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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 227
  • शुम्भ-वध *
    २२७
    दशमोऽध्यायः
    शुम्भ-वध
    ध्यान
    ('ॐ' उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
    नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्।
    रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां
    कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
    मैं मस्तकपर अर्द्धचन्द्र धारण करनेवाली
    शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीका हृदयमें
    चिन्तन करता हूँ। वे तपाये हुए सुवर्णके समान
    सुन्दर हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये ही तीन
    उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर हाथोंमें
    धनुष-बाण, अङ्कुश, पाश और शूल धारण किये
    हुए हैं।)
    ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
    'ॐ' निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्।
    हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ २ ॥
    बलावलेपाद्दुष्टे १ त्वं मा दुर्गे गर्वमावह।
    अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी ॥ ३ ॥
    ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ राजन् ! अपने प्राणोंके
    समान प्यारे भाई निशुम्भको मारा गया देख तथा
    सारी सेनाका संहार होता जान शुम्भने कुपित
    होकर कहा— ॥ २ ॥ 'दुष्ट दुर्गे ! तू बलके अभिमानमें
    आकर झूठ-मूठका घमंड न दिखा। तू बड़ी
    मानिनी बनी हुई है, किन्तु दूसरी स्त्रियोंके बलका
    सहारा लेकर लड़ती है' ॥ ३ ॥
    देव्युवाच ॥४॥
    एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
    पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः २ ॥ ५ ॥
    देवी बोलीं— ॥ ४ ॥ ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही
    हूँ। इस संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन है। देख,
    वे मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश
    कर रही हैं ॥ ५ ॥
    ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्।
    तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥ ६ ॥
    तदनन्तर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अम्बिका
    देवीके शरीरमें लीन हो गयीं। उस समय केवल
    अम्बिका देवी ही रह गयीं ॥ ६ ॥
    देव्युवाच ॥ ७ ॥
    अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता।
    तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ ८ ॥
    देवी बोलीं— ॥ ७ ॥ मैं अपनी ऐश्वर्यशक्तिसे
    अनेक रूपोंमें यहाँ उपस्थित हुई थी। उन
    सब रूपोंको मैंने समेट लिया। अब अकेली
    ही युद्धमें खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो
    जाओ ॥ ८ ॥
    १. पा०-पदु० । २. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है।