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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

मन के रूप

मन के रूप


हम देखते हैं कि एक मिसाइल है, जो आकाश में घूम रही है। उसका नियन्त्रण पृथ्वी पर से हो रहा है। एक छोटे से रिमोट कण्ट्रोल द्वारा उसे किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है। इस शरीर पर भी रिमोट कण्ट्रोल वाला कार्य हो रहा है। मन जो चाहता है, इससे करवाकर छोड़ता है।

कोई भी आदमी अच्छा है या बुरा है, इसको नापने का पैमाना है। जिसका जितना काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियन्त्रण है, वो उतना ही अच्छा होगा। जिसका जितना इंद्रियों पर नियन्त्रण है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने स्वभाव पर अधिकार है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने मन पर काबू है, उतना ही अच्छा होगा। जिसका मन जितना स्थूल होगा, उतना ही बुरा होगा।

मन की दो अवस्थाएँ हैं—स्थूल और सूक्ष्म। इन दोनों को समझना। मन की स्थूल अवस्था है—इंद्रियाँ। जिसकी भी इंद्रियाँ अधिक चलायमान हो रही हैं, समझना मन बहुत बेकाबू है। इंद्रियाँ मन का स्थूल रूप है। कोई बार बार कई चीजें खा रहा है, स्वाद ले रहा है, समझना कि मन चंचल है। मन को नापने के फार्मूले हैं। अपने मन को आप चेक करें। मन के बहाव में मत बहना। अगर ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले चक्षु इंद्रि को साधो। ये आँखें सौंदर्य की तलाश में बार बार घूम रही हैं तो समझना मन भटका रहा है। सुंदर रूप चक्षु की पूजा। हमेशा ये आँखें सौंदर्य चाहती हैं। यही इनका भोजन है। कहीं सुंदर मुखड़ा दिखा, वहीं टिकेंगी। समझना ये है मन का स्थूल खेल। अगर स्थूल रूप में मन

नियंत्रण में नहीं है तो सूक्ष्म में कभी भी नहीं हो सकता है। पहले इंद्रियों को चेक कर लेना। इंद्रियों से ही आदमी को जाना जा सकता है कि इसका मन नियंत्रण में है या नहीं है।

अगर कोई यह कहे कि उसका मन अमुक बात सुनकर निर्मल हो गया, अमुक कथा सुनकर उसका मन निर्मल हो गया, कहीं जाकर या तीर्थ में नहा कर मन निर्मल हो गया तो इसमें शंका है। कभी नहीं हो सकता मन ऐसे निर्मल। अगर दो डुबकियाँ लगाने से मन निर्मल हो जाए तो कहना क्या। फिर तीर्थों में रहने वाले ठगी, छल, कपट कैसे कर सकते हैं। इससे सिद्ध हो रहा है कि मन इतनी जल्दी निर्मल होने वाला नहीं है। मन को काबू करना है।

सौ मन साबुन से एक कोयला उजला नहीं हो सकता। लेकिन कोई अगर कहे कि कोयले को धोकर हमने सफेद कर लिया तो हम मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। पर कोई कहे कि मन को निर्मल कर लिया, हम किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं होंगे। मन निर्मल हो ही नहीं सकता है। काबू करना, इस पर सवारी करना, इस पर नियंत्रण करना।

मन पर काबू कैसे? मन नितांत खराब चीज है। मन का स्थूल रूप इंद्रियाँ अगर सक्रिय हो रही हैं, अपने अपने विषयों की तरफ दौड़ रही हैं तो मन मोटा हो जाता है। मन को पोषण इंद्रियों से मिलता है।

मन के चलाए तन चले, ताको सर्वस्व जाए॥

जिसका भी तन मन के चलाए चल रहा है, सर्वस्व नाश हो जाएगा।

जो भी आदमी मन का गुलाम है, वो अच्छा नहीं है। इसलिए इस मन पर नियंत्रण करना। ये कान अपनी बढ़ाई चाहते हैं, इन पर नियंत्रण करना।

ऐसे मन साधारणतया समझ में नहीं आएगा। वातावरण में बहुत से जीवाणु हैं। पानी में अनेक प्रकार के कीड़े हैं। नौ लाख किस्म के जीव

हैं जल में। उनमें एक-दो लाख किस्म के आप देख सकते हैं खुली आँखों से, बाकी दिखाई नहीं देंगे। इसी तरह—मन को कोई देख न पाए। मन का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है। यह बहुत खतरनाक शक्तियों से सम्पन्न है। मन बहुत जल्दी से किसी को समझ में नहीं आता है।

सूक्ष्म रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मन के रूप हैं। प्रत्येक मानव शरीर में मन चार रूपों में स्थित है—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों अपने-अपने तरीके से आत्मा को भ्रमित कर रहे हैं। जैसे पानी के तीन रूप हैं—तरल, ठोस तथा वाष्प; लेकिन तत्व रूप से तीनों एक ही हैं; बर्फ भी पानी ही है और वाष्प भी; इसी तरह मन के चार रूप हैं, पर मूल रूप से एक ही मन है। जब हमारा मन कोई इच्छा करता है तो यह मन कहलाता है। सारी इच्छाएँ मन से हैं। आत्मा कोई इच्छा नहीं करती है। आत्मा को किसी भी पदार्थ की कोई ज़रूरत नहीं है, वो किसी पर आश्रित ही नहीं है, वो अपने आप में परिपूर्ण और आनन्दमयी है, उसे कुछ नहीं चाहिए, फिर इच्छा क्या करेगी!

देखते हैं कि यह मन कैसी इच्छाएँ करता है। विचार करने पर पता चलता है कि मन मूल रूप से हमारे शरीर के उपयुक्त इच्छाएँ ही करता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए आगे आने वाला नहीं है। कभी-कभी हम बच्चों को अच्छी तालीम दिलवाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। कभी अन्य-अन्य इच्छाएँ करते हैं। सोचो! क्या यह सब इच्छाएँ आत्मा कर रही है? नहीं! आत्मा का कोई रिश्ता-नाता नहीं है। जगत के सब रिश्ते मन बनाता है। सदी-गर्मी से बचने के लिए हम घर बनाते हैं। आत्मा को सदी-गर्मी लगती ही नहीं; सदी-गर्मी तो शरीर को लगती है, फिर आत्मा को क्या ज़रूरत पड़ी है, किसी घर की! कभी-कभी हम कहते हैं, हमारी आत्मा जलेबी खाने को कह रही है, हलवा-पूरी खाने को कह रही है। क्या यह ठीक बात है? नहीं। हमारी आत्मा कुछ भी नहीं खाती। इसमें तो मुँह ही नहीं है; खायेगी क्या! यह तो मन और इन्द्री का समझौता था। इन्द्री को मन ने ही उत्तेजित किया।

इन्द्री के स्वार्थ की पूर्ति के लिए मन ने कार्य किया और इन्द्री मन की आज्ञा के पालन में जुट गयी। आत्मदेव को यहाँ पर धोखा दिया गया। उसने अपने को इन्द्री मान लिया और उसके स्वार्थ की पूर्ति में अपनी ताकत का सहयोग दिया। लोग कहते हैं कि दुनिया में सात अजूबे पर मुझे दुनिया में एक ही अजूबा नज़र आ रहा और वो यह कि आत्मा अपने को शरीर मान रही है। क्या कोई टॉवर कौतुक है! क्या कोई ब्रिज कौतुक है! नहीं है कौतुक। कौतुक है तो बस एक ही। इस आत्मा को भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती; इसका कोई मां-बाप, रिश्ता-नाता नहीं। कितना बड़ा कौतुक है! इसी को साहिब अपने शब्दों में कह रहे हैं—

मन फूला-फूला फिरे जगत में, कैसा नाता रे।
माता कहे है पुत्र यह मेरा, बहिन कहे बीरन मेरा रे।
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा रे।
पेट पकड़कर माता रोवे, बाँह पकड़कर भाई रे।
लपटि झपटि तिरिया रोवे, हंस अकेला जाई रे॥

हम सभी सैद्धान्तिक रूप से तो स्वीकार करते हैं कि 'आत्मा अमर है'। हम ठीक से समझते हैं कि हमारी आत्मा इस भवसागर में जब तक पड़ी रहेगी, यह बंधन में रहेगी। तभी तो हम सब भवसागर से छूटने का प्रयास करते हैं, आत्मा की मुक्ति की बात करते हैं। हम सभी सैद्धान्तिक रूप से शरीर को नाशवान् भी मानते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि जो भी शरीरधारी हुए हैं, सब एक-एक करके जा रहे हैं। हमसे पहले जो शरीरधारी हुए, कोई भी नज़र नहीं आता, चाहे वे बड़े-बड़े महापुरुष ही क्यों न थे, उन्हें भी एक बिन्दु पर पहुँचकर इस शरीर को छोड़ना पड़ा था। इसलिए हम सब सैद्धान्तिक रूप से मानते हैं कि शरीर नाशवान् है। लेकिन विडम्बना यह है कि व्यवहार में हम बिल्कुल विपरीत जा रहे हैं। व्यवहार में तो हम 'आत्मा' नाम की कोई चीज़ मान ही नहीं रहे हैं, क्योंकि हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर रहे, और न ही हम शरीर को

व्यवहार में नाशवान् मान रहे हैं, क्योंकि हम शरीर से बहुत प्यार कर रहे हैं, जितने भी कार्य हैं, सब इसी की सुख-सुविधा के लिए कर रहे हैं। दूसरी ओर आत्मा के कल्याण के लिए, आत्मा को बंधन से छुड़ाने के लिए हम कोई भी कार्य नहीं कर रहे हैं।

‘आत्मा अमर है’ जानकर भी हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर पाते हैं और शरीर को भी व्यवहार में नाशवान् नहीं समझते हैं। आखिर क्यों ? संत कहा करते हैं कि वेद-शास्त्रों या अन्य-अन्य धार्मिक पुस्तकों का हम कितना ही अध्ययन क्यों न कर लें; लेकिन जब तक हम यथार्थ में अपनी आत्मा से परिचित न हो जाएँ, उसे देख न लें; हम अपने को शरीर से परे एक आत्मा मानकर व्यवहार नहीं कर सकते। वर्तमान में हम अपने को आत्मा न समझकर एक शरीर ही मान रहे हैं। आत्मा को ज्ञान है कि वो अमर है, इसलिए आत्मा अपनी अमरता की प्रवृत्ति के कारण ही शरीर में बैठकर उसे भी अमर मान रही है, सत्य मान रही है, नित्य मान रही है, जो कि वास्तव में नाशवान् है, अनित्य है, झूठ है।

मन का दूसरा रूप है—बुद्धि। जब भी मन कोई फैसला करता है तो इसी मन को बुद्धि कहा जाता है। वह बैरी है, वो मित्र है, यह काम करना है, वो काम नहीं करना है आदि कार्य बुद्धि करती है। बुद्धि के भी सारे फैसले, सारे निर्णय शरीर के विषय में होते हैं। आत्मा के विषय में तो इसे सोचने का समय ही नहीं। महापुरुषों के सत्संग से प्रभावित होकर ही हम थोड़ी देर आत्मा के विषय में सोच पाते हैं। ऐसा तभी सम्भव हो पाता है, जब महापुरुषों की अलौकिक वाणी हमारी आत्मा को छू जाती है और फिर हम विचारों में खो जाते हैं। विचार आत्मा का गुण है। पर थोड़ी देर बाद पुनः मन की दुनिया में रम जाते हैं।

मन का तीसरा रूप है—चित्त। चित्त का काम है—याद करना। यह चित्त भी आत्मा के कल्याण के लिए कभी आगे नहीं आने वाला, प्रभु को याद नहीं करने वाला। कभी-कभी हम पुरानी बातों को याद करते हैं कि उसने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया था। फिर कभी-कभी

हम बीते हुए दिनों को याद करते हैं। पचास साल, सौ साल पुरानी बातें भी याद आ जाती हैं, पर कभी भी यह चित्त प्रभु की याद नहीं आने देता। यह गम्भीर विषय है। हम कहीं उलझे हुए हैं। हमें इस पर गहराई से विचार करना है।

चौथा रूप है—अहंकार। इसका काम है—क्रिया करना। उदाहरण के लिए मन ने इच्छा की कि आम खाना है। इस पर बुद्धि फैसला करती है। पहले देखती है कि आम खरीदने के लिए पैसे भी हैं या नहीं। यदि पैसे ही नहीं हैं तो बुद्धि मन से कह देती है—ओ मन! पैसे नहीं हैं, आम नहीं खा सकते। मन शांत हो जाता है। मान लो कि आम खरीदने के लिए पैसे हैं। बुद्धि फौरन फैसला करती है—हाँ, आम खायेंगे। अब आम कहाँ मिले। यह बताता है चित्त। हमने चलते-फिरते कहीं आम की दुकान देखी थी। चित्त में यह बात बैठ गयी थी; उसे याद आ गया। अब फिर हम चलकर आम खरीदने के लिए जाते हैं। यही अहंकार कहलाता है।

<!-- image: Three decorative floral symbols arranged horizontally. -->

“वेद चारों नहीं जानत सत्य पुरुष कहानियां ॥”

क्या कहते वेद ?

  1. ऋग्वेद—परमात्मा निराकार है।
  2. यजुर्वेद—परमात्मा साकार है।
  3. अथर्ववेद—कर्म ही परमात्मा है।
  4. साम वेद—आत्मा ही परमात्मा है।