मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)
Manasara on Architecture and Sculpture by P.K. Acharya
मानसार ऋषि (अनुवादक: डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished856 पृष्ठ
पृष्ठ 287, कुल 856 में से
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विस्तारं पूर्ववत्कुर्यादथवा त्र्यंशालिन्दकम् ॥ १३८॥
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वि-स्ता-रं पूर्-व-वत्-कुर्-या- (8)
द-थ-वा त्र्यं-शा-लिन्-द-कम् (8)
Number:॥ १३८॥ -
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शेषं प्रागुक्तवत्कुर्याद् देवानां तु चतुर्मुखम् ।
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शे-षं प्रा-गुक्-त-वत्-कुर्-याद् (8)
दे-वा-नां तु च-तुर्-मु-खम् (8) -
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तद्विस्तारायते भागं तस्माद् द्व्यंशाधिकं बुधः ॥ १३६॥
Wait, look at the number:॥ १३६॥(or `॥ १३९