सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 458

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४३
का लोप, सुं-लोप तथा संयोगान्तस्य लोपः (२०) से चकारलोप हो 'प्रति अन्' । अब
क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार तथा इको यणचि (१५) से यण्
करने से 'प्रत्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः—आदि में पूर्ववत् अनु-
स्वार-परसवर्ण प्रक्रिया जाननी चाहिये ।
'प्रति अच्+अस्' (शस्)। यहां अचः (३३५) से अकारलोप तथा चौ (३३६)
से पूर्व अण् अर्थात् 'प्रति' के अन्त वाले इकार को दीर्घ होकर—'प्रतीचः' प्रयोग
सिद्ध होता है ।
'प्रति अच्+भ्याम्' यहां चोः कुः (३०६) से चकार को ककार तथा झलां
जशोऽन्ते (६७) से ककार को गकार होकर यण् करने से—'प्रत्यग्भ्याम्' । 'प्रति+
अच्' (पीछे या विपरीत जाने वाला अथवा पश्चिम के देश, काल, जन आदि) शब्द
की रूपमाला यथा—
प्र० प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्चः प० प्रतीचः प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्भ्यः
द्वि० प्रत्यञ्चम् " प्रतीचः प० " प्रतीचोः प्रतीचाम्
तृ० प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्भिः स० प्रतीचि " प्रत्यक्षु
च० प्रतीचे " प्रत्यग्भ्यः सं० हे प्रत्यङ् ! प्रत्यञ्चौ ! प्रत्यञ्चः !
'उद्' पूर्वक 'अञ्चुँ' धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) द्वारा क्विन्, उस का
सर्वापहारलोप, नकारलोप तथा प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
उद् अच्+स् । यहां उगिदचाम्० (२८६) से नुम् आगम, उँम् अनुबन्ध का
लोप, सुंलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार
होकर—'उदङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । उदञ्चौ, उदञ्चः आदि पूर्ववत् जानें ।
उद् अच्+अस् (शस्) । यहां अचः (३३५) सूत्र द्वारा अकार का लोप
प्राप्त होता है, इस पर अग्रिम अपवाद-सूत्र प्रवृत्त हो जाता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३७) उद ईत् ।६।४।१३६॥
उच्छब्दात् परस्य लुप्तनकाराञ्चतेर्भस्याकारस्य ईत् । उदीचः ।
उदीचा । उदग्भ्याम् ॥
अर्थः—'उद्' से परे लुप्त नकार वाली अञ्चुँ धातु के भसञ्ज्ञक अकार को
ईकार हो जाता है ।
व्याख्या—उदः ।५।१। अचः ।६।१। (अचः से) । भस्य ।६।१। (यह अधि-
कृत है) । अत् ।६।१। (अल्लोपोऽनः से) । ईत् ।१।१। अर्थः—(उदः) उद् से परे
(अचः) लुप्त नकार वाली अञ्चुँ धातु के (भस्य) भसञ्ज्ञक (अत्=अतः) अकार के
स्थान पर (ईत्) ईकार आदेश हो जाता है।
उद् अच्+अस् । यहां प्रकृतसूत्र से अकार को ईकार होकर—उद् ईच्+
अस्='उदीचः' प्रयोग सिद्ध होता है । 'उदच्' (ऊपर जाने वाला अथवा उत्तर के
देश, काल, जन आदि) शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—