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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 778, कुल 866 में से

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पृष्ठ 778

यदि कहा जाय कि हाटकरूपसे अभेद है, कटक आदिरूपसे तो भेद है ही ।
परंतु जब कटक हाटकमे अभिन्न है तब कुण्डलादिमें हाटकके समान ही कटककी
अनुवृत्ति क्यों नहीं है । यदि अनुवृत्त नहीं होता तो कटक सुवर्णसे अभिन्न कैसे
समझा जाता है ? जिसके अनुवर्तमान होनेपर जो व्यावृत्त होते हैं, वह उससे भिन्न
होते हैं, जैसे मालामें सूत्र अनुवृत्त होता है, पुष्प व्यावृत्त होते हैं, अतः सूत्रसे पुष्प
भिन्न हैं । हाटकके अनुवर्तमान होनेपर भी कुण्डलादिमें कटकादि अनुवृत्त नहीं हैं,
अतः हाटकसे कटकादि भिन्न ही ठहरते हैं ।
सत्तामात्रकी अनुवृत्तिसे कटककी अनुवृत्ति मानें तब तो सभी वस्तु सर्वत्र
अनुगत हो सकती है। फिर तो 'इदमित्थं नेदम्' 'इदमस्मान्नेदम्, इदमीदानीं नेदम्'—यहाँ
यह है, यहाँ यह नहीं है, इसमे यह उत्पन्न होता है, यह नहीं होता है, इत्यादि विभाग
ही नहीं बन सकेगा । फिर तो किसीका किसीसे विवेकका कोई हेतु ही न रहेगा ।
किञ्च दूरसे सुवर्णमात्रका ज्ञान हो जानेपर भी कुण्डल मुकुटादि विशेषकी जिज्ञासा
होती है । परंतु यदि कुण्डलादि सुवर्णसे अभिन्न ही हैं, तो सुवर्णका ज्ञान हो ही
गया, फिर जिज्ञासा क्यों होनी चाहिये ? हाँ, यदि कनकसे कुण्डलादिका भेद है तब
तो कनकके विज्ञात होनेपर भी वे अज्ञात तथा जिज्ञास्य हो सकते हैं । अगर भेद-
अभेद दोनों ही हैं तो जैसे भेदके कारण कुण्डलादि अज्ञात हैं, वैसे ही अभेदके
कारण ज्ञात क्यों न होने चाहिये ? कारणके अभावमें कार्यका अभाव स्वाभाविक
है । जब ज्ञानका कारण अभेद है तो सुवर्णके ज्ञानसे सुवर्णाभिन्न कुण्डलादिका
ज्ञान होना ही चाहिये । फिर तो कुण्डलादिकी जिज्ञासा और ज्ञान आदि होना
व्यर्थ ही है । जिसके गृहीत होनेपर जो नहीं गृहीत होते, वे उससे भिन्न ही होते
हैं । जैसे हाथीके गृहीत होनेपर गर्दभ नहीं गृहीत होता, अतः हाथी गर्दभसे भिन्न
है । उसी तरह हेमके ग्रहण होनेपर भी कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं गृहीत होते;
अतः सुवर्णसे कटकादि भिन्न हैं । तथापि 'सुवर्ण कुण्डल, कुण्डल सुवर्ण है', इस
प्रकारका सामानाधिकरण्य व्यवहार भी होता है । यह अत्यन्त भिन्न अश्व-महिषमें
नहीं होता । आधाराधेय या समानाश्रयमें भी समानाधिकरण नहीं होता । यह ऊपर
कहा जा चुका है कि अनुवृत्ति, व्यावृत्ति एवं स्फुरण न होनेपर भी कुण्डलादिकी
जिज्ञासा कैसे बन सकेगी ? वास्तविक भेद एवं अभेद दोनोंकी एकत्र उपपत्ति हो नहीं
सकती । अतः भेद या अभेद किसीका त्याग करना ही होगा । अतः अभेदको
तत्त्वभूत अधिष्ठान मानकर उसीमें कल्पित भेद मानकर सब व्यवस्था होसकती है।
भेदोपादानाभेद कल्पना कहनेके लिये भेदको स्वतन्त्र सिद्ध होना चाहिये,
परंतु भेद भिन्न वस्तुओंके परतन्त्र होता है । वस्तुएँ प्रत्येक रूपसे एक ही हैं ।
अतः एक नहीं होगा, तो तदाश्रित भेद सिद्ध ही नहीं होगा, परंतु एक भिन्नके
अधीन नहीं होता । 'नायमयम्