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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

‘प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया राजवृत्तिः । स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् । परोपदिष्टं
परोक्षम् । कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम् ।’ ( कौ० अर्थ० १ । ९ । ११ - १३ )
वाद, जल्प, वितण्डा, रूप कथाके प्रसङ्गसे मन्त्रीकी प्रगल्भता, निर्भीकता,
प्रतिभा एवं वाक्कुशलताको जाना जाता है । उसी प्रसङ्गसे सत्यवादिताका भी
पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसङ्गवशात् प्रत्यक्षसे
ही जाना जा सकता है । आपत्तिके समय उत्साह, प्रभाव तथा क्लेश, सहिष्णुता,
धैर्य, अनुराग, स्थिरताका परिज्ञान होता है । भक्ति, मैत्री तथा स्थिरताका परिज्ञान
व्यवहारसे करना चाहिये—
उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम् ।
धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चापदि लक्षयेत् ॥
भक्तिं मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारात ।
( काम० नीतिसार ४ । ३७-३८ )
मन्त्रीकी शास्त्रज्ञता एवं शिल्पज्ञता तत्-तद् विद्याओके विद्वानोंसे जानना
चाहिये । उसके स्वजनोंसे कुल, स्थान एवं संयमका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।
कर्ममें प्रयुक्तकर दक्षता, विज्ञान एवं धारयिष्णुताकी परीक्षा होती है । सहवासियों,
पड़ोसियोंसे उसके बल, सत्त्व (शक्ति), आरोग्य, शील, अस्तब्धता एवं अचापलका ज्ञान
हो सकता है । दारुण कृच्छ्र उत्पन्न होनेपर उसकी कुलीनताका ज्ञान हो सकता है,
क्योंकि दारुण अवसरपर ही स्वच्छहृदय कुलीन अपनी विशेषताको दिखलाता है—
साधुतैषाममात्यानां तद्विद्येभ्यस्तु बुद्धिमान् ।
चक्षुष्मत्तां च शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम् ॥
स्वजनेभ्यो विजानीयात् कुलं स्थानमवग्रहम् ।
परिकर्मसु दाक्ष्यं च विज्ञानं धारयिष्णुताम् ॥
गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रतिभां तथा ।
संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च ।
अस्तब्धतामचापल्यं वैरिणां चापि कर्तृताम् ॥
समुत्पन्नेषु कृच्छ्रेषु दारुणेष्वप्यसंशयम् ।
दर्शयत्यच्छहृदयः कुलीनश्चतुरस्रताम् ॥
( काम० नी० ४ । ३४ - ३६; ३९, ६९ )
आचार्य, संत, महात्मा और विद्वान् ही विद्याओके प्रकाशक, प्रवर्तक तथा
संचालक होते हैं । राजा भी विद्वानोंसे ही राजनीतिका विज्ञान प्राप्त करता है ।
इसीलिये स्वराज्यकी स्थापनामें मित्र-लाभादिसे भी प्रथम विद्या-चिन्तनका ही
निर्देश किया गया है; क्योकि सम्पूर्ण लोकस्थिति ही विद्यापर निर्भर होती है ।
तत्रायं प्रथमोपाय. यद् विद्यावृद्धैः सार्धं विद्याचिन्ता । विद्याप्रति-
बद्धत्वाल्लोकस्थितेः ॥ ( नीतिवाक्यामृत )