संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बाणोंको काट गिराया ॥ ३१ ॥ यह देख निशुम्भ
दैत्यसेनाके साथ चण्डिकाका वध करनेके लिये
हाथमें गदा ले बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३२ ॥ उसके आते
ही चण्डीने तीखी धारवाली तलवारसे उसकी गदाको
शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथमें लिया ॥ ३३ ॥
देवताओंको पीड़ा देनेवाले निशुम्भको शूल हाथमें
गर्दन कुचलकर खाने लगा, वह बड़ा भयंकर दृश्य
था। उधर काली तथा शिवदूतीने भी अन्यान्य
दैत्योंका भक्षण आरम्भ किया ॥ ३७ ॥ कौमारीकी
लिये आते देख चण्डिकाने वेगसे चलाये हुए अपने
शूलसे उसकी छाती छेद डाली ॥ ३४ ॥ शूलसे विदीर्ण
हो जानेपर उसकी छातीसे एक दूसरा महाबली एवं
महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ
निकला ॥ ३५ ॥ उस निकलते हुए पुरुषकी बात
सुनकर देवी ठठाकर हंस पड़ीं और खड्गसे उन्होंने
उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वीपर
गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ोंसे असुरोंकी
शक्तिसे विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो
गये। ब्रह्माणीके मन्त्रपूत जलसे निस्तेज होकर
कितने ही भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥ कितने ही दैत्य
माहेश्वरीके त्रिशूलसे छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो
गये। वाराहीके थूथुनके आघातसे कितनोंका पृथ्वीपर
कचूमर निकल गया ॥ ३९ ॥ वैष्णवीने भी अपने
चक्रसे दानवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ऐन्द्रीके
हाथसे छूटे हुए वज्रसे भी कितने ही प्राणोंसे हाथ
धो बैठे ॥ ४० ॥ कुछ असुर नष्ट हो गये, कुछ उस
महायुद्धसे भाग गये तथा कितने ही काली, शिवदूती
तथा सिंहके ग्रास बन गये ॥ ४१ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
उवाच २, श्लोकाः ३९, एवम् ४१, एवमादितः ॥ ५४३ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें
'निशुम्भ-वध' नामक नवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥