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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

तेरा बैरी मन

तेरा बैरी मन


तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन

इस बात को गंभीरता से लेना होगा। क्या यह मन हमारा बैरी है? यह मन सच में हमारा बैरी है। तो कैसा है यह मन? हम सब इससे बेखबर क्यों हैं? क्या कर रहा है मन? कहाँ रहता है यह मन? मन को क्या पड़ी है हमें परेशान करने की? ये चंद सवाल हैं, जो बड़े अहम हैं। आदमी इनपर चिंतन नहीं कर रहा है।

मन को क्या पड़ी कि हम सबको इतना परेशान कर रहा है? आत्मा को आखिर मन क्यों उलझा रहा है? जैसे मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, पेट पालने के लिए नौकरी कर रहा है, मेहनत कर रहा है, ऐसे ही मन को क्या पड़ी है? इतना परेशान क्यों कर रहा है? कुछ तो वजह है।

प्रेतात्माएँ किसी में क्यों आती हैं? प्रेतात्माएँ तीन कारण से आती हैं। पहला तो इनको बदला चुकाना होता है। फिर दूसरा, इनकी वृत्तियाँ अच्छी नहीं हैं, विषय-विकारों के लिए आती हैं। एक बात ध्यान में रहे कि जो मर जाता है, उसकी जैसी वृत्तियाँ होंगी, वैसा ही होगा। इस तरह वो पहचान में आयेगा। जो जिस स्वभाव का है, मरने के बाद भी वैसा ही होगा।

पहली बात कि प्रेतात्मा किसी में भी प्रवेश लेती है—बदला लेने के लिए। दूसरा, विकारों के कारण, गंदे काम करने आती हैं। तो तीसरा, उन्हें एक शरीर चाहिए। तब कॉन्शिएस में प्रवेश लेती हैं। इसके लिए वो भोले लोगों के ढूँढ़ती हैं।

...तो मन को क्या पड़ी कि आत्मा को तंग कर रहा है ? जैसे प्रेतात्मा को पिंड़ा चाहिए, ऐसे ही मन को आत्मा चाहिए। नहीं तो कुछ काम नहीं हो पायेगा। वो नहीं चाहता है कि कुछ आत्माएँ निकल जाएँ। वो सावधान है। बेशुमार आत्माएँ हैं। यदि थोड़ी-सी निकल गयीं तो क्या फर्क पड़ता है ? नहीं, फर्क पड़ता है। क्योंकि वो जानता है कि यदि एक भी निकल गया तो कइयों को निकाल ले जायेगा और मेरे लिए खतरा हो जायेगा। इसलिए उलझाता है। यदि आप चिंतन करेंगे तो यह दिखेगा। जैसे शरीर में धड़ दिख रहा है, गर्दन दिख रही है, यह दिखेगा। पर यह चिंतन नहीं करने दे रहा है, किसी भी तरह आत्मा के नजदीक नहीं पहुँचने दे रहा है। इसलिए इस मन से सावधान रहना।

तेरा बैरी कोई नहीं तेरा बैरी मन ॥

मन आपका सबसे बड़ा शत्रु है। आपने घर में पशु रखे होंगे। आजकल वैज्ञानिक युग है; ट्रेक्टर आदि चलते हैं। फिर भी कुछ लोग बैल रखते हैं। बैल को रखने वाले ने उसे जन्म नहीं दिया। फिर क्यों गुलाम बनाकर रखा हुआ है ? न तो उसने बैल को बनाया, न जन्म दिया। फिर क्यों रखा है ? केवल काम करवाने के लिए। यानी अपना काम करवाने के लिए बैल को रखा हुआ है। क्योंकि आप तेज दिमाग के हैं। उसे कैद करके रखा हुआ है। उसे भागने भी नहीं दे रहे हैं। वो भागना भी चाहता होगा। आखिर क्यों नहीं भागने दे रहे हैं आप ? अपने मतलब के लिए।

कुछ ने गाय रखी होती है। बाँधकर रखी होती है। क्योंकि दूध चाहिए। वो बेचारी जाना चाहती होगी, पर वो नहीं जाने देते हैं। रखने वाले ने गाय को जन्म नहीं दिया; बनाया भी नहीं। पर रस्सों से अच्छी तरह से बाँधकर रखा है। वो कभी भाग जाती है तो दूँढ़कर फिर पकड़ लाते हैं और बाँध देते हैं।

बैल को कोई अपने शिकंजे से निकलने नहीं देता है। बैल की कोई पेश नहीं चलती है। वो अपने आप को छुड़ा नहीं पाता होगा। डंडे

भी पड़ते होंगे बैल को। वो रस्सों से बाँधा रहता है। इसी तरह आत्मा को भी एक मतलब के लिए मन ने बाँधा हुआ है। इस पर साहिब कह रहे हैं—

सध्याद के काबू में हैं सब जीव बेचारे॥

कह रहे हैं कि दुनिया के सब जीव एक शैतानी ताकत के हाथ में हैं। एक गीत सुना है—

जिंदगी क्या है, गम का दरिया है।
ना जीना यहाँ बस में, ना मरना यहाँ बस में॥

कुछ लोग हैं कि जीना नहीं चाहते हैं, पर जीना पड़ता है। कुछ लोग हैं कि जीना चाहते हैं, पर मरना पड़ता है। इसका मतलब है कि सब किसी शैतानी ताकत के हाथ में नाच रहे हैं। पर विडंबना यह है कि सभी उस शैतानी ताकत को परमात्मा की संज्ञा दे रहे हैं। तभी तो साहिब कह रहे हैं—

जो रक्षक तहँ चीहनत नाहीं, जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं॥

साहिब ने बड़ी क्रांति लाई। जो अपना है, जिसकी सुरति करनी चाहिए, जिसकी भक्ति करनी चाहिए, उसकी कोई नहीं कर रहा है। जो भक्षक है, जो वैरी है, सब उसी की सुरति कर रहे हैं, सब उसी की भक्ति कर रहे हैं।

साहिब ने पूरे समीकरण बदल दिये। कह रहे हैं—

गण गंधर्व ऋषि मुनि अरु देवा, सब मिल लाग मनहिं की सेवा॥

यानी परमात्मा की सेवा में कोई नहीं लगा है। सब किसी शैतानी ताकत, जिसे मन कहा जाता है, को माने जा रहे हैं।

जस नट मरकट को दुख देई। नाना नाच नचावन लेई॥

जैसे बंदर बाजीगर के इशारों पर नाचता है, यह आत्मदेव भी दुनिया में ऐसे ही काम कर रहा है।

कुछ ने बाजीगर का खेल देखा होगा। मैंने भी देखा। मैं छोटेपन से ही बड़ों के साथ बैठता था, बच्चों के साथ नहीं, क्योंकि उनकी शरारतें

करना मुझे पसंद नहीं था। तो हमारे गाँव में मदारी आया; उसने डमरू बजाया। पहले भीड़ को इकट्ठा करने के लिए उसने अपना डमरू बजाया। सब बच्चे इकट्ठा हुए; अन्य लोग भी इकट्ठा हुए। मैंने भी सोचा कि देखते हैं, क्या करता है! उसने पिठरे में एक काठ रखी थी। कुछ सामान उसने गठरी में बाँधकर एक तरफ रखा तो कुछ दूसरी तरफ। उसके कंधे पर एक बंदर बैठा था। उसने सबसे कहा कि यह बंदर बड़ा बुद्धिमान है; जो कहो, वो करता है। आज यह आपको दिखायेगा कि ससुराल में कैसे जाते हैं। उसने बंदर को पैंट, शर्ट और टोपी पहना रखी थी। लेकिन था वो बंदर ही। पहले ज़माने में आदमी लाठी में एक गठरी बाँधता था। वो लाठी कंधे पर रखकर जाता था। लाठी को बड़ा हथियार मानते थे। नदी-नालों को पार करने में भी आसानी हो जाती थी और कोई चोर आ जाए, तो भी काम आती थी। तो लोग पास में रखते थे।

तो बंदर को अब दो पाँव पर चलकर ससुराल जाने का डरामा करना था। कुत्ता और बंदर दो पाँवों पर नहीं चल पाते हैं; उन्हें दिक्कत होती है। वो दिन-भर तमाशा दिखाता होगा। उस दिन उसका मूड ठीक नहीं था। मदारी ने एक मूढ़ा एक तरफ रखा, एक दूसरी तरफ, कहा कि यह अब वहाँ जायेगा। बंदर ने बंदर की तरह छलाँग लगाई और वहाँ जाकर बैठ गया। ऐसे में तो पैसा मिलना नहीं था। मदारी ने उसे इशारे में कहा कि ऐसे नहीं, इंसान की तरह चलकर जा। उसने फिर बंदर को तमाशा दिखाने को कहा। बंदर फिर दो कदम चला और फिर बंदर की तरह छलाँग लगाकर वहाँ बैठ गया। मदारी ने उसे चार सोटियाँ लगाई। बंदर तिलमिला उठा। बच्चे हँसने लगे। मैं गंभीर था। मैंने सोचा कि यह कितना ज़ालिम है; उसे पीड़ा हुई है। अपनी-अपनी सोच है न! तो मदारी ने उसे कहा कि बीड़ी पी। वो बंदर कुछ नहीं कर रहा था। उसे ससुराल में जाकर पानी भी पीना था, बीड़ी भी पीनी थी। पानी का गिलास उसने फेंक दिया, बीड़ी भी फेंक दी। मदारी ने फिर सोटी उठाई और दी 4-5। वो दिन भर बीड़ी पीता होगा। उस समय उसका मूड नहीं था। जो

भी अधीन है, वो सुखी नहीं है। पर मजबूरी में बंदर ने बीड़ी भी पी। आखिर में मदारी ने जो-जो चाहा, उससे करवाकर छोड़ा, क्योंकि वो अधीन था। पक्का करवाया। साहिब भी कह रहे हैं—

जस नट मरकट को दुख देई। नाना नाच नचावन लेई ॥

मन को क्यों जरूरत पड़ी? साँड को बाँधने की जरूरत पड़ी कि हल चलाना है। कुछ बैलगाड़ी में भी बैल को जोतते हैं; कुछ कोल्हू में लगाते हैं। बहुत काम करवाते हैं बैल से। यू.पी. में बैलों से बड़े काम करवाए जाते हैं।

आत्म-देव को भी निरंजन ने जकड़ा है। आदमी खुद हल नहीं चला सकता है, इसलिए बैल को जकड़ा है। इस तरह निरंजन और माया काम नहीं कर सकते हैं। आत्मा को लगा रखा है। आत्मा से शरीर का सारा काम करवा रहे हैं। आत्मा का शरीर से नाता ही क्या है! यह मन-माया का खेल है। आत्मा कभी चाहती है कि निकलूँ, पर नहीं निकल पाती है। क़तई बैल को कोई नहीं छोड़ना चाहता है। हालाँकि बैल को जन्म नहीं दिया; बनाया नहीं। अच्छा, बैल आदमी के काबू में आया कैसे? पहले-पहले ऐसे आया होगा कि 84 लाख में यह भी था। इसे इंसान ने देखा होगा और पकड़ लिया होगा। गाय को भी पकड़ा होगा। जब कुछ बच्चे हुए होंगे तो दूसरे ने कहा होगा कि मुझे भी एक दो। फिर उसने किसी चीज़ के बदले वो दिया होगा।

हमारे गाँव में हाथियों ने दो आदमियों को मार दिया। वो दिन में नहीं आते हैं। वो रात के समय घरों में घुसकर खाने की चीज़ें लेते हैं और यदि आदमी मिल जाए तो मार देते हैं। तो इंसान उसे अपने मतलब के लिए पकड़ लेता है। अभी भी जंगलों में बड़े हाथी हैं। इंसान कैसे पकड़ता है? बड़ी तरकीब से पकड़ता है। जंगल में एक पेड़ के कुछ दूर सामने एक खड्डा खोदते हैं और उसे छोटी-छोटी लकड़ियों और घास-फूस के साथ ढक देते हैं। पेड़ के साथ एक हथिनी को बाँध देते हैं। हाथी हथिनी को देखकर आता है। उसे कुछ होश नहीं रहता है। वो सीधा उस

खड़े में गिर पड़ता है। खड़ा ज्यादा गहरा नहीं होता है। 10-12 दिन वहाँ रहने दिया जाता है उसे। ऐसे में कमजोर हो जाता है। फिर पेड़ के साथ रस्सी के सहारे से महावत नीचे जाता है। पीछे कुछ रस्सी को पकड़े रखते हैं। वो हाथी को धीरे-धीरे पुचकारता है। उसे रोटी भी देता है। हाथी मान जाता है कि यह भला करने के लिए आया। नहीं, भला नहीं करने आया। इसी तरह से निरंजन अवतार धारण करके आता है तो दुनिया सोचती है कि यही परमात्मा है, हमें बचाने आया है। तो धीरे-धीरे हाथी को पालतू बना देते हैं। फिर उसे खड़े में से बाहर निकालते हैं। क्यों? हाथी को क्यों पकड़ा? एक दिन मैं असाम साइड में जा रहा था तो देखा कि हाथी रेल के डिब्बे में लकड़ी चढ़ा रहे थे। बड़ा काम करते हैं हाथी। बड़ा बुद्धिमान भी है हाथी। सूँढ़ से धकेल रहे थे। फिर सूँढ़ से धकेलकर ऊपर कर रहे थे। फिर क्या कराते हैं हाथी से? एक कहावत भी है कि जिंदा हाथी लाख का और मरा सवा लाख का। पर आजकल एक लाख से कुछ नहीं बनता है। मैं रखबंधू की चारदीवारी करवा रहा था तो 20 लाख की चारदीवारी बनाई। छोटे आश्रम की चारदीवारी में 5-6 लाख लग जाते हैं। तो हाथी जिंदा लाख का; मरा तो सवा लाख का। पर आजकल 5-6 लाख है हाथी की कीमत। मेरे पास महा घटिया लोग भी आते हैं और राजे लोग भी आते हैं। अभी काफ़ी बुद्धिजीवी मेरे पास आ रहे हैं। एक हाथी का व्यापारी आया। उसने कहा कि यदि आपकी आज्ञा हो तो आपके लिए हाथी लाऊँ? मैंने पूछा कि हाथी के व्यापारी हो क्या? कहा—हाँ। आसाम से लाकर यहाँ पर बेचता हूँ।

अमृतसर में घोड़े बिकते हैं। वहाँ घोड़ा-मण्डी है। अच्छे लंबे-चौड़े घोड़े हैं। पहले यहाँ पंजाब से आते थे पशु, पर अब यहाँ से पंजाब में जा रहे हैं। इस तरह अन्य पशुओं की तरह हाथी की भी बिक्री होती है। हाथियों से बड़े काम लिये जाते हैं। पहले तो राजा लोग सवारी भी करते थे। आजकल झांकियों आदि में, भीख माँगने आदि के लिए हाथी का इस्तेमाल करते हैं। मंदिरों, देवस्थानों आदि में हाथियों का प्रयोग

होता है। तो मैंने उससे पूछा कि क्या कीमत है हाथी की? कहा—पाँच से छः लाख। वो बोला कि हथिनी की कीमत 5 से 7 लाख है। हथिनी मँहगी है। मैंने पूछा कि क्यों है मँहगी? कहा कि बच्चा देती है। कुछ साल में बड़ा हो जाता है। मैं छोटी हथिनियों को लाता हूँ, अपने बगीचे में पत्तियाँ खिलाकर जवान करता हूँ। वो खुद खा लेती हैं। ज्यादा खर्चा भी नहीं है। फिर वे बच्चे देती हैं। तब मैं उन्हें बेचता हूँ।

हाथी के चमड़े, दाँतों आदि से बड़े काम होते हैं। हाथी के दाँतों से चूड़ियाँ बनती हैं, जो शादियों आदि अवसरों पर पहनते हैं। तो उसने कहा कि बड़ी कीमती बिकती हैं।

इंसान ने हाथी को इसलिए रखा कि उससे काम करवाना है; कुछ मतलब है। मन ने इसलिए इस आत्मा को बाँधा हुआ है कि उससे अपने काम करवाने हैं, दुनिया को चलाना है। रूह को मन ने बाँधकर रखा है। क्यों बाँधा? जैसे इंसान ने अपने मतलब के लिए घोड़े को बाँधा है, गाय को बाँधा है।

मन ने आत्मा को किस फँदे में बाँधा है? मेरा बेटा, मेरा भाई आदि के फँदों में आत्मा को बाँध दिया गया है। रूह अपने को नहीं जान पा रही है। विरोधी ताकतें रूह को बाँधे हुए हैं। आत्मदेव बुरे बँधनों में हैं। इसलिए साहिब कह रहे हैं—

बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।

जिसने बाँधा है, बड़े यत्न से बाँधा है। अब बैल को उसका मालिक नहीं जाने देना चाहता है। भैंसे आदि किसी को नहीं जाने दे रहा है कोई। अच्छी तरह से बाँधकर रखे हुए हैं सब अपने-अपने स्वार्थों के लिए अपने-अपने पशुओं को। इस तरह—

बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव।

जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

आत्मदेव को बहुत बंधनों में कैद किया गया है। इसकी पेश नहीं चल रही है। यह नहीं निकल पा रहा है जालिम मन के बंधन से। इससे

निरंजन पूरे-पूरे काम करवा रहा है। जो भी काम कर रहे हैं, आपका कोई काम नहीं है। जो घर बनाया, यह निरंजन का काम है, आत्मा का नहीं। फकीरचंद के पास बैल हैं। वो बैल से जो भी काम करवाता होगा, वो अपने वाला ही करवाता होगा। उस काम से बैल को कोई मतलब नहीं होगा। बैल का कोई काम नहीं है। इस तरह—

जीव पड़ा बहु लूट में, नहीं कछु लेन न देन ॥

निरंजन जो भी करवा रहा है, आत्मा का उससे कोई वास्ता नहीं है। आत्मा को घर की जरूरत ही नहीं है, पर निरंजन उससे घर बनवा रहा है। शादी करवा रहा है। शादी से आत्मा को क्या लेना! आत्मा तो स्त्री-पुरुष कुछ भी नहीं है। खेतीबाड़ी करवाई जा रही है। खेतीबाड़ी से आत्मा का क्या वास्ता! आत्मा को भूख-प्यास नहीं लगती है। तभी तो साहिब बार-बार समझा रहे हैं—

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई।

हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

तो फकीरचंद ने बैल को नहीं छोड़ा है। उसे रोटी भी खिलाता होगा ताकि जिंदा रहे और उसका (फकीरचंद का) काम करता रहे। उसे जो रोटी खिला रहा होगा, वो भी अपने मतलब के लिए। निरंजन ने भी शादी में, इंद्रियों आदि का मजा इसलिए डाल दिया ताकि जिंदा रहे और उसका काम करता रहे।

<!-- image: Three decorative floral or geometric symbols arranged horizontally. -->

सुर नर मुनि सबको ठगे, मनहिं लिया औतार।
जो कोई या ते बचे, तीन लोक से न्यार ॥