मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 593, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंसन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसञ्ज्ञकः ।
स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥
अमात्यः साधु लिखितमित्येतद् प्राग् लिखेद्यम् ।
सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥
सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम् ।
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ॥
अङ्गीकर्तव्यमिति- च युवराजो लिखेत् स्वयम् ।
लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः ।
स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥
( शुक्रनीति २ । ३५५-३५९ )
मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोको लेकर विचार करना
चाहिये । फिर जो बहुमत हो उसे स्वीकार करना चाहिये--
पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् ।
विमृशेत् स्वमतेनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम् ॥
जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक
बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये--
अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।
स संहृत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ( शुक्रनीति )
इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृङ्खल नहीं होता था ।
आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार
योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है । बहुमत
जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमे शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एव लोक-
सभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें
सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं जो कानूनसे सर्वथा
अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य
वकीलोंका सहारा लेते हैं; परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं ।
साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदो एव मन्वादि धर्मशास्त्रोको
ही राष्ट्रका संविधान एव कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञ एवं
सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं ।
शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है ।
राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका
परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एव आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा
विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रो, मन्त्रियोको विनययुक्त बनाये, पश्चात्
भृत्यो एव प्रजाको विनययुक्त बनाये-