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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३६९
आदर्श राजर्षि हुए हैं । वे भी योग्य मन्त्रियों, निःस्पृह सभ्योंकी सभामें कार्याकार्यका
विचार करके प्रजाहितार्थ स्वसर्वस्वकी बाजी लगानेके लिये हर समय प्रस्तुत रहते
थे । पर लोलुपलोग उनकी शासन-सभाओके सभ्य भी नहीं हो सकते थे । व्यवहार-
वेत्ता, प्राज्ञ, वृत्तशील, गुणान्वित, शत्रु-मित्रमें समान बुद्धि रखनेवाले, निरालस्य,
धर्मज्ञ एवं सत्यवादी, काम, क्रोध, लोभको जीतनेवाले, प्रियवद, वृद्ध सभ्य
ही उन शासन-सभाओंके सभ्य होते थे और वे विभिन्न जातिके होते थे—
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥
निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु ॥
( शुक्रनी० ४ । ५३९-४० )
उन्हें वर्गों तथा जातियोंका मिटाना अभीष्ट न था; किंतु योग्य एव एक
दूसरेका पूरक—पोषक बनानेका ही प्रयत्न होता था । वेदमन्त्रके आधारपर राष्ट्रमें
ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण, शूर, धनुर्धर, महारथी एवं लक्ष्यवेधी क्षत्रिय, दोग्ध्री गौ
तथा भारवहन-समर्थ बलवान् वृषभ, शीघ्रगामी अश्वोंकी कामना की जाती थी ।
प्रतिगृहमे कुलपालिनी पतिव्रता स्त्री, विजयी प्रियदर्शी सभ्य युवक, यथेष्ट
वृष्टि, फलयुक्त ओषधियो तथा योगक्षेमकी कामना की जाती थी—
आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यो
ऽतिव्याधी महारथो जायताम् । दोग्ध्री धेनुर्वोढाऽनड्वानाशुः सप्ति पुरन्ध्रिर्योषा
जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् । निकामे निकामे नः पर्जन्यो
वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो न कल्पताम् । (शु० यजु० २२।२२)
राज्य-कर न केवल भूमिपर किंतु किसी प्रकारके आयपर भी लगानेका
नियम अति प्राचीन है । क्रय विक्रयके करको शुल्क नामसे कहा जाता है—
विक्रेतृक्रेतृत्तो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् ।
शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः ॥
वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः ।
क्वचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे ग्राह्यं नृपैश्छलात् ॥
द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा ।
विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूलाविरोधकम् ॥
न हीनसममूल्याद्धि शुल्कं विक्रेतृत्तो हरेत् ।
लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः ॥
( शुक्रनीति, अध्याय ४ । २१८–२२१ )
बेचने-खरीदनेवालोद्वारा देय राजभाग ही चुंगी या शुल्क है । बाजारों
या देशोंकी सीमापर चुंगीघर होना चाहिये । एक वस्तुकी एक ही बार
मा० रा० २४—