन तो भक्तिके लिये
भी उपयोगी है—
कथा इमास्ते कथिता महीयसा विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् ।
विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥
यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः ।
तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ॥
( भागवत १२ । ३ । १४-१५ )
४५६ मार्क्सवाद और रामराज्य
मार्क्सवादियोंके मतानुसार 'वर्ग-संघर्ष, वर्ग-विद्वेष एवं वर्ग-विध्वंसका
इतिहास ही इतिहास' माना जाता है, परंतु वस्तुतः वही मानवका इतिहास नहीं है।
वाद, प्रतिवाद, संवादका भी यही ध्येय नहीं है, किंतु आत्मसाक्षात्कार, स्व-
धर्मानुष्ठान, क्षमा, दया, परोपकार, त्याग, तपस्या आदि ही इतिहासका ध्येय है।
अवश्य ही खाने-कमाने, लड़ाई-झगड़े और संघर्षकी भी घटनाएँ होती हैं, परंतु
वे आदर्श एवं अनुकरणीय नहीं हैं। उनके द्वारा उत्थानानुकूल रचनात्मक शिक्षा
नहीं ग्रहण की जा सकती। मनुष्योंमें ही क्यो, पशु-पक्षियों, कीड़ो-मकोड़ोंमें भी
खाने-पीने, विषयोपभोगके लिये संघर्ष चलता है। कईयोंमें तो खूब जमकर लड़ाई
होती है। बंदरों, मुर्गों, तीतरो, भेड़ों आदिमें भी गहरी लड़ाई होती है।
उनमें भी जातिभेदके आधारपर प्राबल्य-दौर्बल्य होता है। मुर्गोंमें यह प्रसिद्ध है।
किसी भी लड़ाईमें दो गुट हो सकते हैं। मजदूरोंकी ही आपसमें जब कभी लड़ाई
होने लगती है, तब उनमें दो गुट बन जाते हैं। कभी जातिभेदसे संघर्ष होता है,
कभी धर्मभेदसे, कभी जीविकाभेदसे और कभी सिद्धान्तभेदसे भी संघर्ष चलता
है। कई कूटनीतिज्ञोद्वारा कृत्रिम गुट बना डाले जाते हैं। आजकल तो स्त्री-पुरुषों-
में भी संघर्ष उत्पन्न करनेकी चेष्टा चल रही है।
घटनाएँ चेतनके परतन्त्र होती हैं, किंतु चेतन घटनाओंके परतन्त्र नहीं
होता। चेतनकी परतन्त्रता इसी प्रकार अस्थायीरूपसे सम्भव होती है। जैसे एक
दौड़नेवाले चेतन व्यक्तिने अपने आप स्वतन्त्रतापूर्वक स्वेच्छासे दौड़ना प्रारम्भ
किया। वह दौड़ने, न दौड़ने या बैठ जानेमें पहले स्वतन्त्र है; किंतु बादमें दौड़ने-
से उत्पन्न होनेवाले वेगके बढ़ जानेपर वह परतन्त्रताका अनुभव करता है। फिर
उसे ठहरना होता है तो कुछ पहलेसे ही उसे अपनी गति मन्द करनेका प्रयत्न
करना पड़ता है। मोटर आदिका दौड़ना रोकनेके लिये तो और भी पहलेसे गति
मन्द करनेके लिये प्रयत्न करना पड़ता है। मनन करनेवाला मन्ता चेतन मनका
प्रयोक्ता है, वह स्वतन्त्र है। परंतु मननजन्य वेगके बढ़ जानेपर मननको सहसा रोक
देना मन्ताके वशकी बात नहीं होती। मनन रोकनेके लिये मन्ताको यम-नियमादि-
अष्टाङ्गयोग करने पड़ते हैं। आये दिन हम देखते हैं कि मनुष्य परिस्थिति बनाता
है और उसका सामना करता है। यदि ऐसा न हो, प्राणी परिस्थितिका एक
जड़यन्त्र ही हो, तब तो पुरुषार्थके लिये स्थान ही न रह जाय। वैज्ञानिक कितनी
ही बार यन्त्रोंके निर्माणमें तथा सञ्चालनमें असफल होते हैं, कितनी ही बार रेल,
मोटर एवं वायुयानोंकी दुर्घटनाएँ होती हैं; फिर भी हिम्मती लोग घबराते नहीं,
संकटपूर्ण परिस्थितिका मुकाबला करते हैं।
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४५७
सम्पत्ति विपत्ति, अनुकूलता-प्रतिकूलता—सभीमें वाद, प्रतिवाद, संवादकी
कथा जुड़ सकती है । उन्नति भी पाप पुण्य, भलाई-बुराई दोनोंकी होती है ।
शैतानवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति होती है । इसी तरह एक सज्जन और
सज्जनवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति हो सकती है । सभीका समर्थन इतिहाससे
मिल सकता है । फिर भी सज्जन लोग सज्जनोंके इतिवृत्तसे ही शिक्षा ग्रहण करेंगे
और सज्जनोचित उपायसे ही उन्नतिका प्रयत्न करेंगे । आर्ष, प्रामाणिक रामायण,
महाभारत आदि इतिहासोंके आधारपर तो बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें
सत्त्वप्रधान धर्मनियन्त्रित मनुष्य राज्य, राजा तथा दण्ड-विधान आदिके बिना
ही एकमात्र धर्मसे नियन्त्रित होकर सब काम आपसमें ही चला लेते थे । उस
समय सत्त्व प्रधान एवं धर्म-नियन्त्रित होनेके कारण अपराधी भी कोई नहीं होता
था । इसका कारण यह भी था कि सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् स्वच्छ परमेश्वरके अधिक
सन्निहित प्राणियोंमें स्वच्छता अधिक थी । जो वस्तु स्वच्छ कारणसे अधिक
सन्निहित होती है, वह उतनी ही स्वच्छ होती है। जैसे आकाशसे उत्पन्न वायु
पृथ्वीकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है। तेज वायुकी अपेक्षा कुछ कम, किंतु जलादिकी
अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । तेजकी अपेक्षा जल कुछ कम स्वच्छ है, परंतु पृथ्वीकी
अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । पृथ्वी पार्थिव प्रपञ्चकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । इसी
तरह परमेश्वरसे उत्पन्न ब्रह्मा और ब्रह्मासे उत्पन्न वसिष्ठादि महर्षि अधिक स्वच्छ,
सात्त्विक एवं सर्वज्ञ थे । परमेश्वरसे उत्तरोत्तर दूर परम्परा सृष्ट प्राणियोंके सत्त्वमें
तथा सर्वज्ञता आदिमें भी उत्तरोत्तर न्यूनता आती गयी । तदनुकूल ही रज-
तमोगुणकी वृद्धि होनेसे पाप एवं अपराधकी भी वृद्धि होती गयी । जहाँ सत्त्व एवं
धर्मकी प्रधानता है, वहाँ धर्मनियन्त्रण ही पर्याप्त है। जहाँ सत्त्व एवं धर्मकी
न्यूनता होती है, वहाँ बाह्य नियन्त्रण भी अपेक्षित होता है । जलकी जैसे निम्न
प्रदेशकी ओर स्वभावतः प्रवृत्ति होती है, वैसे ही इन्द्रियोंकी अपने विषय शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी ओर स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। सुन्दर शब्द, सुन्दर
स्पर्श, सुन्दर रूप, सुन्दर रस, सुन्दर गन्ध, सुन्दर भूषण वसन, सुन्दर स्त्री
आदिकी ओर इन्द्रियोंका स्वाभाविक खिंचाव होता है । इन्द्रियाँ और मन सुन्दरता-
मात्र देखकर किसी वस्तुकी ओर प्रवृत्त होते हैं । 'यह मेरा है या पराया, यह
ग्राह्य है या त्याज्य,' यह विवेक तो धर्मनियन्त्रित, शास्त्रसंस्कृत मन ही कर सकता
है । मनके अधिक विषयप्रवण एवं रागी हो जानेपर उसके नियन्त्रणके लिये फिर
शास्त्रके अतिरिक्त नरक एवं राजदण्ड आदिका भय भी अपेक्षित होता है। यही
कारण है कि जब सत्त्व धर्ममें कमी हुई, रजोगुण, तमोगुणकी वृद्धि हुई और
४५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
अधर्मका विस्तार हुआ, तब इन्द्रियोपर नियन्त्रण भी कम हो गया । फिर तो
राग-प्रवण मन सुन्दर परधन तथा परकलत्रादिके अपहरणमें प्रवृत्त होने लगा ।
तभी मात्स्यन्याय फैला और प्रजा उद्विग्न होकर नियन्त्रण एवं व्यवस्था चाहने
लगी । तभी परमेश्वरानुगृहीत, चन्द्र-सूर्यादि अष्टलोकपालोके अंशोसे युक्त राजा-
का प्रादुर्भाव हुआ और उसपर भी धर्मका नियन्त्रण हुआ ।
धर्म-नियन्त्रित राजा धर्म-प्रसार, दण्ड-विधान आदिद्वारा मात्स्यन्यायको
हटानेमें समर्थ हुआ । वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता, दिलीप, गाधि, अलर्क,
शिबि, रन्तिदेव, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, युधिष्ठिरादि राजा पूर्ण धर्म-नियन्त्रित, दयालु,
परोपकारी और प्रजारक्षणार्थ अपना सर्वस्व बलिदान करनेवाले हो गये हैं । रामचन्द्रका
प्रजारञ्जनार्थ सर्वत्याग प्रसिद्ध है । शिबि, रन्तिदेव आदि नरेन्द्रोने केवल प्रजाके ही
नहीं, पशु-पक्षियोंतकके हितार्थ अपने राज्य, धन, प्राण—सब कुछका त्याग किया
है। इन्हें शोषक एव अन्यायी कहना शुद्ध उच्छृङ्खलताका ही प्रदर्शन करना है ।
धर्म-नियन्त्रित राजा, जनप्रतिनिधियोका शासन ही ऐहिक, आमुष्मिक, अभ्युदय
और परम निःश्रेयसका मार्ग प्रशस्त कर सकता है । उसके बिना मात्स्य-न्याय
फैलता है । सभीका शासनमें भाग लेना सम्भव न होनेसे प्रतिनिधिकी कल्पना
करनी पडती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है, किंतु वह मुख्यका अपेक्षित
एव निश्चित कार्यकारी होता है । स्वेच्छात्मक संस्थाओ या अराजकतावादी सघको
भी तो यूरोप या ससारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना ही पडता है । हाँ, प्रति
निधि योग्य होना उचित है । अराजकतावादकी नींव है व्यक्ति और मार्क्सवाद-
की नींव है समाज । प्रथम पक्षमे समूहकी स्वाधीनताकी पहली सबसे बड़ी शर्त है
व्यक्तिकी स्वतन्त्रता । तदनुसार सब कुछ व्यक्तिकी स्वाधीनताके लिये ही होना
चाहिये । दूसरे पक्षमें स्वाधीनताकी सबसे बड़ी शर्त है जनताकी स्वाधीनता, अतः
सब कुछ जनताके लिये ही होना चाहिये । रामराज्यवादीकी दृष्टिमें व्यष्टि और
समष्टिका अभेद है, अतएव दोनोका समन्वय ही सिद्धान्त है । समष्टिके द्वारा
व्यष्टिको अभ्युदयकी सुविधा मिलती है और व्यष्टिके द्वारा समष्टिका निर्माण होता है ।
समाजवादी तथा अराजकतावादी दोनोंहीके सिद्धान्तोके आधारभूत इतिहास
अल्प देशीय हैं । मार्क्सके अनुभवका क्षेत्र इग्लैण्डका श्रमिक आन्दोलन ही था ।
अधिक-से-अधिक फ्रास, जर्मनी तथा इंग्लैडके, तत्रापि लगभग ४०० वर्षतकके ही
इतिहासपर उसका सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अतः उसका क्या प्रामाण्य ?
अष्टम परिच्छेद
मार्क्स-दर्शन
मार्क्स प्रयोग तथा अनुभवद्वारा प्राप्त ज्ञानको ही वास्तविक ज्ञान मानता है ।
‘डाइलेक्टिक्स’ (द्वन्द्वमान) की चर्चा हम पहले कर आये हैं। यह एक यूनानी शब्द
है, जिसका अर्थ है दो मनुष्योंका वार्तालाप । इसमें एक तर्ककी स्थापना की
जाती है, फिर उसका खण्डन होता है, जिसमें नये तर्ककी उत्थापना होती है । इस
प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं। यह एक क्रमोन्नतिकी
प्रक्रिया है, इसमें स्थिरता नहीं है, वेग है। यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान
है। मानव-समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये
हैं। ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं। इनमें तीन मुख्य हैं,
१-परिमाणका गुणमें तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तन करनेका नियम,
२-विरोधियोंके अन्तःप्रवेशका नियम तथा स्वय विपरीतानुवर्तनका नियम और
३-प्रतिषेधके प्रतिषेधका नियम। इन तीनों नियमका विचार हीगेलने विचारके
नियमोंके रूपमें किया है। पहला नियम उसके तर्कशास्त्रके पहले
४६० मार्क्सवाद और रामराज्य
'पीछे हमने देखा है कि गतिमात्र इस प्रकारके विरोधात्मक सत्यका उदाहरण
है। किसी वस्तुके स्थानपरिवर्तनको हम यों ही समझ सकते हैं कि वह वस्तु
एक ही समयपर एकाधिक स्थानपर है तथा एक ही स्थानपर है भी और नहीं
भी है। इस विरोधाभासका हल है गति ।
अध्यात्मवादीका इस सम्बन्धमें कहना है कि द्वन्द्वमान कोई व्यापक या
स्थिर सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि विचार करनेपर वह वाद-विवाद, तर्क-प्रतितर्कमें
भी सही नहीं उतरता । तर्कके सम्बन्धमे यही कहा जा सकता है कि वह
प्रमाणान्तरोंके समान प्रतिष्ठित नहीं होता । कोई तार्किक अपने तर्कसे एक
वस्तुको प्रतिष्ठित करता है, दूसरा कोई उससे भी बडा तार्किक और उत्कृष्ट तर्कसे
पहले तर्कको तर्काभास सिद्ध करके प्रथमतर्कसिद्ध व्यवस्थाका खण्डनकर अन्य उत्कृष्ट
व्यवस्थाको प्रतिष्ठित करता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर खण्डन-मण्डन,
चलता रहता है—'यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरै-
रन्यैरन्यथैवोपपाद्यते॥' परंतु इस तरह तो तर्क ही अप्रतिष्ठित ठहरते हैं, फिर उनके
द्वारा किसी भी अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती । फिर तो तर्कद्वारा किसी भी सत्यपर
पहुँचना सम्भव नहीं है, परम सत्यतक पहुँचनेकी बात तो दूर रही ।
अनवस्थित तर्कके आधारपर ही द्वन्द्वमान सिद्धान्त बनानेका प्रयत्न किया जाता
है, किंतु अनवस्थित तर्क किसी भी सत्यका बोधक नहीं हो सकता ।
अतः ऐसे आधारपर आधारित द्वन्द्वमानके आधारपर किसी सिद्धान्तपर
पहुँचना कैसे सम्भव है ?
यद्यपि रामराज्यवादी तर्कको सर्वथा अप्रतिष्ठित नहीं मानते । वे कहते
हैं कि कतिपय तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व देखकर ही तर्कजातीय होनेसे विमत तर्कोंका
भी अप्रतिष्ठितत्व अनुमित किया जाता है । परंतु यदि सभी तर्क अप्रतिष्ठित हैं
तो तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व सिद्ध करनेवाला तर्क भी अप्रतिष्ठित ही होगा । फिर
स्वतः अप्रतिष्ठित तर्कके बलपर तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व कैसे सिद्ध होगा ? इस तरह
कहना होगा कि सत्यबोधक तर्क या प्रमाणान्तरसंवादी तर्क अप्रतिष्ठित नहीं
होता । जो तर्क प्रतिष्ठित होता है, वह तो निश्चितरूपसे वस्तु-तत्त्वका बोधक होता
है । फिर उसका तर्कान्तरसे खण्डन भी नहीं हो सकता और न उसके द्वारा
सिद्ध विषयका ही खण्डन हो सकता है । न उससे उत्कृष्ट तर्कका उत्थान
होता है और न उसके द्वारा उत्कृष्ट सत्यके सिद्धिकी ही आशा रहती है । सुतरां
प्रत्यक्ष एव आगममें इस न्यायका सञ्चार नहीं हो सकता; क्योंकि किसी भी
तर्कान्तर या प्रमाणान्तरसे निर्दोष प्रत्यक्षागमका बाध नहीं होता । इस तरह
जब विचार या तर्कके स्वजातीय, विजातीय प्रमाणोंमें ही खण्डन-मण्डन, साधन-
बाधनकी परम्परा नहीं चलती, तब भौतिक विषयमे द्वन्द्वमान सिद्धान्तरूपसे कैसे
लागू होगा ?
परिमाणका गुणमें परिवर्तन तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तनका नियम
अवश्य कहीं उपलब्ध हो सकता है, परंतु यह नियम अव्यभिचरित नहीं है ।
मृत्तिकासे घट, तन्तुसे पट बनता है; प्रकृतिमें जलानयन, अङ्गप्रावरण, शीतापनयनकी
सामर्थ्य नहीं होती, परंतु कार्योंमें यह सब होता है । यहाँ मूलकारणसे भिन्न किसी
भी वस्तु-अन्तरका प्रवेश नहीं है, फिर भी कारणसे कार्यकी भिन्नता नहीं होती ।
जैसे शिविकावाहक प्रत्येक रूपसे मार्गदर्शनादि कार्य करते हैं, किंतु मिलकर
शिविकावहन कार्य करते हैं । इसी तरह तन्तु आदि जो कार्य नहीं कर पाते, वह
कार्य तन्तुनिर्मित पटादि कर सकते हैं । इसी तरह वेदान्तरीतिसे शब्दगुणवाले
आकाशसे उत्पन्न वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुण हो जाते हैं । फिर वायुसे
उत्पन्न तेजमें शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हो जाते हैं । तेजसे उत्पन्न जलमें शब्द,
स्पर्श, रूप, रस चार गुण हो जाते हैं । जलसे उत्पन्न पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध पाँच गुण होते हैं । पृथ्वी जलमें, जल तेजमें जब लीन हो जाता है, तब गुणोंकी
कमी होती जाती है । परमकारण स्वप्रकाश ब्रह्म चेतन सर्वथा निर्गुण एवं
निर्विशेष माना जाता है । कार्यकी ओर चलनेमे गुणों और विशेषणोमे वृद्धि
होती है । कारणकी ओर जानेमे निर्गुणता, निर्विशेषताकी वृद्धि होती जाती है;
फिर भी कारणसे भिन्न कार्य स्वतन्त्र सत्तावाला नहीं होता । सङ्कुचित एव
प्रसारित पटमें एव सङ्कुचिताङ्ग, विकसिताङ्ग, कूर्ममें भेद प्रतीत होने,
कारण-कार्यमें विलक्षणता प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें भेद नहीं है ।
कार्यान्तरका भेद भी शिविकावाहकोंके मार्गदर्शन एव शिविकावाहनके दृष्टान्तसे
दिखाया जा चुका है । शब्द-स्पर्शादि गुण तथा समवाय सामान्यविशेष
आदि भी मूल द्रव्यकी अवस्थाविशेष ही हैं, वस्तुतः उनमें भिन्न नहीं हैं ।
तापगुणकी वृद्धि होते-होते जलका द्रवत्व समाप्त हो जाता है और तापका
ह्रास होते होते जल बर्फ बन जाता है । तापवृद्धिसे जलके परिमाणमें कमी आती
है । वेदान्त-रीतिसे तेजमे ही जलकी उत्पत्ति होती है, अतः तेजमें उसका विलय होना
कोई अनहोनी बात नहीं है ।
वैज्ञानिक द्वन्द्ववाद
मार्क्सवादी कहते हैं कि 'संख्यानुगुणित डिफरेन्शन काल्कुलस यह
मानकर चलता है कि एक ही रेखा ऋजु और वक्र दोनो है और इस बुनियादपर
जो नतीजे निकलते हैं, उनका हम व्यावहारिक उपयोग करते हैं। एक असीम
व्यासके वृत्तके परिधिका एक छोटा अंश ऋजु रेखा है, लेकिन एक वृत्तके अंशके
नाते यह रेखा वक्र भी है। इसी प्रकारका एक दूसरा उदाहरण भी है—दो ऋजु
रेखाएँ यदि किसी बिन्दुपर मिलती हैं, तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि उस
बिन्दुसे थोड़ी ही दूरपर ये दोनों रेखाएँ असमानान्तर हैं। गणितहीमें और
यह एक विरोधाभास है कि किसी संख्याके वर्गमूलको उसके वर्गफलके रूपमें
प्रकाशित किया जाय, जैसे-क ३/२=√ २ इससे भी अधिककी कोई ऋणात्मक सख्या
किसी संख्याका वर्ग हो सकती है; क्योंकि वर्गीकरणका यह साधारण नियम
है कि ऋणात्मक संख्याका वर्ग धनात्मक होता है । लेकिन √ -१ गणितका एक
आवश्यक अग है खडीकरण, फैक्टराइजेशनका उदाहरण क²+ख²=(क+ख ९—१ )
( क-ख ९ ) ।
‘भौतिक विज्ञानमें विरोधियोके ऐक्यका उदाहरण है अणु, स्वय तडितकी
अणुमें क्रिया-प्रतिक्रिया नही है । लेकिन यह जिन अशोसे बनता है, उसमें एक
धन तडितात्मक है, ‘प्रोटन’ और दूसरा ऋणतडितात्मक है, ‘इलेक्ट्रन’, जीवन तो
सर्वथा विरोधमय है । वह हर समय कुछ है और कुछ अन्य भी है । ज्यो ही इस
विरोधका अन्त होता है, जीवनका भी अन्त हो जाता है । विचारक्षेत्रमें यह विरोध
विद्यमान है । मनुष्यकी ज्ञानशक्ति अपरिसीम है, लेकिन उसका वास्तविक ज्ञान
सीमाबद्ध है ।
अब परिमाणके गुणात्मक परिवर्तनके कुछ उदाहरण ले लीजिये ।
मार्क्स-दर्शन ४६३
इसका विचार हमारे यहाँके दर्शनोंमें विस्तारसे है। 'स्यादस्ति स्यान्नास्ति स्यादस्ति
च नास्ति च, स्यादवक्तव्यः स्यादस्ति चावक्तव्यश्च स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च
स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च।' अर्थात् हर वस्तुमें यह सप्तभङ्ग न्याय जोड़ा
जाता है। यह वस्तु किसी तरह है, किसी तरह नहीं है। किसी तरह है भी, नहीं भी
है। किसी तरह अवक्तव्य है, किसी तरह है भी और अवक्तव्य भी है, किसी तरह
नहीं भी है और अवक्तव्य भी है, किसी तरह है भी नहीं भी है, अवक्तव्य भी है,
किसी पदार्थकी नित्यताका एकता आदिके सम्बन्धमें भी ये सप्तभङ्ग जोडे जाते हैं।
इसपर विचारणीय बात यह है कि एक वस्तुमें युगपत् सत्त्व तथा असत्त्व-
विरुद्ध धर्मका होना असम्भव है। जैसे एक ही वस्तु समानरूपसे शीत और उष्ण
नहीं कही जा सकती। वस्तुतः जो वस्तु सत्य है, वह सर्वथा, सर्वदा, सर्वरूपसे है
ही-जैसे परमात्मा। जो कहीं, कभी, किसी रूपसे है, किसी रूपसे नहीं है, वह वस्तुतः
असत् ही है। 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गीता २।१६) असत्का
सत्त्व एव सत्त्वका कभी अभाव नहीं हो सकता। प्रत्यय (बोध) मात्र वस्तुतत्त्वका
व्यवस्थापक नहीं होता। शुक्ति, रजत, मरीचिमें जल आदिका प्रत्यय भी प्रत्यय ही है,
परंतु मिथ्या वस्तुका ही व्यवस्थापन करता है। यदि कहा जाय कि जिस प्रत्ययमे
लौकिक दृष्टिसे बाध न हो उसे सत्य मानें, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि
लौकिक दृष्टिसे देह ही आत्मा है, इस प्रत्ययका बाध नहीं होता। फिर भी देह-
भिन्न आत्मा प्रमाणसिद्ध है ही। वस्तुमें विकल्प नहीं हो सकता, अतः एक वस्तुमें
ही सत्त्व, असत्त्व दोनो धर्म नहीं हो सकते।
यदि यह अनेकान्तवाद सब वस्तुमें मान लिया जाय तो प्रमाता,
प्रमाण, प्रमेय एव अनेकान्तवाद आदिके सम्बन्धमे भी यही अनेकान्तवाद जोड़ा
जा सकता है। अर्थात्, 'यह अनेकान्तवादका पक्ष 'कथंचित् सत्य है, कथंचित्
असत्य है', इत्यादि। तब तो अनिर्धारित ज्ञान संशय-ज्ञानके तुल्य अप्रमाण ही माना
जायगा। यदि कहा जाय कि नहीं, अनेकान्तवाद सिद्धान्त निर्धारित स्वरूप ही
है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि जब सभी वस्तु अनेकान्तिक हैं, तब तो वस्तु होनेसे
अनेकान्तवादमें भी अनेकान्तिकता अनिवार्य ही है। अतः अनिर्धारित प्रमाता,
अनिर्धारित प्रमाण, अनिर्धारित प्रमेय, अनिर्धारित साधन, अनिर्धारित साध्यके
आधारपर व्यवहार भी कैसे सम्पन्न होगा?
विकासवाद परिणामवादमें आ जाता है। मूल वस्तुमें भेद, अन्तर्विरोध एव
कार्यमें वस्तुतः भेद होता है या नही, इसपर विचारणीय यह है कि वस्तु सर्व-
४६४ मार्क्सवाद और रामराज्य
रूपसे परिणत होती है या एक देशसे ? सर्वरूपसे परिणत होती है, तब तो पूर्णरूपका
सर्वथा त्याग होनेसे उसे तत्त्वान्तर ही कहना चाहिये । परन्तु ऐसा व्यवहार नहीं होता ।
यदि वस्तुके एकदेशका परिणाम होता है, तो प्रश्न होगा कि वह एकदेश वस्तुसे
भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न है तो उस वस्तुका परिणाम कैसे हुआ ? अभिन्न है तब
तो एक देश भी वस्तुसे अभिन्न होनेसे उसका परिणाम वस्तुका ही सर्वरूपसे
परिणाम हुआ । फिर भी पूर्वोक्त दोष ही होगा । कुछ लोगोंके मतानुसार एक देशको
वस्तुसे भिन्नाभिन्न कहा जाता है, अर्थात् कारणरूपसे अभिन्न एवं कार्यरूपसे भिन्न ।
जैसे सुवर्णरूप कटक-कुण्डलादि अभिन्न हैं, परन्तु कटक-कुण्डलादिरूपसे भिन्न ही हैं।
भेदाभेदका एकत्र होना विरुद्ध है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रमाण-
विपरीत प्रतीति ही विरोध है । जो वस्तु प्रमाणसे जैसी प्रतीत होती है, उसे तो वैसे
उसी रूपमें मानना चाहिये । ‘कुण्डलमिदं सुवर्णम्’ यह कुण्डल सुवर्ण है, इस प्रकारके
समानाधिकरणके प्रत्ययमें भेद, अभेद-दोनोंही प्रतीत होते हैं । यदि यहाँ सुवर्ण-
कुण्डलका अत्यन्त अभेद हो तब तो दोनोंमेंसे किसी एककी ही दो बार प्रतीति होनी
चाहिये । यदि दोनोंका अत्यन्त भेद हो तब तो सामानाधिकरण-प्रत्यय नहीं होना
चाहिये । अश्व-गोका अत्यन्त भेद है । उनका सामानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता ।
आधाराधेयभावमें ‘कुण्डे बदरम्’ ‘कुण्ड में बेर है’, ऐसा प्रत्यय होता है। ‘कुण्ड बेर है’,
ऐसा प्रत्यय नहीं होता । एकाश्रयाश्रितोंमें भी सामानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता अर्थात्
एक आसनपर स्थित चैत्र-मैत्रमें चैत्र और मैत्र ऐसा प्रत्यय होता है । चैत्र मैत्र
है, ऐसा प्रत्यय नहीं होता । अतः कार्यका कारणरूपसे अभेद होता है । इस तरहके
असन्दिग्ध अबाधित सार्वजनिक अनुभवसे सद्रूपकारण सर्वत्र अनुगत है । इसलिये
सद्रूपसे सबका अभेद है । गो, घट आदिमें कार्यरूपमे भेद है । ‘कार्यरूपेण नानात्व-
मभेदः कारणात्मना । हेमात्मना यथाभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा ।’
परन्तु विचार करनेसे यह पक्ष अनुचित प्रतीत होता है । भेद क्या वस्तु है जो
अभेदकेसाथ रहता है ? यदि अन्योन्याभावको ही भेद कहा जाय,तो भी यह देखना है
कि क्या कार्य-कारण कुण्डल और सुवर्णमें यह अन्योन्याभावरूप भेद है ? यदि
नहीं है, तब तो कार्य-कारणका अभेद ही हुआ, भेद नहीं हुआ । यदि है तब तो
कार्य-कारणका भेद ही रहेगा, अभेद नहीं हो सकेगा । यदि कहा जाय कि भाव एवं
अभावका विरोध ही नहीं, तो यह कथन भी ठीक नहीं । क्योंकि भाव-अभावका
एकत्र अवस्थान नहीं होता । यदि दोनोंकी सहावस्थिति मानी जाय, तब तो कटक-
कुण्डलका भी तात्त्विक ही अभेद होना चाहिये; क्योंकि आप भेद-अभेदकी एक
साथ अवस्थिति मानते ही हैं, किञ्च यदि कटक हाटकसे अभिन्न है तो जैसे हाटक-
रूपसे कटक-मुकुटादि अभिन्न हैं, वैसे ही कटकरूपसे भी कटक-मुकुटादिको
अभिन्न होना चाहिये । क्योंकि कटक हाटकसे भिन्न है, इस तरह हाटक ही वस्तु
ठहरती हैं, कटकादि नहीं ।
यदि कहा जाय कि हाटकरूपसे अभेद है, कटक आदिरूपसे तो भेद है ही ।
परंतु जब कटक हाटकमे अभिन्न है तब कुण्डलादिमें हाटकके समान ही कटककी
अनुवृत्ति क्यों नहीं है । यदि अनुवृत्त नहीं होता तो कटक सुवर्णसे अभिन्न कैसे
समझा जाता है ? जिसके अनुवर्तमान होनेपर जो व्यावृत्त होते हैं, वह उससे भिन्न
होते हैं, जैसे मालामें सूत्र अनुवृत्त होता है, पुष्प व्यावृत्त होते हैं, अतः सूत्रसे पुष्प
भिन्न हैं । हाटकके अनुवर्तमान होनेपर भी कुण्डलादिमें कटकादि अनुवृत्त नहीं हैं,
अतः हाटकसे कटकादि भिन्न ही ठहरते हैं ।
सत्तामात्रकी अनुवृत्तिसे कटककी अनुवृत्ति मानें तब तो सभी वस्तु सर्वत्र
अनुगत हो सकती है। फिर तो 'इदमित्थं नेदम्' 'इदमस्मान्नेदम्, इदमीदानीं नेदम्'—यहाँ
यह है, यहाँ यह नहीं है, इसमे यह उत्पन्न होता है, यह नहीं होता है, इत्यादि विभाग
ही नहीं बन सकेगा । फिर तो किसीका किसीसे विवेकका कोई हेतु ही न रहेगा ।
किञ्च दूरसे सुवर्णमात्रका ज्ञान हो जानेपर भी कुण्डल मुकुटादि विशेषकी जिज्ञासा
होती है । परंतु यदि कुण्डलादि सुवर्णसे अभिन्न ही हैं, तो सुवर्णका ज्ञान हो ही
गया, फिर जिज्ञासा क्यों होनी चाहिये ? हाँ, यदि कनकसे कुण्डलादिका भेद है तब
तो कनकके विज्ञात होनेपर भी वे अज्ञात तथा जिज्ञास्य हो सकते हैं । अगर भेद-
अभेद दोनों ही हैं तो जैसे भेदके कारण कुण्डलादि अज्ञात हैं, वैसे ही अभेदके
कारण ज्ञात क्यों न होने चाहिये ? कारणके अभावमें कार्यका अभाव स्वाभाविक
है । जब ज्ञानका कारण अभेद है तो सुवर्णके ज्ञानसे सुवर्णाभिन्न कुण्डलादिका
ज्ञान होना ही चाहिये । फिर तो कुण्डलादिकी जिज्ञासा और ज्ञान आदि होना
व्यर्थ ही है । जिसके गृहीत होनेपर जो नहीं गृहीत होते, वे उससे भिन्न ही होते
हैं । जैसे हाथीके गृहीत होनेपर गर्दभ नहीं गृहीत होता, अतः हाथी गर्दभसे भिन्न
है । उसी तरह हेमके ग्रहण होनेपर भी कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं गृहीत होते;
अतः सुवर्णसे कटकादि भिन्न हैं । तथापि 'सुवर्ण कुण्डल, कुण्डल सुवर्ण है', इस
प्रकारका सामानाधिकरण्य व्यवहार भी होता है । यह अत्यन्त भिन्न अश्व-महिषमें
नहीं होता । आधाराधेय या समानाश्रयमें भी समानाधिकरण नहीं होता । यह ऊपर
कहा जा चुका है कि अनुवृत्ति, व्यावृत्ति एवं स्फुरण न होनेपर भी कुण्डलादिकी
जिज्ञासा कैसे बन सकेगी ? वास्तविक भेद एवं अभेद दोनोंकी एकत्र उपपत्ति हो नहीं
सकती । अतः भेद या अभेद किसीका त्याग करना ही होगा । अतः अभेदको
तत्त्वभूत अधिष्ठान मानकर उसीमें कल्पित भेद मानकर सब व्यवस्था होसकती है।
भेदोपादानाभेद कल्पना कहनेके लिये भेदको स्वतन्त्र सिद्ध होना चाहिये,
परंतु भेद भिन्न वस्तुओंके परतन्त्र होता है । वस्तुएँ प्रत्येक रूपसे एक ही हैं ।
अतः एक नहीं होगा, तो तदाश्रित भेद सिद्ध ही नहीं होगा, परंतु एक भिन्नके
अधीन नहीं होता । 'नायमयम्