महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
प्रकाशक : परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान
ॐह्रीं
हिन्दी
महा-निर्वाण तन्त्र
प्रकाशक : परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान
कल्याण मन्दिर प्रकाशन
श्रीचण्डी-धाम, अलोपी-देवी मार्ग, प्रयाग-२११००६
ह्रीं ॐ
(हिन्दी)
महा-निर्वाण तन्त्र
आदि-सम्पादक एवं अनुवादक
प्रातः-स्मरणीय 'कुल-भूषण' पं० रमादत्त शुक्ल
✶
सम्पादक
ऋतशील शर्मा
✶
प्रकाशक
पण्डित देवीदत्त शुक्ल स्मारक
परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान
कल्याण मन्दिर प्रकाशन
श्रीचण्डी-धाम, प्रयाग-राज-२११००६ ☎ ९४५०२२२७६७
Website : www.paravani.org Email : [email protected]
प्रकाशक
प्रकाशक
पण्डित देवीदत्त शुक्ल स्मारक
परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान
कल्याण मन्दिर प्रकाशन
श्रीचण्डी-धाम, प्रयाग-राज-२११००६ ☎ ९४५०२२२७६७
(हिन्दी)
महा-निर्वाण तन्त्र
हे शिवे! तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो।
यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है।
हे भद्रे! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल-सूक्ष्म
सारा स्थावर जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है।
सारा जगत् तुम्हारे अधीन है।
तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो।
सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं।
सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो।
तुम्हें कोई नहीं जान सकता।
(पृष्ठ १६)
तृतीय संस्करण
चैत्र शुक्लाष्टमी, क्रोधी सं० २०६८ वि०
(११ अप्रैल, २०११)
सर्वाधिकार सुरक्षित
परा-वाणी प्रेस
'श्रीचण्डी-धाम', अलोपी-देवी मार्ग, प्रयाग-राज (उ०प्र०)
अनुक्रमणिका
महा-निर्वाण-तन्त्रोक्त पूजन-यन्त्र चार
प्राक्कथन : 'महा-निर्वाण तन्त्र' का महत्त्व पाँच
पहला उल्लास : जीव-निस्तारोपाय-सम्बन्धी प्रश्न १
दूसरा उल्लास : जीव-निस्तारोपाय का कथन ४
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि ७
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम १५
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार २०
छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि ३३
सातवाँ उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन ४३
आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन ५०
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार ६३
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन ७९
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन ८९
बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन ९६
तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि १०४
चौदहवाँ उल्लास : शिव-लिङ्ग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण ११६
परिशिष्ट : 'महा-निर्वाण तन्त्र' के अनूठे उद्धरण १२६
★★★
(तीन)
महा-निर्वाण-तन्त्रोक्त पूजन-यन्त्र
सामान्यार्घ्य-स्थापन-यन्त्र श्री आद्या-पूजन-यन्त्र
ह्रीं ह्रीं
पाँचवाँ उल्लास, १६० पाँचवाँ उल्लास, १७२-७३
कलश-स्थापन-यन्त्र विशेषार्घ्य (श्रीपात्र) स्थापन-यन्त्र
२ ३
ह्रीं
१ ४
पाँचवाँ उल्लास, १८२ छठा उल्लास, २१
(चार)
प्रकाशन हो चुका है।
प्राक्कथन
'महा-निर्वाण तन्त्र' का महत्त्व
(द्वितीय संस्करण में प्रकाशित)
'महा-निर्वाण तन्त्र' का महत्त्व इसी से समझा जा सकता है कि दरभङ्गा-नरेश स्व० महाराजाधिराज
श्री रमेश्वर सिंह, जो अपने समय के एक सिद्ध कौल साधक थे एवं सर जॉन वुडरफ (कलकत्ता उच्च
न्यायालय के न्यायाधीश) द्वारा तत्कालीन उच्च कोटि के तान्त्रिक विद्वानों के सहयोग से बीसवीं शताब्दी के
प्रारम्भ में कलकत्ते में संस्थापित 'आगम अनुसन्धान समिति' के तत्त्वावधान में सन् १९२९ में इस ग्रन्थ
को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया गया। यही नहीं, 'आर्थर एवेलॉन' के उपनाम से स्व० वुडरफ ने इस
तन्त्र का पूर्ण अंग्रेजी भावानुवाद भी 'ग्रेट लिबरेशन' नाम से उक्त संस्था द्वारा प्रकाशित कराया था। इस
सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि बङ्गाल में उन दिनों समाज-सुधार की अग्रणी संस्था 'ब्राह्म-समाज'
थी, जिसके प्रख्यात कर्णधार राजा राममोहन राय और उनके गुरु स्वामी हरिहरानन्द भारती ने 'ब्राह्म-
समाज' द्वारा प्रवर्तित ब्राह्म-धर्म के उपदेशों की रचना इसी तन्त्र के आधार पर की थी। स्वामी जी ने इस
तन्त्र के मूल श्लोकों की संस्कृत-टीका भी लिखी थी, जो समिति द्वारा प्रकाशित 'महा-निर्वाण तन्त्र' में
मूल के साथ छपवा दी गई थी और वह आज भी उपलब्ध है।
संवत् १९६० में प्रकाशित भाषा-टीका-सहित 'महा-निर्वाण तन्त्र' की भूमिका में पण्डित
बलदेवप्रसाद मिश्र (दीनदार पुरा, मुरादाबाद) द्वारा लिखित निम्न कथन ध्यान देने योग्य है-
"...तन्त्रसार में महा-निर्वाण तन्त्र का नाम नहीं लिखा है। इस कारण से कोई-कोई महात्मा इस
ग्रन्थ की प्रामाणिकता में संशय करते हैं। ऐसी शङ्का करनेवालों को उचित है कि पद्म-पुराण, अग्नि-पुराण
और शङ्कर-विजय को पढ़कर अपने सन्देह को दूर करें। कुलार्णव तन्त्र और इस महा-निर्वाण तन्त्र में
ब्रह्मोपासना की विधि व प्रकरण वर्तमान हैं। "...पं० जीवानन्द विद्यासागर की मूल मुद्रित पुस्तक के
अतिरिक्त हमको दो प्राचीन लिखित पुस्तकें भी मिलीं, जिनमें से एक ७५० वर्ष पूर्व की है।..."
इसके अतिरिक्त इस तन्त्र के अन्य संस्करण प्रकाशित हुए, जिनका विवरण आगे दिया गया है। इन
तथ्यों के साथ ही अनुक्रमणिका के अनुसार जो विषय इस तन्त्र में वर्णित हुए हैं, उनसे यह स्पष्ट रूप से
अनुभव होता है कि तान्त्रिक साधना के सम्बन्ध में यह एक श्रेष्ठ शिक्षा-प्रद ग्रन्थ है।
हस्त-लिखित पाण्डु-लिपियाँ
महा-महोपाध्याय स्व० गोपीनाथ कविराज ने सन् १९७२ में प्रकाशित अपने 'तान्त्रिक साहित्य'
ग्रन्थ, पृष्ठ ४९१-९२ में 'महा-निर्वाण तन्त्र' की छः हस्त-लिखित पाण्डु-लिपियों का उल्लेख किया है,
जिनके विवरण का सारांश निम्न प्रकार है-
१. एशियाटिक सोसायटी बङ्गाल सूची-पत्र, सं० ६०३९-प्रथम भाग के १९ पटल। इसका
प्रकाशन हो चुका है।
(पाँच)
प्रकाशित संस्करण
२. राजेन्द्रलाल मित्र की संस्कृत पुस्तकें, सं० २८९-आद्या-सदा-शिव के संवाद-रूप में। पूर्व-
काण्ड मात्र, जिसमें १४ उल्लास हैं। विषय हैं-भगवती आद्या महादेव से 'जीवों के निस्तार' का उपाय
पूछती हैं, भगवान् शिव उपाय बताते हैं-पर-ब्रह्म की उपासना, प्रकृति की साधना, देवी का दशाक्षर-
मन्त्र, कलश-स्थापना, तत्त्व-संस्कार, श्रीपात्र-स्थापना, होम, चक्रानुष्ठान, कुल-तन्त्र, वर्णाश्रम
के आचार, कुश-कण्डिका, दस संस्कार, वृद्धि-श्राद्ध, अन्त्येष्टि, पूर्णाभिषेक, अनिष्ट-कारी पापों
का प्रायश्चित्त आदि।
३. वङ्गीय साहित्य परिषद् सूची-पत्र, सं० १२९-अपूर्ण।
४. कलकत्ता संस्कृत कालेज पुस्तकालय, सूची-पत्र सं० ५५-आद्या-सदा-शिव के संवाद-
रूप में उत्तरार्द्ध मात्र, जिसमें १४ उल्लास हैं। विषय हैं-१. कलियुग में पतित जीवों का उद्धार कैसे हो,
२. परम-ब्रह्मोपासना, ३. उपासना-विधि, ४. प्रकृति-साधना, ५. मन्त्रों के उद्धार, संस्कार आदि,
६. पात्र-स्थापन, होम, चक्रानुष्ठान, ७. कुल-तत्त्व, ८. वर्णाश्रम के आचार, ९. कुश-कण्डिका,
दश संस्कार, १०. पूर्णाभिषेकादि, ११. अपने, पराए पापों का प्रायश्चित्त, १२. सनातन व्यवहार,
१३. वास्तु, गृह-याग, १४. शिव-लिङ्ग-स्थापनादि।
५. जम्मू काश्मीर महाराजा पुस्तकालय सूची-पत्र, सं० १०६६-सदा-शिव-प्रोक्त।
६. राजस्थान पुरातत्त्व ग्रन्थ-सूची, सं० ६२६२-मात्र पूर्व-काण्ड।
कविराज जी ने यह भी सूचित किया है कि 'प्राण-तोषिणी तन्त्र' और 'सर्वोल्लास तन्त्र' में
'महा-निर्वाण तन्त्र' के वचनों को उद्धृत किया गया है, किन्तु 'सर्वोल्लास' में उद्धृत वचन प्रकाशित
'महा-निर्वाण तन्त्र' में नहीं पाए जाते।
प्रकाशित संस्करण
'आगम अनुसन्धान समिति कलकत्ता' के द्वारा सन् १९१८ में प्रकाशित 'महा-निर्वाण तन्त्र'
की भूमिका में आर्थर एबेलॉन (सर जॉन वुडरफ) ने इस तन्त्र के प्रकाशित संस्करणों का जो विवरण
दिया है, उसके अनुसार आठ संस्करणों का परिचय निम्न प्रकार है-
१. 'महा-निर्वाण तन्त्र' का प्रथम खण्ड, जिसमें चौदह उल्लास हैं, पहले पहल 'आदि ब्राह्म
समाज' द्वारा सन् १८७६ में प्रकाशित हुआ। उसके सम्पादक थे श्री आनन्दचन्द्र वेदान्त-वागीश। इस
खण्ड की संस्कृत-टीका स्वामी हरिहरानन्द भारती द्वारा की गई थी, जिसकी पाण्डुलिपि उनके शिष्य राजा
राममोहन राय के हाथ की लिखी उपलब्ध थी। उसे भी मूल के साथ प्रकाशित किया गया।
२. इसके बाद इस तन्त्र का मूल मात्र सन् १८८६ में श्रीकृष्णगोपाल भक्त ने प्रकाशित किया।
इस संस्करण के सम्पादक थे श्री जगन्मोहन तर्कालङ्कार। इसमें भारती की उक्त टीका के साथ वङ्गानुवाद
और तर्कालङ्कार की व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ भी प्रकाशित हुईं।
३. इसी वर्ष अर्थात् सन् १८८६ में वाराणसी की दण्डी-सभा के श्री शाक्तानन्द सरस्वती द्वारा
(छ:)
उल्लास 'मिश्र'-संस्करण 'सरकार'-संस्करण एवेलॉन-संस्करण
इस तन्त्र के एक ऐसे संस्करण का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया, जिसमें किन्हीं शङ्कराचार्य द्वारा आध्यात्मिक
व्याख्या प्रस्तुत की गई थी। साथ ही वङ्गानुवाद भी दिया गया था। इसमें भारती और तर्कालङ्कार दोनों की
टीका की आलोचना भी की गई थी, किन्तु यह संस्करण अपूर्ण ही छपा था क्योंकि उसमें छठे उल्लास के
१५८ वें श्लोक तक का ही प्रकाशन हो पाया था।
४. जीवानन्द विद्यासागर ने भी मूल और संस्कृत टीका को प्रकाशित किया।
५. सन् १८९१ में 'वङ्गवासी' प्रेस कलकत्ता के श्री विहारीलाल सरकार ने इस तन्त्र को
वङ्गानुवाद सहित प्रकाशित किया।
६. सन् १९०६ में श्री श्यामाचरण कविरत्न ने वङ्गानुवाद के साथ मूल मात्र प्रकाशित किया।
७. श्री आर० एम० चट्टोपाध्याय ने मूल मात्र का प्रकाशन किया।
८. श्री वेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई द्वारा पण्डित बलदेवप्रसाद मिश्र कृत भाषा-टीका सहित इस तन्त्र
का प्रकाशन सन् १९०३ में किया गया।
नवाँ संस्करण आर्थर एवेलॉन द्वारा सम्पादित माना जा सकता है।
प्रस्तुत हिन्दी रूपान्तर
'महा-निर्वाण तन्त्र' का प्रस्तुत हिन्दी-रूपान्तर तैयार करने में हमने वङ्गवासी प्रेस कलकत्ता
से श्री विहारीलाल सरकार द्वारा सन् १८९१ में प्रकाशित संस्करण को आधार-रूप में लिया है। इस
संस्करण, पं० बलदेवप्रसाद मिश्र और आर्थर एवेलॉन द्वारा सम्पादित संस्करण में उल्लास तो समान ही
हैं अर्थात् प्रत्येक में १४ उल्लास हैं, किन्तु कुछ उल्लासों की श्लोक-संख्या में अन्तर दृष्टिगत होता है-
उल्लास 'मिश्र'-संस्करण 'सरकार'-संस्करण एवेलॉन-संस्करण
१ ७४ ७४ ७२
२ ५४ ५४ ५४
३ १५४ १५४ १५३
४ १०९ १०९ १०६
५ २१५ २१५ २१६
६ १९९ २०० २००
७ १११ १११ १११
८ २८९ २८९ २८९
९ २८३ २८३ २८४
१० २१२ २१२ २१२
११ १७० १७० १७०
१२ १२९ १२९ १२९
१३ ३१० ३१० ३१०
१४ २११ २११ २११
(सात)
उक्त तालिका के अनुसार वङ्गवासी-संस्करण के उल्लास १, ३ और ४ में क्रमशः २, १ और ३
श्लोक अधिक प्रतीत होते हैं, किन्तु दोनों के पाठों के मिलान करने पर ज्ञात होता है कि 'एवेलॉन' ने अर्थ
की पूर्णता को देखते हुए कहीं-कहीं तीन पंक्तियों का और कहीं एक पंक्ति का श्लोक मान लिया है; जैसे
प्रथम उल्लास के श्लोक २८, ३५, ५०, ५७, ६६ तीन-तीन पंक्तियों के हैं, जबकि श्लोक ७० एक पंक्ति का
है, जब कि वङ्गीय संस्करण में सभी श्लोक दो-दो पंक्तियों के हैं। फलतः इस संस्करण की श्लोक-संख्या
तो ७४ है, जब कि एवेलॉन-संस्करण में वह घट कर ७२ रह गई है। यही बात अन्यत्र भी है। अतः तीनों
संस्करणों की श्लोक-संख्या वस्तुतः समान ही है।
प्रस्तुत 'हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र' में अनुवाद के साथ दी गई श्लोक-संख्या अप्राप्य 'सरकार'-
संस्करण के अनुरूप है, किन्तु थोड़ा ही ध्यान देने से सम्बन्धित मूल श्लोक 'एवेलॉन'-संस्करण में
जिज्ञासु पाठक देख सकते हैं। अनुवाद करने में यह सावधानी रखी गई है कि मन्त्र, ध्यान, स्तोत्रादि का
मूल संस्कृत पाठ भी उद्धृत रहे, जिससे केवल इसी संस्करण की सहायता से साधक बन्धु अपनी उपासना
में इस उपयोगी तन्त्र की बातों का उपयोग कर सकें। साथ ही पहले-पहल इस तन्त्र में उल्लिखित मुख्य
पूजा-यन्त्रों के रेखा-चित्र भी इस संस्करण में प्रकाशित किए गए हैं। यही नहीं, अप्राप्य 'सर्वोल्लास तन्त्र'
में इस तन्त्र के जो दुर्लभ वचन दिए गए हैं, उन्हें भी परिशिष्ट में उद्धृत कर दिया गया है। आशा है कि इन
विशेषताओं से युक्त यह संस्करण पाठकों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होगा। इसी में हमारे परिश्रम की
सार्थकता है।
-'कुल-भूषण'
प्रयाग
चैत्र पूर्णिमा, २०३९
नवनाभ-मण्डल (पृष्ठ ८८) पञ्चाब्ज-मण्डल (पृष्ठ ८८)
(आठ)
श्रीगणेशाय नमः
हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
पहला उल्लास : जीव-निस्तारोपाय-सम्बन्धी प्रश्न
विविध प्रकार के रत्नों से शोभायमान, विभिन्न वृक्षों-लताओं से व्याप्त, नाना प्रकार के पक्षियों की ध्वनि
से युक्त, सभी ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाले फूलों की गन्ध से सुगन्धित, अति मनोरम, ठण्डी-सुगन्धित-हलकी हवा
से कम्पायमान, अप्सराओं के सङ्गीत से उत्पन्न मधुर ध्वनि से गुंजित, स्थिर छायावाले वृक्षों की छाया से ढँके
हुए, सुन्दर मस्त कोयलों के झुण्ड द्वारा समुचित शब्दायमान वन-प्रदेश-वाले, सभी समय भौरों आदि के सहित
ऋतुराज वसन्त द्वारा सेवित, सिद्ध-चारण-गन्धर्व-गाणपत्य सभी से परिपूर्ण—इस प्रकार के रमणीय गिरीन्द्र
अर्थात् कैलास-पर्वत के शिखर पर चराचर जगत् के गुरु, मौन रहनेवाले, दयामृत के सागर, कपूर और कुन्द-
पुष्प के समान गौर वर्ण, विशुद्ध सत्व-गुण-मय, व्यापक पुरुष, दिक्-रूप वस्त्र धारण करनेवाले, सभी दीनों के
नाथ, स्वयं श्रेष्ठ योगी, योगियों के प्रिय, गङ्गा-जल से भीगे हुए जटा-समूह से शोभित, भस्म से अलंकृत, शान्त
अर्थात् संयमित अन्तःकरण वाले, सर्प-माला पहने हुए, नर-कपाल लिए हुए, तीनों लोकों के ईश्वर, त्रिशूल-धारी,
आशु-तोष अर्थात् शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, ज्ञान-मय, निर्वाण-मोक्ष-रूपी फल देनेवाले, निर्विकल्प, आशङ्का-
रहित, निर्विशेष, निरञ्जन, निरामय, सबके कल्याणकारी, देवों के देव, प्रसन्न-मुख, सदानन्द सदाशिव के दर्शन
कर विनय से झुकी हुई पार्वती देवी ने लोक-हित के लिए उनसे कहा— (१-१०)
हे देव-देव ! जगन्नाथ, मेरे नाथ, करुणा-निधे ! मैं तुम्हारे अधीन हूँ। हे देवेश ! मैं सदा तुम्हारी आज्ञा
माननेवाली हूँ। तुम्हारे आदेश को छोड़कर कुछ कहने में समर्थ नहीं हूँ। यदि मेरे ऊपर थोड़ी भी कृपा हो और
यदि मुझ पर स्नेह हो, तो मेरे मन में जो कुछ विचार हैं, उन्हें कहती हूँ। हे महेश्वर ! तीनों लोकों में तुम्हारे
सिवा और कौन है, जो इस संशय को दूर करने के योग्य है ? तुम्हीं सर्वज्ञ हो और सब शास्त्रों के जाननेवाले
हो। (११-१३)
सदाशिव ने कहा—हे महा-प्राज्ञे, हे प्राण-वल्लभे ! तुम क्या कहना चाहती हो, उसे कहो। अति गोपनीय
होने पर भी, प्रिय पुत्र गणेश और सेना-पति कार्तिकेय से भी जो कहने योग्य नहीं होगा, उसे भी तुम्हें बताऊँगा।
तीनों लोक में तुम्हारे लिए क्या गोपनीय है ? हे देवि ! तुम मेरा ही रूप हो, तुममें और मुझमें कोई भेद नहीं
है। तुम सर्वज्ञा हो। क्या नहीं जानती हो, जो अनजान के समान पूछती हो ?
महादेव के इस प्रकार के वाक्य सुनकर प्रसन्न-मन होकर साध्वी पार्वती ने विनय से झुककर शङ्कर से
जिज्ञासा की। (१४-१७)
आद्या ने कहा—हे भगवन्, सर्व-भूतेश ! हे सर्व-धर्म-विदां वर ! तुम षडैश्वर्यशाली, कृपालु और
[ १ ]
फा०—१
२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
सबके अन्तर्यामी हो । तुम्हारे द्वारा पूर्व-काल में चारों वेद प्रकाशित हुए हैं (१८) । इन वेदों से सभी
धर्मों को वृद्धि हुई और वर्णाश्रमादि के नियम प्रतिष्ठित हुए (१६) । उन्हीं वेदों में कथित योग, यज्ञादि-
रूप समस्त कर्मों द्वारा पृथ्वो पर पुण्य-शील सभी मनुष्यों ने 'कृत' अर्थात् 'सत्य-युग' में सभी देवताओं और
पितरों को प्रसन्न किया (२०) । उस सत्य-युग में मनुष्य लोग पुण्य-शील होते थे और स्वाध्याय, ध्यान, तपस्या,
दया, दानादि द्वारा जितेन्द्रिय होते थे। वे बड़े बली, वीर्य्य-वान् और अत्यन्त सत्य-पराक्रमी थे (२१) । वे मनुष्य
मरण-धर्म-शील होने पर भी स्वर्गादि जाने में समर्थ, देव-तुल्य और नियम पालन करने में दृढ़ थे। सभी सज्जन,
सत्य-धर्म के माननेवाले और सत्यवादी थे (२२) । उस युग में राज-वर्ग सत्य-निष्ठ और प्रजा-पालन में तत्पर
था । पर-स्त्री को वे मातृ-वत् और पर-पुत्र को अपने पुत्र के समान स्नेह करते थे (२३) । तत्कालीन मनुष्य लोग
पराए धन को लोष्ठ के समान देखते थे। वे स्वधर्म का पालन करते थे और सन्मार्ग पर चलते थे (२४) । उस
सत्ययुग में कोई भी व्यक्ति भूठा नहीं था। किसी भी समय कोई प्रमाद, चोरी, पर-द्रोह नहीं करता था। कोई
बुरे आशयवाला नहीं था (२५) । कोई भी व्यक्ति ईर्ष्यालु, अति-क्रोधी, कामुक नहीं था। सभी अच्छे अन्तः-
करण, सदा आनन्दित हृदयवाले थे (२६) । उस काल में सारी पृथ्वी सभी फसलों से भरी-पूरी, सारे बादल
यथा-समय वर्षा करनेवाले, सभी गाएँ खूब दूध देनेवाली, सारे वृक्ष बहुत फल देनेवाले होते थे (२७) । उस
युग में कोई जीव अकाल मृत्यु के मुख में नहीं जाता था। दुर्भिक्ष या रोग होते नहीं थे। सारी प्रजा हृष्ट-पुष्ट,
सदैव स्वस्थ, तेजस्वी और गुणों से सम्पन्न रहती थी। स्त्रियाँ व्यभिचारिणी नहीं थीं और पतिव्रता होती थीं
(२८) । उस सत्ययुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र लोग अपने-अपने आचार को मानते हुए अपने-अपने
वर्ण के लिए निर्दिष्ट धर्म का पालन करते हुए मोक्ष-पद को प्राप्त करते थे (२६) । सत्ययुग के बीतने पर, इस सभी
धर्म में व्यतिक्रम दिखाई देने लगा। उस समय मनुष्य लोग समस्त वेदोक्त कर्मों द्वारा अपने-अपने अभीष्ट को
पाने में समर्थ नहीं थे (३०) । अत्यधिक साधनवाले वैदिक कर्म उस समय बड़े कष्ट-साध्य हो गए थे। बहुत
सी चिन्ताओं से व्याकुल होकर लोग उनका पालन करने में समर्थ नहीं थे (३१) । तथापि वैदिक कर्म का त्याग
करने से विविध दोष होने की बात सुनने से वे लोग उस कर्म को छोड़ने में भी समर्थ नहीं थे। फलतः अपनी
इस असमर्थता से वे सदैव व्याकुल-चित्त रहते थे (३२) ।
उसी समय आपने भू-तल पर 'स्मृति'-रूप वेदार्थ-युक्त शास्त्रों का प्रकाश किया। दुःख-शोक-रोग-दायक
पाप के होने पर तपस्या-स्वाध्याय करने में दुर्बल सभी लोग उसके द्वारा अपना उद्धार करने लगे (३३) । इस
भयानक संसार-सागर में आपके सिवा सभी जीवों का पालन-रक्षा-उद्धार करनेवाला-पिता के समान प्रिय
करनेवाला प्रभु और कौन है ? (३४) ।
इसके बाद द्वापर-युग के आने पर मनुष्य के स्मृत्युक्त सुकर्म का त्याग हुआ; धर्माङ्गों का लोप हो गया;
मनुष्य मानसिक व्यथा और व्याधि से व्याकुल हो उठा। उस समय तुम्हारे द्वारा व्यासादि रूप में 'संहिता'-
शास्त्रादि के उपदेश से उन सब मनुष्यों का उद्धार हुआ (३५-३६) ।
उसके बाद पाप-रूपी, सभी धर्मों को लुप्त करनेवाला, दुराचार-दुष्कर्म को फैलानेवाला, दुष्ट कर्मों
का प्रवर्त्तक कलियुग आया (३७) । इस समय वेद शक्तिमान न रहा, सभी स्मृतियों का किसे स्मरण था ?
विविध इतिहास-युक्त, नाना मार्ग दिखानेवाले सभी पुराण नष्ट हो गए (३८) । हे विभो ! पुराणादि शास्त्रों
का विनाश होने पर उस समय सभी लोग धर्म-कर्म से विमुख होंगे (३६) और परम्परा-रहित होकर मदोन्मत्त,
पाप कर्म में तत्पर, कामुक, अति लोभी, निर्दय, दम्भख, शठ (४०), अल्पायु, मन्द-बुद्धि, रोग-शोक से अति
व्याकुल, श्री-रहित, बल-हीन, नीचाचार-परायण (४१), सदा नीच-सङ्ग करनेवाले, पराए धन को हरण
पहला उल्लास : जीव-निस्तारोपाय-सम्बन्धी प्रश्न | ३
करनेवाले, पर-निन्दा में तत्पर, पर-द्रोही, पर-योनि-परायण होंगे (४२) । पर-स्त्री का हरण करने में पाप की
शङ्का और भय से शून्य होंगे। इस प्रकार सभी निर्धन, मलिन, दीन, दरिद्र, चिर-रोगी होंगे (४३) । सभी
सन्ध्या-वन्दनादि से रहित होकर शूद्र के समान आचारवाले होंगे और अयाज्य अपकृष्ट जाति के पुरोहित,
लोभी, दुर्वृत्त, पापी, (४४) मिथ्या-वादी, मूर्ख, दम्भी, दुष्ट कथा का विस्तार करनेवाले, कन्या बेचनेवाले,
संस्कार-हीन और तपस्या-व्रत से पराङ्मुख होंगे (४५) । वे लोगों को ठगने के लिए जप-पूजा-परायण, पाखण्ड
व्यवहार करनेवाले, अपने को पण्डित कहकर घमण्ड करनेवाले और श्रद्धा-भक्ति से रहित होंगे (४६) ।
कलि के ब्राह्मण सभी निन्द्य आहार करनेवाले, निन्द्य व्यवहार में तत्पर और 'धूतक' अर्थात् अपना पेट भरने
के लिए जीवित रहनेवाले, शूद्र-सेवक, शूद्र का अन्न खानेवाले, क्रूर और शूद्र-पत्नी से रति-सम्भोग को इच्छा
रखनेवाले होंगे (४७) । ये लोग धन के लोभ से अपनी स्त्री को नीच जाति में दान देंगे, इन लोगों का ब्राह्मण-
सम्बन्धी चिह्न केवल सूत्र-धारण मात्र रहेगा (४८) । इन ब्राह्मणों का पानादि नियम और भक्ष्याभक्ष्य का
विचार न रहेगा । ये सदा धर्म-शास्त्र को निन्दा और सभी साधुओं से द्रोह करेंगे (४६) । उनके मन में कभी
सत्कथा की बात तक न उठेगी।
जीव के उद्धार के लिए तुम्हारे द्वारा समस्त 'तन्त्र' की रचना हुई है और भोग-मोक्ष-दायक निगम-
आगम शास्त्र-समूह की भी रचना हुई है (५०) । इस तन्त्रादि शास्त्र में देव-देवी-गण के मन्त्र-यन्त्रादि का
साधन (५१), सृष्टि-स्थिति-संहार रूपी बहुत से न्यास और बद्ध-पद्मासन आदि बहुत प्रकार के आसन बताए
गए हैं तथा सभी देवताओं के मन्त्रों को सिद्धि देनेवाले पशु-भाव, वीर-भाव और दिव्य-भाव भी कहे गए हैं
(५२) । इसमें शवासन, चितारोहण, मुण्ड-साधन, लता-साधनादि सभी असंख्य कर्म तुम्हारे द्वारा बताए गए
हैं (५३) ।
परन्तु इस तन्त्र-शास्त्र में स्वयं तुम्हारे द्वारा पशु-भाव और दिव्य-भाव का निषेध किया गया है
(५४) । कलि में पशु-भाव ही नहीं है, फिर दिव्य-भाव किस प्रकार हो सकता है ? कारण पशु-भावावलम्बियों
का कर्तव्य है कि वे पत्र-पुष्प-फल-जल को स्वयं ही लावें, शूद्र को देखें नहीं और मन में भी स्त्री का स्मरण न
करें (५५) । दिव्यभावापन्न व्यक्ति को देव-तुल्य होना है; सदा शुद्ध अन्तः-करणवाला, द्वन्द्व-सहनशील,
वासना-रहित, सब प्राणियों में सम भाव रखनेवाला और क्षमावान् होना है (५६) । किन्तु इस क्षण में लोग
कलि के पाप से युक्त, सदा अस्थिर-चित्त, निद्रा और आलस्यवाले होंगे । इन लोगों की भाव-शुद्धि किस प्रकार
होगी ? (५७) । हे शङ्कर ! आपने 'पञ्च-तत्त्व' बताए हैं, उनसे 'वीर-साधन' कहा गया है (५८) । मद्य, मांस,
मत्स्य, मुद्रा, मैथुन—ये ही 'पञ्च-तत्त्व' आपने कहे हैं (५६) । कलि-काल में उत्पन्न सभी मनुष्य लोभी और
शिश्नोदर-परायण होते हैं; वे लोग लोभ-वश उन 'पञ्च-तत्त्वों' से पतित होंगे, साधन नहीं करेंगे (६०) । वे
लोग इन्द्रिय-सुख के लिए अधिकतर मधु-पान करके मदोन्मत्त और हिताहित के ज्ञान से शून्य हो जायेंगे
(६१) । उनमें से कोई-कोई व्यक्ति पर-स्त्री-धर्षक अर्थात् परायी स्त्रियों का पतन करनेवाले होंगे; बहुत से लोग
चोरी का सहारा लेंगे; वे सब महा-पापी लोग योनि का विचार न करेंगे (६२) । असीमित पानादि दोष से
पृथ्वी पर मद-विह्वल बहुत से लोग शक्ति-हीन, रुग्ण, बुद्धि-हीन और विकलेन्द्रिय होकर जलाशय, गर्त, जङ्गल,
महल से, पर्वत से गिरेंगे और मृत्यु को प्राप्त करेंगे (६३-६४) । इन सब मत्त लोगों में से कुछ तो गुरु-जनों
और स्व-जनों से विवाद करेंगे; कुछ स्तब्ध (चुप) रहेंगे; अथवा कुछ अति पान से मृत-प्राय या कुछ बकवादी
होंगे । ये सब अनुचित कार्य, क्रूर कर्म करनेवाले और धर्म-पथ को विलुप्त करनेवाले होंगे (६५-६६) । हे
प्रभो, महा-देव ! हित-साधन के लिए जो सारे कर्म आपने बताए हैं, वे सब मनुष्य लोगों के लिए उल्टे हो
४ | हिन्दी महा-निर्वाण मन्त्र
जायँगे । कौन व्यक्ति योग का आश्रय लेगा ? या कौन व्यक्ति न्यासों का करने में समर्थ होगा ? (६७)। अथवा
कौन स्तोत्र का पाठ करेगा ? या कौन व्यक्ति यन्त्राधार में पूजा करेगा या यन्त्र धारण करेगा ? अथवा कौन
व्यक्ति पुरश्चरण करेगा ? (६८) । हे जगत्पते ! युग-धर्म के प्रभाव से मनुष्य लोग स्वभावतः बड़े दुराचारी ओर
सदा पाप करनेवाले होंगे ।
हे दीनेश प्रभो ! कृपा करके कलि में उत्पन्न मनुष्य लोगों के निस्तार का उपाय बताइये (६६), जिससे
उनकी आयु, आरोग्य, तेज, बल, वीर्य की वृद्धि हो; उन्हें विद्या, बुद्धि प्राप्त हो; प्रयत्न बिना परम मङ्गल का
लाभ हो (७०), जिससे सभी लोग महा-बली, पराक्रमी हों, शुद्ध-हृदय होकर परोपकार में तत्पर हों; माता-
पिता का प्रिय करनेवाले हों (७१); जिससे सभी पुरुष स्वपत्नी-निष्ठ और पर-स्त्री-विमुख होकर देवता-गुरु-
भक्त तथा पुत्र, स्वजनादि के पोषक हों (७२)। जिस उपाय से ये सब लोग ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म-विद्या के ज्ञाता और
ब्रह्म की चिन्ता में तत्पर हों; मनुष्यों के लोक-यात्रा के निर्वाह हेतु और पारलौकिक हित के लिए आप कृपा
करके वही (उपाय) वर्णन करें (७३)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि वर्ण एवं आश्रम-भेद से जो कर्त्तव्य और
अकर्त्तव्य हैं, उन्हें कृपा करके प्रकट करें। त्रिभुवन में आपको छोड़कर समस्त लोगों का उद्धार करनेवाला
कौन है ?
❇ ❖ ❇
दूसरा उल्लास : जीव-निस्तारोपाय का कथन
महा-करुणा-समुद्र, सभी लोगों के कल्याणकारी, शङ्कर ने आद्या देवी के इस प्रकार के वचन सुनकर
प्रकृत कथा का प्रारम्भ किया (१) । सदाशिव ने कहा—हे महा-भागे ! तुम जगत् की हित-कारिणी हो, तुमने
उत्तम प्रश्न किया है। इस प्रकार की मङ्गल-कथा को पहले किसी ने जानना नहीं चाहा (२) । हे भद्रे ! तुम
धन्य हो, सुकृतज्ञा अर्थात् जीव की सुकृति को जाननेवाली हो । कलि-काल में उत्पन्न सभी (प्राणियों) की तुम्ही
वास्तविक हित-कारिणी हो; तुमने जो-जो कहा है, वह सब अति ही सत्य है, इसमें सन्देह नहीं (३)। हे
परमेश्वरि ! तुम धर्म को जाननेवाली हो, त्रिकाल की ज्ञाता हो, अतः सर्वज्ञा हो। हे प्रिये, भूत-भविष्यत्-वर्तमान
धर्म-युक्त जो कहा है, वह यथार्थ, यथा-योग्य और न्यायसम्मत है, इसमें सन्देह नहीं (४)। हे सुरेश्वरि ! कलियुग
में पाप से दुर्गति को प्राप्त, पवित्रापवित्र के विचार से शून्य ब्राह्मणादि लोगों की शुद्धि श्रौत अर्थात् वेदोक्त कर्म
से नहीं होगी; पुराण, संहिता और सभी स्मृतियों से भी मनुष्यों को इष्ट-सिद्धि न होगी (५-६)। हे प्रिये ! मै
सत्य-सत्य पुनः सत्य कहता हूँ, कलि-काल में आगमोक्त पथ के सिवा अन्य गति नहीं है (७) । हे शिवे ! पूर्व काल
में श्रुति, स्मृति, पुराणादि मैने ही कहे हैं, कलि-काल में घोर व्यक्ति आगमोक्त विधि से ही देवगण की पूजा करे
(८)। हे शङ्करि ! कलि-युग में आगम-शास्त्र का लङ्घन कर जो व्यक्ति अन्य पथ से चलेगा, उसका उद्धार
नहीं होगा, यह मैं सत्य कहता हूँ, इसमें सन्देह नहीं (६)। वेद, पुराण, स्मृति और संहितादि शास्त्र द्वारा मैं ही
प्रतिपाद्य हूँ, अन्य किसी का प्रतिपादन नहीं है। इस प्रकार जगत् में मेरे सिवा सर्वेश्वर प्रभु कोई नहीं है (१०)।
वेदादि सभी शास्त्र मेरे पद को 'लोक-पावन' मानते हैं, मेरे पथ से विमुख सभी लोग ब्रह्म-घाती और पाखण्डी
दूसरा उल्लास : जीव-निस्तारोपाय का कथन | ५
हैं (११)। इसीलिए मेरे मत को छोड़कर जो व्यक्ति जो कर्म करता है, हे देवि ! वह कर्म निष्फल होता है और
उस कर्म का करनेवाला नरक में जाता है (१२) । जो मूर्ख मेरे मत का त्याग कर अन्य मत को ग्रहण करता है
वह ब्रह्म-हत्यारे, पितृ-हत्यारे, स्त्री-घातक के समान पापी होता है, इसमें सन्देह नहीं (१३) । कलि में तन्त्रोक्त
सभी मन्त्र सिद्ध और शीघ्र फल-दायक हैं, जप-यज्ञ-क्रियादि में और सभी कर्मों में वे प्रशस्त हैं (१४)। कलि-काल
में वेदोक्त सभी मन्त्र विष-हीन सर्प के समान शक्ति-रहित होते हैं। सत्यादि युग में वे सब मन्त्र फल देने में समर्थ
थे, किन्तु कलि-काल में वे मृत के समान निष्फल हैं (१५) । जिस प्रकार दीवार में बनी हुई पुतली आँख, कान,
नाक आदि सभी इन्द्रियों से युक्त होने पर भी कार्य करने में अर्थात् देखने, सुनने, जाने आदि में अशक्त है, उसी
प्रकार तन्त्र में कथित मन्त्रों के सिवा अन्य मन्त्र उन-उन कार्यों के करने में असफल रहते हैं (१६)। तन्त्र में
कथित मन्त्रों से भिन्न अन्य मन्त्र द्वारा कर्म करने पर फल नहीं मिलता, जिस प्रकार वन्ध्या स्त्री के सम्पर्क से
सन्तान-रूप फल सिद्ध नहीं होता, यह भी उसी प्रकार निष्फल होता है, केवल श्रम भर होता है (१७)। जो
मनुष्य इस कलि-युग में अन्य शास्त्र में कथित पथ से सिद्धि पाने की इच्छा करता है, वह दुर्बुद्धि मानों प्यासा
होकर गङ्गा किनारे कुआँ खोदता है। मेरे मुख से कथित धर्म का त्याग कर जो मूर्ख अन्य धर्म को चाहता है, वह
मानों अपने घर के अमृत को छोड़कर मदार के वृक्ष से उत्पन्न दूध की कामना करता है (१८)। तन्त्रोक्त पथ जिस
प्रकार सुख मोक्ष का हेतु, मुक्ति का कारण और इस लोक एवं पर-लोक में सुख-प्राप्ति का निमित्त है, उस प्रकार
अन्य कोई पथ नहीं है (१६-२०)। हे प्रिये ! विविध आख्यानों से युक्त बहु प्रकार का 'तन्त्र' मेरे द्वारा कहा गया
है; सभी सिद्ध एवं सभी साधन-विधान का विस्तार से वर्णन किया गया है। पशुओं की अधिकता होने से अधि-
कारी-भेद से कुलाचारोक्त धर्म को कहीं-कहीं गुप्त रखने के लिए भी कहा है; जीवों को प्रवृत्ति करनेवाले कोई-
कोई तन्त्र-कर्म भी कहे हैं; विविध प्रकार के देव और बहुत प्रकार के देवों के विषय बताए हैं। भैरव गण,
वेताल-गण, बटुक-गण, समस्त नायिकाएँ और शाक्त, शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य-सब ही कहे गए हैं। नाना
प्रकार के मन्त्र, यन्त्र और अनेक प्रकार के सिद्धोपाय भी बताए हैं।
हे प्रिये ! जिस-जिस समय जिन-जिन व्यक्तियों ने जो-जो प्रश्न किए हैं, मैंने उस-उस समय उन लोगों के
हितार्थ तदनुरूप कहा है (२१-२६) । हे पार्वति ! सब लोगों के हितार्थ, सब प्राणियों के कल्याण के लिए, युग-
धर्मानुसार यथोचित रूप से, तुमने जिस प्रकार का प्रश्न किया है, इस प्रकार का प्रश्न पहले किसी व्यक्ति ने नहीं
किया है। तुम्हारे स्नेहवश मैं इस सार-पूर्ण परात्पर विषय को कहता हूँ (२७-२८) । हे देवेशि ! वेद, आगम-
विशेष कर सभी तन्त्रों का सार निकाल कर तुम्हें बताता हूँ (२६) । जिस प्रकार मनुष्यों में तन्त्र-ज्ञानी श्रेष्ठ है,
देवताओं में मैं श्रेष्ठ हूँ, उसी प्रकार आगम-शास्त्रों में यह 'महा-निर्वाण तन्त्र' ही श्रेष्ठ है (३०)। हे शिवे ! सभी
वेदों या सभी पुराणों या बहुत से शास्त्रों द्वारा क्या फल मिलता है ? एकमात्र इसी महा-तन्त्र के विशेष रूप
से ज्ञात होने पर जीव सभी सिद्धियों का स्वामी होता है (३१) । जिस प्रकार जगत् के मङ्गल के लिए तुम्हारे
द्वारा मैं नियुक्त हुआ हूँ, अतः जैसे यह विश्व का हितकारी हो, वह मैं कहता हूँ (३२) । हे देवि, हे परमेश्वरि !
विश्व का हित करने से विश्व का ईश्वर प्रसन्न होता है, क्योंकि वही विश्व का आत्मा है, विश्व उसी का आश्रय
लेकर स्थित है। वह एक, अद्वितीय, सत्य, सद्-रूप, परात्पर, स्व-प्रकाश, सदा पूर्ण और सच्चिदानन्द-स्वरूप है।
वह निर्विकार, निराधार, निर्विशेष, निराकुल अर्थात् आकुलता से शून्य है; वह गुणातीत, सब प्रकार के शुभा-
शुभ कर्मों का साक्षात् द्रष्टा, सभी की आत्मा, सबको देखनेवाला, विभु है (३३-३५) । वह सर्व-व्यापी, सब भूतों
में गूढ़ भाव से अवस्थित है अर्थात् आदि-अन्त से शून्य वह स्वयं तो सब इन्द्रियों से रहित है किन्तु सभी इन्द्रियों
और इन्द्रियों के विषय उसी से दीप्ति पाते हैं (३६) । वह लोकातीत, त्रिभुवन का हेतु या बीज-स्वरूप और
६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
वाक्य, मन से अगोचर है; वह सर्वज्ञ, विश्वं को सम्पूर्णतः जाननेवाला है, उसे कोई व्यक्ति नहीं जानता (३७) ।
यह सारा जगत् उसके अधीन है। स्थावर, जङ्गम सहित यह त्रैलोक्य उसो के सहारे है। यह वितर्क-विषय से
रहित जगत् परमात्मा के सत्यत्व का आश्रय लेकर, इस पृथ्वी, इस जल, इस वायु इत्यादि रूपों में अलग-अलग
सत्य के समान प्रकाशित होता है। हे महेश्वरि ! वह 'ब्रह्म' हेतु-भूत होकर भी मुझसे ही उत्पन्न हुआ है (३८-
३६) । वही परमेश्वर सब प्राणियों का एकमात्र कारण है; ब्रह्मा (उसी परमेश्वर द्वारा नियुक्त होकर) सारे लोक
में सृष्टि करने के कारण 'स्रष्टा' नाम से कहा जाता है (४०) । उनकी इच्छा से प्रयुक्त विष्णु इस जगत् का
पालन करने से 'पालयिता' कहे जाते हैं। उनकी इच्छा से संहार करने में नियुक्त मैं जगत् में 'संहर्ता' नाम से कहा
जाता हूँ। इन्द्रादि लोक-पाल लोग और सभी उसकी वश्यता में हैं, अपने-अपने अधिकार में नियुक्त होकर, उसी
की आज्ञानुसार जगत् का शासन करते हैं। तुम उसकी 'परा-प्रकृति' हो, इसीलिए त्रिभुवन में पूज्या हो (४१-
४२)। वही परमात्मा अन्तर्यामी-रूप में उन सबको उन-उन विषयों में नियुक्त कर उनसे अपने-अपने कर्म करवाता
है। जीव-गण किसी काल में स्वतन्त्र नहीं हैं (४३) । हे देवि ! जिसके भय से वायु चलता है; जिसके भय से
डरकर सूर्य गर्मी देता है; सारे मेघ यथा-समय वर्षा करते हैं; जिसके शासन में जङ्गल में सभी वृक्ष विशेष पुष्पों
से सम्पन्न होते हैं (४४) ; जो प्रलय-काल में साक्षात् काल का नाश करते हैं; जो साक्षात् मृत्यु के मृत्यु-स्वरूप
हैं, वे ही वेदान्त द्वारा जानने योग्य भगवान् हैं। वे 'यत्-तत्' (यह-वह) शब्दों से जाने जाते हैं (४५)। हे सुर-
वन्दिते ! सभी देव और देवी-गण इसी में तन्मय हैं अर्थात् परमात्मा-स्वरूप हैं; 'आब्रह्म-स्तम्ब पर्यन्त' - अर्थात्
ब्रह्मा से लेकर तृणादि गुच्छ तक साा जगत् 'तन्मय' है अर्थात् पर-ब्रह्म-स्वरूप है (४६) । इस परमात्मा के
परितुष्ट होने पर जगत् परितुष्ट होता है; उसे प्रसन्न करने पर सारा जगत् प्रसन्न हो जाता है; उसकी आराधना
करने से सभी की प्रीति उत्पन्न हो जाती है (४७) । हे देवि ! जिस प्रकार वृक्ष को जड़ को सींचने से उसको
डालियाँ, पत्ते सभी तृप्त होते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर की आराधना करने से अमरादि (देवादि) सभी सन्तुष्ट
होते हैं (४८) ।
हे सुव्रते, प्रिये ! जिस प्रकार तुम्हारी अर्चना, ध्यान, पूजा और जप करने से सभी देवियाँ प्रसन्न
होती हैं, उसी प्रकार परमात्मा के अर्चनादि से सभी देवता प्रसन्न होते हैं, यह जान लो (४६) । जिस प्रकार
नदियाँ लाचार होकर नदी-पति समुद्र में जाती हैं, उसी प्रकार सभी देवों के पूजादि कर्म, हे देवि ! उसी पर-
मात्मा के ही लिए सम्पन्न होते हैं (५०)। जो-जो व्यक्ति जिस-जिस फल के पाने के लिए जिस-जिस देवता की
पूजा श्रद्धा के साथ करता है, हे शिवे, वही अध्यक्ष पुरुष उन-उन देवताओं के द्वारा वही-वही फल उस-उस
व्यक्ति को प्रदान करता है (५१)। हे प्रिये ! इस विषय में बहुत और क्या कहूँ, तुम्हारे आगे इतना भर कहता हूँ
कि उस परमात्मा को छोड़कर मुक्ति के लिए ध्येय, पूज्य और सुखाराध्य अन्य कोई नहीं है (५२) । उस पर-
ब्रह्म की उपासना में श्रम नहीं है, उपवास नहीं है, शरीर-सम्बन्धी कोई कष्ट नहीं है, आचारादि नियम नहीं हैं,
बहुत से उपचारों आदि की आवश्यकता नहीं है; दिशा एवं काल आदि का विचार नहीं है; मुद्रा या न्यास की
आवश्यकता नहीं है। हे कुलेशानि ! जिसके साधन में पूर्वोक्त श्रम आदि नहीं है, उससे भिन्न अन्य किसी का
आश्रय कोई क्यों लेगा (५३-५४) ?
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि
देवी ने कहा—हे देव-देव ! आप देवताओं के गुरु के गुरु हैं; हे महा-देव ! आप सभी शास्त्रों, सभी मन्त्रों
और सभी साधनों के वक्ता हैं (१)। हे भगवन् ! परात्पर परमेश्वर परब्रह्म, जिनका आपने कथन किया है और
जिनको उपासना से मरण-शील मनुष्य भोग तथा मोक्ष पाएँगे, वे परमात्मा किस उपाय द्वारा प्रसन्न होंगे ?
अथवा उनकी साधना क्या है ? या उनका मन्त्र किस रूप का है ? ध्यान और विधान किस प्रकार है ? मैं इसका
प्रकृत तत्त्व सुनना चाहती हूँ । आप कृपा कर बतलायें (२-४) ।
सदाशिव ने कहा—हे मेरी प्राण-वल्लभे ! यह परम तत्त्व अति गुह्य है। हे कल्याणि ! मैंने किसी भी
स्थान पर इस रहस्य को प्रकाशित नहीं किया है। तुम्हारे स्नेह-वश मैं बताता हूँ। यह तत्त्व मुझे प्राणों से भी
अधिक प्रियतम है (५) । हे परमेश्वरि ! सत्, चित्, जगत्-स्वरूप वही परब्रह्म स्वरूप-लक्षण और तटस्थ-लक्षण
द्वारा यथावत् ज्ञेय होता है (६) । जो सत्ता-मात्र है अर्थात् केवल परमार्थ-स्वरूप है; जो निर्विशेष है अर्थात् स्वगत
भेद-शून्य है और जो वाक्य-मन के अगोचर है (७); जिसके सत्त्व से मिथ्याभूत त्रिलोकी का सत्यत्व प्रतीत होता
है—यहाँ परब्रह्म का स्वरूप-लक्षण है। जो शत्रु-मित्र आदि में सर्वत्र सम-दर्शी है, जो शीतोष्ण सुख-दुःखादि
द्वन्द्वों से अतीत है, जो नाना-प्रकार की भेद-कल्पनाओं से शून्य है, शरीर-निष्ठ आत्मत्व-बुद्धि-रहित इस प्रकार
के सभी योगियों के समाधि-योग द्वारा उस ब्रह्म का स्वरूप जाना जाता है (८) । जिससे यह विश्व उत्पन्न होता
है, उत्पन्न हुआ विश्व जिसमें स्थित रहता है और प्रलय-काल में यह चराचर जगत् जिसमें लय हो जाता है,
वही ब्रह्म है। इसी तटस्थ-लक्षण द्वारा वह जाना जाता है। हे शिवे ! स्वरूप-लक्षण द्वारा जो ब्रह्म जाना जाता
है, वही तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य या ज्ञेय होता है। स्वरूप-लक्षण द्वारा जानने में साधन की अपेक्षा नहीं है किन्तु
तटस्थ लक्षण द्वारा ब्रह्म-प्राप्ति की इच्छा करने पर साधन विहित है (६-१०) । हे प्रिये ! वही साधन अर्थात्
तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य ब्रह्म का साधन बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ।
उस साधन में पहले महेश्वर का मन्त्रोद्धार बताता हूँ (११) । पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर
'सच्चित्' पद कहे । फिर 'एकं' पद, तब 'ब्रह्म' पद कहने से मन्त्र का उद्धार होता है। सन्धि-क्रम से मिल-
जाने पर यह मन्त्र सात अक्षर (सप्ताक्षर) का होता है—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म ।'
यही मन्त्र प्रणव-रहित होने पर षडक्षर (छः अक्षर का) होता है—'सच्चिदेकं ब्रह्म ।' (१२-१३)
यह मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। यह साक्षात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का देनेवाला है। इस मन्त्र में सिद्धादि
चक्र के विचार की अपेक्षा नहीं है और अरि-मित्रादि दोषों से यह दूषित नहीं होता (१४) । इस मन्त्र के ग्रहण
करने में तिथि, नक्षत्र, राशि, कुलाकुल आदि चक्रों की गणना करने का नियम नहीं है और दश-संस्कार की भी
अपेक्षा नहीं है। यह मन्त्र सर्वथा सिद्ध है, अतः इसके सम्बन्ध में किसी रूप के विचार की अपेक्षा न करे (१५) ।
अनेक जन्मों के अर्जित पुण्यों के फल से यदि सद्गुरु पा जाय, तो उसी गुरु के मुख से निकले हुए इस मन्त्र को
प्राप्त करने से उसी क्षण से जन्म सफल हो जाता है। वह ब्रह्मोपासक जीव धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग को
हस्तगत कर इस लोक में और पर-लोक में आनन्द का भोग करता है (१६-१७) । ब्रह्म-मन्त्र-रूप महा-मणि
[ ७ ]
८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
जिसके कान में पहुँचता है, वे ही धन्य हैं, कृतार्थ हैं, कृती हैं, धार्मिक हैं, सब तीर्थों में नहाये हुए हैं, सब यज्ञों
में दीक्षित हैं, सब शास्त्रों में निपुण हैं और वे ही सब लोकों में प्रतिष्ठित हैं—ऐसा कहा जाता है (१८-१९)। हे
शिवे ! जिन्हें ब्रह्म-मन्त्र प्राप्त हुआ है, उनके माता-पिता धन्य हैं, उनका कुल पवित्र है, उनके पितृ-गण सन्तुष्ट
होकर देव-गण के सहित आनन्द का अनुभव करते हैं और वे पुलकित-शरीर से यह गाथा गाते रहते हैं कि
“हमारे कुल में उत्पन्न पुत्र ने ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित होकर कुल को पवित्र कर दिया है, हम लोगों के लिए गया
में पिण्ड-दान की और क्या आवश्यकता ? अथवा तीर्थ, तीर्थ-श्राद्ध और तीर्थ-तर्पण ही की क्या आवश्यकता ?
अथवा हमारे लिए दान, जप, होम और अन्यान्य बहु-विध साधनों की ही क्या आवश्यकता ? हमारे इस सत्पुत्र
ने सद्गुरु से ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा-ग्रहण का जो साधन किया है, उसी से हम अक्षय तृप्ति पा रहे हैं।” (२०-२२) हे
जगद्-वन्द्ये ! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, सुनो । ब्रह्म-मन्त्र के सभी उपासकों के लिए किसी अन्य साधना की आवश्य-
कता नहीं है । इस ब्रह्म-मन्त्र के ग्रहण करने मात्र से देही ब्रह्म-मय हो जाता है । हे देवेशि ! जो ब्रह्म-भूत है,
उसके लिए तीनों जगत् में क्या दुष्प्राप्य है ? सभी वस्तुएँ उसे सुलभ हो जाती हैं। ग्रह, वेताल, चेटक, पिशाच,
गुह्यक, भूत, डाकिनी और मातृका आदि के समूह रुष्ट होकर उसका क्या कर सकते हैं ? वे ब्रह्मोपासक के
दर्शन मात्र से पराङ्मुख होकर भाग खड़े होते हैं ( २३-२५) । वह ब्रह्म-मन्त्र से रक्षित रहता है, वह ब्रह्म-तेज
से अच्छी तरह आवृत्त रहता है, वह द्वितीय सूर्य के समान होता है । अतः ग्रहादि से उसे क्या भय होगा ? वह
कभी भयभीत नहीं होता (२६) । हाथियों का समूह जिस प्रकार सिंह को देख डर कर भाग जाता है, उसी
प्रकार उस साधक को देखकर पूर्वोक्त ग्रहादि भाग जाते हैं और जिस प्रकार पतङ्ग-गण अग्नि में नष्ट हो जाते
हैं, उसी प्रकार ग्रहादि उसके तेज से नष्ट हो जाते हैं (२७) । वह ब्रह्म-निष्ठ साधक सत्य-पूत, शुद्ध अन्तः-
करणवाला और सब प्राणियों का हितकारी होता है ; पाप उसे कभी छू भी नहीं पाता । आत्म-घाती को छोड़
कर और कौन व्यक्ति ऐसे महात्मा का अनिष्ट करने की इच्छा करेगा (२८) ? दुष्ट-स्वभाव वाले जो पापात्मा
व्यक्ति परब्रह्मोपासक का अनिष्ट करने को उद्यत होते हैं, वे अपना ही अनिष्ट करते हैं । परब्रह्मोपासक सत्-
स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं है (२९) । हे देवि ! वह ब्रह्मोपासक सबका हित-कारी है, साधु है और सबका प्रिय
करनेवाला है । ऐसे महात्मा का अनिष्ट कर कौन व्यक्ति शान्ति से रह सकता है (३०) ?
जो साधक 'मन्त्रार्थ' और 'मन्त्रार्थ-चैतन्य' को नहीं जानता, उसे सौ लाख जप करने पर भी मन्त्र की
सिद्धि नहीं होती (३१) । हे प्रिये ! इसीलिए मैं इस मन्त्र का 'अर्थ' और 'चैतन्य' बताता हूँ, सुनो ।
'अ उ म'—ये तीन वर्ण मिलकर 'ॐ' मन्त्र बनता है। अकार का अर्थ है जगत् की रक्षा करनेवाला,
उकार का अर्थ है संहार करनेवाला, मकार का अर्थ है जगत् की सृष्टि करनेवाला । प्रणव का यही अर्थ कहा
गया है (३२) । 'सत्'—शब्द का अर्थ है सदा विद्यमान, 'चित्'-शब्द का अर्थ है चैतन्य, 'एक'-शब्द का अर्थ है
अद्वैत । हे ईशानि ! बृहत् होने से 'ब्रह्म' कहा जाता है । हे देवि ! सभी साधकों को अभीष्ट सिद्धि देनेवाला यह
'मन्त्रार्थ' कहा गया है (३३-३४) ।
हे परमेशानि ! मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता ही 'मन्त्र का चैतन्य' है । मन्त्र के अधिष्ठातृ-देवता सम्बन्धी
ज्ञान भक्तों को सिद्धि दिलाता है (३५) । हे देवेशि ! जो इस मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता है, वह समस्त पदार्थों में
व्याप्त रहनेवाला है; वह सनातन, अतर्क्य, निराकार, वाणी से परे और निरञ्जन है (३६) ।
हे देवि ! इस पूर्वोक्त मन्त्र को प्रणव से रहित कर 'ऐं'—वाग्बीज-विद्या, 'ह्रीं'—माया, 'श्रीं'—लक्ष्मी
को आदि में जोड़ने से क्रमशः विविध विद्याएँ, विविध मायाएँ और विविध प्रकार की सर्वतोमुखी लक्ष्मी-प्रदा-
यक मन्त्र बनते हैं (३७) । मन्त्र देने की विधि यह है कि 'ऐं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा विद्या प्रदान करे,
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ६
'ह्रीँ सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा माया और 'श्रीं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा लक्ष्मी प्रदान करे ।
पूर्वोक्त मन्त्र के प्रत्येक पद में अथवा समस्त पद में प्रणव जोड़कर या प्रणव से रहित कर अथवा उक्त
मन्त्र के दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर या छोड़कर उच्चारण करने से अनेक प्रकार के मन्त्र बनते हैं। यथा—
१. प्रत्येक पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सत्, 'ॐ चित्, ॐ एकं, ॐ ब्रह्म'; प्रणव से रहित कर—सत्,
चित्, एकं, ब्रह्म' ।
२. समस्त पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म', प्रणव से रहित कर—'सच्चिदेकं ब्रह्म।'
३. दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर—'ॐ सद् ब्रह्म, ॐ चिद् ब्रह्म, ॐ एकं ब्रह्म, ॐ सच्चित्, ॐ चिदेकम्,
प्रणव छोड़कर—'सद् ब्रह्म, चिद् ब्रह्म, एकं ब्रह्म, सच्चिद्, चिदेकम् ।' (३८)
इस मन्त्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता निर्गुण सर्वान्तर्यामी परम ब्रह्म और चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति
के निमित्त विनियोग कहे गए हैं (३६) ।
ऋष्यादि-न्यास — शिरसि सदाशिवाय ऋषये नमः । मुखे अनुष्टुप्-छन्दसे नमः । हृदि
सर्वान्तर्यामि-निर्गुण-परम-ब्रह्मणे देवतायै नमः । धर्मार्थ-काम-मोक्षावाप्तये विनियोगः ।
हे प्रिये ! अङ्ग-न्यास, कर-न्यास कहता हूँ, सुनो (४०) । हे महेश्वरि ! (पहले कर-न्यास में) ॐ सच्चिद्
ब्रह्म एकम्, ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म' इसी क्रम से पदोच्चारण करते हुए अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा
—इन पाँच अंगुलियों में एवं दोनों कर-तलों, कर-पृष्ठों में क्रमशः 'नमः, स्वाहा, वषट्, हुं', वौषट्, फट्' को
क्रमशः अन्त में उच्चारण कर एकाग्र मन से न्यासोक्त विधि से कर-न्यास करे। इसी प्रकार हृदय से कर-पर्यन्त
(अङ्ग-न्यास) यथा-विधि करे (४१-४३) ।
हे पार्वति ! तदनन्तर मूल-मन्त्र या प्रणव से प्राणायाम करे । दाएं हाथ को मध्यमा-अनामिका अंगुलियों से
बाएँ नासा-पुट को बन्द कर दाएँ नासा-पुट से वायु खींचते हुए आठ बार मूल-मन्त्र या प्रणव का जप करे (४४-
४५) । फिर अंगूठे से दाएँ नासा को बन्द कर कुम्भक (श्वास रोक) कर बत्तीस बार जप करे । तब दाईं नासा
से धीरे-धीरे निःश्वास छोड़ते हुए सोलह बार मन्त्र-जप करे। बाद में इसी प्रकार बाएँ नासा-पुट से पूरक,
कुम्भक, रेचक करे अर्थात् आठ बार मन्त्र-जप करते-करते बाएँ नासा-पुट से धीरे-धीरे वायु खींचे; फिर वायु
रोककर बत्तीस बार जप करे (४६) । तब बाएँ नासा-पुट को छोड़कर उससे धीरे-धीरे वायु निकालते हुए सोलह
बार मन्त्र जप करे । बाएँ नासा-पुट से भी इसी प्रकार पूरक, कुम्भक, रेचक करे (४७) । हे सुर-वन्दिते ! पहले के
समान पुनः दाईं नासा से पूरक, कुम्भक, रेचक करे । ब्रह्म-मन्त्र के साधन में प्राणायाम की विधि तुमसे कही
गई (४८) । इसके बाद साधक के अभीष्ट को सिद्ध करनेवाला ध्यान करे (४६) । यथा—
हृदय-कमल-मध्ये निर्विशेषं निरीहम्, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यान-गम्यम् ।
जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्-स्वरूपम् । सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े ॥
अर्थ : जो निर्विशेष है अर्थात् नाना प्रकार के भेदों से रहित है; जो निरीह अर्थात् चेष्टा-रहित है; जो
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर द्वारा ज्ञेय है; जो योगियों द्वारा ध्यान-गम्य है; जिसके द्वारा जन्म और मृत्यु का भय
दूर होता है; जो नित्य और ज्ञान-स्वरूप है; जो समस्त भुवनों का बीज है—ऐसे चैतन्य-स्वरूप ब्रह्म को मैं
हृदय-कमल के मध्य में ध्यान करता हूँ (५०) ।
फा०—२
१० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करने के लिए परा भक्ति के साथ परम ब्रह्म का इसी प्रकार ध्यान कर मानस
उपचारों से उनकी पूजा करे (५१)। मानस-पूजा में ईश्वर को भूत-तत्त्व अर्पित करे—पृथ्वी-तत्त्व को गन्ध,
आकाश-तत्त्व को पुष्प, वायु-तत्त्व को धूप, तेजस्तत्त्व को दीप और जल-तत्त्व को नैवेद्य मानकर उस परमात्मा
को प्रदान करे (५२) । फिर श्रेष्ठ साधक मन में पूर्वोक्त महा-मन्त्र (ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म) का जप कर ब्रह्म को
जप समर्पित कर बाह्य-पूजा आरम्भ करे (५३) ।
गन्ध-पुष्पादि, वस्त्रालङ्कारादि एवं भक्ष्य-पेयादि जो सारी वस्तुएँ विद्यमान हों, उन सबको निम्न मन्त्र
से संशोधित कर, दोनों आँखें बन्द कर बुद्धिमान् व्यक्ति सनातन ब्रह्म का ध्यान करता हुआ उन्हें परमात्मा
को समर्पित करे (५४-५५)—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ।।
अर्थ : 'अर्पण' अर्थात् यज्ञ-पात्र ब्रह्म । 'हवि' अर्थात् हवनीय द्रव्य जो अर्पित करना है, वह भी ब्रह्म ।
जो आहुति देनेवाला अर्थात् अर्पण करनेवाला है, वह भी ब्रह्म। इस प्रकार जो ब्रह्म में चित्त को एकाग्र रूप
से स्थापित करता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है (५६) ।
इसके बाद यथा-शक्ति मूलमन्त्र का जप कर दोनों आँखें बन्द कर उक्त 'ब्रह्मार्पण०' मन्त्र का उच्चारण
कर ब्रह्म को जप समर्पित कर स्तव और कवच का पाठ करे (५७) ।
हे महेशानि ! हे देवि ! परमात्मा ब्रह्म के स्तव को सुनो, जिसके सुनने से साधक ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त
करता है (५८)—
ॐ नमस्ते सते सर्व-लोकाश्रयाय, नमस्ते चिते विश्व-रूपात्मकाय ।
नमोऽद्वैत-तत्त्वाय मुक्ति-प्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने निर्गुणाय ।। १ ।।
त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्, त्वमेकं जगत्-कारणं विश्व-रूपम् ।
त्वमेकं जगत्-कर्तृ-पातृ-प्रहर्तृ, त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।। २ ।।
भयानां भयं भीषणं भीषणानाम्, गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् ।
महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकम्, परेषां परं रक्षकं रक्षकानाम् ।। ३ ।।
परेश प्रभो सर्व-रूपाविनाशिन्, अनिर्देश्य सर्वेन्द्रियागम्य सत्य !
अचिन्त्याक्षर व्यापकाव्यक्त-तत्त्व, जगद्-भासकाधीश पायादपायात् ।। ४ ।।
तदेकं स्मरामस्तदेकं जपामः, तदेकं जगत्-साक्षि-रूपं नमामः ।
सदेकं निधानं निरालम्बमीशम्, भवाम्बोधि-पोतं शरण्यं व्रजामः ।। ५ ।।
पञ्च-रत्नमिदं स्तोत्रं ब्रह्मणः परमात्मनः । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ।। ६ ।।
प्रदोषेऽदः पठेन्नित्यं सोमवारे विशेषतः । श्रावयेद् बोधयेत् प्राज्ञो ब्रह्म-निष्ठान् स्व-बान्धवान् ।।७।।
इति ते कथितं देवि ! पञ्च-रत्नं महेशितुः ।
अर्थात् तुम नित्य हो, तुम सब लोकों के आश्रय हो, तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम ज्ञान-स्वरूप हो,
विश्व की आत्मा-स्वरूप हो, अद्वैत तत्त्व, मुक्ति-दायक तुम्हें नमस्कार है। तुम सर्व-व्यापी निर्गुण ब्रह्म हो, तुम्हें
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ११
नमस्कार (१) । तुम एकमात्र शरण्य अर्थात् आश्रय हो, तुम अद्वितीय वरणीय हो, तुम जगत् के एकमात्र कारण
हो, तुम विश्व-रूप हो, एक-मात्र तुम्हीं जगत् के सृष्टि-कर्त्ता, पालन-कर्त्ता और अन्त में संहार-कर्त्ता हो, तुम्हीं
एक-मात्र परम पुरुष हो, निश्चल और विविध कल्पनाओं से रहित हो (२) । तुम भय के भय हो, तुम भयानक
के भयानक हो, तुम प्राणियों के एकमात्र गति हो, पावित्र्य-जनक सबके पावित्र्य-जनक हो। तुम उच्च पद पर
अधिष्ठित ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि के नियामक हो, तुम सभी श्रेष्ठ पदार्थों से श्रेष्ठ हो और रक्षकों के रक्षक
हो (३) । हे परेश (ब्रह्मादि देवों के स्वामी), हे प्रभो ! तुम सर्व-रूप, अविनाशी, अनिर्देश्य और सभी इन्द्रियों से
अगम्य हो - किसी भी इन्द्रिय द्वारा गोचर नहीं हो । हे सत्य-स्वरूप, हे अचिन्त्य, हे अक्षर, हे व्यापक,
हे अव्यक्त तत्व, हे जगद्-भासकाधीश (जगद्-भासक चन्द्र-सूर्यादि के अधीश्वर) अथवा हे जगद्-भासक, हे अधीश,
तुम हम लोगों को 'अपाय' अर्थात् भक्ति-विश्लेष और ज्ञान-विश्लेष होने से बचाओ (४) । उसी एक-मात्र ब्रह्म
को हम स्मरण करते हैं, उसी अद्वितीय ब्रह्म का हम जप करते हैं, उसी एक जगत्-साक्षी-स्वरूप ब्रह्म को हम
प्रणाम करते हैं। वही तुम सत् हो, जगत् के एक-मात्र निधान अर्थात् आश्रय-भूत हो, स्वयं निरालम्ब अर्थात्
आश्रय-रहित हो, वही तुम ईश्वर हो, भव-सागर के जहाज-स्वरूप हो, हम तुम्हारा आश्रय ग्रहण करते हैं (५) ।
परमात्मा ब्रह्म के 'पञ्च-रत्न' नामक इस स्तोत्र को जो संयत होकर पाठ करता है, वह ब्रह्म-सायुज्य
को प्राप्त करता है (६) । प्रतिदिन प्रदोष-काल में इस 'पञ्च-रत्न' स्तोत्र का पाठ करे। विशेष कर सोमवार
को ज्ञानी व्यक्ति अपने ब्रह्म-निष्ठ बान्धवों को इस स्तोत्र को सुनाये और समझा दे (७) । हे देवि ! महेश्वर के
'पञ्चरत्न स्तोत्र' नामक स्तोत्र को तुमसे मैंने कहा है (५६-६५) ।
हे चार्वङ्गि ! उनके 'जगन्मङ्गल' नामक कवच को सुनो। इस कवच का पाठ करने एवं धारण करने से
निश्चय ही ब्रह्म-ज्ञानी होता है (६६) -
कवचं शृणु चार्वङ्गि ! जगन्मङ्गल-नामकम् । पठनाद् धारणाद् यस्य ब्रह्मज्ञो जायते ध्रुवम् ॥१
परमात्मा शिरः पातु हृदयं परमेश्वरः । कण्ठं पातु जगत्-पाता वदनं सर्व-दृग्-विभुः ॥२
करौ मे पातु विश्वात्मा पादौ रक्षतु चिन्मयः । सर्वाङ्गं सर्वदा पातु परं ब्रह्म सनातनम् ॥३
श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य सदाशिवः । ऋषिश्च्छन्दोऽनुष्टुविति परम-ब्रह्म देवता ।
चतुर्वर्ग-फलावाप्त्यै विनियोगः प्रकीर्त्तितः ॥४॥
यः पठेद् ब्रह्म-कवचं ऋर्षि-न्यास पुरःसरम् । स ब्रह्म-ज्ञानमासाद्य साक्षाद् ब्रह्म-मयो भवेत् ॥५
भूर्जे बिलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । कण्ठे दक्षिणे बाहौ सर्व-सिद्धीश्वरो भवेत् ॥६
इत्येतत् परम-ब्रह्म-कवचं ते प्रकाशितम् । दद्यात् प्रियाय शिष्याय गुरु-भक्ताय धीमते ॥७
अर्थात् परमात्मा हमारे शिरोदेश की रक्षा करें, परमेश्वर हृदय की रक्षा करें, जगत्-पाता कण्ठ की रक्षा
करें, सर्व-दर्शी विभु वदन को रक्षा करें (१) । विश्वात्मा हमारे दोनों हाथों की रक्षा करें, चिन्मय हमारे दोनों
पैरों की रक्षा करें, सनातन परब्रह्म सदैव हमारे सर्वाङ्ग की रक्षा करें (२) । इस जगन्मङ्गल कवच के ऋषि सदा-
शिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता परमब्रह्म, फल चतुर्वर्ग-प्राप्ति के निमित्त विनियोग है (३) । जो ऋषि-न्यास कर इस
ब्रह्म-कवच का पाठ करता है, वह ब्रह्म-ज्ञान पाकर साक्षात् ब्रह्म-मय होता है (४) । जो इस कवच को भोज-पत्र
पर लिखकर स्वर्ण-गुटिका में रखकर कण्ठ या दाईं भुजा में धारण करता है, वह सब प्रकार की सिद्धियों का
स्वामी होता है (६) । तुमसे मैंने इस परम ब्रह्म का कवच प्रकट किया। इसे गुरु-भक्त, बुद्धिमान्, प्रिय शिष्य को