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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 633 में से

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पृष्ठ 453

उस तुझे नमस्कार हो)। यहां अन्वादेश होने से 'तुभ्यम्' के स्थान पर नित्य 'ते'
आदेश हो जाता है विकल्प नहीं होता ।
यहां पाणिनि के और भी दो नियम जानने आवश्यक हैं—
(१) न चवाहाहैवैयोगे (८।१।२४) । अर्थात् यदि 'च, वा, ह, अह, एव'
इन पांचों में से किसी अव्यय का युष्मद् और अस्मद् के साथ साक्षात् योग हो तो
ये वाम्, नौ आदि आदेश नहीं होते । यथा—हरिस्त्वा मा च रक्षतु । यहां 'त्वाम्,
माम्' के स्थान पर 'त्वा, मा' आदेश नहीं होते क्योंकि 'च' का योग है। मा मय्या
इदं पुस्तकं ममैवास्तीति । यहां 'मम' के स्थान पर 'मे' आदेश न होगा क्योंकि 'एव'
का योग है ।
(२) पश्यार्थैश्चानालोचने (८।१।२५) । अर्थात् अचाक्षुष ज्ञानार्थक धातुओं
के योग में ये आदेश नहीं होते । यथा—चेतसा त्वा समीक्षते (वह मन से तुझे देखता
है) । यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' नहीं हुआ । क्योंकि देखना आंखों से नहीं हो रहा ।
(यहां युष्मद् अस्मद् शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] सुपात्, सुपाद् । सुपादौ ॥
व्याख्या—सु = शोभनौ पादौ यस्य सः = सुपात् । बहुव्रीहिसमासः । सङ्ख्या-
सुपूर्वस्य (५।४।१४०) इतिपादस्यान्त्यलोपः समासान्तः । सुन्दर पैरों वाले को 'सुपाद्'
कहते हैं ।
सुपाद्+स्(सुं) । यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो
कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने से—सुपात्, सुपाद् ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३३) पादः पत् ।६।४।१३०॥
पाच्छब्दान्तं यदङ्गं भं तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः स्यात् ।
सुपदः । सुपदा । सुपाद्भ्याम् ॥
अर्थः—'पाद्'शब्दान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्'
आदेश होता है ।
व्याख्या—पादः ।६।१। (यह अङ्गस्य का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि
होकर 'पादन्तस्य' बन जाता है) । भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। पद् ।१।१। अर्थः—(पाद = पादन्तस्य) 'पाद्' अन्त वाले (भस्य)
भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (पद्) पद् आदेश हो जाता है ।
निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति इस पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार 'पाद्' के स्थान
पर ही 'पद्' यह सर्वादेश होगा ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां यचि भम् (१६५) के अनुसार 'सुपाद्' की
भसञ्ज्ञा है । इस के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्' आदेश होकर—सुपद्+
अस् = सुपदः । इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी समझ लेना चाहिये ।
सुपाद् शब्दकी समग्र रूपमाला यथा—