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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 683

३७० मार्क्सवाद और रामराज्य
चुंगी या कर लेना उचित है। छल-छद्मसे अनेक बार चुंगी लेना अनुचित
है। विक्रेता या क्रेतासे वस्तुका ३२ वाँ भाग शुल्करूपमें ग्रहण करे। अथवा लाभांशसे
बीसवाँ या सोलहवाँ भाग ले। घाटावालेसे कुछ भी कर नहीं लेना चाहिये।
खेतीके करोंके सम्बन्धमें भी शुक्रने लिखा है कि राजभाग एवं व्यय आदिकी
अपेक्षा कम-से-कम दुगुना लाभ खेतीसे होना चाहिये। अन्यथा खेती दुःख ही है—
राजभागादिव्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः।
कृषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम्॥ (शुक्र० ४।२२४)
मालाकार अथवा मधुमक्षिका जैसे पुष्पस्तबक आदिको नुकसान पहुँचाये
बिना सार-संग्रह करके पुष्पमाला और मधु निर्मित कर लेती है, वैसे ही प्रजाको
नुकसान पहुँचाये बिना राजाको कर ग्रहण करना चाहिये। अङ्गारकार जैसे वृक्षोको काटकर
कोयला बनाता है, उस प्रकार प्रजाको नष्ट करके शुल्क-संग्रह नहीं करना चाहिये—
मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत्।
बहुमध्याल्पफलतः तारतम्यं विमृश्य च॥ (शुक्रनी० ४।२२३)
तड़ाग, वापी, कूपसे तथा मेघजलसे, नदीजलसे जहाँ खेतकी सिंचाई हो,
वहाँ-वहाँ लाभका तृतीय-चतुर्थ तथा आधा भाग क्रमसे लेना चाहिये। ऊषर या
पत्थरवाली भूमिसे षष्ठांश ग्रहण करना चाहिये। राजाको जिस किसानसे १००
मुद्रा मिलती हो, उसमेंसे किसानके लिये राजा बीसवाँ भाग छोड़ दे—
तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात्। देशान्नदीमातृकात्तु राजानुक्रमतः सदा॥
तृतीयांशं चतुर्थांशमर्धांशं तु हरेत्फलम्। षष्ठांशमूषरात्तद्वत् पाषाणादिसमाकुलात्॥
राजभागस्तु रजतशतकर्षमितो यतः। कर्षकाल्लभ्यते तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः॥
(शुक्र० ४।२२५—२२७)
गौतमने लाभका दसवाँ, आठवाँ या छठा भाग राज्यांश माना है। खेतोंकी भिन्नता-
से यह भेद मान्य है। पशु एवं हिरण्यकी वृद्धिमें पचासवाँ भाग राजाको मिलना चाहिये—
राज्ञे बलिदानं कर्षकैर्दशममष्टमं षष्ठं वा। पशुहिरण्ययोरप्येके पञ्चाशद्भागम्॥
(गौ० सू० १०।१४-१५)
'ये पशुभिर्जीवन्ति ये वा हिरण्यप्रयोक्तारो वार्धुषिकाः तैः पञ्चाशत्तमो भागो राज्ञे देयः
इत्येके। तद्यथा—यस्य पञ्चाशत्पशवः सन्ति स प्रतिसंवत्सरमेकं पशुं राज्ञे दद्यात्।
यस्य वा पञ्चाशन्निष्कैर्वृद्धिप्रयोगः स प्रतिवत्सरमेकैकं निष्कं राज्ञे बलिरूपेण
दद्यादिति।' (गौ० ध० सू० मस्करी भाष्य)
विक्रय-लाभमें बीसवाँ भाग राजाका है—
'विंशतिभागः शुल्कः पण्ये' (गौ० १०।१६)
'यद् वणिग्भिर्विक्रीयते तत्पण्यम्, तत्र विंशतितमो भागो राज्ञे देयस्तस्यैव दीयमा-
नस्य शुल्क इति संज्ञा। शुल्कप्रदेशाः प्रतिभाव्यं वणिक्शुल्कमित्यादयः' (मस्क० भा०)
मूल, फल, फूल, औषध, मधु, मांस, तृण, ईंधनोंके लानेका छठा भाग राजाको
देना चाहिये—
'मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणेन्धनानां षष्ठः' (गौ० १०।१७)