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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 770

ऐतिहासिक भौतिकवाद ४५७
सम्पत्ति विपत्ति, अनुकूलता-प्रतिकूलता—सभीमें वाद, प्रतिवाद, संवादकी
कथा जुड़ सकती है । उन्नति भी पाप पुण्य, भलाई-बुराई दोनोंकी होती है ।
शैतानवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति होती है । इसी तरह एक सज्जन और
सज्जनवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति हो सकती है । सभीका समर्थन इतिहाससे
मिल सकता है । फिर भी सज्जन लोग सज्जनोंके इतिवृत्तसे ही शिक्षा ग्रहण करेंगे
और सज्जनोचित उपायसे ही उन्नतिका प्रयत्न करेंगे । आर्ष, प्रामाणिक रामायण,
महाभारत आदि इतिहासोंके आधारपर तो बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें
सत्त्वप्रधान धर्मनियन्त्रित मनुष्य राज्य, राजा तथा दण्ड-विधान आदिके बिना
ही एकमात्र धर्मसे नियन्त्रित होकर सब काम आपसमें ही चला लेते थे । उस
समय सत्त्व प्रधान एवं धर्म-नियन्त्रित होनेके कारण अपराधी भी कोई नहीं होता
था । इसका कारण यह भी था कि सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् स्वच्छ परमेश्वरके अधिक
सन्निहित प्राणियोंमें स्वच्छता अधिक थी । जो वस्तु स्वच्छ कारणसे अधिक
सन्निहित होती है, वह उतनी ही स्वच्छ होती है। जैसे आकाशसे उत्पन्न वायु
पृथ्वीकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है। तेज वायुकी अपेक्षा कुछ कम, किंतु जलादिकी
अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । तेजकी अपेक्षा जल कुछ कम स्वच्छ है, परंतु पृथ्वीकी
अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । पृथ्वी पार्थिव प्रपञ्चकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । इसी
तरह परमेश्वरसे उत्पन्न ब्रह्मा और ब्रह्मासे उत्पन्न वसिष्ठादि महर्षि अधिक स्वच्छ,
सात्त्विक एवं सर्वज्ञ थे । परमेश्वरसे उत्तरोत्तर दूर परम्परा सृष्ट प्राणियोंके सत्त्वमें
तथा सर्वज्ञता आदिमें भी उत्तरोत्तर न्यूनता आती गयी । तदनुकूल ही रज-
तमोगुणकी वृद्धि होनेसे पाप एवं अपराधकी भी वृद्धि होती गयी । जहाँ सत्त्व एवं
धर्मकी प्रधानता है, वहाँ धर्मनियन्त्रण ही पर्याप्त है। जहाँ सत्त्व एवं धर्मकी
न्यूनता होती है, वहाँ बाह्य नियन्त्रण भी अपेक्षित होता है । जलकी जैसे निम्न
प्रदेशकी ओर स्वभावतः प्रवृत्ति होती है, वैसे ही इन्द्रियोंकी अपने विषय शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी ओर स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। सुन्दर शब्द, सुन्दर
स्पर्श, सुन्दर रूप, सुन्दर रस, सुन्दर गन्ध, सुन्दर भूषण वसन, सुन्दर स्त्री
आदिकी ओर इन्द्रियोंका स्वाभाविक खिंचाव होता है । इन्द्रियाँ और मन सुन्दरता-
मात्र देखकर किसी वस्तुकी ओर प्रवृत्त होते हैं । 'यह मेरा है या पराया, यह
ग्राह्य है या त्याज्य,' यह विवेक तो धर्मनियन्त्रित, शास्त्रसंस्कृत मन ही कर सकता
है । मनके अधिक विषयप्रवण एवं रागी हो जानेपर उसके नियन्त्रणके लिये फिर
शास्त्रके अतिरिक्त नरक एवं राजदण्ड आदिका भय भी अपेक्षित होता है। यही
कारण है कि जब सत्त्व धर्ममें कमी हुई, रजोगुण, तमोगुणकी वृद्धि हुई और