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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

४३२ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां


अथ युष्मद्-अस्मद्-विषयक कुछ उपयोगी नोट लिखते हैं । इन से सब सूत्रों
का अवगाहन हो कर निश्चय ही बालकों को अपूर्व लाभ होगा । ध्यान देकर पढ़ें—
[१] (मपर्यन्त आदेशों के विषय मे) —
(क) एकवचन में—सुं, ङे, ङस् को छोड़ कर अन्य सब स्थानों में त्वमावेक-
वचने (३१३) प्रवृत्त हो जाता है । सुं में त्वाहावमौ (३१२), ङे में तुभ्यमह्यौ ङयि
(३२२) और ङस् में तवममौ ङसि (३२६) अपवाद हैं । तथाहि—
ङस् सु ङेविभक्तिञ्च विनैकवचने सदा ।
एकोक्तौ तु त्वमादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥१॥
तुभ्यमह्यौ ङयि स्याता त्वाहौ सौ मुनिचोदितौ ।
ङस्यादेशौ तथा स्यात्तौ तवेति च ममेत्यपि ॥२॥
(ख) द्विवचनों मे सदा म्पर्यन्त ‘युव, आव’ आदेश होते हैं । इन का कोई
अपवाद नहीं । तथाहि—
विना बाधं तु द्वित्वोक्तौ युवावौ भवतः सदा ।
(ग) बहुवचन में जस् को छोड़कर अन्य कहीं भी म्पर्यन्त आदेश नहीं होता ।
जस् में यूयवयौ जसि (३१६) में ‘यूय, वय’ आदेश होते हैं । तथाहि—
बहुत्वोक्तौ जसोऽन्यत्र नैवादेशौ क्वचिन्मतौ ।
जसि यूयवयादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥
[२] (विभक्तिस्थानिक आदेशों के विषय में)—
शस् त्यक्त्वा द्वितीयायाः प्रथमायास्तथैव ङेः ।
अमादेशो बुधैः प्रोक्तः शसोऽकारस्य नः स्मृतः ॥१॥
साम आक ङसोऽत्प्रोक्तोऽत् पञ्चम्येकबहुत्वयोः ।
ऋत एन्यो न चादेशो विभक्तीना क्वचिद्‌भवेत् ॥२॥
अर्थ —शस् को छोड़ कर द्वितीया के तथा प्रथमा और ङे के स्थान पर अम्
आदेश हो जाता है । शस् के अकार को नकार आदेश होता है ॥१॥ साम् (आम्)
को आकम्, ङस् को अत्, पञ्चमी के एकवचन और बहुवचन को अत् आदेश होता
है । इन के बिना अन्य किसी विभक्ति के स्थान पर कोई आदेश नहीं होता ॥२॥
[३] (आत्व और यत्व के विषय में)—
(क) सुपि चौङि भिसि भ्यामि द्वितीयायां तथैव च ।
आत्वमेषु दकारस्य त्रिभिः सूत्रैर्मुनीरते ॥
अर्थ —प्रथमा के द्विवचन (औ), द्वितीया, भ्याम्, भिस् तथा सुप् में युष्मद्
अस्मद् के दकार को आकार हो जाता है । दकार को आकार तीन सूत्रों से होता है ,
—१. प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५), २ द्वितीयायां च (३१८), ३.
युष्मदस्मदोरनादौ (३२१) ।
(ख) योऽचि सूत्रेण यादेश आङि ओसि तथैव ङौ ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३३
अर्थः—आङ् (टा), ओस् तथा ङि परे होने पर योऽचि (३२०) सूत्र से
दकार को यकारादेश हो जाता है।
[४] ('शेषे लोपः' सूत्र के विषय में)--
पञ्चम्याश्च चतुर्थ्याश्च षष्ठीप्रथमयोरपि।
यान्यद्विवचनान्यत्र शेषे—लोपो विधीयते॥
अर्थः—पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा के एकवचन और बहुवचन के परे
होने पर शेषे लोपः (३१३) सूत्र प्रवृत्त हुआ करता है।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२६) युष्मदस्मदोः षष्ठी-चतुर्थी-द्वितीयास्थयोर्वा-
न्नावौ ।८।१।२०॥
पदात्परयोरपादादौ स्थितयोः षष्ठ्यादिविशिष्टयोर्युष्मदस्मदोर्वान्नौ
इत्यादेशौ स्तः॥
अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया
विभक्ति से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः वाम्, नौ आदेश होते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (यह अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।
।६।२। युष्मदस्मदोः ।६।२। वान्नावौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह अधिकृत है)।
समासः—न पादादौ = अपादादौ, प्रसज्यप्रतिषेधः। नञ्समासः। अर्थः—(पदात्) पद
से परे (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया विभक्ति के साथ वर्त-
मान (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (वान्नावौ) वाम्, नौ
आदेश हो जाते हैं। (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र केवल षष्ठ्यादि के द्विवचन में ही प्रवृत्त होता है, एकवचन वा बहु-
वचन में नहीं। एकवचन और बहुवचन में अग्रिम तीन सूत्र इस के अपवाद हैं। सूत्र के
उदाहरण यथा—
षष्ठी—धनमिदं वाम् (युवयोः) अस्ति। धनमिदं नौ (आवयोः) अस्ति।
चतुर्थी—ईशो वां (युवाभ्याम्) ददाति। ईशो नौ (आवाभ्याम्) ददाति।
द्वितीया—ईश्वरो वां (युवाम्) पश्यति। ईश्वरो नौ (आवाम्) पश्यति।
यहां कोष्ठक में लिखे शब्दों के स्थान पर वाम्, नौ आदेश हुए हैं।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि—(१) युवयोर्धनमस्ति। (२) आवयोर्धन-
मस्ति। (३) युवाभ्यां माता ददाति। (४) आवाभ्यां माता ददाति। (५) युवा-
मीशो रक्षतु। (६) आवामीशो रक्षतु। इत्यादि स्थानों पर आदेश न हों।.यहां
'युवयोः' आदि पद से परे नहीं हैं।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि श्लोक के पाद के आदि में 'वाम्, नौ' आदेश
न हो जाएं। यथा—
योऽयम्भूतेश्वरो देवो युवयोः पापनाशनः।
असावस्तु विभुर्नाथ आवयोरपि पालकः॥
ल० प्र० (२८)

४३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

यहां 'युवयो' और 'आवयो' के पद से परे होने पर भी पाद के आदि में वर्त्तमान होने
के कारण 'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते ।¹
युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः० में 'स्थ' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि
षष्ठ्यादि विभक्तियों के साथ रहने पर ही 'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों को 'वाम्, नौ'
आदेश हो, समास में विभक्ति के लुप्त हो जाने पर न ही । यथा--'इमौ युष्मत्पुत्रौ
गच्छतः । इमावस्मत्पुत्रौ वदतः' यहां 'युवयोः पुत्रौ = युष्मत्पुत्रौ, आवयोः पुत्रौ =
अस्मत्पुत्रौ' इस प्रकार षष्ठीतत्पुरुष-समास है। समास में विभक्ति का लुक् हो जाने से
'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते ।
अब इस सूत्र के अपवाद आरम्भ किये जाते हैं--
[लघु०] विधि-सूत्रम्-- (३३०) बहुवचनस्य वस्नसौ ।८।१।२१॥
उक्तविधयोरनयोः षष्ठ्यादिबहुवचनान्तयोर्वस्नसौ स्तः ॥
अर्थ--पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया
के बहुवचनों से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः वस्, नस् आदेश हो जाते हैं ।
व्याख्या--पदात् ।८।१। (अधिकृत है) । षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।८।१।
युष्मदस्मदोः ।८।१।२। (पूर्वसूत्र से) । बहुवचनस्य ।८।१। (यह 'युष्मदस्मदोः' का विशे-
षण है, अतः वचनविपरिणाम तथा तदन्तविधि से 'बहुवचनान्तयोः' बन जाता है) ।
वस्नसौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है) । अर्थ--(पदात्) पद से परे
(षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया सहित वर्त्तमान (बहुवचनस्य
= बहुवचनान्तयोः) बहुवचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर
क्रमशः (वस्नसौ) वस्, नस् आदेश हो जाते हैं । परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में
नहीं होते । यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है । उदाहरण यथा--
षष्ठी--गावो वः (युष्माकम्) सन्ति । अजा नः (अस्माकम्) सन्ति ।
चतुर्थी--गावो वो (युष्मभ्यम्) दीयन्ते । अजा नो (अस्मभ्यम्) दीयन्ते ।
द्वितीया--गावो वः (युष्मान्) पश्यन्ति । अजा नः (अस्मान्) पश्यन्ति ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि--१. युष्माकं धनमस्ति । २. अस्माकं बल-
मस्ति । ३. युष्मभ्यं दीयते । ४. अस्मभ्यं दीयते । ५. युष्मान् पश्यन्ति । ६. अस्मान्
पश्यन्ति । इत्यादियों में वस्, नस् आदेश न हों ।
'अपादादौ' इसलिये कहा गया है कि--रुद्रः शिवकरो देयो युष्माकं पापहारकः
--इत्यादियों में 'युष्माकम्' के स्थान पर 'वस्' आदेश न हो ।
'स्थ' ग्रहण से पूर्ववत्--'अयं युष्मद्दासौ (युष्माकं दासः) याति, अयम् अस्म-
द्दासो (अस्माकं दासः) याति' इत्यादियों में वस्, नस् आदेश नहीं होते ।
१. यह निषेध श्लोक के द्वितीय तृतीयादि पादों के लिये किया गया है, प्रथम पाद के
लिये नहीं । क्योंकि प्रथम पाद में तो 'पदात्' इस अधिकार से ही व्यभिचार-
निवृत्ति हो सकती थी ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३५
अब 'वाम्, नौ' आदेशों का दूसरा अपवाद लिखते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३१) तेमयावेकवचनस्य ।८।१।२२॥
उक्तविधयोरनयोः षष्ठीचतुर्थ्येकवचनान्तयोस्ते मे एतौ स्तः ॥
अर्थः—पद से परे पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी तथा चतुर्थी के एक-
वचनों से युक्त, युष्मद् अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'ते, मे' आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।६।२।
युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोः षष्ठी० से)। एकवचनस्य ।६।१। (युष्मदस्मदोः
का विशेषण होने से पूर्ववत् 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। तेमयौ ।१।२। अपादादौ
।७।१। (अधिकृत है)। अर्थः—(पदात्) पद से परे, (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः)
षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया के सहित वर्त्तमान (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक-
वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तेमयौ) 'ते, मे'
आदेश होते हैं। परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र युष्मदस्मदोः षष्ठी० (३२६) सूत्र का अपवाद है। इस का भी त्वामौ
द्वितीयायाः (३३२) यह अग्रिमसूत्र अपवाद है। अतः यह सूत्र केवल षष्ठी तथा चतुर्थी
के एकवचनान्तों में ही प्रवृत्त होता है। ग्रन्थकार ने भी वृत्ति में इसीलिये द्वितीया का
ग्रहण नहीं किया। इस के उदाहरण यथा—
षष्ठी—ईश ! अहं ते (तव) दासोऽस्मि । त्वं मे (मम) पालकोऽसि ।
चतुर्थी—नमस्ते (तुभ्यम्) ऽस्तु । भोजनं मे (मह्यम्) प्रयच्छ ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि—तव दास एष जनः। ममास्ति प्रयोजनम्।
तुभ्यं धनं दास्यामि। मह्यम् मोदकम् रोचते। इत्यादियों में 'ते, मे' आदेश न हो जाएं।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि—आगमिष्यति यन्मित्रं, तव कार्यं करिष्यति
इत्यादि में आदेश न हो जाये।
अब इस सूत्र का अपवाद कहते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३२) त्वामौ द्वितीयायाः ।८।१।२३॥
द्वितीयैकवचनान्तयोस्त्वा मा इत्यादेशौ स्तः ॥
अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, द्वितीया के एकवचन से युक्त
युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'त्वा, मा' आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। द्वितीयायाः ।६।१। एकवचनस्य ।६।१।
(तेमयावेकवचनस्य से। 'युष्मदस्मदोः' का विशेषण है, अतः वचनविपरिणाम तथा
तदन्तविधि हो कर 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मद-
स्मदोः षष्ठी० से)। त्वामौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है)। अर्थः
—(पदात्) पद से परे (द्वितीयायाः) द्वितीया के (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक-
वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (त्वामौ) त्वा,
मा आदेश हो जाते हैं (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र तेमयावेकवचनस्य (३३१) सूत्र का अपवाद है। इस के उदाहरण
यथा—

४३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
लोकस्त्वा (त्वाम्) पश्यति । लोको मा (माम्) पश्यति ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि-त्वा लोकाः पश्यन्ति । मा लोकाः पश्यन्ति ।
इत्यादियो में 'त्वा, मा' आदेश न हो ।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि-स जगद्रक्षको देवो मा सदा पालयिष्यति
इत्यादियो में आदेश न हो ।
अब ग्रन्थकार इन सब सूत्रों के उदाहरणों को रामचन्द्राचार्यनिर्मित दो श्लोकों
में दर्शाते हैं-
[लघु०] श्रीशस्त्वाऽवतु माऽपीह, दत्तात् ते मेऽपि शर्म सः ।
स्वामी ते मेऽपि स हरिः, पातु वाम् अपि नौ विभुः ॥१॥
सुखं वां नौ ददात्वीशः, पतिर्वाम् अपि नौ हरिः ।
सोऽव्याद् वो नः, शिवं वो नो दद्यात्, सेव्योऽत्र वः स नः ॥२॥
अर्थः- (इह) इस लोक में (श्रीशः) श्रीपति विष्णु (त्वा=त्वाम्) तुझे
(अपि) तथा (मा=माम्) मुझे (अवतु) बचावे । (सः) वह भगवान् विष्णु
(ते=तुभ्यम्) तेरे लिये (अपि) तथा (मे=मह्यम्) मेरे लिये (शर्म) कल्याण
(दत्तात्) प्रदान करे । (सः) वह (हरिः) भगवान् विष्णु (ते=तव) तेरा (अपि)
तथा (मे=मम) मेरा (स्वामी) स्वामी है । (विभुः) सर्वव्यापक हरि (वाम् =
युवाम्) तुम दोनों को (अपि), तथा (नौ=आवाम्) हम दोनों को (पातु)
बचावे ॥१॥ (ईशः) भगवान् (वाम् = युष्मभ्यम्) तुम दोनों के लिये तथा (नौ =
आवाभ्याम्) हम दोनों के लिये (सुखम्) सुख (ददातु) प्रदान करे । (हरिः) श्री
विष्णु (वाम् = युवयोः) तुम दोनों का (अपि) तथा (नौ = आवयोः) हम दोनों का
(पतिः) पति है । (सः) वह भगवान् विष्णु (वः=युष्मान्) तुम सब को तथा (नः =
अस्मान्) हम सबको (अव्यात्) बचावे । (सः) वह जगत्प्रसिद्ध विष्णु (वः=युष्म-
भ्यम्) तुम सबके लिये तथा (नः=अस्मभ्यम्) हम सब के लिये (शिवम्) कल्याण
(दद्यात्) प्रदान करे । (सः) वह विष्णु (वः=युष्माकम्) तुम सब का तथा (न =
अस्माकम्) हम सब का (सेव्यः) सेवनीय=आराध्य है ।
व्याख्या - यहां पहले द्वितीया, चतुर्थी तथा षष्ठी के एकवचन का, पीछे द्वि-
वचन का और तदनन्तर बहुवचन का उदाहरण दिया गया है । हम ने अर्थ करते समय
कोष्ठक में इसे स्पष्ट कर दिया है । ये श्लोक प्रक्रियाकौमुदी से उद्धृत किये गये हैं ।
[लघु०] वा०-(२६) समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः ॥
एकतिङ् वाक्यम् । तेनेह न - ओदनं पच तव भविष्यति । इह तु स्या-
देव-शालीनान्ते ओदनं दास्यामि ॥
अर्थ - युष्मद् अस्मद् शब्दों के स्थान पर होने वाले 'वाम्, नौ' आदि आदेश
समानवाक्य अर्थात् एक वाक्य में होते हैं । एकतिङ् इति - एक तिङन्त वाला वाक्य
कहाता है ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३७
व्याख्या—पूर्वोक्त 'वाम्, नौ' आदि आदेश समान वाक्य में प्रवृत्त होते हैं।
अर्थात् इन सूत्रों के विषय में निमित्त और निमित्ती का एक ही वाक्य में वर्त्तमान
होना आवश्यक है। पद से परे 'वाम्, नौ' आदि आदेशों का विधान है। यहां पद
निमित्त तथा 'वाम्, नौ' आदि आदेश निमित्ती हैं। यदि निमित्त अन्य वाक्य में स्थित
होगा तो ये आदेश न होंगे।
इस वार्त्तिक के उदाहरण देने से पूर्व वाक्य क्या होता है ? इस जिज्ञासा की
निवृत्ति के लिये वाक्य का लक्षण करते हैं—एकतिङ् वाक्यम्। एकः=मुख्यः, तिङ्
=तिङन्तो यस्य यस्मिन् वा तद् एकतिङ्। जिस में तिङन्त मुख्य वा विशेष्य हो—
उसे 'वाक्य' कहते हैं।¹
अब वार्त्तिक का प्रयोजन दिखाते हुए प्रत्युदाहरण देते हैं—
'ओदनं पच तव भविष्यति'। यहां एक वाक्य नहीं, दो वाक्य हैं। 'ओदनं पच'
यह पहला वाक्य तथा 'तव भविष्यति' यह दूसरा वाक्य है। यहां दूसरे वाक्य में स्थित
'तव' के स्थान पर 'ते' आदेश नहीं होता, क्योंकि उस का निमित्त पद (पच) उस वाक्य
में स्थित नहीं।
'शालीनां ते ओदनं दास्यामि' (मैं तुझे साठी चावलों का भात दूंगा)। यहां
'शालीनाम्' यह निमित्त एक वाक्य में स्थित है अतः इस से परे 'तुभ्यम्' के स्थान पर
'ते' आदेश हो जाता है।
[लघु०] वा०—(२७) एते वांनावादयोऽनन्वादेशे वा वक्तव्याः ॥
धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्तीति वा। अन्वादेशे तु नित्यं
स्युः—तस्मै ते नम इत्येव ॥
अर्थः—अन्वादेश न होने पर पूर्वोक्त वाम्, नौ आदि आदेश विकल्प से होते
हैं। [तात्पर्य यह है कि अन्वादेश में नित्य होते हैं।]
व्याख्या—'किसी कार्य को विधान या बोधन कराने के लिये ग्रहण किये हुए
का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना अन्वादेश कहाता है' यह
हम पीछे 'इदम्' शब्द पर स्पष्ट कर चुके हैं। जहां अन्वादेश न होगा वहां पूर्वोक्त
'वाम्, नौ, वस्, नस्, ते, मे, त्वा, मा' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होंगे। जहां अन्वादेश
होगा वहां नित्य होंगे। यथा—
धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्ति (ब्रह्मा तेरा भक्त है)। यहां अन्वा-
देश न होने से 'तव' को 'ते' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होता है।
योऽग्निर्हव्यवाट् तस्मै ते नमः (जो तूं हव्य को ले जाने वाला अग्निदेव है,
१. 'विशेष्य' के कथन से—'पश्य मृगस्ते धावति' (अपने दौड़ते हुए मृग को देखो)
इत्यादि दो तिङन्तों वाले भी वाक्य हो सकते हैं। इन में भी 'पश्य' इस एक
तिङन्त की ही मुख्यता या विशेष्यता है।

उस तुझे नमस्कार हो)। यहां अन्वादेश होने से 'तुभ्यम्' के स्थान पर नित्य 'ते'
आदेश हो जाता है विकल्प नहीं होता ।
यहां पाणिनि के और भी दो नियम जानने आवश्यक हैं—
(१) न चवाहाहैवैयोगे (८।१।२४) । अर्थात् यदि 'च, वा, ह, अह, एव'
इन पांचों में से किसी अव्यय का युष्मद् और अस्मद् के साथ साक्षात् योग हो तो
ये वाम्, नौ आदि आदेश नहीं होते । यथा—हरिस्त्वा मा च रक्षतु । यहां 'त्वाम्,
माम्' के स्थान पर 'त्वा, मा' आदेश नहीं होते क्योंकि 'च' का योग है। मा मय्या
इदं पुस्तकं ममैवास्तीति । यहां 'मम' के स्थान पर 'मे' आदेश न होगा क्योंकि 'एव'
का योग है ।
(२) पश्यार्थैश्चानालोचने (८।१।२५) । अर्थात् अचाक्षुष ज्ञानार्थक धातुओं
के योग में ये आदेश नहीं होते । यथा—चेतसा त्वा समीक्षते (वह मन से तुझे देखता
है) । यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' नहीं हुआ । क्योंकि देखना आंखों से नहीं हो रहा ।
(यहां युष्मद् अस्मद् शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] सुपात्, सुपाद् । सुपादौ ॥
व्याख्या—सु = शोभनौ पादौ यस्य सः = सुपात् । बहुव्रीहिसमासः । सङ्ख्या-
सुपूर्वस्य (५।४।१४०) इतिपादस्यान्त्यलोपः समासान्तः । सुन्दर पैरों वाले को 'सुपाद्'
कहते हैं ।
सुपाद्+स्(सुं) । यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो
कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने से—सुपात्, सुपाद् ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३३) पादः पत् ।६।४।१३०॥
पाच्छब्दान्तं यदङ्गं भं तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः स्यात् ।
सुपदः । सुपदा । सुपाद्भ्याम् ॥
अर्थः—'पाद्'शब्दान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्'
आदेश होता है ।
व्याख्या—पादः ।६।१। (यह अङ्गस्य का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि
होकर 'पादन्तस्य' बन जाता है) । भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। पद् ।१।१। अर्थः—(पाद = पादन्तस्य) 'पाद्' अन्त वाले (भस्य)
भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (पद्) पद् आदेश हो जाता है ।
निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति इस पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार 'पाद्' के स्थान
पर ही 'पद्' यह सर्वादेश होगा ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां यचि भम् (१६५) के अनुसार 'सुपाद्' की
भसञ्ज्ञा है । इस के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्' आदेश होकर—सुपद्+
अस् = सुपदः । इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी समझ लेना चाहिये ।
सुपाद् शब्दकी समग्र रूपमाला यथा—

हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३६
प्र० सुपात्-द् सुपादौ सुपादः प० सुपदः† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भ्यः
द्वि० सुपादम् ,, सुपदः† ष० ,, † सुपदोः† सुपदाम्‡
तृ० सुपदा† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भिः स० सुपदि† ,, † सुपात्सु‡
च० सुपदे† ,, सुपाद्भ्यः सं० हे सुपात्-द् ! सुपादौ ! सुपादः!
†सर्वत्र पादः पत् (३३१) से पाद् को पद् आदेश होता है ।
‡पद् आदेश हो कर खरि च (७४) से चर्व्व—तकार हो जाता है ।
इसी प्रकार— द्विपाद्, त्रिपाद् प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं ।
अभ्यास (४२)
(१) शेषे लोपः सूत्र के दोनों अर्थ स्पष्ट करें ।
(२) 'युष्मद्, अस्मद्' शब्द अवर्णान्त नहीं अतः सुँट् आगम स्वतः ही प्राप्त
नहीं तो पुनः साम आकम् में ससुँट् निर्देश का क्या प्रयोजन है ?
(३) किस किस विभक्ति में शेषे लोपः सूत्र की प्रवृत्ति होती है ?
(४) शसो न द्वारा नकारादेश कैसे और किस के स्थान पर होता है ?
(५) 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' में योऽचि द्वारा यकारादेश क्यों नहीं होता ?
(६) 'वाम्, नौ' आदेशों के कौन २ अपवाद हैं ससूत्र सोदाहरण लिखें ।
(७) द्वेप्रथमयोरम् के अर्थ में 'द्वितीया' का कैसे ग्रहण हो जाता है ?
(८) भ्यसोभ्यम् सूत्र के दो प्रकार के अर्थों का विवेचन करें ?
(९) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (गीता १८.६६)
यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' हुआ है परन्तु 'माम्' को 'मा' नहीं, क्या कारण है ?
(१०) युवावौ द्विवचने और त्वमावेकवचने में वचनग्रहण को स्पष्ट करें ।
(११) एषः, त्वम्, युष्माकम्, त्वयि, अस्मान्, आवाभ्याम्, सुपदः, त्वत्, मम,
माम्, एनयोः, एतेषाम्, तस्मिन्, आवयोः— रूपों को सिद्ध करें ।
(१२) अधोलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की व्याख्या करें—
१ पादः पत् । २ योऽचि । ३ द्वितीयायाञ्च । ४ त्वाहौ सौ । ५ तदोः
सः० । ६ समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशाः० । ७ एते वांन्नावादयः० ।
(१३) ऐसा शब्द बताएं जिस के दोनों भ्यसों तथा दोनों 'औ' में रूप वा सिद्धि
का भेद पड़ता हो ।
(यहां दकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
—:०:—
अब थकारान्त पुंल्लिङ्ग का वर्णन करते हैं—
[लघु०] अग्निमत्, अग्निमद् । अग्निमथौ । अग्निमथः ॥
व्याख्या—अग्निं मथ्नातीति—अग्निमत् । अग्निकर्मोपपदाद् मन्थ् विलोडने

(क्र्या० भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातो क्विपि सर्वापहारलोपे अनिदितां हल उपधायाः
क्ङिति (३३४) इति नलोपे च कृते 'अग्निमथ्' इतिशब्द सिद्धयति¹। अग्नि का
मन्थन करने वाला 'अग्निमथ्' कहलाता है । इस की रूपमाला यथा—
प्र० अग्निमत्-द्† अग्निमथौ, अग्निमथ । द्वि० अग्निमथम्, अग्निमथौ,
अग्निमथ । तृ० अग्निमथा अग्निमद्भ्याम्‡, अग्निमद्भिः । च० अग्निमथे, अग्निमद्-
भ्याम् अग्निमद्भ्य । ५० अग्निमथ, अग्निमद्भ्याम्, अग्निमद्भ्य । प० अग्निमथ,
अग्निमथो, अग्निमथाम् । स० अग्निमथि, अग्निमथो, अग्निमत्सु* । स० हेअग्निमत्-द्†,
हे अग्निमथौ , हे अग्निमथ ।
† हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६), झला जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) ।
‡ झला जशोऽन्ते (६७) । * झला जशोऽन्ते (६७), खरि च (७४) ।
(यहा थकारान्त पुल्लिंग्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
——— o ———
अब चकारान्त पुल्लिंग्गो का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विधि सूत्रम्—(३३४) अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति।६।४।२४॥
हलन्तानामन्दितामङ्गानामुपधाया नस्य लोप क्ङिति ङिति । नुँम् ।
संयोगान्तस्य लोप (२०) । नस्य कुत्वेन ङ । प्राङ् । प्राञ्चौ । प्राञ्च ॥
अर्थ.—जिन के इकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती ऐसे हलन्त अङ्गों की उपधा
के नकार का कित् ङित् परे होने पर लोप हो जाता है ।
व्याख्या—अनिदिताम् ।६।३। हल ।६।१। (अङ्गस्य का विशेषण होने से
तदन्तविधि होकर 'हलन्तस्य' बन जाता है) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) ।
उपधाया ।६।१। न ।६।१। (इनान्नलोप मे । यहा षष्ठी का सुक् हुआ है) । लोप.
।१।१। (इनान्नलोप से) । क्ङिति ।७।१। समास — इत् (ह्रस्वेकार) इत् (इत्स-
ञ्ज्ञक) यषान्ते=इदितः, बहुव्रीहिसमास । न इदितः=अनिदित, तेषाम्=अनिदि-
ताम्, नञ्समास । क् च् ङ् च=क्ङौ, इतरेतरद्वन्द्वः । क्ङौ इतौ यस्य स क्ङित्,
तस्मिन्= क्ङिति, बहुव्रीहिसमास. । 'अनिदिताम्' इस प्रकार बहुवचननिर्देश करने से
'हल' और 'अङ्गस्य' दोनों में वचनविपरिणाम अर्थात् बहुवचन हो जाता है । अर्थ —
(अनिदिताम्) जिन के इकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती ऐसे (हल=हलन्तानाम्)
हलन्त (अङ्गस्य=अङ्गानाम्) अङ्गों की (उपधाया ) उपधा के (न=नस्य) नकार
का (लोप ) लोप हो जाता है (क्ङिति) कित् ङित् परे हो तो ।
'प्र' पूर्वक अञ्चुँ गतिपूजनयोः२ (भ्वा० प०) धातु में ऋत्विग्दधृक्० (३०१)
१. इदितो मथेस्तु नलोपाभावाद्—अग्निमन्, अग्निमन्थावित्यादिरूपाणि ज्ञेयानि ।
२. यहा केवल गति अर्थ ही विवक्षित है, पूजन नहीं । अन्यथा नाञ्चेः पूजायाम्
(३४१) से नकारलोप का निषेध हो जायेगा । पूजा अर्थ में रूप आगे दर्शाए
जाएंगे ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४१
सूत्र से क्विन् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो जाने से—'प्र अञ्च्'। अब
यहां प्रत्ययलक्षणद्वारा कित् क्विन् प्रत्यय को मान कर अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति
(३३४) सूत्र से नकार १ का लोप हो जाने पर 'प्र अच्' हुआ। अब इस की प्राति-
पदिकसञ्ज्ञा २ होकर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
प्र अच् + स् (सुं)। उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् का आगम—'प्र अनुँम् च्

  • स्'। 'उम्' अनुबन्ध का लोप होकर 'प्र अन्च् + स्'। हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से
    सुंलोप, संयोगान्तस्य लोपः (२०) से चकारलोप—'प्र अन्'। अब क्विन्प्रत्ययस्य कुः
    (३०४) से नासिकास्थानीय नकार के स्थान पर तादृश ङकार होकर—'प्र अङ्'।
    अकः सवर्णे दीर्घः (४२) सूत्र से सवर्णदीर्घ एकादेश करने पर 'प्राङ्' प्रयोग सिद्ध
    होता है।
    प्र अच् + औ ३। उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम, उम् अनुबन्ध का लोप,
    नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार के स्थान पर अनुस्वार ४ तथा अनुस्वारस्य ययि
    परसवर्णः (७६) से अनुस्वार को परसवर्ण ञकार करने पर—प्र अञ्च् + औ =
    प्राञ्चौ। इसी प्रकार सम्पूर्ण सर्वनामस्थान में प्रक्रिया होती है।
    प्र अच् + अस् (शस्)। सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा न होने से उगिदचाम्० (२८६)
    से नुँम् आगम नहीं हो सकता। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है –
    [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३५) अचः ।६।४।१३८॥
    लुप्तनकारस्याञ्चतेर्भस्याकारस्य लोपः स्यात् ॥
    अर्थः—लुप्त नकार वाली अञ्चु धातु के भसञ्ज्ञक अकार का लोप हो।
    व्याख्या—अचः ।६।१। (यहां 'अच्' से लुप्तनकार वाली अञ्चु धातु का
    निर्देश किया गया है)। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अत् ।६।१। (षष्ठी का
    लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। अर्थः—(अचः) लुप्त नकार वाली
    अञ्चु धातु के (भस्य) भसञ्ज्ञक (अत् = अतः) अकार का (लोपः) लोप हो
    जाता है।
    'प्र अच् + अस्'। यहां 'अच्' यह लुप्तनकार अञ्चु है, यचि भम् (१६५) से
    इस की भसञ्ज्ञा भी है अतः प्रकृतसूत्र से इस के अकार का लोप होकर—'प्र च् +
    अस्'। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
    १. अञ्चु धातु में स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा नकार का ञकार बना है। इस का
    स्पष्टीकरण इस व्याख्या के द्वितीय भाग में संसूं (भ्वा० आ०) धातु पर देखें।
    २. इस प्रकरण में 'प्र अच्, प्रति अच्, समि अच्' इस प्रकार सन्ध्यभाव में ही प्राति-
    पदिकसञ्ज्ञा की जाती है। यह सब शसादियों में अचः (३३५) आदि द्वारा
    अकारलोपादिप्रक्रिया की सुविधा के लिये ही किया जाता है।
    ३. क्विन्, उसका सर्वापहारलोप, अनिदिताम्० (३३४) द्वारा नकारलोप—इतनी
    प्रक्रिया स्वयं सब विभक्तियों में जान लें बार-बार नहीं लिखेंगे।
    ४. नस्य श्चुत्वन्तु न भवति, अनुस्वारं प्रति श्चुत्वस्यासिद्धत्वात्।

४४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३६) चौ ।६।३।१३७॥
लुप्ताकारनकारेऽञ्चतौ परे पूर्वस्याणो दीर्घः स्यात् । प्राचः । प्राचा ।
प्राग्भ्याम् । प्रत्यङ् । प्रत्यञ्चौ । प्रतीचः । प्रत्यग्भ्याम् । उदङ् । उदञ्चौ ॥
अर्थ—लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु पर हो तो पूर्व अण् को दीर्घ
आदेश हो ।
व्याख्या—चौ ।७।१। (यहां 'चु' से लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु
का ग्रहण अभिप्रेत है) । पूर्वस्य ।६।१। अणः ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से) । अर्थ—(चौ) लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु के पर होने
पर (पूर्वस्य) पूर्व (अणः) अण् के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है ।
प्र च्+अस् यहां लुप्ताकारनकारवाली 'च्' यह अञ्चु धातु परे है अतः
पूर्व अण् अर्थात् 'प्र' के रेफोत्तर अकार को दीर्घ होकर—प्राच्+अस् = 'प्राचः'
प्रयोग सिद्ध होता है । इसी प्रकार आगे भी भसंज्ञकों में जान लेना चाहिये ।
नोट—यद्यपि यहां अचः (३३५) और चौ (३३६) सूत्रों के बिना भी 'प्र
अच्+अस्' इस अवस्था में अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ होकर 'प्राचः'
प्रयोग सिद्ध हो सकता था तथापि इन सूत्रों की 'प्रतीचः' आदि के लिये परम आव-
श्यकता थी अतः यहां भी न्यायवशात् प्रवृत्ति दिखा दी है ।
'प्र+अञ्च्' (उत्तमरीति से या पहले चलने वाला अथवा पूर्व के देश, काल,
जन आदि) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः | प० प्राक् प्राग्भ्याम् प्राग्भ्यः
द्वि० प्राञ्चम् ,, प्राचः | ष० ,, प्राचोः प्राचाम्
तृ० प्राचा प्राग्भ्याम्* प्राग्भिः | स० प्राचि ,, प्राक्षु†
च० प्राचे ,, प्राग्भ्यः | सं० हे प्राङ् ! हे प्राञ्चौ ! हे प्राञ्चः !
*यहां चोः कुः (३०६) की दृष्टि में क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) तथा झलां
जशोऽन्ते (६७) दोनों के असिद्ध होने से प्रथम चकार को ककार होकर पुनः झलां
जशोऽन्ते (६७) से गकार करने पर 'प्राग्भ्याम्' आदि रूप सिद्ध होते हैं । यहां पर
भत्व न होने से अचः (३३५) तथा चौ (३३६) न होंगे, सवर्णदीर्घ हो कर उक्त
प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं । इसी प्रकार हलादि विभक्तियों में आगे भी प्रक्रिया जाननी
चाहिये ।
†यहां चोः कुः (३०६) द्वारा कुत्व होकर आदेशप्रत्यययोः (१५०) से सकार
को षकार हो जाता है ।
'प्रति' पूर्वक अञ्चु धातु से ऋत्विग्दधृक्० (२०१) से क्विन्, उस का सर्वा-
पहारलोप तथा अनिदितां हलः (३३८) से नकारलोप होकर प्रातिपदिकसञ्ज्ञा
करने से सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं ।
प्रति अच्+स् (सुँ) । उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम, उँम् अनुबन्ध

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४३
का लोप, सुं-लोप तथा संयोगान्तस्य लोपः (२०) से चकारलोप हो 'प्रति अन्' । अब
क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार तथा इको यणचि (१५) से यण्
करने से 'प्रत्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः—आदि में पूर्ववत् अनु-
स्वार-परसवर्ण प्रक्रिया जाननी चाहिये ।
'प्रति अच्+अस्' (शस्)। यहां अचः (३३५) से अकारलोप तथा चौ (३३६)
से पूर्व अण् अर्थात् 'प्रति' के अन्त वाले इकार को दीर्घ होकर—'प्रतीचः' प्रयोग
सिद्ध होता है ।
'प्रति अच्+भ्याम्' यहां चोः कुः (३०६) से चकार को ककार तथा झलां
जशोऽन्ते (६७) से ककार को गकार होकर यण् करने से—'प्रत्यग्भ्याम्' । 'प्रति+
अच्' (पीछे या विपरीत जाने वाला अथवा पश्चिम के देश, काल, जन आदि) शब्द
की रूपमाला यथा—
प्र० प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्चः प० प्रतीचः प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्भ्यः
द्वि० प्रत्यञ्चम् " प्रतीचः प० " प्रतीचोः प्रतीचाम्
तृ० प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्भिः स० प्रतीचि " प्रत्यक्षु
च० प्रतीचे " प्रत्यग्भ्यः सं० हे प्रत्यङ् ! प्रत्यञ्चौ ! प्रत्यञ्चः !
'उद्' पूर्वक 'अञ्चुँ' धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) द्वारा क्विन्, उस का
सर्वापहारलोप, नकारलोप तथा प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
उद् अच्+स् । यहां उगिदचाम्० (२८६) से नुम् आगम, उँम् अनुबन्ध का
लोप, सुंलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार
होकर—'उदङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । उदञ्चौ, उदञ्चः आदि पूर्ववत् जानें ।
उद् अच्+अस् (शस्) । यहां अचः (३३५) सूत्र द्वारा अकार का लोप
प्राप्त होता है, इस पर अग्रिम अपवाद-सूत्र प्रवृत्त हो जाता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३७) उद ईत् ।६।४।१३६॥
उच्छब्दात् परस्य लुप्तनकाराञ्चतेर्भस्याकारस्य ईत् । उदीचः ।
उदीचा । उदग्भ्याम् ॥
अर्थः—'उद्' से परे लुप्त नकार वाली अञ्चुँ धातु के भसञ्ज्ञक अकार को
ईकार हो जाता है ।
व्याख्या—उदः ।५।१। अचः ।६।१। (अचः से) । भस्य ।६।१। (यह अधि-
कृत है) । अत् ।६।१। (अल्लोपोऽनः से) । ईत् ।१।१। अर्थः—(उदः) उद् से परे
(अचः) लुप्त नकार वाली अञ्चुँ धातु के (भस्य) भसञ्ज्ञक (अत्=अतः) अकार के
स्थान पर (ईत्) ईकार आदेश हो जाता है।
उद् अच्+अस् । यहां प्रकृतसूत्र से अकार को ईकार होकर—उद् ईच्+
अस्='उदीचः' प्रयोग सिद्ध होता है । 'उदच्' (ऊपर जाने वाला अथवा उत्तर के
देश, काल, जन आदि) शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—

४४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्र० उदङ् उदञ्चौ उदञ्चः प० उदीचः उदग्भ्याम् उदग्भ्यः
द्वि० उदञ्चम् ,, उदीचः प० ,, उदीचोः उदीचाम्
तृ० उदीचा उदग्भ्याम् उदग्भिः स० उदीचि ,, उदक्षु
च० उदीचे ,, उदग्भ्यः स० हे उदङ् । उदञ्चौ । उदञ्चः ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३८) समः समि ।६।३।९२॥
वप्रत्ययान्तेऽञ्चतौ परे [समः सम्यादादेशः स्यात्] । सम्यङ् । सम्यञ्चौ ।
समीचः । सम्यग्भ्याम् ॥
अर्थ —वप्रत्ययान्त अञ्चुं धातु परे हो तो सम् को समि आदेश हो।
व्याख्या—वप्रत्यय' ।७।१। (विश्वग्देवयोश्च टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये मे)। अञ्चतौ
।७।१। (विश्वग्देवयोश्च० से) । समः ।६।१। समि ।१।१। (नपुंसक मे निर्देश किया
गया है) । समास —वः प्रत्ययो यस्मात् स वप्रत्ययः । तस्मिन्=वप्रत्यये । बहुव्रीहि-
समास । 'व्' से यहाँ क्विन्, क्विप् आदि वकारघटित प्रत्यय अभिप्रेत हैं। अर्थः—
(वप्रत्यये) जिस से 'व्' प्रत्यय किया गया हो ऐसे (अञ्चतौ) अञ्चुं धातु के परे होने
पर (समः) सम् के स्थान पर (समि) समि आदेश हो जाता है ।
'समि' में इकार अनुनासिक नहीं अतः उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से
उस की इत्संज्ञा नहीं होती ।
'सम्' पूर्वक 'अञ्चुँ' धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) द्वारा क्विन्, उस का
सर्वापहारलोप तथा अनिदितां हलः ० (३३४) से नकारलोप होकर—'सम् अच्' । अब
वप्रत्ययान्त या अप्रत्ययान्त 'अञ्चुँ' परे होने के कारण समः समि (३३८) द्वारा सम्
को समि आदेश होकर प्रातिपदिकसंज्ञा करने से सुं आदि की उत्पत्ति होती है—
समि अच्+स् । उगिदचां० (२८६) से नुम्, उँम् अनुबन्ध का लोप, सुं-
लोप तथा संयोगान्तलोप होकर—'समि अङ्' । क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार
को ङकार तथा इको यणचि (१५) से यण् करने पर—'सम्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता
है । सम्यञ्चौ, सम्यञ्चः —यहाँ पूर्ववत् नुम्, अनुस्वार तथा परसवर्ण जानें ।
समि अच्+अस् (शस्) । अ्रश्चः (३३५) से अकारलोप तथा चौ (३३६) से
पूर्व इकार को दीर्घ करने से—'समीचः' । 'सम्यच्' (ठीक चलने वाला) शब्द की
समग्र रूपमाला यथा—
१. कई लोग विश्वग्देवयोश्च टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये (६ ३ ९१) ऐसा पाठ मान कर
समः समि(३३८) सूत्र में 'प्रत्यये' का अनुवर्त्तन करते हैं। तब इस सूत्र का—
अविद्यमान-प्रत्ययान्त अञ्चुं धातु के परे होने पर सम् को समि आदेश हो—
ऐसा अर्थ होता है । 'अविद्यमान प्रत्यय' से क्विन् क्विप् आदि प्रत्ययों का ही
ग्रहण होता है, क्योंकि ये प्रत्यय सर्वापहारलोप के कारण सदा अविद्यमान ही
रहते हैं ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४५
प्र० सम्यङ् सम्यञ्चौ सम्यञ्चः । प० समीचः सम्यग्भ्याम् सम्यग्भ्यः
द्वि० सम्यञ्चम् " समीचः ष० " समीचोः समीचाम्
तृ० समीचा सम्यग्भ्याम् सम्यग्भिः स० समीचि " सम्यक्षु
च० समीचे " सम्यग्भ्यः सं० हे सम्यङ् ! सम्यञ्चौ ! सम्यञ्चः!
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३६) सहस्य सध्रिः ।६।३।६४॥
वप्रत्ययान्तेऽञ्चतौ परे [सहस्य सध्र्यादेशः स्यात्]। सध्र्यङ् ॥
अर्थः—वप्रत्ययान्त अञ्चु धातु परे होने पर 'सह' के स्थान पर 'सध्रि'
आदेश हो।
व्याख्या—वप्रत्ययान्ते ।७।१। अञ्चतौ ।७।१। (विष्वग्देवयोश्च० से)। सहस्य
।६।१। सध्रिः ।१।१। अर्थः—(वप्रत्यये) जिस से 'व्' प्रत्यय किया गया हो ऐसे
(अञ्चतौ) अञ्चु धातु के परे होने पर (सहस्य) 'सह' के स्थान पर (सध्रिः) 'सध्रि'
आदेश हो। अनेकाल्परिभाषा से यह सर्वादेश होगा।
यहां भी अनुनासिक न होने से सध्रि के इकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती।
'सह' पूर्वक 'अञ्चु' धातु से पूर्ववत् क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, नकारलोप
तथा सहस्य सध्रिः (३३६) ने 'सह' के स्थान पर 'सध्रि' आदेश होकर—'सध्रि
अच्' । अब प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर सुं आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति होती है।
सध्रि अच् + सु । नुँम् आगम, उँम्लोप, सुँलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्य-
यस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार करने से—सध्रि अङ् = 'सध्रयङ्' प्रयोग सिद्ध
होता है। सध्रयञ्चौ, सध्रयञ्चः—आदि में पूर्ववत् 'अनुस्वारपरसवर्ण' कर लेने
चाहियें।
सध्रि अच् + अस् (शस्) । अचः (३३५) द्वारा अकारलोप तथा चौ (३३६)
द्वारा पूर्व अण् इकार को दीर्घ करने से 'सध्रीचः' ।
'सध्रयच्' (साथ चलने वाला, साथी) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सध्रयङ् सध्रयञ्चौ सध्रयञ्चः प० सध्रीचः सध्रयग्भ्याम् सध्रयग्भ्यः
द्वि० सध्रयञ्चम् " सध्रीचः ष० " सध्रीचोः सध्रीचाम्
तृ० सध्रीचा सध्रयग्भ्याम् सध्रयग्भिः स० सध्रीचि " सध्रयक्षु
च० सध्रीचे " सध्रयग्भ्यः सं० हे सध्रयङ्! सध्रयञ्चौ! सध्रयञ्चः!
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४०) तिरसस्तिर्यलोपे ।६।३।६३॥
अलुप्ताकारेऽञ्चतौ वप्रत्ययान्ते परे तिरसस्तिर्यादेशः स्यात् । तिर्यङ् ।
तिर्यञ्चौ । तिरश्चः । तिर्यग्भ्याम् ॥
अर्थः—जिस के अकार का लोप नहीं हुआ ऐसी वप्रत्ययान्त अञ्चु धातु के
परे होने पर 'तिरस्' को 'तिरि' आदेश हो।
व्याख्या—अलोपे ।७।१। वप्रत्यये ।७।१। अञ्चतौ ।७।१। (विष्वग्देवयोश्च

४४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये से)। तिरस् ।६।१। तिरि ।१।१। समास —नास्ति लोपो यस्य
सोऽलोपस्तस्मिन् = अलोपे । नञ्बहुव्रीहिसमास । यहां लोप से तात्पर्य चो (३३६)
द्वारा किये अकारलोप से ही है । अर्थ —(अलोपे) अलुप्त अकार वाली (वप्रत्यये)
वप्रत्ययान्त (अञ्चतौ) अञ्चु धातु के परे होने पर (तिरस् ) तिरस् के स्थान पर
(तिरि) तिरि आदेश हो जाता है ।
अञ्चु धातु के अकार का लोप भसञ्ज्ञको में अचः (३३५) सूत्र द्वारा हुआ
करता है । अतः भसञ्ज्ञा के अभाव मे ही तिरस् को तिरि यह आदेश होता है ।
भसञ्ज्ञकों मे 'तिरि' आदेश नही होता ।
'तिरस्' पूर्वक 'अञ्चु' धातु से क्विन्, उस का सर्वापहार लोप, नकारलोप,
तिरसस्तिर्यलोपे (३४०) से तिरस् के स्थान पर तिरि आदेश होकर—'तिरि अच्' ।
अब सुँ प्रत्यय आकर नुम् आगम, उम्-लोप, सुँलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य
कुः (३०४) से कुत्व अर्थात् नकार को ङकारादेश और पुनः इको यणचि (१५) मे
यण् होकर 'तिर्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'तिरस् + अच्' (टेढ़ा चलने वाला अर्थात् जो मनुष्य की तरह सीधा खड़ा हो
कर नही चलता—पशु पक्षी आदि) की रूपमाला यथा—
प्र० तिर्यङ् तिर्यञ्चौ तिर्यञ्चः | प० तिरश्च तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भ्यः
द्वि० तिर्यञ्चम् ,, तिरश्च † | ष० ,, तिरश्चोः तिरश्चाम्
तृ० तिरश्चा तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भिः | स० तिरश्चि ,, तिर्यक्षु
च० तिरश्चे ,, तिर्यग्भ्यः | सं० हे तिर्यङ् ! तिर्यञ्चौ ! तिर्यञ्च !
† तिरस् अच् + अस् । यहां अचः (३३५) सूत्र से अकार का लोप होकर
स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से श्चुत्व हो जाता है। इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों मे
समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि इन स्थानो पर 'तिरि' नही होगा, क्योकि यहाँ
अकार का लोप है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४१) नाञ्चेः पूजायाम् ।६।४।३०॥
पूजार्थस्याञ्चतेरुपधाया नस्य लोपो न । प्राङ् । प्राञ्चौ । नलोपा-
भावादल्लोपो न । प्राञ्चः । प्राङ्भ्याम् । प्राङ्क्षु । एवम् पूजार्थे प्रत्यङ्ङा-
दयः ॥
अर्थ—पूजार्थक 'अञ्चु' धातु के उपधाभूत नकार का लोप नही होता ।
व्याख्या—पूजायाम् ।७।१। अञ्चेः ।६।१। उपधायाः ।६।१। (अनिदितां हल
उपधायाः से) । न ।६।१। (श्नान्नलोप से, यहां षष्ठी का लुक् हुआ है) । लोपः
।१।१। (श्नान्नलोपः से)। न इत्यव्ययपदम् । अर्थ—(पूजायाम्) पूजा अर्थ मे (अञ्चेः)
अञ्चु धातु के (उपधायाः) उपधा के (न = नस्य) नकार का (लोपः) लोप (न)
नही होता ।
अञ्चु धातु के दो अर्थ होते हैं । एक गति और दूसरा पूजा । पूजा अर्थ मे

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४७
अनिदिताम्० (३३४) द्वारा नकारलोप प्राप्त होने पर नाञ्चेः पूजायाम् (३४१) से
निषेध कर दिया जाता हैं। अतः गति अर्थ होने पर ही नकार का लोप होता है पूजा
अर्थ में नहीं। पीछे 'प्राङ्' से लेकर 'तिर्यङ्' तक सर्वत्र गत्यर्थक अञ्चुं धातु का ही
प्रयोग हुआ है। अब पूजा अर्थ में प्रयोग दिखलाते हैं—
प्राञ्च्—'प्र' पूर्वक पूजार्थक 'अञ्चुं' धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप,
अनिदितां हलः० (३३४) मे उपधाभूत नकार का लोप प्राप्त होने पर—नाञ्चेः पूजा-
याम् (३४१) से निषेध, सवर्णदीर्घ हो कर प्रातिपदिक संज्ञा करने से सुं आदि प्रत्यय
उत्पन्न होते हैं। नलोपी अञ्चुं न होने से उगिदचाम्० (२८६) वाला नुंम् भी न होगा।
प्राञ्च् + स् । सुंलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से
नकार को ङकार होकर—प्राङ् ।
नोट—नकारलोप के निषेध का फल शसादियों में स्पष्ट होता है। सर्वनाम-
स्थान तक तो गत्यर्थक और पूजार्थक दोनों अवस्थाओं में प्रक्रियाओं का अन्तर होने
पर भी रूप एक समान होते हैं !
पूजायाम्—'प्राञ्च्' (उत्तमरीति से पूजा करने वाला) १
प्र० प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः | प० प्राञ्चः प्राङ्भ्याम् प्राङ्भ्यः
द्वि० प्राञ्चम् ,, ,, † | ष० ,, प्राञ्चोः प्राञ्चाम्
तृ० प्राञ्चा प्राङ्भ्याम् ‡ प्राङ्गिः | स० प्राञ्चि ,, प्राङ्ख्पु,-क्षु,-पु*
च० प्राञ्चे ,, प्राङ्भ्यः | सं० हे प्राङ् ! हे प्राञ्चौ ! हे प्राञ्चः !
† 'प्राञ्च् + अस्' यहां नकारलोप न होने से अचः (३३५) द्वारा भसंज्ञक
अकार का भी लोप नहीं होता, उस के अर्थ में 'लुप्तनकारस्याञ्चतेः' ऐसा लिख चुके हैं।
फिर चौ (३३६) से दीर्घ भी नहीं होता। किन्तु सवर्णदीर्घ होकर कार्यनिष्पत्ति
होती है।
‡ 'प्राञ्च् + भ्याम्' यहाँ संयोगान्तलोप होकर क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४)
द्वारा नकार को ङकार हो जाता है।

  • 'प्राञ्च् + सु' यहां संयोगान्तलोप तथा नकार को ङकार हो—ङ्णोः कुक्टुक्
    शरि (८६) द्वारा विकल्प कर के कुँक् आगम होकर एकपक्ष में चयो द्वितीयाः शरि०
    (वा० १४) वार्तिक द्वारा ककार को खकार हो जाता है। पुनः दोनों पक्षों में आदेश-
    प्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो जाता है।
    पूजायाम्—'प्रत्यञ्च्' (विपरीत रीति से पूजा करने वाला)
    प्र० प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्चः | प० प्रत्यञ्चः प्रत्यङ्भ्याम् प्रत्यङ्भ्यः
    द्वि० प्रत्यञ्चम् ,, ,, | ष० ,, प्रत्यञ्चोः प्रत्यञ्चाम्
    तृ० प्रत्यञ्चा प्रत्यङ्भ्याम् प्रत्यङ्गिः | स० प्रत्यञ्चि ,, प्रत्यङ्ख्पु,-क्षु,-पु
    च० प्रत्यञ्चे ,, प्रत्यङ्भ्यः | सं० हे प्रत्यङ् ! हे प्रत्यञ्चौ ! हे प्रत्यञ्चः !
    १. इन शब्दों के पूजा अर्थ में प्रयोग अन्वेष्टव्य हैं।

४४८ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
पूजायाम्—‘उदञ्च्’ (उत्कृष्ट रीति से पूजा करने वाला)
प्र० उदङ् उदञ्चौ उदञ्चः प० उदञ्चः उदङ्भ्याम् उदङ्भ्यः
द्वि० उदञ्चम् ,, ,, प० ,, उदञ्चो उदञ्चाम्
तृ० उदञ्चा उदङ्भ्याम् उदङ्भिः स० उदञ्चि ,, उदङ्क्षु,-क्षु,-पु
च० उदञ्चे ,, उदङ्भ्य स० हे उदङ् ! हे उदञ्चौ ! हे उदञ्चः !
नकारलोप न होने से शसादियो मे उद ईत् (३३७) सूत्र प्रवृत्त न होगा।
पूजायाम्—‘सम्यञ्च्’ (सम्यग्रीति से पूजा करने वाला)
प्र० सम्यङ् सम्यञ्चौ सम्यञ्चः प० सम्यञ्चः सम्यङ्भ्याम् सम्यङ्भ्यः
द्वि० सम्यञ्चम् ,, ,, प० ,, सम्यञ्चो सम्यञ्चाम्
तृ० सम्यञ्चा सम्यग्भ्याम् सम्यग्भिः स० सम्यञ्चि ,, सम्यङ्क्षु,-क्षु,-पु
च० सम्यञ्चे ,, सम्यङ्भ्यः स० हे सम्यङ् ! सम्यञ्चौ ! सम्यञ्चः !
भसंज्ञको मे अकार का लोप तथा दीर्घ न होगा। समः समि (३३८) तो लोप
वा अलोप दोनो पक्षों मे सर्वत्र हो ही जाता है।
पूजाया—‘सध्र्यञ्च्’ (साथ पूजा करने वाला)
प्र० सध्रयङ् सध्रयञ्चौ सध्रयञ्च प० सध्रयञ्च सध्रनङ्भ्याम् सध्रयङ्भ्य
द्वि० सध्रयञ्चम् ,, ,, प० ,, सध्रयञ्चो सध्रचञ्चाम्
तृ० सध्रयञ्चा सञ्चड्म्याम् सध्रयङ्भि स० सध्रयञ्चि ,, सध्रयङ्क्षु,-क्षु, पु
च० सध्रयञ्चे ,, सध्रयङ्भ्य सं० हे सध्रयङ् ! सध्रयञ्चौ ! सध्रयञ्च !
भत्व मे अचः (३३५) से अ का लोप तथा चौ (३३६) से दीर्घ न होगा।
‘सधि’ तो लोप तथा अलोप दोनों मे ही सर्वत्र हो जाता है।
पूजाया—‘तिर्यञ्च्’ (विपरीत रीति मे पूजा करने वाला)
प्र० तिर्यङ् तिर्यञ्चौ तिर्यञ्च प० तिर्यञ्च तिर्यङ्भ्याम् तिर्यट्ग्य
द्वि० तिर्यञ्चम , ,, प० ,, तिर्यञ्चो तिर्यञ्चाम्
तृ० तिर्यञ्चा तिर्यट्भ्याम तिर्यग्भि स० निर्यञ्चि ,, तिर्यङ्सु,-क्षु,-पु
च० न्त्यञ्चे ,, तिर्यट्ग्य स० हे तिर्यङ् ! हे तिर्यञ्चौ ! हे तिर्यञ्च !
ट्म मे नकारलोप न होने से अचः (३३५) द्वारा अकारलोप कही नही होता,
अन तिरसस्तिर्यलोपे (३४०) द्वारा सर्वत्र ‘तिरि’ आदेश हो जाता है।
[लघु०] क्रुङ् । क्रुञ्चौ । क्रुङ्भ्याम् ॥
व्याख्या—क्रुञ्च गतिशौटिल्याल्पीभावयो (भ्वा० प०) धातु मे ऋत्विग्दधृक्०
(३०१) द्वारा क्विन्-प्रत्यय उसका सर्वापहारलोप तथा अनिदिताम्० (३३४) द्वारा
नलोप प्राप्त होने पर नत्वभाव का निपातन करने से ‘क्रुञ्च्’ (क्रौञ्चपक्षी) शब्द निष्पन्न
होता है। भाष्यकार के मत मे यह आपद्य धातु है; अत लोप की प्राप्ति ही नही।
क्रुञ्च्+स् (सुं) । हल्ङ्यादिलोप तथा संयोगान्तलोप होकर निमित्तापाये
नैमित्तिकस्याप्यपाय के अनुसार वकार को नकार हो जाता है—क्रुन् । अब क्विन्प्रत्यय-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४६
यस्य कुः (३०४) से नकार को कुत्व-ङकार होकर—'क्रुङ्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
भ्याम् आदि में संयोगान्तलोप होकर कुत्व हो जाता है—क्रुङ्भ्याम् आदि ।
सुप् में संयोगान्तलोप तथा कुत्व होकर—क्रुङ् + सु । अब वैकल्पिक कुँक् हो
पक्ष में ककार को खकार हो जाता है । पुन: दोनों पक्षों में षत्व हो—क्रुङ्ख्षु,
क्रुङ्क्षु । कुँक् के अभाव में—क्रुङ्क्षु । तीन रूप सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा –
प्र० क्रुङ् क्रुञ्चौ क्रुञ्चः प० क्रुञ्चः क्रुङ्भ्याम् क्रुङ्भ्यः
द्वि० क्रुञ्चम् " " प० " क्रुञ्चोः क्रुञ्चाम्
तृ० क्रुञ्चा क्रुङ्भ्याम् क्रुङ्गिः स० क्रुञ्चि " क्रुङ्ख्षु,-क्षु,-षु
च० क्रुञ्चे " क्रुङ्भ्यः सं० हे क्रुङ् ! क्रुञ्चौ ! क्रुञ्चः !
[लघु०] पयोमुक्, पयोमुग् । पयोमुचौ । पयोमुग्भ्याम् ॥
व्याख्या—पयो जलं मुञ्चतीति—पयोमुक् [क्विँप्प्रत्ययान्तः] । 'पयोमुच्'
शब्द क्विबन्त नहीं किन्तु क्विब्वन्त है अतः सर्वत्र पदान्त में चोः कुः (३०६) प्रवृत्त
होता है । पयोमुच् (बादल) शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० पयोमुक्-ग्† पयोमुचौ पयोमुचः प० पयोमुचः पयोमुग्भ्याम् पयोमुग्भ्यः
द्वि० पयोमुचम् " " प० " पयोमुचोः पयोमुचाम्
तृ० पयोमुचा पयोमुग्भ्याम्‡ पयोमुग्भिः स० पयोमुचि " पयोमुक्षु*
च० पयोमुचे " पयोमुग्भ्यः सं० हे पयोमुक्-ग्! पयोमुचौ! पयोमुचः!
†हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६), चोः कुः (३०६), झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने
(१४६) ।
‡चोः कुः (३०६), झलां जशोऽन्ते (६७) ।
*चोः कुः (३०६), झलां जशोऽन्ते (६७), खरि च (७४) ।
अभ्यास (४३)
(१) अप्रत्यय और वप्रत्यय से क्या अभिप्राय है ? स्पष्ट करें ।
(२) पूजापक्ष में अञ्चुं का नकारलोप (?) किस सूत्र से हो जाता है ?
(३) 'क्रुञ्च्' से 'क्विन्' होने पर भी नकार का लोप क्यों नहीं होता ?
(४) पूजापक्ष में शसादि में 'तिर्यञ्च्' शब्द की भसञ्ज्ञा होने पर भी अचः
द्वारा अकार का लोप क्यों नही होता ?
(५) 'उदञ्च्' के पूजापक्ष में उद ईत् सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ?
(६) 'प्र+अच्, प्रति+अच्, समि+अच्' इस प्रकार सन्ध्यभाव में ही.
इन की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने का क्या प्रयोजन है ?
(७) निम्नलिखित रूपों की सूत्रोपन्यासपूर्वक साधनप्रक्रिया दर्शाएं—
१ प्राचः, २ प्रतीचः, ३ उदीचः, ४ समीचः, ५ तिरश्चः, ६ पयोमुक्,
७ अग्निमत्, ८ प्राङ्खषु, ६ तिर्यङ्, १० प्राङ् ।
ल० प्र० (२६)

(८) निम्नलिखित शब्दों की रूपमाला लिखें—
१ क्रुञ्च्, २ अग्निमथ्, ३ सह+अञ्च् (दोनों पक्षों में), ४ तिरस्+
अञ्च् (दोनों पक्षों में) ५ प्रति+अञ्च् (दोनों पक्षों में) ।
(६) निम्नलिखित सूत्रों की व्याख्या करें—
१ अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति । २ अचः । ३ घोः । ४ तिरस-
स्तिर्यलोपे । ५ उद ईत् । ६ सहस्य सधिः ।
(यहाँ चकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
० —— ०
अब तकारान्त पुंलिङ्गों का वर्णन करते हैं—
[लघु०] उगित्वान्नुम् ॥
व्याख्या—महत् (बड़ा) शब्द वर्तमाने पृषद्-बृहन्महज्जगच् शतृवच्च (उणा०
२४१) इस औणादिक सूत्र द्वारा मह् पूजायाम् (भ्वा० प०) धातु से अति प्रत्यय कर
निपातित किया गया है और साथ ही इसे शतृ-प्रत्यय के समान आदिष्ट भी किया गया
है । शतृ प्रत्यय अन्त्य ऋकार के इत् होने से उगित् है । इस प्रकार महत् शब्द को भी
उगित् मान कर उगित्कार्य नुम् आदि हो जायेंगे ।
महत्+सुं (स्) । शतृवत् अतिदेश के कारण उगित् होने से उगिदचां सर्व-
नामस्थानेऽधातोः (२८६) से नुँम् का आगम होकर—मह् नुँम् त्+स्=महन्त्+
स् । अब निम्नस्थ सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधिसूत्रम्—(३४२) सान्त महतः संयोगस्य ।६।४।१०॥
सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्योपधाया दीर्घः स्यादासम्बुद्धौ
सर्वनामस्थाने । महान् । महान्तौ । महान्तः । हे महन् ! । महद्भ्याम् ॥
अर्थ —सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर सकारान्त संयोग के तथा महत्
शब्द के नकार की उपधा को दीर्घ हो जाता है ।
व्याख्या—सान्तः ।६।१। (यहाँ षष्ठीविभक्ति का लुक् हुआ है । यह ‘संयोगस्य’
का विशेषण है) । संयोगस्य ।६।१। महत् ।६।१। न ।६।१। (नोपधायाः से । यहाँ षष्ठी
का लुक् हुआ है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से ) । दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)।
अर्थ — (सान्तः) सकारान्त (संयोगस्य) संयोग के तथा (महतः) महत् शब्द के
(न—नस्य) नकार की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ आदेश
हो जाता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर ।
सकारान्त संयोग के नकार की उपधा को दीर्घ करने के उदाहरण आगे—विद्वांसौ,
विद्वांसः, यशांसि, मनांसि आदि आएँगे ।
'महन्त् +स्' । यहाँ प्रकृतसूत्र से महत् शब्द के अवयव नकार की उपधा—
हकारोत्तर अकार को दीर्घ होकर—'महान्त् +स्' । अब सुँलोप तथा संयोगान्तलोप

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५१
होकर 'महान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोर्गान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप
नहीं होता। 'महत्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० महान् महान्तौ महान्तः | प० महतः महद्भ्याम् महद्भ्यः
द्वि० महान्तम् " महतः | ष० " महतोः महताम्
तृ० महता महद्भ्याम्‡ महद्भिः | स० महति " महत्सु
च० महते " महद्भ्यः | सं० हे महन्*! हे महान्तौ! हे महान्तः!
†उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् तथा सान्तमहतः० (३४२) से नकार की
उपधा को दीर्घ होकर अनुस्वार (७८) और परसवर्ण (७६) हो जाते हैं।
‡झलां जशोऽन्ते (६७) से तकार को जश्त्व-दकार हो जाता हैं।
*उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् होकर सुँलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाते
हैं। सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) प्रवृत्त नहीं होता।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४३) अत्वसन्तस्य चाधातोः।६।४।१४॥
अत्वन्तस्योपधाया दीर्घो धातुभिन्नाऽसन्तस्य चाऽसम्बुद्धौ सौ परे।
धीमान्। धीमन्तौ। धीमन्तः। हे धीमन्! । शसादौ महद्वत्॥
अर्थः—सम्बुद्धि-भिन्न सुँ परे होने पर, 'अतुँ' जिस के अन्त में हो उस की उपधा
को दीर्घ होता है एवम् धातु को छोड़कर 'अस्' जिस के अन्त में हो उसकी उपधा को
भी दीर्घ हो जाता है।
व्याख्या—अतुँ ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है। अङ्गस्य का विशेषण
होने से तदन्तविधि होकर 'अत्वन्तस्य' बन जाता है)। असन्तस्य ।६।१। च इत्यव्यय-
पदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः
।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)।
सौ ।७।१। (सौ च से)। अर्थः — (अतु-अन्तस्य) अत्वन्त (अङ्गस्य) अङ्ग की (च)
तथा (अधातोः) धातुभिन्न (असन्तस्य) अस् अन्त वाले (अङ्गस्य) अङ्ग की (उपधायाः)
उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुँ परे हो तो।
'अतुँ' से 'मतुँप्, वतुँप्, डवतुँ, क्तवतुँ' आदि प्रत्ययों का ग्रहण होता है। 'अस्-
अन्त' का उदाहरण आगे मूल में ही 'वेधाः' आदि पर स्पष्ट हो जायेगा। यहां अत्वन्त
का उदाहरण दर्शाया जाता है—
धीमत् (बुद्धिमान्)। धीरस्त्यस्येति धीमान्। 'धी' शब्द से तदस्यास्त्यस्मिन्निति
मतुँप् (११८१) सूत्र द्वारा मतुँप् प्रत्यय करने पर 'धीमत्' शब्द निष्पन्न होता है।
'धीमत् + सुँ' यहां धीमत् शब्द के अतु + अन्त (मतुँ = म् + अतुँ) होने से
प्रथम¹ अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) से उपधादीर्घ होकर—धीमात् + सुँ। पुनः
१. ध्यान रहे कि 'धीमत् + सुँ' में अत्वसन्तस्य० (३४३) द्वारा उपधादीर्घ तथा
उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम युगपत् प्राप्त होते हैं। नुँम् आगम नित्य
तथा पर होने पर भी प्रथम नहीं होता। क्योंकि यदि ऐसा किया जाये तो सर्वत्र