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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२१
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । त्वाहौ ।१।२। सौ ।७।१। समासः—त्वश्च अहश्च = त्वाहौ, इतरे-
तरद्वन्द्वः । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (मपर्यन्तस्य = मपर्यन्तयोः) 'म्' तक (युष्मद-
स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर (त्वाहौ) क्रमशः त्व और अह आदेश
हो जाते हैं ।
युष्मद् में युष्म् और अस्मद् में अस्म् ये म्पर्यन्त भाग हैं । सुँ परे होने पर
इन के स्थान पर क्रमशः 'त्व' और 'अह' आदेश होते हैं ।
युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां सुं के स्थान पर हुए अम् आदेश को
स्थानिवद्भाव से सुँ मान कर प्रकृतसूत्र से क्रमशः म्पर्यन्त त्व और अह आदेश करने
से—'त्व अद् + अम्, अह अद् + अम्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१३) शेषे लोपः ।७।२।९०॥
एतयोष्टिलोपः । त्वम् । अहम् ॥
अर्थः—युष्मद् और अस्मद् की टि अर्थात् 'अद्' भाग का लोप हो जाता है ।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तात् ।५।१।
(मपर्यन्तस्य इस अधिकृत का अपकर्ष कर विभक्तिविपरिणाम हो जाता है) । शेषे
।७।१। (स्थानषष्ठी के अर्थ में अधिकरणत्व की विवक्षा से सप्तमी हुई है) । लोपः
।१।१। अर्थः—(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तात्) म्पर्यन्त
भाग से आगे (शेषे) शेष भाग में (लोपः) लोप प्रवृत्त होता है ।
म्पर्यन्त भाग से आगे शेष भाग 'अद्' होता है। इस के लोप का इस सूत्र से
विधान किया गया है। यह 'अद्' भाग युष्मद् और अस्मद् का 'टि' भाग ही होता है,
अतः वृत्ति में टि के लोप का कथन किया गया है।
सावधानता—यहां यह नहीं समझना चाहिये कि युष्मद् और अस्मद् शब्द में
म्पर्यन्त आदेशों से अवशिष्ट शेष भाग का लोप होता है, यथा यहां त्व और अह
आदेश हो चुकने पर 'अद्' भाग शेष रहता है। यदि ऐसा मानेंगे तो यहां तो कार्य्य
चल जायेगा, परन्तु 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' आदियों में न हो सकेगा । क्योंकि वहां
'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों के स्थान पर कुछ आदेश नहीं होता । अतः यहां 'मपर्यन्तस्य'
का अपकर्षण कर म् से आगे के भाग अर्थात् 'अद्' को शेष समझना चाहिये ।
इस सूत्र का दूसरा अर्थ भी होता है और कही २ लघुकौमुदी में वह उपलब्ध
भी होता है । वह यह है—
आत्व-यत्वनिमित्तेतरविभक्तौ परतो युष्मदस्मदोरन्त्यस्य लोपः स्यात् ।
अर्थः—जिस विभक्ति के परे होने पर आत्व और यत्व विधान नहीं होते, उस
विभक्ति के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अन्त्य अर्थात् दकार का लोप हो
जाता है ।
व्याख्या—अष्टन आ विभक्तौ से 'विभक्तौ' पद की अनुवृत्ति आ जाने से इस

४२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ की उत्पत्ति इस प्रकार होती है—(शेषे) शेष (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर
(युष्मदस्मदो) युष्मद् और अस्मद् का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि
से यह लोप अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में—युष्मदस्मदोरनादेशे (७।२।८६), द्वितीया-
याञ्च (७।२।८७), प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (७।२।८८), योऽचि (७।२।८६)
—इन चार सूत्रों के द्वारा कुछ विशिष्ट विभक्तियों के परे होने पर आत्व और यत्व
का विधान किया गया है। यदि आत्व और यत्व निमित्तक विभक्तियों से भिन्न अन्य
शेष विभक्तियां परे हों तो दकार का लोप हो जाता है। काशिकाकार ने उन सब
शेष विभक्तियों की गणना एक श्लोक में कर दी है जिन में आत्व और यत्व प्रवृत्त
नहीं हो सकते। तथाहि—
पञ्चम्यांश्च चतुर्थ्यांश्च, षष्ठीप्रथमयोरपि।
यान्यद्विवचनान्यत्र, 'शेषे लोपो' विधीयते॥
अर्थात् पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा विभक्तियों के एकवचन और बहु-
वचन शेषविभक्तियां हैं। इन के परे होने पर शेषे लोपः (३१३) से युष्मद् और
अस्मद् के अन्त्य दकार का लोप हो जाता है।
त्व अद्+अम्, अह अद्+अम् –यहां अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे
(२७४) से पररूप एकादेश हो 'त्वद्+अम्, अहद्+अम्'। अब शेषे लोपः (३१३) से
अद् भाग का लोप हो कर—'त्व्+अम्=त्वम्, अह्+अम्=अहम्' ये रूप सिद्ध
होते हैं।¹ अन्त्यलोप वाले पक्ष में केवल दकार का लोप हो कर अमि पूर्वः (१३५)से
पूर्वरूप करने से इन प्रयोगों की निष्पत्ति होती है—यही विशेष है।
१. त्व अद्+अम्, अह अद्+अम्—यहां शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप
और अतो गुणे (२७४) से पररूप दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। शेषे लोप (३१३)
सूत्र अष्टाध्यायी में पर होते हुए भी प्रथम प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि वह अङ्गाधि-
कार में पठित होने से विभक्ति प्रत्यय सापेक्ष होने के कारण बहिरङ्ग है और
अतो गुणे (२७४) सूत्र अन्तर्गतवर्णद्वयापेक्ष होने से अन्तरङ्ग है। असिद्धं बहिरङ्ग-
मन्तरङ्गे—इस परिभाषा के अनुसार अन्तरङ्गकार्य अतो गुणे प्रथम हो जाता
है। शेषे लोपः बहिरङ्ग होने से अन्तरङ्ग के बाद प्रवृत्त होता है।
यहां यह भी ध्यातव्य है कि वार्णादाङ्गं बलीयः (वर्णकार्य की अपेक्षा
अङ्गकार्य बलवान् होता है) परिभाषा के आश्रय से वर्णकार्य अतो लोप की
अपेक्षा अङ्गकार्य शेषे लोपः को बलवान् नहीं माना जा सकता, क्योंकि जहां
याङ्ग और वार्ण कार्य समानाश्रय हों वहीं पर यह परिभाषा प्रवृत्त होती है।
जैसे धृ+ण्वुल्=धृ+अक यहां 'ऋ' को प्रत्यय के णित् होने से आङ्गकार्य
अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि प्राप्त होती है तथा इसी ऋ को वार्णकार्य यण्
(र्) भी प्राप्त होता है। इस परिभाषा से आङ्गकार्य वृद्धि हो जाती है। परन्तु

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२३
युष्मद् + औ, अस्मद् + औ—यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) सूत्र से औकार को
अम् आदेश हो जाता है । 'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' । अब इस दशा में अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१४) युवावौ द्विवचने ।७।२।६२॥
द्वयोरुक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य युवावौ स्तो विभक्तौ ॥
अर्थः—विभक्ति परे होने पर द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त
क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । युष्मदस्मदोः ।६।२।
(युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१। (अधिकृत है)। युवावौ ।१।२। द्विवचने
।७।१। समासः—द्वयोर् वचनम् (कथनम्) द्विवचनम्, तस्मिन् = द्विवचने । षष्ठी-
तत्पुरुषः । यहां 'द्विवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य कर लेने से 'द्विवचन
विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं । क्योकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो
महामुनि 'द्विवचने' न कहकर 'द्वित्वे' ही कह देते । उन के 'द्वित्वे' न कह कर 'द्विवचने'
कथन का यह तात्पर्य है कि चाहे एकवचन, द्विवचन, बहुवचन जो भी विभक्ति परे
हो द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त युव, आव आदेश हो जाते हैं ।
यथा—युवाम् अतिक्रान्तः=अतियुवाम्, आवाम् अतिक्रान्तः=अत्यावाम् । यहां सुं परे
होने पर भी युव और आव आदेश हो जाते हैं । यहां का विशेष विचार सिद्धान्त-
कौमुदी में देखें । अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (द्विवचने) द्वित्वकथन में
(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तस्य) म्पर्यन्त भाग के स्थान
पर (युवावौ) क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां द्वित्वकथन में युवावौ द्विवचने (३१४)
सूत्र द्वारा म्पर्यन्त क्रमशः युव, आव आदेश करने पर—युव अद् + अम्, आव अद् +
अम् । अब अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश हो जाता
है—युवद् + अम्, आवद् + अम् । इस स्थिति में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१५) प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ।७।२।८८॥
औङ्चेतयोरात्वं लोके । युवाम् । आवाम् ॥
अर्थः—लोक में प्रथमा का द्विवचन परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को
आकार आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—प्रथमायाः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । द्विवचने ।७।१। भाषायाम्
।७।१। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ
से)। अर्थः—(भाषायाम्) लोक में (प्रथमायाः) प्रथमाविभक्ति के (द्विवचने)
व्याश्रय (भिन्न भिन्न आश्रय) में यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती । यहां प्रकृत में
शेषे लोपः तो विभक्ति को निमित्त मानता है और अतो गुणे 'अ' को । अतः
भिन्न भिन्न आश्रय होने से यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती ।

४२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
द्विवचन के पर होने पर (च) भी (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर
(आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आकार आदेश अन्त्य अल्
—दकार के स्थान पर होता है।
युवद् + आम् आवद् + आम्। यहां प्रकृतसूत्र से दकार को आकार आदेश
होकर— युव आ+अम्, आव आ+अम् हुआ। अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से
सवर्णदीर्घ और अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर— 'युवाम्, आवाम्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं। [भाषाग्राम्य कथन में वद से युवम् आवम् बनेंगे]।
युष्मद् + जस् अस्मद् + जस् —यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) से जस् को अम्
आदेश हो जाता है। 'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३१६) यूयवयौ जसि ॥७।२।६३॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य यूयवयौ स्तो जसि। यूयम्। वयम्॥
अर्थ —जस् परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों का म्पर्यन्त क्रमशः यूय
और वय आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। यूयवयौ ।१।२। जसि ।७।१। अर्थ —(जसि) जस् परे होने पर
(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तस्य) म्पर्यन्त भाग के स्थान
पर क्रमशः (यूयवयौ) यूय और वय आदेश होते हैं।
'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्' यहां अम् को स्थानिवद्भाव से जस् मान कर
उस के परे होने पर प्रकृतसूत्र द्वारा म्पर्यन्त क्रमशः यूय और वय आदेश हो—'यूय
अद् +अम्, वय अद्+अम्'। अब अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—यूयद+
अम्, वयद्+अम्। पुनः शेषे लोपः (३१३) से अद् भाग का लोप होकर—यूय्
+अम् = 'यूयम्', वय्+अम्= 'वयम्' रूप सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष में शेषे लोपः
(३१३) से जब केवल दकार का लोप होता है, तब अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप
करने से उक्त रूप सिद्ध होते हैं।
द्वितीया के एकवचन में—'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्'। यहां अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१७) त्वमावेकवचने ॥७।२।६७॥
एकस्योक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य त्वमौ स्तो विभक्तौ॥
अर्थ —विभक्ति परे होने पर एकत्व कथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त
त्व और म आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। युष्मदस्मदोः ।६।२।
(युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। त्वमौ ।१।२। एक-
वचने ।७।१। समास —एकस्य वचनम्—वचनम् = एकवचनम्, तस्मिन् = एकवचने।

हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम्
षष्ठीतत्पुरुषसमासः। यहां 'एकवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य करके
'एकवचन विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं। क्योंकि तब आचार्य 'एक-
वचने' न कह कर 'एकत्वे' ऐसा कह देते। अतः यहां 'एकवचने' कहने का यह तात्पर्य
है कि चाहे एकवचन, द्विवचन वा बहुवचन जो भी विभक्ति परे हो युष्मद् और
अस्मद् को एकत्वकथन में मपर्यन्त त्व और म आदेश हो जाते हैं। यथा—त्वाम्
अतिक्रान्तो = अतित्वम्, माम् अतिक्रान्ती = अतिमाम्। यहां द्विवचन परे होने पर भी
युष्मद् और अस्मद् के एकार्थवाची होने से 'त्व, म' आदेश हो जाते हैं। विशेष
सिद्धान्तकौमुदी में देखें।
'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहां क्रमशः मपर्यन्त 'त्व, म' आदेश होकर—
'त्व अद् + अम्, म अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'त्वद् +
अम्, मद् + अम्'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१८) द्वितीयायाञ्च ७।२।८७॥
अनयोरात् स्यात्। त्वाम्। माम् ॥
अर्थः—द्वितीया विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार
आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से)। आ ।१।१। (अष्टन
आ विभक्तौ से)। द्वितीयायाम् ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(द्वितीयायाम्)
द्वितीया विभक्ति परे होने पर (च) भी (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के
स्थान पर (आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश अन्त्य
दकार के स्थान पर होता है।
'त्वद् + अम्, मद् + अम्' यहां द्वितीया परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को
आकार आदेश होकर—'त्व आ + अम्, म आ + अम्' हुआ। अब अकः सवर्णे दीर्घः
(४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'त्वाम्, माम्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं।
युष्मद् + औट्, अस्मद् + औट्—यहां ङे प्रथमोयोर्‌म् (३११) सूत्र से अम् आदेश
होकर—'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्'। युवावौ द्विवचने (३१४) से मपर्यन्त युव
और आव हो—'युव अद् + अम्, आव अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप
करने से—'युवद् + अम्, आवद् + अम्'। अब द्वितीयायां च (३१८) से दकार को
आकार, अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप
एकादेश करने से 'युवाम्, आवाम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
विशेष—प्रथमाविभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में तथा द्वितीया
विभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में आकारविधायक सूत्र का भेद है। प्रथमा
में प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५) द्वारा तथा द्वितीया में द्वितीयायाञ्च (३१८)
से आकार आदेश होता है।

४२६ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

'युष्मद् + शस्, अस्मद् + शस्' यहां अनुबन्ध शकार का लोप होकर 'युष्मद् +
अस्, अस्मद् + अस्' । अब इस अवस्था में ङे प्रथमयोरम् (३११) द्वारा अम् आदेश
प्राप्त होने पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१६) शसो न ।७।१।२६॥
आभ्यां शसो न स्यात् । अमोऽपवादः । आदेः परस्य (७२) । संयो-
गान्तलोपः । युष्मान् । अस्मान् ॥
अर्थः—युष्मद् या अस्मद् शब्दा से परे शस् को नकार आदेश हो ।
व्याख्या — युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । शसः ।६।१।
न ।१।१। (विभक्ति का लुक्) । अर्थ — (युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों
से पर (शसः) शस् के स्थान पर (न) न् आदेश हो जाता है । अम् आदेश के प्राप्त
होने पर यह आदेश विधान किया गया है अतः यह उस (३११) का अपवाद है । यह
नकारादश अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् अर्थात् सकार के स्थान पर प्राप्त था,
परन्तु आदेः परस्य (७२) से उस का बाध कर शस् = अस् के आदि अर्थात् अकार के
स्थान पर हो जाता है ।
'युष्मद् + अस्, अस्मद् + अस्' यहां प्रकृतसूत्र से शस् के अकार को नकार
आदेश हो 'युष्मद् + न्स्, अस्मद् + न्स्' । अब द्वितीयायाञ्च (३१८) सूत्र से दकार
को आकार तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो—'युष्मान्स्, अस्मान्स्' ।
पुनः संयोगान्तस्य लोपः (२०) से सकार का लोप करने पर—'युष्मान्, अस्मान्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं । ध्यान रहे कि यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से न लोप० (१८०)
द्वारा नकार का लोप नहीं होता किञ्च 'युष्मान्' में अट्कु० (१३८) द्वारा प्राप्त
णत्व का भी पदान्तस्य (१३६) द्वारा निषेध हो जाता है ।
युष्मद् + आ (टा), अस्मद् + आ (टा)—यहां एकत्वकथन होने के कारण
त्वामावेकवचने (३१७) से म्पर्यन्त त्व और म आदेश हो—'त्व अद् + आ, म अद् +
आ' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + आ, मद् + आ' । अब अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२०) योऽचि ।७।२।८६॥
अनयोर्यकारादेशः स्यादनादेशेऽजादौ परतः । त्वया । मया ॥
अर्थः—अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को
यकार आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । यः ।१।१। (यकारा-
दकार उच्चारणार्थः) । अनादेशे ।७।१। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । अचि ।७।१।
विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'अचि' यह 'विभक्तौ' का विशेषण है अतः
यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२७
अर्थः— (अनादेशे) अनादेश (अचि) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो (युष्मद-
स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है।
जिन विभक्तियों के स्थान पर कोई आदेश नही होता वे अनादेश विभक्तियां
कहाती हैं। अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को य् आदेश
हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
'त्वद्+आ, मद्+आ' यहां 'आ' यह अनादेश अजादि विभक्ति परे है अतः
प्रकृतसूत्र से दकार को यकार आदेश हो कर—त्वय्+आ='त्वया', मय्+आ=
'मया' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'अनादेश' कथन के कारण पञ्चमीबहुवचनान्त 'युष्मत्, अस्मत्' में यकारादेश
नहीं होत। क्योंकि यहां पञ्चमी के बहुवचन 'भ्यस्' के स्थान पर पञ्चम्या अत्
(३२५) द्वारा 'अत्' यह अजादि आदेश हुआ है।
'युष्मद्+भ्याम्, अस्मद्+भ्याम्' यहां युवावौ द्विवचने (३१४) से क्रमशः
म्पर्यन्त युव और आव आदेश हो कर 'युव अद्+भ्याम्, आव अद्+भ्याम्'। अतो
गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्'। अब अग्रिम-
सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२१) युष्मदस्मदोरनादेशे ७।२।८६॥
अनयोरात् स्याद् अनादेशे हलादौ विभक्तौ। युवाभ्याम्। आवाभ्याम्।
युष्माभिः। अस्माभिः॥
अर्थः—अनादेश हलादि विभक्तियों के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों
के स्थान पर आकार आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। अनादेशे ।७।१। हलि ।७।१। (रायो हलि से)।
विभक्तौ ।७।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। अर्थः—(अनादेशे) अनादेश
(हलि =हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (युष्मदस्मदोः) युष्मद्
और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (आ) 'आ' यह आदेश हो जाता है। यह आकार
आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह अनादेश हलादि विभक्ति
परे है अतः दकार को आकार हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'युवाभ्याम्, आवाभ्याम्'
प्रयोग सिद्ध होते हैं।
अनादेश के फलस्वरूप 'युष्मभ्यम्' आदि में भ्यम्-पक्ष में 'आ' आदेश न होगा।
'युष्मद्+भिस्, अस्मद्+भिस्' यहां युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) सूत्र से
दकार को आकार तथा सवर्णदीर्घ हो कर 'युष्माभिः, अस्माभिः' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'युष्मद्+ङे, अस्मद्+ङे' यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) से ङे को अम् आदेश
हो कर 'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्'। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—

४२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२२) तुभ्यमह्यौ ङयि ।७।२।९५॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य । टिलोप । तुभ्यम् । मह्यम् ॥
अर्थ —'ङे' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को मपर्यन्त क्रमशः तुभ्य
और मह्य आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे स) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । तुभ्यमह्यौ ।१।२। ङयि ।७।१। अर्थ —(ङयि) 'ङे' परे होने पर
(युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के स्थान
पर क्रमश (तुभ्यमह्यौ) तुभ्य और मह्य आदेश हो जाते हैं ।
'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहा स्थानिवद्भाव से अम् को ङे मान कर
प्रकृतसूत्र से तुभ्य और मह्य आदेश हो कर 'तुभ्य अद् + अम्, मह्य अद् + अम्' ।
अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'तुभ्यद् + अम्, मह्यद् + अम्' । अब टिलोपपक्ष मे
शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप करने पर 'तुभ्यम्, मह्यम्' प्रयोग सिद्ध होते
हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे शेषे लोप (३१३) से दकारलोप तथा अमि पूर्व. (१३५) से
पूर्वरूप करने पर उक्त रूपो की सिद्धि होती है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२३) भ्यसोऽभ्यम् ।७।२।३०॥
आभ्या परस्य भ्यसोऽभ्यम् इत्यादेश. स्यात् । युष्मभ्यम् । अस्मभ्यम् ॥
अर्थ.—युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । भ्यस
।६।१। अभ्यम् ।१।१। अर्थ —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे
(भ्यस.) भ्यस् के स्थान पर (अभ्यम्) अभ्यम् आदेश हो जाता है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो कर शेषे लोप•
(३१३) से टिलोप' करने से 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोप-
पक्ष मे केवल दकार का लोप हो कर अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर उक्त
रूप सिद्ध होंगे ।
ध्यान रहे कि शेषे लोपः (३१३) मे अन्त्यलोप मानने वाले कुछ वैयाकरण
'भ्यसो भ्यम्' इस प्रकार सूत्र पढ कर भ्यस् के स्थान पर भ्यम् आदेश करते हैं। अत
उन के मत मे पररूप किये बिना ही यथेष्ट रूप सिद्ध हो जाते हैं।२
१. यहा अनादेश अजादि विभक्ति न होने से योऽचि (३२०) सूत्र से यकारादेश
नही होता । एवम्—'भ्यम्' पक्ष मे भी युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) से आकारा-
देश की अप्रवृत्ति जाननी चाहिये ।
२ परन्तु इस प्रकार अन्त्यलोप करने पर 'युष्म + भ्यम्, अस्म + भ्यम्' इस अवस्था
मे बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एत्व प्राप्त होता है। इस का वारण सङ्गवृत्तो
पुनर्वृत्तो विधिरनिष्टितस्य इस परिभाषा से किया जाता है। किसी सङ्गाधि-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२६
'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२४) एकवचनस्य च ।७।१।३२॥
आभ्यां ङसेरत् । त्वत् । मत् ॥
अर्थः—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे ङसिँ को 'अत्' आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः
।६।१। (पञ्चम्या अत् से) । एकवचनस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अत् ।१।१।
(पञ्चम्या अत् से) । अर्थः—(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे
(पञ्चम्याः) पञ्चमी के (एकवचनस्य) एकवचन के स्थान पर (च) भी (अत्)
'अत्' यह आदेश हो जाता है ।
'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां प्रकृतसूत्र से ङसिँ के स्थान पर अत्
आदेश (ध्यान रहे कि अत् आदेश अनेकाल् होने से सर्वादेश होता है) होकर—
'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । त्वमावेकवचने (३१७) से मपर्यन्त 'त्व, म' होकर —
'त्व अद् + अत्, म अद् + अत्' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + अत्,
मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टि = अद् भाग का लोप करने पर—'त्व् +
अत् = त्वत्, म् + अत् = मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं । अन्त्यलोपपक्ष में केवल दकार
का लोप हो कर पररूप (२७४) करने से यही रूप सिद्ध होते हैं ।
नोट—'अत्' आदेश में हलन्त्यम् (१) द्वारा तकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती,
न विभक्तौ तुस्माः (१३१) सूत्र निषेध करता है। अवसान में जश्त्व-चर्त्व तो होंगे ही ।
पञ्चमी के बहुवचन में 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां भ्यसोऽभ्यम्
(३२३) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२५) पञ्चम्या अत् ।७।१।३१॥
आभ्यां पञ्चम्या भ्यसोऽत् स्यात् । युष्मत् । अस्मत् ॥
अर्थः—युष्मद् अस्मद् शब्दों से परे पञ्चमी के भ्यस् को 'अत्' आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः
।६।१। भ्यसः ।६।१। (भ्यसोऽभ्यम् से) । अत् ।१।१। अर्थः —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद्
और अस्मद् शब्दों से परे (पञ्चम्याः) पञ्चमी के (भ्यसः) भ्यस् के स्थान पर (अत्)
'अत्' आदेश हो जाता है । अनेकाल् होने से 'अत्' सर्वादेश होता है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां प्रकृतसूत्र से पञ्चमी के भ्यस् को अत्
आदेश होकर — 'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टिलोप
कारीय विधि के प्रवृत्त होने पर यदि परिनिष्ठित (व्यवहार्य) प्रयोग बन जाये
तो पुनः दूसरे अङ्गाधिकारीय कार्य की प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये । यहां शेषे
लोपः (३१३) इस अङ्गकार्य के प्रवृत्त होने पर लोकप्रसिद्ध 'युष्मभ्यम्, अस्म-
भ्यम्' प्रयोग बन चुके हैं अतः अब इन का रूप बिगाड़ने के लिये दूसरा अङ्ग-
कार्य बहुवचने झल्येत् (१४५) प्रवृत्त न होगा ।

४३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

होकर युष्म्+अत् = युष्मत्, अस्म् + अत् -=अस्मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्य-
लोपपक्ष म अन्त्य दकार का लोप होकर अतो गुणे (२७४) द्वारा पररूप करने से—
'युष्मत्, अस्मत्' यही रूप सिद्ध होते हैं।
षष्ठी के एकवचन में 'युष्मद्+ङस्, अस्मद्+ङस्' यहा त्वमावेकवचने
(३१७) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२६) तवममौ ङसि।७।२।९६॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममौ स्तो ङसि ॥
अर्थ —'ङस्' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दो को मपर्यन्त क्रमश 'तव'
और 'मम' आदेश होते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। तवममौ ।१।२। ङसि ।७।१। अर्थ — (ङसि) ङस् परे होने पर
(युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के
स्थान पर क्रमश (तव ममौ) 'तव' और 'मम' आदेश होते हैं।
'युष्मद् + ङस्, अस्मद् + ङस्' यहा प्रवृत्तसूत्र से मपर्यन्त 'तव, मम' आदेश
करने पर—'तव अद्+ङस्, मम अद्+ङस्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप कर—
'तवद्+ङस्, ममद्+ङस्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२७) युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् ।७।१।२७॥
[युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङसोऽशादेश स्यात्]। तव। मम। युवयोः।
आवयोः॥
अर्थ —युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे ङस् के स्थान पर 'अश्' आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। ङस ।६।१। अश् ।१।१। अर्थ —(युष्मद-
स्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङस ) ङस् के स्थान पर (अश्) अश्
आदेश हो जाता है। 'अश्' आदेश शित् होने से आदे. परस्य (७२) का बाघ कर
अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) से सर्वादेश होता है।
'तवद+ङस्, ममद्+ङस्' यहा अश् आदेश होकर—'तवद्+अ (अश्),
ममद +अ(अश)'। अब शेषे लोप (३१३) से अद् का लोप करने से—'तव, मम'
ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे केवल दकार का लोप होकर पररूप एकादेश
करन से यही रूप सिद्ध हो जाते हैं।
'युष्मद्+ओस्, अस्मद्+ओम्' यहा युवावौ द्विवचने (३१४) मे मपर्यन्त
क्रमश युव, आव आदेश होकर—'युव अद्+ओस्, आव अद्+ओम्'। अतो गुणे
(२७४) से पररूप कर—'युवद् + ओम्, आवद् +ओम्'। अब अनादेश अजादि विभक्ति
ओम् के परे हान में योऽचि (३२०) मे दकार को यकार आदेश होकर—'युवय् +
ओस्=युवयो, आवय् +ओम्=आवयो' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'युष्मद् +आम् अस्मद् + आम्' अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३१
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२८) साम आकम् ।७।१।३३॥
आभ्यां परस्य साम आकम् स्यात् । युष्माकम् । अस्माकम् । त्वयि ।
मयि । युवयोः । आवयोः । युष्मासु अस्मासु ॥
अर्थः—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे साम् को आकम् आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । सामः
।६।१। आकम् ।१।१। अर्थः —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे
(सामः) साम् के स्थान पर (आकम्) आकम् आदेश हो ।
युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अदन्त न होने से इन से परे आम् को आमि सर्व-
नाम्नः सुट् (१५५) से सुट् न हो सकने के कारण जब साम् ही नहीं होता तो पुनः
उस के स्थान पर 'आकम्' आदेश कैसे सम्भव हो सकता है ? यह प्रश्न यहां उपस्थित
होता है । इस का उत्तर यह है कि यहां 'साम्' निर्देश भावी (आगामी = आगे होने
वाले) 'सुट्' की निवृत्ति के लिये है । अर्थात् 'आकम्' आदेश करने पर अन्त्यलोपपक्ष
में शेषे लोपः (३१३) सूत्र से जब अन्त्य दकार का लोप हो जाता है तब युष्मद्
अस्मद् के अदन्त हो जाने से आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५) सूत्र से जो 'सुट्' का
आगम प्राप्त होता है, उसकी निवृत्ति के लिये यहां 'साम्' के स्थान पर 'आकम्'
आदेश कर रहे हैं। इस से 'आकम्' आदेश करने पर अन्त्यलोपपक्ष में अवर्णान्त हो
जाने पर भी सुट् का आगम नहीं होता ।
बालोपयोगी सार यह है कि यह सूत्र दो कार्य करता है । एक तो यह आम्
के स्थान पर आकम् आदेश करता है। दूसरा यह शेषे लोपः (३१३) से अन्त्यलोपपक्ष
में दकारलोप हो जाने पर प्राप्त सुट् आगम का भी निषेध करता है।
'युष्मद् + आम्, अस्मद् + आम्' यहां साम आकम् (३२८) सूत्र से आम् को
आकम् करने पर—युष्मद् + आकम्, अस्मद् + आकम् । अब अन्त्यलोपपक्ष में शेषे
लोपः (३१३) से दकार का लोप होकर सवर्णदीर्घ करने पर 'युष्माकम्, अस्माकम्'
ये रूप सिद्ध होते हैं । टिलोपपक्ष में भी शेषे लोपः (३१३) से टि = अद् का लोप
हो कर—'युष्म् + आकम् = युष्माकम्, अस्मू + आकम् = अस्माकम्' सिद्ध हो जाते हैं।
विशेष—यदि 'आकम्' की बजाय 'अकम्' कहा होता तो अन्त्यलोपपक्ष में
शेषे लोपः (३१३) से दकार का लोप हो कर पररूप एकादेश करने पर 'युष्मकम्'
'अस्मकम्' इस प्रकार अनिष्ट रूप बन जाते । अतः 'आकम्' आदेश कहा है।
'युष्मद् + ङि, अस्मद् + ङि' यहां ङकार अनुबन्ध का लोप हो कर त्वमावेक-
वचने (३१७) से क्रमशः मपर्यन्त त्व और म आदेश करने से—'त्व अद् + इ, म अद्

  • इ' । अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश कर—'त्वद् + इ, मद् + इ' । अब
    अनादेश अजादि विभक्ति परे रहने के कारण योऽचि (३२०) से दकार को यकार
    करने से—'त्वय् + इ = त्वयि, मय् + इ = मयि' प्रयोग सिद्ध होते हैं ।
    युष्मद् + सु(सुप्), अस्मद् + सु(सुप्) । यहां युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) से
    दकार को आकार हो सवर्णदीर्घ करने से 'युष्मासु, अस्मासु' प्रयोग सिद्ध होते हैं।

४३२ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां


अथ युष्मद्-अस्मद्-विषयक कुछ उपयोगी नोट लिखते हैं । इन से सब सूत्रों
का अवगाहन हो कर निश्चय ही बालकों को अपूर्व लाभ होगा । ध्यान देकर पढ़ें—
[१] (मपर्यन्त आदेशों के विषय मे) —
(क) एकवचन में—सुं, ङे, ङस् को छोड़ कर अन्य सब स्थानों में त्वमावेक-
वचने (३१३) प्रवृत्त हो जाता है । सुं में त्वाहावमौ (३१२), ङे में तुभ्यमह्यौ ङयि
(३२२) और ङस् में तवममौ ङसि (३२६) अपवाद हैं । तथाहि—
ङस् सु ङेविभक्तिञ्च विनैकवचने सदा ।
एकोक्तौ तु त्वमादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥१॥
तुभ्यमह्यौ ङयि स्याता त्वाहौ सौ मुनिचोदितौ ।
ङस्यादेशौ तथा स्यात्तौ तवेति च ममेत्यपि ॥२॥
(ख) द्विवचनों मे सदा म्पर्यन्त ‘युव, आव’ आदेश होते हैं । इन का कोई
अपवाद नहीं । तथाहि—
विना बाधं तु द्वित्वोक्तौ युवावौ भवतः सदा ।
(ग) बहुवचन में जस् को छोड़कर अन्य कहीं भी म्पर्यन्त आदेश नहीं होता ।
जस् में यूयवयौ जसि (३१६) में ‘यूय, वय’ आदेश होते हैं । तथाहि—
बहुत्वोक्तौ जसोऽन्यत्र नैवादेशौ क्वचिन्मतौ ।
जसि यूयवयादेशौ मपर्यन्ताविदीरितौ ॥
[२] (विभक्तिस्थानिक आदेशों के विषय में)—
शस् त्यक्त्वा द्वितीयायाः प्रथमायास्तथैव ङेः ।
अमादेशो बुधैः प्रोक्तः शसोऽकारस्य नः स्मृतः ॥१॥
साम आक ङसोऽत्प्रोक्तोऽत् पञ्चम्येकबहुत्वयोः ।
ऋत एन्यो न चादेशो विभक्तीना क्वचिद्‌भवेत् ॥२॥
अर्थ —शस् को छोड़ कर द्वितीया के तथा प्रथमा और ङे के स्थान पर अम्
आदेश हो जाता है । शस् के अकार को नकार आदेश होता है ॥१॥ साम् (आम्)
को आकम्, ङस् को अत्, पञ्चमी के एकवचन और बहुवचन को अत् आदेश होता
है । इन के बिना अन्य किसी विभक्ति के स्थान पर कोई आदेश नहीं होता ॥२॥
[३] (आत्व और यत्व के विषय में)—
(क) सुपि चौङि भिसि भ्यामि द्वितीयायां तथैव च ।
आत्वमेषु दकारस्य त्रिभिः सूत्रैर्मुनीरते ॥
अर्थ —प्रथमा के द्विवचन (औ), द्वितीया, भ्याम्, भिस् तथा सुप् में युष्मद्
अस्मद् के दकार को आकार हो जाता है । दकार को आकार तीन सूत्रों से होता है ,
—१. प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५), २ द्वितीयायां च (३१८), ३.
युष्मदस्मदोरनादौ (३२१) ।
(ख) योऽचि सूत्रेण यादेश आङि ओसि तथैव ङौ ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३३
अर्थः—आङ् (टा), ओस् तथा ङि परे होने पर योऽचि (३२०) सूत्र से
दकार को यकारादेश हो जाता है।
[४] ('शेषे लोपः' सूत्र के विषय में)--
पञ्चम्याश्च चतुर्थ्याश्च षष्ठीप्रथमयोरपि।
यान्यद्विवचनान्यत्र शेषे—लोपो विधीयते॥
अर्थः—पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा के एकवचन और बहुवचन के परे
होने पर शेषे लोपः (३१३) सूत्र प्रवृत्त हुआ करता है।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२६) युष्मदस्मदोः षष्ठी-चतुर्थी-द्वितीयास्थयोर्वा-
न्नावौ ।८।१।२०॥
पदात्परयोरपादादौ स्थितयोः षष्ठ्यादिविशिष्टयोर्युष्मदस्मदोर्वान्नौ
इत्यादेशौ स्तः॥
अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया
विभक्ति से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः वाम्, नौ आदेश होते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (यह अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।
।६।२। युष्मदस्मदोः ।६।२। वान्नावौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह अधिकृत है)।
समासः—न पादादौ = अपादादौ, प्रसज्यप्रतिषेधः। नञ्समासः। अर्थः—(पदात्) पद
से परे (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया विभक्ति के साथ वर्त-
मान (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (वान्नावौ) वाम्, नौ
आदेश हो जाते हैं। (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र केवल षष्ठ्यादि के द्विवचन में ही प्रवृत्त होता है, एकवचन वा बहु-
वचन में नहीं। एकवचन और बहुवचन में अग्रिम तीन सूत्र इस के अपवाद हैं। सूत्र के
उदाहरण यथा—
षष्ठी—धनमिदं वाम् (युवयोः) अस्ति। धनमिदं नौ (आवयोः) अस्ति।
चतुर्थी—ईशो वां (युवाभ्याम्) ददाति। ईशो नौ (आवाभ्याम्) ददाति।
द्वितीया—ईश्वरो वां (युवाम्) पश्यति। ईश्वरो नौ (आवाम्) पश्यति।
यहां कोष्ठक में लिखे शब्दों के स्थान पर वाम्, नौ आदेश हुए हैं।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि—(१) युवयोर्धनमस्ति। (२) आवयोर्धन-
मस्ति। (३) युवाभ्यां माता ददाति। (४) आवाभ्यां माता ददाति। (५) युवा-
मीशो रक्षतु। (६) आवामीशो रक्षतु। इत्यादि स्थानों पर आदेश न हों।.यहां
'युवयोः' आदि पद से परे नहीं हैं।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि श्लोक के पाद के आदि में 'वाम्, नौ' आदेश
न हो जाएं। यथा—
योऽयम्भूतेश्वरो देवो युवयोः पापनाशनः।
असावस्तु विभुर्नाथ आवयोरपि पालकः॥
ल० प्र० (२८)

४३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

यहां 'युवयो' और 'आवयो' के पद से परे होने पर भी पाद के आदि में वर्त्तमान होने
के कारण 'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते ।¹
युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः० में 'स्थ' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि
षष्ठ्यादि विभक्तियों के साथ रहने पर ही 'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों को 'वाम्, नौ'
आदेश हो, समास में विभक्ति के लुप्त हो जाने पर न ही । यथा--'इमौ युष्मत्पुत्रौ
गच्छतः । इमावस्मत्पुत्रौ वदतः' यहां 'युवयोः पुत्रौ = युष्मत्पुत्रौ, आवयोः पुत्रौ =
अस्मत्पुत्रौ' इस प्रकार षष्ठीतत्पुरुष-समास है। समास में विभक्ति का लुक् हो जाने से
'वाम्, नौ' आदेश नहीं होते ।
अब इस सूत्र के अपवाद आरम्भ किये जाते हैं--
[लघु०] विधि-सूत्रम्-- (३३०) बहुवचनस्य वस्नसौ ।८।१।२१॥
उक्तविधयोरनयोः षष्ठ्यादिबहुवचनान्तयोर्वस्नसौ स्तः ॥
अर्थ--पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया
के बहुवचनों से युक्त युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः वस्, नस् आदेश हो जाते हैं ।
व्याख्या--पदात् ।८।१। (अधिकृत है) । षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।८।१।
युष्मदस्मदोः ।८।१।२। (पूर्वसूत्र से) । बहुवचनस्य ।८।१। (यह 'युष्मदस्मदोः' का विशे-
षण है, अतः वचनविपरिणाम तथा तदन्तविधि से 'बहुवचनान्तयोः' बन जाता है) ।
वस्नसौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है) । अर्थ--(पदात्) पद से परे
(षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः) षष्ठी, चतुर्थी तथा द्वितीया सहित वर्त्तमान (बहुवचनस्य
= बहुवचनान्तयोः) बहुवचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर
क्रमशः (वस्नसौ) वस्, नस् आदेश हो जाते हैं । परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में
नहीं होते । यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है । उदाहरण यथा--
षष्ठी--गावो वः (युष्माकम्) सन्ति । अजा नः (अस्माकम्) सन्ति ।
चतुर्थी--गावो वो (युष्मभ्यम्) दीयन्ते । अजा नो (अस्मभ्यम्) दीयन्ते ।
द्वितीया--गावो वः (युष्मान्) पश्यन्ति । अजा नः (अस्मान्) पश्यन्ति ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि--१. युष्माकं धनमस्ति । २. अस्माकं बल-
मस्ति । ३. युष्मभ्यं दीयते । ४. अस्मभ्यं दीयते । ५. युष्मान् पश्यन्ति । ६. अस्मान्
पश्यन्ति । इत्यादियों में वस्, नस् आदेश न हों ।
'अपादादौ' इसलिये कहा गया है कि--रुद्रः शिवकरो देयो युष्माकं पापहारकः
--इत्यादियों में 'युष्माकम्' के स्थान पर 'वस्' आदेश न हो ।
'स्थ' ग्रहण से पूर्ववत्--'अयं युष्मद्दासौ (युष्माकं दासः) याति, अयम् अस्म-
द्दासो (अस्माकं दासः) याति' इत्यादियों में वस्, नस् आदेश नहीं होते ।
१. यह निषेध श्लोक के द्वितीय तृतीयादि पादों के लिये किया गया है, प्रथम पाद के
लिये नहीं । क्योंकि प्रथम पाद में तो 'पदात्' इस अधिकार से ही व्यभिचार-
निवृत्ति हो सकती थी ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३५
अब 'वाम्, नौ' आदेशों का दूसरा अपवाद लिखते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३१) तेमयावेकवचनस्य ।८।१।२२॥
उक्तविधयोरनयोः षष्ठीचतुर्थ्येकवचनान्तयोस्ते मे एतौ स्तः ॥
अर्थः—पद से परे पाद के आदि में न ठहरे हुए, षष्ठी तथा चतुर्थी के एक-
वचनों से युक्त, युष्मद् अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'ते, मे' आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः ।६।२।
युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोः षष्ठी० से)। एकवचनस्य ।६।१। (युष्मदस्मदोः
का विशेषण होने से पूर्ववत् 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। तेमयौ ।१।२। अपादादौ
।७।१। (अधिकृत है)। अर्थः—(पदात्) पद से परे, (षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः)
षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया के सहित वर्त्तमान (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक-
वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तेमयौ) 'ते, मे'
आदेश होते हैं। परन्तु (अपादादौ) पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र युष्मदस्मदोः षष्ठी० (३२६) सूत्र का अपवाद है। इस का भी त्वामौ
द्वितीयायाः (३३२) यह अग्रिमसूत्र अपवाद है। अतः यह सूत्र केवल षष्ठी तथा चतुर्थी
के एकवचनान्तों में ही प्रवृत्त होता है। ग्रन्थकार ने भी वृत्ति में इसीलिये द्वितीया का
ग्रहण नहीं किया। इस के उदाहरण यथा—
षष्ठी—ईश ! अहं ते (तव) दासोऽस्मि । त्वं मे (मम) पालकोऽसि ।
चतुर्थी—नमस्ते (तुभ्यम्) ऽस्तु । भोजनं मे (मह्यम्) प्रयच्छ ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि—तव दास एष जनः। ममास्ति प्रयोजनम्।
तुभ्यं धनं दास्यामि। मह्यम् मोदकम् रोचते। इत्यादियों में 'ते, मे' आदेश न हो जाएं।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि—आगमिष्यति यन्मित्रं, तव कार्यं करिष्यति
इत्यादि में आदेश न हो जाये।
अब इस सूत्र का अपवाद कहते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३२) त्वामौ द्वितीयायाः ।८।१।२३॥
द्वितीयैकवचनान्तयोस्त्वा मा इत्यादेशौ स्तः ॥
अर्थः—पद से परे, पाद के आदि में न ठहरे हुए, द्वितीया के एकवचन से युक्त
युष्मद्, अस्मद् शब्दों को क्रमशः 'त्वा, मा' आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—पदात् ।५।१। (अधिकृत है)। द्वितीयायाः ।६।१। एकवचनस्य ।६।१।
(तेमयावेकवचनस्य से। 'युष्मदस्मदोः' का विशेषण है, अतः वचनविपरिणाम तथा
तदन्तविधि हो कर 'एकवचनान्तयोः' बन जाता है)। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मद-
स्मदोः षष्ठी० से)। त्वामौ ।१।२। अपादादौ ।७।१। (यह भी अधिकृत है)। अर्थः
—(पदात्) पद से परे (द्वितीयायाः) द्वितीया के (एकवचनस्य = एकवचनान्तयोः) एक-
वचनान्त (युष्मदस्मदोः) युष्मद्, अस्मद् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (त्वामौ) त्वा,
मा आदेश हो जाते हैं (अपादादौ) परन्तु पाद के आदि में नहीं होते।
यह सूत्र तेमयावेकवचनस्य (३३१) सूत्र का अपवाद है। इस के उदाहरण
यथा—

४३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
लोकस्त्वा (त्वाम्) पश्यति । लोको मा (माम्) पश्यति ।
'पद से परे' इसलिये कहा है कि-त्वा लोकाः पश्यन्ति । मा लोकाः पश्यन्ति ।
इत्यादियो में 'त्वा, मा' आदेश न हो ।
'अपादादौ' इसलिये कहा है कि-स जगद्रक्षको देवो मा सदा पालयिष्यति
इत्यादियो में आदेश न हो ।
अब ग्रन्थकार इन सब सूत्रों के उदाहरणों को रामचन्द्राचार्यनिर्मित दो श्लोकों
में दर्शाते हैं-
[लघु०] श्रीशस्त्वाऽवतु माऽपीह, दत्तात् ते मेऽपि शर्म सः ।
स्वामी ते मेऽपि स हरिः, पातु वाम् अपि नौ विभुः ॥१॥
सुखं वां नौ ददात्वीशः, पतिर्वाम् अपि नौ हरिः ।
सोऽव्याद् वो नः, शिवं वो नो दद्यात्, सेव्योऽत्र वः स नः ॥२॥
अर्थः- (इह) इस लोक में (श्रीशः) श्रीपति विष्णु (त्वा=त्वाम्) तुझे
(अपि) तथा (मा=माम्) मुझे (अवतु) बचावे । (सः) वह भगवान् विष्णु
(ते=तुभ्यम्) तेरे लिये (अपि) तथा (मे=मह्यम्) मेरे लिये (शर्म) कल्याण
(दत्तात्) प्रदान करे । (सः) वह (हरिः) भगवान् विष्णु (ते=तव) तेरा (अपि)
तथा (मे=मम) मेरा (स्वामी) स्वामी है । (विभुः) सर्वव्यापक हरि (वाम् =
युवाम्) तुम दोनों को (अपि), तथा (नौ=आवाम्) हम दोनों को (पातु)
बचावे ॥१॥ (ईशः) भगवान् (वाम् = युष्मभ्यम्) तुम दोनों के लिये तथा (नौ =
आवाभ्याम्) हम दोनों के लिये (सुखम्) सुख (ददातु) प्रदान करे । (हरिः) श्री
विष्णु (वाम् = युवयोः) तुम दोनों का (अपि) तथा (नौ = आवयोः) हम दोनों का
(पतिः) पति है । (सः) वह भगवान् विष्णु (वः=युष्मान्) तुम सब को तथा (नः =
अस्मान्) हम सबको (अव्यात्) बचावे । (सः) वह जगत्प्रसिद्ध विष्णु (वः=युष्म-
भ्यम्) तुम सबके लिये तथा (नः=अस्मभ्यम्) हम सब के लिये (शिवम्) कल्याण
(दद्यात्) प्रदान करे । (सः) वह विष्णु (वः=युष्माकम्) तुम सब का तथा (न =
अस्माकम्) हम सब का (सेव्यः) सेवनीय=आराध्य है ।
व्याख्या - यहां पहले द्वितीया, चतुर्थी तथा षष्ठी के एकवचन का, पीछे द्वि-
वचन का और तदनन्तर बहुवचन का उदाहरण दिया गया है । हम ने अर्थ करते समय
कोष्ठक में इसे स्पष्ट कर दिया है । ये श्लोक प्रक्रियाकौमुदी से उद्धृत किये गये हैं ।
[लघु०] वा०-(२६) समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः ॥
एकतिङ् वाक्यम् । तेनेह न - ओदनं पच तव भविष्यति । इह तु स्या-
देव-शालीनान्ते ओदनं दास्यामि ॥
अर्थ - युष्मद् अस्मद् शब्दों के स्थान पर होने वाले 'वाम्, नौ' आदि आदेश
समानवाक्य अर्थात् एक वाक्य में होते हैं । एकतिङ् इति - एक तिङन्त वाला वाक्य
कहाता है ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३७
व्याख्या—पूर्वोक्त 'वाम्, नौ' आदि आदेश समान वाक्य में प्रवृत्त होते हैं।
अर्थात् इन सूत्रों के विषय में निमित्त और निमित्ती का एक ही वाक्य में वर्त्तमान
होना आवश्यक है। पद से परे 'वाम्, नौ' आदि आदेशों का विधान है। यहां पद
निमित्त तथा 'वाम्, नौ' आदि आदेश निमित्ती हैं। यदि निमित्त अन्य वाक्य में स्थित
होगा तो ये आदेश न होंगे।
इस वार्त्तिक के उदाहरण देने से पूर्व वाक्य क्या होता है ? इस जिज्ञासा की
निवृत्ति के लिये वाक्य का लक्षण करते हैं—एकतिङ् वाक्यम्। एकः=मुख्यः, तिङ्
=तिङन्तो यस्य यस्मिन् वा तद् एकतिङ्। जिस में तिङन्त मुख्य वा विशेष्य हो—
उसे 'वाक्य' कहते हैं।¹
अब वार्त्तिक का प्रयोजन दिखाते हुए प्रत्युदाहरण देते हैं—
'ओदनं पच तव भविष्यति'। यहां एक वाक्य नहीं, दो वाक्य हैं। 'ओदनं पच'
यह पहला वाक्य तथा 'तव भविष्यति' यह दूसरा वाक्य है। यहां दूसरे वाक्य में स्थित
'तव' के स्थान पर 'ते' आदेश नहीं होता, क्योंकि उस का निमित्त पद (पच) उस वाक्य
में स्थित नहीं।
'शालीनां ते ओदनं दास्यामि' (मैं तुझे साठी चावलों का भात दूंगा)। यहां
'शालीनाम्' यह निमित्त एक वाक्य में स्थित है अतः इस से परे 'तुभ्यम्' के स्थान पर
'ते' आदेश हो जाता है।
[लघु०] वा०—(२७) एते वांनावादयोऽनन्वादेशे वा वक्तव्याः ॥
धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्तीति वा। अन्वादेशे तु नित्यं
स्युः—तस्मै ते नम इत्येव ॥
अर्थः—अन्वादेश न होने पर पूर्वोक्त वाम्, नौ आदि आदेश विकल्प से होते
हैं। [तात्पर्य यह है कि अन्वादेश में नित्य होते हैं।]
व्याख्या—'किसी कार्य को विधान या बोधन कराने के लिये ग्रहण किये हुए
का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना अन्वादेश कहाता है' यह
हम पीछे 'इदम्' शब्द पर स्पष्ट कर चुके हैं। जहां अन्वादेश न होगा वहां पूर्वोक्त
'वाम्, नौ, वस्, नस्, ते, मे, त्वा, मा' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होंगे। जहां अन्वादेश
होगा वहां नित्य होंगे। यथा—
धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्ति (ब्रह्मा तेरा भक्त है)। यहां अन्वा-
देश न होने से 'तव' को 'ते' आदेश विकल्प से प्रवृत्त होता है।
योऽग्निर्हव्यवाट् तस्मै ते नमः (जो तूं हव्य को ले जाने वाला अग्निदेव है,
१. 'विशेष्य' के कथन से—'पश्य मृगस्ते धावति' (अपने दौड़ते हुए मृग को देखो)
इत्यादि दो तिङन्तों वाले भी वाक्य हो सकते हैं। इन में भी 'पश्य' इस एक
तिङन्त की ही मुख्यता या विशेष्यता है।

उस तुझे नमस्कार हो)। यहां अन्वादेश होने से 'तुभ्यम्' के स्थान पर नित्य 'ते'
आदेश हो जाता है विकल्प नहीं होता ।
यहां पाणिनि के और भी दो नियम जानने आवश्यक हैं—
(१) न चवाहाहैवैयोगे (८।१।२४) । अर्थात् यदि 'च, वा, ह, अह, एव'
इन पांचों में से किसी अव्यय का युष्मद् और अस्मद् के साथ साक्षात् योग हो तो
ये वाम्, नौ आदि आदेश नहीं होते । यथा—हरिस्त्वा मा च रक्षतु । यहां 'त्वाम्,
माम्' के स्थान पर 'त्वा, मा' आदेश नहीं होते क्योंकि 'च' का योग है। मा मय्या
इदं पुस्तकं ममैवास्तीति । यहां 'मम' के स्थान पर 'मे' आदेश न होगा क्योंकि 'एव'
का योग है ।
(२) पश्यार्थैश्चानालोचने (८।१।२५) । अर्थात् अचाक्षुष ज्ञानार्थक धातुओं
के योग में ये आदेश नहीं होते । यथा—चेतसा त्वा समीक्षते (वह मन से तुझे देखता
है) । यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' नहीं हुआ । क्योंकि देखना आंखों से नहीं हो रहा ।
(यहां युष्मद् अस्मद् शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] सुपात्, सुपाद् । सुपादौ ॥
व्याख्या—सु = शोभनौ पादौ यस्य सः = सुपात् । बहुव्रीहिसमासः । सङ्ख्या-
सुपूर्वस्य (५।४।१४०) इतिपादस्यान्त्यलोपः समासान्तः । सुन्दर पैरों वाले को 'सुपाद्'
कहते हैं ।
सुपाद्+स्(सुं) । यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो
कर वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने से—सुपात्, सुपाद् ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३३) पादः पत् ।६।४।१३०॥
पाच्छब्दान्तं यदङ्गं भं तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः स्यात् ।
सुपदः । सुपदा । सुपाद्भ्याम् ॥
अर्थः—'पाद्'शब्दान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्'
आदेश होता है ।
व्याख्या—पादः ।६।१। (यह अङ्गस्य का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि
होकर 'पादन्तस्य' बन जाता है) । भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। पद् ।१।१। अर्थः—(पाद = पादन्तस्य) 'पाद्' अन्त वाले (भस्य)
भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (पद्) पद् आदेश हो जाता है ।
निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति इस पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार 'पाद्' के स्थान
पर ही 'पद्' यह सर्वादेश होगा ।
सुपाद्+अस् (शस्) । यहां यचि भम् (१६५) के अनुसार 'सुपाद्' की
भसञ्ज्ञा है । इस के अवयव 'पाद्' शब्द के स्थान पर 'पद्' आदेश होकर—सुपद्+
अस् = सुपदः । इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी समझ लेना चाहिये ।
सुपाद् शब्दकी समग्र रूपमाला यथा—

हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३६
प्र० सुपात्-द् सुपादौ सुपादः प० सुपदः† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भ्यः
द्वि० सुपादम् ,, सुपदः† ष० ,, † सुपदोः† सुपदाम्‡
तृ० सुपदा† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भिः स० सुपदि† ,, † सुपात्सु‡
च० सुपदे† ,, सुपाद्भ्यः सं० हे सुपात्-द् ! सुपादौ ! सुपादः!
†सर्वत्र पादः पत् (३३१) से पाद् को पद् आदेश होता है ।
‡पद् आदेश हो कर खरि च (७४) से चर्व्व—तकार हो जाता है ।
इसी प्रकार— द्विपाद्, त्रिपाद् प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं ।
अभ्यास (४२)
(१) शेषे लोपः सूत्र के दोनों अर्थ स्पष्ट करें ।
(२) 'युष्मद्, अस्मद्' शब्द अवर्णान्त नहीं अतः सुँट् आगम स्वतः ही प्राप्त
नहीं तो पुनः साम आकम् में ससुँट् निर्देश का क्या प्रयोजन है ?
(३) किस किस विभक्ति में शेषे लोपः सूत्र की प्रवृत्ति होती है ?
(४) शसो न द्वारा नकारादेश कैसे और किस के स्थान पर होता है ?
(५) 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' में योऽचि द्वारा यकारादेश क्यों नहीं होता ?
(६) 'वाम्, नौ' आदेशों के कौन २ अपवाद हैं ससूत्र सोदाहरण लिखें ।
(७) द्वेप्रथमयोरम् के अर्थ में 'द्वितीया' का कैसे ग्रहण हो जाता है ?
(८) भ्यसोभ्यम् सूत्र के दो प्रकार के अर्थों का विवेचन करें ?
(९) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (गीता १८.६६)
यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' हुआ है परन्तु 'माम्' को 'मा' नहीं, क्या कारण है ?
(१०) युवावौ द्विवचने और त्वमावेकवचने में वचनग्रहण को स्पष्ट करें ।
(११) एषः, त्वम्, युष्माकम्, त्वयि, अस्मान्, आवाभ्याम्, सुपदः, त्वत्, मम,
माम्, एनयोः, एतेषाम्, तस्मिन्, आवयोः— रूपों को सिद्ध करें ।
(१२) अधोलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की व्याख्या करें—
१ पादः पत् । २ योऽचि । ३ द्वितीयायाञ्च । ४ त्वाहौ सौ । ५ तदोः
सः० । ६ समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशाः० । ७ एते वांन्नावादयः० ।
(१३) ऐसा शब्द बताएं जिस के दोनों भ्यसों तथा दोनों 'औ' में रूप वा सिद्धि
का भेद पड़ता हो ।
(यहां दकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
—:०:—
अब थकारान्त पुंल्लिङ्ग का वर्णन करते हैं—
[लघु०] अग्निमत्, अग्निमद् । अग्निमथौ । अग्निमथः ॥
व्याख्या—अग्निं मथ्नातीति—अग्निमत् । अग्निकर्मोपपदाद् मन्थ् विलोडने

(क्र्या० भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातो क्विपि सर्वापहारलोपे अनिदितां हल उपधायाः
क्ङिति (३३४) इति नलोपे च कृते 'अग्निमथ्' इतिशब्द सिद्धयति¹। अग्नि का
मन्थन करने वाला 'अग्निमथ्' कहलाता है । इस की रूपमाला यथा—
प्र० अग्निमत्-द्† अग्निमथौ, अग्निमथ । द्वि० अग्निमथम्, अग्निमथौ,
अग्निमथ । तृ० अग्निमथा अग्निमद्भ्याम्‡, अग्निमद्भिः । च० अग्निमथे, अग्निमद्-
भ्याम् अग्निमद्भ्य । ५० अग्निमथ, अग्निमद्भ्याम्, अग्निमद्भ्य । प० अग्निमथ,
अग्निमथो, अग्निमथाम् । स० अग्निमथि, अग्निमथो, अग्निमत्सु* । स० हेअग्निमत्-द्†,
हे अग्निमथौ , हे अग्निमथ ।
† हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६), झला जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) ।
‡ झला जशोऽन्ते (६७) । * झला जशोऽन्ते (६७), खरि च (७४) ।
(यहा थकारान्त पुल्लिंग्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
——— o ———
अब चकारान्त पुल्लिंग्गो का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विधि सूत्रम्—(३३४) अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति।६।४।२४॥
हलन्तानामन्दितामङ्गानामुपधाया नस्य लोप क्ङिति ङिति । नुँम् ।
संयोगान्तस्य लोप (२०) । नस्य कुत्वेन ङ । प्राङ् । प्राञ्चौ । प्राञ्च ॥
अर्थ.—जिन के इकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती ऐसे हलन्त अङ्गों की उपधा
के नकार का कित् ङित् परे होने पर लोप हो जाता है ।
व्याख्या—अनिदिताम् ।६।३। हल ।६।१। (अङ्गस्य का विशेषण होने से
तदन्तविधि होकर 'हलन्तस्य' बन जाता है) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) ।
उपधाया ।६।१। न ।६।१। (इनान्नलोप मे । यहा षष्ठी का सुक् हुआ है) । लोप.
।१।१। (इनान्नलोप से) । क्ङिति ।७।१। समास — इत् (ह्रस्वेकार) इत् (इत्स-
ञ्ज्ञक) यषान्ते=इदितः, बहुव्रीहिसमास । न इदितः=अनिदित, तेषाम्=अनिदि-
ताम्, नञ्समास । क् च् ङ् च=क्ङौ, इतरेतरद्वन्द्वः । क्ङौ इतौ यस्य स क्ङित्,
तस्मिन्= क्ङिति, बहुव्रीहिसमास. । 'अनिदिताम्' इस प्रकार बहुवचननिर्देश करने से
'हल' और 'अङ्गस्य' दोनों में वचनविपरिणाम अर्थात् बहुवचन हो जाता है । अर्थ —
(अनिदिताम्) जिन के इकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती ऐसे (हल=हलन्तानाम्)
हलन्त (अङ्गस्य=अङ्गानाम्) अङ्गों की (उपधाया ) उपधा के (न=नस्य) नकार
का (लोप ) लोप हो जाता है (क्ङिति) कित् ङित् परे हो तो ।
'प्र' पूर्वक अञ्चुँ गतिपूजनयोः२ (भ्वा० प०) धातु में ऋत्विग्दधृक्० (३०१)
१. इदितो मथेस्तु नलोपाभावाद्—अग्निमन्, अग्निमन्थावित्यादिरूपाणि ज्ञेयानि ।
२. यहा केवल गति अर्थ ही विवक्षित है, पूजन नहीं । अन्यथा नाञ्चेः पूजायाम्
(३४१) से नकारलोप का निषेध हो जायेगा । पूजा अर्थ में रूप आगे दर्शाए
जाएंगे ।