मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् ।
ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यान् ततो भृत्यान् ततः प्रजाः ॥
( शुक्रनी० १ । ९८ )
राजाको व्यसनमुक्त होना चाहिये । कठोर भाषण, उग्र दण्ड, अर्थ-
दूषण, सुरापान, स्त्री, मृगया और द्यूत--ये राजाके लिये भीषण व्यसन हैं ।
पीछे अष्टादश व्यसनोंकी चर्चा आयी ही है--
वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च ।
पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपतेः ॥
( कामन्दकीयनीतिसार १४ । ६ )
मन्त्रीके लिये भी ये सब दूषण हैं । आलस्य, स्तब्धता, घमण्ड, प्रमाद,
वैरकारिता आदि ये और भी मन्त्रीके व्यसन हैं । दक्षता, शीघ्रता, अमर्ष, शौर्य एवं
उत्साह आदि गुणोंसे युक्त ही राजा होना चाहिये--
दाक्ष्यं जैघ्र्यं तथामर्षः शौर्यं चोत्साहलक्षणम् ।
गुणैरेतैरुपेतः सन् राजा भवितुमर्हति ॥
( कामन्दकीयनीति० ४ । २३ )
मन्त्रियोंके उपयोगी और भी बहुत-से गुण कहे गये हैं । जिनके बिना
शासन करनेकी योग्यता ही नहीं हो सकती है ।
स्वावग्रहो जानपद कुलशीलग्लान्वितः ।
वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान् ॥
स्तम्भचापलहीनश्च मैत्रः क्लेशसहः शुचिः ।
सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुतः ॥
कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान् धारणान्वितः ।
दृढभक्तिरकर्ता च वैराणां मन्त्रिणो भवेत् ॥
स्मृतिस्तत्परतार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः ।
दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसम्पत्प्रकीर्तिता ॥
( कामन्दकीयनीति० ४ । २८-३१ )
आत्मनियन्त्रित, स्वदेशस्थ, कुलीन, शीलवान्, बलवान्, वाग्मी, निर्भीक,
शास्त्रज्ञ, उत्साही, प्रत्युत्पन्नमति, निरभिमान, अचञ्चल, मैत्रीवर्धक, सहिष्णु,
पवित्र, धैर्य-स्थैर्य-सत्य एवं सत्त्वसे युक्त, प्रतापी, नीरोग, शिल्पज्ञ, दक्ष,
बुद्धिमान्, धारणावान्, स्वामिभक्त तथा उससे कभी वैर-विद्वेष न करनेवाला सचिव
होता है । स्मृतिमान्, पुरुषार्थ-तत्पर, विचारशील, निश्चित ज्ञानवाला, दृढता,
मन्त्रगुप्ति, क्षमता आदि गुणोंसे युक्त मन्त्री हो । मन्त्रियोंकी योग्यता राजाको
स्वयं प्रत्यक्ष देखकर, परोक्ष ( परोपदेश ) से तथा अनुमानसे ( कार्य देखकर यह
जान लेना कि कितना कार्य नहीं किया ) जाननी चाहिये--