सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

२३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
विशेष—'बहुपति' (ईषदून पति) शब्द में 'बहुच्' प्रत्यय है, जो कि—विभाषा
सुपो बहुच् पुरस्तात् (५।३।६८) इस सूत्र से प्रकृति मे पूर्व होगा। उस का उच्चारण
'पति' की तरह होगा। यदि 'बहु' शब्द अभीष्ट हो, तब 'भूपति' की तरह होगा।
प्रश्न—सीतायाः पतये नमः इत्यादि स्थानों पर समास न होने से कैसे घिसञ्ज्ञा
कर दी गई है ?
उत्तर—यहां पर छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति इस उक्ति के अनुसार षष्ठीयुक्त-
श्छन्दसि वा (१।४।६) से घिसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये। अथवा—तत्पुरुषे कृति बहु-
लम् (८१२) सूत्र से बहुलग्रहणसामर्थ्यात् यहां षष्ठी का समास में अलुक् जान कर
घिसञ्ज्ञा समझनी चाहिये।
[लघु०] कतिशब्दो नित्य बहुवचनान्तः ॥
अर्थ:—'कति' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है।
व्याख्या—'किम्' शब्द से 'डति' प्रत्यय करने पर कति शब्द सिद्ध होता है।
इस का प्रयोग सदा बहुवचन में ही होता है, एकवचन और द्विवचन में नहीं। क्योंकि
'कति' (कितने) शब्द बहुत्व का ही वाचक है एक दो का नहीं।
'कति + शस्' (जस्) इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१८६) बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या ।१।१।२३॥
अर्थ—बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा डतिप्रत्ययान्त शब्द 'सङ्ख्या'
सञ्ज्ञक होते हैं।
व्याख्या—बहु-गण-वतुं-डति ।१।१। सङ्ख्या ।१।१। समासः—बहुश्च गणश्च
वतुंश्च डतिश्च = बहु-गण-वतुं-डति, समाहारद्वन्द्वः । 'वतुँ' और 'डति' प्रत्यय हैं, अतः
प्रत्ययग्रहणे तदन्त-ग्रहणम् से तदन्त शब्दों का ही ग्रहण होगा। केवल प्रत्ययों की सञ्ज्ञा
करना निष्प्रयोजन होने से सञ्ज्ञाविधौ प्रत्यय-ग्रहणे तदन्त-ग्रहणं नास्ति यह निषेध
प्रवृत्त न होगा। अर्थ—(बहु-गण-वतुं-डति) बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा
डतिप्रत्ययान्त शब्द (सङ्ख्या) सङ्ख्या सञ्ज्ञक होते हैं।
'कति + जस्' यहां प्रकृतसूत्र से डतिप्रत्ययान्त 'कति' शब्द की सङ्ख्या सञ्ज्ञा
हो जाती है। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१८७) डति च ।१।१।२४॥
डत्यन्ता सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञा स्यात् ॥
अर्थ:—डति-प्रत्ययान्त सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञक हो।
व्याख्या—डति ।१।१। च इत्यव्ययपदम् ।१।१। (बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या
से) । षट् ।१।१। (ष्णान्ता षट् से)। अर्थ—(डति) डतिप्रत्ययान्त (सङ्ख्या) सङ्-
ख्यासञ्ज्ञक शब्द (षट्) षट् सञ्ज्ञक होते हैं।
'कति + जस्' यहां कतिशब्द डतिप्रत्ययान्त है और साथ ही सङ्ख्यासञ्ज्ञक
भी है; अतः इस की षट्सञ्ज्ञा हो जाती है। आकडारादेका संज्ञा (१६६) इस

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३७
अधिकार से बहिर्भूत होने के कारण यहां एक की दो सञ्ज्ञाएं हुईं । अब अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (१८८) षड्भ्यो लुक् ।७।१।२२॥
जश्शसोः ॥
अर्थः-षट्सञ्ज्ञकों से परे जस् और शस् का लुक् हो जाता है ।
व्याख्या - षड्भ्यः ।५।३। जश्शसोः ।६।२। (जश्शसोः शिः से) । लुक् ।१।१।
अर्थः - (षड्भ्यः) षट्सञ्ज्ञकों से परे (जश्शसोः) जस् और शस् का (लुक्) लुक्
हो जाता है ।
'कति + अस्' यहां 'कति' शब्द की षट्सञ्ज्ञा है । इस से परे जस् विद्यमान
है, अतः जस् का लुक् होगा । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि लुक् किसे कहते
हैं ? इस का समाधान अग्रिमसूत्र से करते हैं-
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् - (१८६) प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ।१।१।६०॥
लुक्-श्लु-लुपूशब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमात् तत्तत्सञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थः-लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो प्रत्यय का अदर्शन किया जाता है,
वह (अदर्शन) क्रमशः लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता है ।
व्याख्या-प्रत्ययस्य ।६।१। अदर्शनम् ।१।१। (अदर्शनं लोपः से) । लुक्श्लुलुपः
।१।३। यहां 'प्रत्यय का अदर्शन लुक्, श्लु, लुपू सञ्ज्ञक हो' ऐसा अर्थ प्रतीत होता है ।
इस से एक ही प्रत्यय के अदर्शन की 'लुक्, श्लु, लुपू' ये तीन सञ्ज्ञाएं हो जाती हैं ।
इस से 'हन्ति' में शप् का लुक् होने पर श्लौ (६०५) से द्वित्व प्राप्त होता है। 'जुहोति'
में शप् का श्लु होने से उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६) से वृद्धि प्राप्त होती है । अतः
इन के साङ्कर्य की निवृत्ति के लिये 'लुक्-श्लु-लुपः' पद की आवृत्ति (दो वार पाठ)
कर एक स्थान पर उस का तृतीयान्ततया विपरिणाम कर लेना चाहिये । अर्थः- (लुक्-
श्लु-लुब्भिः) लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो (प्रत्ययस्य) प्रत्यय का (अदर्शनम्)
अदर्शन किया जाता है, वह क्रमशः (लुक्-श्लु-लुपः) लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता
है । भावः-१. प्रत्यय का अदर्शन 'लुक्' सञ्ज्ञक होता है । २. प्रत्यय का अदर्शन 'श्लु'
सञ्ज्ञक होता है । ३. प्रत्यय का अदर्शन 'लुपू' सञ्ज्ञक होता है । अब इस अर्थ से
'हन्ति' आदि में कोई दोष नहीं आता; क्योंकि 'हन्ति' में शप्प्रत्यय का अदर्शन लुक्-
सञ्ज्ञक है श्लुसञ्ज्ञक नहीं, अतः श्लौ (६०५) से द्वित्व नहीं होता । 'जुहोति' में
शप्प्रत्यय का अदर्शन श्लुसञ्ज्ञक है लुक्सञ्ज्ञक नहीं, अतः उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६)
से वृद्धि नहीं होती । इसी प्रकार अन्यत्र भी जान लेना चाहिये । तो अब हमें विदित
हो गया कि प्रत्यय के अदर्शन को ही 'लुक्' कहते हैं ।
'कति + अस्' यहां अस् (जस्) प्रत्यय का लुक् अर्थात् अदर्शन हो कर 'कति'
प्रयोग सिद्ध होता है । अब यहां जसि च (१६८) द्वारा गुण की आशङ्का करने के
लिये प्रथम जस् की स्थापना करते हैं-

२३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(१६०) प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम्। १।१।६१॥
प्रत्यये लुप्ते तदाश्रितं कार्यं स्यात् । इति जसि च (१६८) इति गुणे
प्राप्ते—
अर्थ—प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी तदाश्रित कार्य हो जाते हैं। इस सूत्र से
जसि च (१६८) द्वारा 'कति' में गुण प्राप्त होता है। इस पर [अग्रिमसूत्र निषेध कर
देता है]।
व्याख्या—प्रत्यय लोपे ।७।१। प्रत्यय-लक्षणम् ।१।१। समास—प्रत्ययस्य लोप
= प्रत्ययलोप, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे। षष्ठीतत्पुरुषसमास । प्रत्ययो लक्षणं (निमित्तम्)
यस्य तत् प्रत्ययलक्षणम् कार्यम् इत्यर्थः । बहुव्रीहिसमास । अर्थ — (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय
का लोप हो जाने पर भी (प्रत्ययलक्षणम्) प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य हो
जाता है।
कई कार्य प्रत्यय को मान कर हुआ करते हैं। यथा—जसि च (१६८) यह
‘जस्’ प्रत्यय को मान कर ह्रस्वान्त अङ्ग के स्थान पर गुण करता है। सुपि च (१४१)
यह यत्रादि सुप् प्रत्यय को मान कर अदन्त अङ्ग को दीर्घ करता है। सुप्तिङन्तं पदम्
(१४) यह सुप् तथा तिङ् प्रत्यय को मान कर ही पद सञ्ज्ञा करता है। इस प्रकार
के कार्य उस प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी हो जाते हैं—यह इस सूत्र का तात्पर्य
है। यथा—'राम' यहां जिस प्रकार सुप् प्रत्यय के रहते पदसञ्ज्ञा हो जाती है वैसे
'लिट्, विद्वान्, भगवान्' आदियों में सुप् प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा
सिद्ध हो जाती है।
'कति' यहां जस् प्रत्यय का लोप हो चुका है, अब इस सूत्र से उस के न रहने
पर भी उस को मान कर जसि च (१६८) द्वारा गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-
सूत्र निषेध करता है :
प्रश्न—इस सूत्र द्वारा प्रत्यय के लोप में ही प्रत्ययलक्षण होता है, परन्तु 'कति'
में प्रत्यय का लुक् हुआ है, लोप नहीं, तो यहां कैसे प्रत्ययलक्षण (गुण) प्राप्त हो
सकता है ?
उत्तर—जैसे लोक में एक व्यक्ति की अनेक सञ्ज्ञाएं देखी जाती हैं वैसा इस
शास्त्र में भी होता है। तव्यत्, तव्य, अनीयर् आदि प्रत्ययों की कृत् और कृत्य दोनों
सञ्ज्ञाएं हैं। जहां शास्त्र में एक सञ्ज्ञा करना अभीष्ट होता है वहां स्पष्ट कह दिया
जाता है यथा—आकडारादेका सञ्ज्ञा (१४१)। यहां प्रत्यय के अदर्शन की अदर्शनं
लोपः (२) से लोप-सञ्ज्ञा की गई है। उसी अदर्शन की पुनः प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः
(१८६) सूत्र से लुक्, श्लु और लुप्-सञ्ज्ञाएं की जाती हैं। तो इस प्रकार लुक्, श्लु
और लुप् तीनों सञ्ज्ञाओं के साथ 'लोप' सञ्ज्ञा भी वर्तमान रहती है। इस से 'कति'
में प्रत्यय-लक्षण प्राप्त होता है।
[लघु०] निषेध सूत्रम्—(१६१) न लुमताऽङ्गस्य ।१।१।६२॥
लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात् । कति २। कतिभिः ।
कतिभ्यः २ । कतीनाम् । कतिषु ॥

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३६
अर्थः—लु वाले (लुक्, श्लु, लुप्) शब्दों से यदि प्रत्यय का लोप हुआ हो तो
तन्निमित्तक (उस प्रत्यय को निमित्त मान कर होने वाला) अङ्ग-कार्य नहीं होता।
व्याख्या—लुमता ।१।१। प्रत्ययलोपे ।७।१। (प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् से)।
अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। प्रत्ययलक्षणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम्। समासः—
लु इत्येकदेशोऽस्त्यस्य स लुमान्, तेन लुमता। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुँप् (११८४)
इति मतुँप्प्रत्ययः। प्रत्ययस्य लोपः=प्रत्ययलोपः, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे, षष्ठीतत्पुरुषः।
अर्थः—(लुमता) लु वाले शब्द से (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय का लोप होने पर (अङ्गस्य)
अङ्ग के स्थान पर (प्रत्ययलक्षणम्) उस प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य (न)
नहीं होता। ‘लु’ वाले शब्द तीन हैं—१. लुक्, २. श्लु, ३. लुप्। यह सूत्र पूर्वकथित
प्रत्ययलक्षण सूत्र का अपवाद है।
‘कति’ में जस् प्रत्यय का लु वाले शब्द = लुक् से अदर्शन हुआ है तो यहां
प्रत्ययलक्षण कार्य (गुण) न होगा।
ध्यान रहे कि यह निषेध तभी होगा जब अङ्ग के स्थान पर प्रत्ययलक्षण कार्य
करना होगा। यदि अङ्ग के स्थान पर कार्य न होगा तो ‘लु’ वाले शब्दों से अदर्शन
होने पर भी प्रत्ययलक्षण हो जायेगा। यथा—‘पञ्चन्, सप्तन्’ यहां षड्भ्यो लुक्
(१८४) से जस् और शस् का लुक् होने पर भी सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र से पद-
सञ्ज्ञा हो जाती है। पदसञ्ज्ञा हो जाने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा
नकार का लोप हो जाता है। पदसञ्ज्ञा केवल अङ्ग की ही नहीं होती किन्तु प्रत्यय-
विशिष्ट अङ्ग की हुआ करती है; इस से प्रत्ययलक्षण में कोई बाधा उपस्थित नहीं
होती। इसी प्रकार यङ्लुगन्त प्रक्रिया में यङ्लुक् होने पर भी यङन्तमूलक द्वित्व हो ही
जाता है। यह विषय विस्तारपूर्वक रोऽसुंपि (११०) सूत्र पर लिख आए हैं वहीं देखें।
द्वितीया के बहुवचन शस् में भी जस् की तरह ‘कति’ प्रयोग बनता है। प्रत्यय-
लक्षण द्वारा गुणप्राप्ति तथा उस का निषेध यहां नहीं होता।
कति + भिस् = कतिभिः। कति + भ्यस् = कतिभ्यः। यहां सकार को रुँ और
रेफ को विसर्ग आदेश हो जाते हैं।
‘कति + आम्’ यहां ह्रस्वनद्यापो नुट् (१८४) सूत्र से ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट्
आगम, अनुबन्धलोप तथा नामि (१४६) से दीर्घ होकर—‘कतीनाम्’ प्रयोग सिद्ध
होता है। [अथवा षट्त्व के कारण षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से नुट् का आगम
कर दीर्घ कर लेना चाहिये। इस की स्पष्टता ‘रामाणाम्’ प्रयोग पर सिद्धान्तकौमुदी
की टीकाओं में देखनी चाहिये।]
सप्तमी के बहुवचन में आदेश-प्रत्यययोः (१५०) से मूर्धन्य षकार होकर
‘कतिषु’ रूप बनता है।
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० कति | तृ० ० ० कतिभिः
द्वि० ० ० ,, | च० ० ० कतिभ्यः

२४० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
पं० ० ० कतिभ्यः | स० ० ० कतिषु
ष० ० ० कतीनाम् | सं० ० ० हे कति !
[लघु०] युष्मदस्मत्षट्सञ्ज्ञकास्त्रिषु सरूपा ॥
अर्थ — युष्मद् अस्मद् और षट्सञ्ज्ञक शब्द तीनों लिङ्गो में समान रूप वाले
होते हैं।
व्याख्या—समानानि रूपाणि येषां ते सरूपाः, बहुव्रीहिसमासः । ज्योतिर्जनपद०
(६ ३ ८४) इति समानस्य सभावे । 'कति' शब्द षट्सञ्ज्ञक है, अतः तीनों लिङ्गों
में एक समान रूप बनेंगे। यथा—कति पुरुषाः ? कति नार्यः ? कति फलानि ? ।
इसी प्रकार युष्मद् और अस्मद् के भी—'अहम्पुरुषः, अहं नारी, अहं मित्रम्, त्वं
पुरुषः त्वं नारी, त्वं मित्रम्' इत्यादि समान रूप बनते हैं।
[लघु०] त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । त्रयः । त्रीन् । त्रिभिः । त्रिभ्यः २ ॥
अर्थ—'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त है।
व्याख्या—'त्रि' शब्द का अर्थ 'तीन' है। तीन—बहुसङ्ख्या का वाचक है
अतः एकत्व और द्वित्व का प्रकृति के अर्थ—बहुत्व के साथ अन्वय न हो सकने के
कारण एकवचन द्विवचन नहीं आते।
ध्यान रहे कि प्रधान होने पर ही 'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है, गौण
अवस्था में तो इस में एकवचन और द्विवचन भी हुआ करते हैं जैसा कि आगे 'प्रियत्रि'
शब्द में किया गया है।
'त्रि+अस्' (जस्) इस अवस्था में जसि च (१६८) सूत्र से गुण हो एचोऽय-
वायाव (२२) से अय् आदेश करने पर—त्रयस्— 'त्रयः' रूप बनता है।
'त्रि+अम्' (शस्) इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ हो शकार को नकार करने
पर 'त्रीन्' प्रयोग सिद्ध होता है।
त्रि+भिस् = त्रिभिः । त्रि+भ्यस् = त्रिभ्यः । सकार को रुत्व विसर्ग हो
जाते हैं।
'त्रि+आम्' इस दशा में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६२) त्रेस्त्रयः ।७।१।५३॥
त्रि-शब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि। त्रयाणाम् । त्रिषु । गौणत्वेऽपि -
प्रियत्रयाणाम् ॥
अर्थ—आम् पर हो तो 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'त्रय' आदेश हो।
व्याख्या—त्रेः ।६।१। त्रयः ।१।१। आमि ।७।१। (आमि सर्वनाम्नः सुट् से)।
अर्थ —(आमि) आम् परे होने पर (त्रेः) त्रिशब्द के स्थान पर (त्रयः) त्रय आदेश
हो। अनेकाल् होने से यह आदेश अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा।
सूत्र में त्रिशब्द सङ्ख्यावाचक नहीं शब्दवाचक है अतः हरिवत् उच्चारण होने
से 'त्रेः' यहाँ एकवचन हो गया है।
'त्रि+आम्' यहाँ आम् परे है अतः त्रिशब्द को प्रकृतसूत्र से त्रय आदेश हो

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४१
—'त्रय + आम्' । अब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, नामि (१४६)
से दीर्घ तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व करने पर 'त्रयाणाम्' रूप सिद्ध होता है।
'त्रि + सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्ययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर
'त्रिषु' रूप सिद्ध हुआ। 'त्रि' शब्द की समग्र रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० त्रयः | प० ० ० त्रिभ्यः
द्वि० ० ० त्रीन् | ष० ० ० त्रयाणाम्
तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु
च० ० ० त्रिभ्यः | सं० ० ० हे त्रयः !
बहुव्रीहिसमास में अन्यपद प्रधान रहता है, समस्यमान पद गौण अर्थात्
अप्रधान रहते हैं। यह हम पीछे (१३३) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। जब बहुव्रीहि-
समास में 'त्रि' शब्द गौण होता है तब भी इस सूत्र से उस के स्थान पर 'त्रय' आदेश
हो जाता है। सूत्र में 'त्रेः' यहां एकवचन करना ही इस में प्रमाण है; अन्यथा अष्टाभ्य
औश् (३००) की तरह यहां भी त्रेस्त्रयः की बजाय 'त्रयाणां त्रयः' इस प्रकार का
सूत्र बनाते।
प्रियाः त्रयः यस्य सः=प्रियत्रिः, बहुव्रीहिसमासः । जिसे तीन प्रिय हों उसे
'प्रियत्रि' कहते हैं। 'प्रियत्रि+आम्' इस स्थिति में त्रि के स्थान पर त्रय आदेश हो—
प्रियत्रय+आम्। तब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, ह्रस्वान्त अङ्ग को
दीर्घ तथा नकार को णकार हो कर 'प्रियत्रयाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अन्य
विभक्तियों में रूप 'हरि' की तरह होते हैं। 'प्रियत्रि' की रूपमाला यथा—
प्र० प्रियत्रिः प्रियत्री प्रियत्रयः | प० प्रियत्रेः प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभ्यः
द्वि० प्रियत्रिम् ,, प्रियत्रीन् | ष० ,, प्रियत्र्योः प्रियत्रयाणाम्
तृ० प्रियत्रिणा प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभिः | स० प्रियत्रौ ,, प्रियत्रिषु
च० प्रियत्रये ,, प्रियत्रिभ्यः | सं० हे प्रियत्रे! हे प्रियत्री! हे प्रियत्रयः!
अब सङ्ख्यावाचक द्वि(दो) शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६३) त्यदादीनामः ।७।२।१०२॥
एषामकारो विभक्तौ । द्विपर्यन्तानामेवेष्टिः । द्वौ २ । द्वाभ्याम् ३ ।
द्वयोः २ ॥
अर्थः—विभक्ति परे रहने पर त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर अकार आदेश
हो । द्विपर्यन्तानाम् —'द्वि' तक ही त्यदादियों को अकार करना इष्ट है।
व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। अः ।१।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ
से) । समासः—त्यद्-शब्द आदिर्येषान्ते त्यदायः, तद्गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि-समासः ।
सर्वादिगण के अन्तर्गत त्यदादिगण आया है। यह त्यद् शब्द से आरम्भ होता है। इस
की अवधि भाष्यकार ने 'द्वि' शब्द पर्यन्त नियत की है। इस प्रकार इस गण में 'त्यद्,
ल० प्र० (१६)

२४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि' ये आठ शब्द आते हैं। अर्थ—(विभक्तौ)
विभक्ति परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर (अ) अकार
आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ही अकार आदेश होगा।
'द्वि' शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त होता है। द्विवचन
प्रत्यय आने पर सब विभक्तियों में प्रथम प्रकृतसूत्र द्वारा इकार को अकार हो 'द्व' बन
जाता है। तब रामशब्द के समान प्रक्रिया होकर रूप सिद्ध होते हैं। द्विशब्द की सम्पूर्ण
रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० द्वौ* ० | प० ० द्वाभ्याम् ०
द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयो ‡ ०
तृ० ० द्वाभ्याम्† ० | स० ० ,, ०
च० ० ,, ० | त्यदादियों का प्राय सम्बोधन नहीं होता।

  • 'द्वि + औ' यहां अकार अन्तादेश हो वृद्धि हो जाती है।
    † 'द्वि + भ्याम्' यहां अकार अन्तादेश हो सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है।
    ‡ 'द्वि + ओस्' यहां अकार अन्तादेश हो ओसि च (१४७) से एकार तथा एचोऽय-
    वायाव (२२) से एकार को अय् आदेश हो जाता है।

अभ्यास (२६)
(१) अव्ययों से अतिरिक्त ऐसे कौन से शब्द हैं जो तीनों लिङ्गों में सरूप
अर्थात् समान रूप वाले होते हैं ?
(२) ऐसे किसी शब्द का उल्लेख करें जिस की सुबन्तप्रक्रिया आम् को छोड़
अन्यत्र हरिशब्दवत् होती हो।
(३) सीतायाः पतये नमः यहां समासाभाव में भी कैसे घिसञ्ज्ञा हो कर
तज्जन्य कार्य हो जाते हैं ?
(४) निम्नलिखित सञ्ज्ञाओं में कौन सी सञ्ज्ञा प्रकृति की, और कौन सी
प्रत्यय की होती है ? ससूत्र यथाधीतं टिप्पणं करें—
१ अपृक्त। २ अङ्ग। ३. आट्। ४ उपधा। ५ सर्वनाम। ६. सङ्ख्या।
७ षट्। ८ घि। ६ सर्वनामस्थान। १० विभक्ति। ११ भ। १२
पद। १३ प्रातिपदिक। १४ सम्बुद्धि। १५ बहुवचन।
(५) (क) न लुमताङ्गस्य सूत्र में 'अङ्गस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(ख) शेषो घ्यसखि सूत्र में 'शेष' पद का ग्रहण क्यों किया गया है ?
(ग) हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० सूत्र में 'दीर्घात्' पद के ग्रहण का क्या
प्रयोजन है ?
(घ) अतिदेश किसे कहते हैं ? इस का क्या लाभ होता है ?
(ङ) प्रत्यय का लुक् होने पर भी क्या प्रत्ययलक्षण हुआ करता है ?

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४३
(६) इस व्याकरण में एक की एक सञ्ज्ञा होती है या अनेक ? सप्रमाण
लिखें।
(७) ह्यत्स्यात् परस्य सूत्र में 'परस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(८) 'अपत्य' आदि शब्दों से परे ङसिं या ङस् के अकार को ह्यत्स्यात्परस्य
द्वारा उकार आदेश होगा या नहीं ? स्पष्ट करें।
(६) संयोगान्तस्य लोपे हि—इस श्लोक की व्याख्या करें।
(१०) हरौ, त्रयाणाम्, सख्युः, पत्ये, हरिणा, कति, सखा, हरेः, भूपतये, द्वौ,
सखायौ, हे सखे, प्रियययः—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक साधनप्रक्रिया
लिखें।
(११) नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य, शेषो घ्यसखि इन सूत्रों की व्याख्या करें।
[यहां ह्रस्व इकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है]
—:०:—
अब ईकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का वर्णन किया जाता है—
[लघु०] पाति लोकमिति पपीः=सूर्यः। दीर्घाज्जसि च (१६२)—पप्यौ २।
पप्यः। हे पपीः। पपीम्। पपीन्। पप्या। पपीभ्याम् ३। पपीभिः। पप्ये।
पपीभ्यः २। पप्यः २। पप्योः। दीर्घात्वान्न नुट्—पप्याम्। ङौ तु सवर्ण-दीर्घः
—पपी। पप्योः। पपीषु। एवं वातप्रम्यादयः॥
व्याख्या—पा रक्षणे (अदा०) धातु से औणादिक 'ई' प्रत्यय कर द्वित्व और
आकार का लोप करने से 'पपी' शब्द सिद्ध होता है[देखें—पापोः किद् द्वे च (उणा०
४३६)]। जगत् का रक्षक होने से सूर्य 'पपी' कहाता है। प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर
इस से सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
पपी+स् (सुँ) इस स्थिति में सकार को रेफ और रेफ को विसर्ग करने पर
'पपीः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि यहां 'ङी' के न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्०
(१७६) सूत्र द्वारा सुँ का लोप नहीं होता।
'पपी+औ' यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) सूत्र से प्राप्त पूर्वसवर्णदीर्घ का
दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से निषेध हो कर इको यणचि (१५) से ईकार को
यण्=यकार करने से 'पप्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी+अस्' (जस्) यहां पूर्व-
सवर्णदीर्घ का निषेध हो ईकार को यण्=यकार करने से 'पप्यः' रूप बनता है।
'पपी+अम्' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप
एकादेश करने पर 'पपीम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
'पपी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७)
से सकार को नकार करने से 'पपीन्' रूप बनता है।
'पपी+आ' (टा) यहां इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'पप्या' रूप बनता है।
तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में 'पपीभ्याम्' बनता है।
तृतीया के बहुवचन में 'पपीभिः'। सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं।

२४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
चतुर्थी के एकवचन में—'पप्ये'। इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है।
पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन 'पपी + अस्' में यण् हो—'पप्यः'।
'पपी + ओस्' इस अवस्था में यण् हो कर 'पप्योः' बनता है।
'पपी + आम्' इस स्थिति में दीर्घ होने से नुट् का आगम नहीं होता। पुंल्-
लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञा भी नहीं होती। तब यण् (१५) हो कर 'पप्याम्' प्रयोग
सिद्ध होता है।
'पपी + ङि' (ङि) यहां अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर 'पपी'
बनता है।
'पपी + सु' (सुप्) यहां सकार को षकार (१५०) हो कर 'पपीषु' बनता है।
'पपी' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० पपी पप्यौ पप्यः | प० पप्यः पपीभ्याम् पपीभ्यः
द्वि० पपीम् ,, पपीन् | ष० ,, पप्योः पप्याम्
तृ० पप्या पपीभ्याम् पपीभिः | स० पपी , पपीषु
च० पप्ये ,, पपीभ्यः | सं० हेपपी ! हे पप्यौ ! हे पप्यः !
इसी प्रकार—ययी (मार्ग), वातप्रमी (मृग-विशेष) आदि के रूप होते हैं।
[लघु०] बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी ॥
व्याख्या—'बहु' शब्द से स्त्रीलिङ्ग में बह्वादिभ्यश्च (१२५६) द्वारा ङीष्
प्रत्यय करने पर 'बह्वी' शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'प्रशस्य' शब्द से द्विवचन-
विभाज्योपपदे० (१२१८) सूत्र द्वारा 'ईयसुन्' प्रत्यय करने तथा प्रशस्यस्य श्रः (१२१६)
से 'श्र' आदेश और उगितश्च (१२४६) से ङीप् प्रत्यय करने पर 'श्रेयसी' शब्द बनता
है। अतिशयेन प्रशस्या = श्रेयसी। बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स = बहुश्रेयसी। अतिप्रशस-
नीय बहुत स्त्रियों वाला पुरुष 'बहुश्रेयसी' कहाता है। यहां 'बह्वी' और 'श्रेयसी' पदों
का बहुव्रीहिसमास हो गया है। स्त्रियाः पुंवत्० (६६८) सूत्र से समास में बह्वी पद को
पुंवत् अर्थात् 'बहु' शब्द हो जाता है। ईयसो बहुव्रीहेर्नेति वाच्यम् (वा०) इस निषेध
के कारण उपसर्जनह्रस्व नहीं होता। समासान्त 'कप्' प्रत्यय प्राप्त था, परन्तु ईयसश्च
(५।४।१५६) सूत्र से निषिद्ध हो गया।
समास होने के कारण प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय आते हैं—
'बहुश्रेयसी + स्' (सुं)। यहां 'श्रेयसी' शब्द ङ्यन्त है, अतः ङी से परे सुं का
हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) सूत्र से लोप हो कर 'बहुश्रेयसी' बनता है।
प्रथमा के द्विवचन में 'बहुश्रेयस्यौ' तथा बहुवचन में 'बहुश्रेयस्यः' बनता है।
दोनों स्थानों पर पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध (१६२) हो कर यण् हो जाता है।
सम्बुद्धि में 'हे बहुश्रेयसी + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१६४) यू स्त्र्याख्यौ नदी ।१।४।३॥
ईदूदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गौ नदीसञ्ज्ञौ स्तः ॥
अर्थ—ईदन्त और ऊदन्त नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द नदीसञ्ज्ञक होते हैं।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४५
व्याख्या—यू ।१।२। स्त्र्याख्यौ ।१।२। नदी ।१।१। समासः—ईश्च ऊश्च = यू
['यू+औ' इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घः, दीर्घाज्जसि च इति निषेधाभावश्छान्दसः], इतरेतर-
द्वन्द्वः । स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ [स्त्रीकर्मोपपदाद् आङ्पूर्वात् चक्षिङ्धातोः
कर्तरि मूलविभुजादित्वात् कप्रत्यये, ख्यावादेशे, आकारलोपे, उपपदसमासे च कृते 'स्त्र्या-
ख्य'शब्दो निष्पद्यते ] । यहां शब्दशास्त्र के प्रस्तुत होने से 'यू' का विशेष्य 'शब्दौ'
अध्याहृत किया जाता है अतः विशेषण से तदन्तविधि हो जायेगी । 'स्त्र्याख्यौ' का अर्थ
'स्त्रियाम्' कहने से भी सिद्ध हो सकता है अतः यहां इस के फलस्वरूप 'नित्य' शब्द
का अध्याहार किया जाता है । अर्थः— (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईदान्त और
ऊदन्त शब्द (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं ।
जिन शब्दों का केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयोग होता है वे शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग
कहाते हैं । 'ग्रामणी, खलपू' आदि शब्द पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में देखे जाते
हैं अतः ये नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, इन की नदीसञ्ज्ञा न होगी । नदी, गौरी, वधू आदि
शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं वे यहां उदाहरण समझने चाहियें । [वस्तुतः नित्यस्त्रीलिङ्ग
शब्दों के विषय में विस्तारपूर्वक विचार सिद्धान्तकौमुदी के अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में
देखें ] ।
श्रेयसी शब्द ङ्यन्त होने से नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अतः इस की तो इस सूत्र से
नदीसञ्ज्ञा निर्बाध होगी ही; परन्तु बहुश्रेयसी में श्रेयसीशब्द गौण हो जाता है, इस
की इस सूत्र से नदीसञ्ज्ञा नहीं हो सकती—इस पर अग्रिम वार्तिक प्रवृत्त होता है—
[लघु०] वा०—(१७) प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च ॥
पूर्वं स्त्र्याख्यस्योपसर्जनत्वेऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः ॥
अर्थः—यहां नदीसञ्ज्ञा में प्रथमलिङ्ग का भी ग्रहण होता है अर्थात् जो शब्द
पहले नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं और बाद में समासवशात् गौण हो जाने से अन्य लिङ्ग में चले
गये हैं उन की भी पहले के लिङ्ग के द्वारा नदीसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये ।
व्याख्या—इस वार्तिक से 'बहुश्रेयसी' में स्थित 'श्रेयसी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा
हो जाती है । अब इस का फल अग्रिमसूत्र में दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६५) अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः ।७।३।१०७॥
सम्बुद्धौ । हे बहुश्रेयसि ! ॥
अर्थः—अम्बार्थ तथा नद्यन्त अङ्गों को सम्बुद्धि परे रहते ह्रस्व हो जाता है ।
व्याख्या—अम्बार्थनद्योः ।६।२। अङ्गयोः ।६।२। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) ।
ह्रस्वः ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। (सम्बुद्धौ च से) । अम्बा अर्थो यस्य सः=अम्बार्थः,
बहुव्रीहिसमासः । अम्बार्थश्च नदी च=अम्बार्थनद्यौ, तयोः=अम्बार्थनद्योः, इतरेतर-
१. इस सूत्र से वर्णों की भी नदीसञ्ज्ञा हो जाती है; अन्यथा 'तुदन्ती' आदि उदा-
हरणों में आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) से नुम् न हो सकेगा [इसी सूत्र पर तत्त्वबोधिनी
यहां द्रष्टव्य है] ।

२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
द्वन्द्व । ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ —
(अम्बार्थनद्यो ) अम्बा=माता अर्थ वाले तथा नद्यन्त (अङ्गयो ) अङ्गो के स्थान पर
(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे रहते (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह
ह्रस्व अङ्ग के अन्त्य अल् के स्थान पर होगा । अम्बार्थको के उदाहरण आगे अजन्त-
स्त्रीलिङ्ग प्रकरण मे आयेंगे ।
‘हे बहुश्रेयसी + सु’ यहा ‘श्रेयसी’ की नदीसञ्ज्ञा है, नद्यन्त शब्द ‘बहुश्रेयसी’
है । इस से परे सम्बुद्धि वर्त्तमान है । अत प्रकृतसूत्र से ईकार को ह्रस्व हो एङ्-
ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे बहुश्रेयसि’ प्रयोग सिद्ध
होता है । ध्यान रहे कि ह्रस्व हो जाने पर ह्रस्वविधानसामर्थ्य से ह्रस्वस्य गुण
(१६६) द्वारा गुण नही होगा, अन्यथा ‘अम्बार्थनद्योर्गुण ’ सूत्र ही पढ देते ।
द्वितीया के एकवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अम्’ यहा पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर
अमि पूर्व. (१३५) से पूर्वरूप करने पर ‘बहुश्रेयसीम्’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अस्’(शस्) इस स्थिति मे पूर्वसवर्ण-
दीर्घ हो कर तस्माच्छसो न पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने पर ‘बहुश्रेयसीन्’
प्रयोग बनता है ।
बहुश्रेयसी + आ (टा) = बहुश्रेयस्या [इको यणचि (१५) से यण्] ।
तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी के द्विवचन मे ‘बहुश्रेयसीभ्याम्’ सिद्ध होता है ।
तृतीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसीभि’ । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं ।
चतुर्थी के एकवचन मे बहुश्रेयसी + ए’ (ङे) इस स्थिति मे नदीसञ्ज्ञा हो
कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) आङ् नद्या. ।७।३।११२॥
नद्यन्तात् परेषा ङितामाडागमः ॥
अर्थ — नद्यन्त शब्दो से परे ङित् प्रत्ययो को आट् आगम हो ।
व्याख्या—आट् ।१।१। (सूत्र मे यरोऽनुनासिके० द्वारा अनुनासिक हुआ है) ।
नद्या ।५।१। अङ्गात् ।५।१।(अङ्गस्य अधिकृत है)। ङित ।६।१। (घेर्डिति से विभक्ति-
विपरिणाम कर के) । अर्थ —(नद्या ) नद्यन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित ) ङित्
का अवयव (आट्) आट् हो जाता है । आट् टित् है अत आद्यन्तौ टकितौ (८५)
द्वारा ङितो का आद्यवयव होगा ।
‘बहुश्रेयसी + ए’ यहा ‘ए’ ङित् है, ‘बहुश्रेयसी’ नद्यन्त है । अत ङित् से पूर्व
आट् का आगम हो— ‘बहुश्रेयसी + आ ए’ । इस स्थिति मे अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६७) आठश्च । ६।१।८७॥
आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेश । बहुश्रेयस्यै । बहुश्रेयस्या २ । नद्यन्त-
त्वान्नुट्—बहुश्रेयसीनाम् ॥
अर्थ —आट् से अच् परे रहते पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४७
व्याख्या—आटः ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि से) ।
पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१।
(वृद्धिरेचि से) । अर्थः—(आटः) आट् से (अचि) अच् परे रहते (पूर्व-परयोः) पूर्व
+पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो ।
'बहुश्रेयसी+आ ए' यहां आट् से परे 'ए' अच् वर्त्तमान है, अतः पूर्व (आ)
और पर (ए) के स्थान पर ऐकार वृद्धि एकादेश हो गया । तब 'बहुश्रेयसी+ऐ' इस
दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'बहुश्रेयस्यै' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
नोट—यद्यपि यहां वृद्धिरेचि (३३) से भी वृद्धि हो सकती थी; तथापि
'ऐक्षत' (आ+ईक्षत) आदि प्रयोगों में आटश्च (१६७) के विना कार्य सिद्ध नहीं
हो सकता था, इस लिये इस का बनाना आवश्यक था। यहां न्यायवशात् इसे प्रवृत्त
किया गया है।
चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसीभ्यः' । सकार को रुँत्व तथा
रेफ को विसर्ग हो जाते हैं ।
पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+अस्' इस दशा में नदीसञ्ज्ञा
हो कर आन्नद्याः (१६६) से आट् का आगम और आटश्च (१६७) से वृद्धि हो
जाती है। तब 'बहुश्रेयसी+आस्' इस अवस्था में यण् हो सकार को रुँत्व विसर्ग
करने से 'बहुश्रेयस्याः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
षष्ठी के द्विवचन में यण् हो कर 'बहुश्रेयस्योः' बना ।
षष्ठी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसी+आम्' इस स्थिति में नद्यन्त होने से ह्रस्व-
नद्यापो नुट् (१४८) सूत्र द्वारा नुट् का आगम हो 'बहुश्रेयसीनाम्' रूप सिद्ध होता है ।
सप्तमी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+इ' (ङि) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६८) ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ।७।३।११६॥
नद्यन्ताद्, आवन्ताद्, 'नी'शब्दाच्च परस्य ङेराम् । बहुश्रेयस्याम् ।
शेषं पपीवत् ॥
अर्थः—नद्यन्त, आवन्त तथा 'नी' शब्द से परे 'ङि' के स्थान पर 'आम्'
आदेश हो ।
व्याख्या—ङेः ।६।१। आम् ।१।१। नद्याम्नीभ्यः ।५।३। अङ्गेभ्यः ।५।३। (अङ्गस्य
अधिकृत है। इस के विभक्ति और वचन का विपरिणाम हो जाता है) । समासः—
नदी च आप् च नीश्च=नद्याम्न्यः, (यरोऽनुनासिके० इत्यनुनासिकः), तेभ्यः=नद्या-
म्नीभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । नदी और आप् 'अङ्ग' के विशेषण हैं अतः येन विधिस्तदन्तस्य
(१.१.७१) द्वारा इन से तदन्तविधि हो जाती है¹ । 'आप्' के प्रत्यय होने से प्रत्यय-
१. ग्रन्थकार के अनुरोध से हम ऐसा कर रहे हैं। वस्तुतः 'नी' शब्द से भी तदन्त-
विधि हो जाती है; वह भी 'अङ्ग' का विशेषण हैं। अत एव 'ग्रामण्याम्' में आम्
आदेश हो जाता है।

२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा भी इस से तदन्तविधि हो सकती है । अर्थ —
(नद्याम्नीभ्य ) नद्यन्त, आवन्त और नी (अङ्गेभ्य ) अङ्गो से परे (ङे.) ङि के स्थान
पर (आम्) आम् आदेश होता है ।
'बहुश्रेयसी+इ' यहां 'बहुश्रेयसी' नद्यन्त अङ्ग है, अतः इस से परे ङि को
आम् आदेश हो गया । 'बहुश्रेयसी + आम्' इस स्थिति में स्थानिवद्भाव से आम् ङित्
है । अब यहां आण्नद्या (१६६) से आट् का आगम तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८)
से नुट् का आगम युगपत् प्राप्त होते हैं । दोनों सावकाश हैं । आट्—'बहुश्रेयस्यै'
आदियों में तथा नुट्—'बहुश्रेयसीनाम्' आदियों में चरितार्थ है अतः विप्रतिषेधे परं
कार्यम् (११३) से पर कार्य आट् आगम हो कर—'बहुश्रेयसी + आ आम्' हुआ ।
अब यद्यपि आम् परे होने से नुट् आगम प्राप्त हो सकता है और इस में आम् का अव-
यव होने से आट् आगम बाधा भी नहीं डाल सकता, तथापि विप्रतिषेधे यद् बाधितं
तद् बाधितमेव (अर्थात् विप्रतिषेधस्थल में जिस शास्त्र का एक बार बाध हो जाता
है उस की पुनः प्रवृत्ति नहीं होती) इस नियमानुसार नुट् नहीं होता । तब आठश्च
(१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१४) से यण् आदेश हो 'बहुश्रेयस्याम्' प्रयोग
बनता है ।
बहुश्रेयसी+सु(सुप्) = बहुश्रेयसीषु । यहां आदेश-प्रत्यययो (१५०) से सकार
को षकार हो जाता है । 'बहुश्रेयसी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० बहुश्रेयसी, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयस्य । द्वि० बहुश्रेयसीम्, बहुश्रेयस्यौ,
बहुश्रेयसीन् । तृ० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभि । च० बहुश्रेयस्यै, बहु-
श्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । प० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । ष०
बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयस्यो, बहुश्रेयसीनाम् । स बहुश्रेयस्याम्, बहुश्रेयस्यो, बहु-
श्रेयसीषु । स० हे बहुश्रेयसि', हे बहुश्रेयस्यौ', हे बहुश्रेयस्य ।
[लघु०] अङ्यन्तत्वान्न सुँलोप । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ॥
व्याख्या—लक्ष दर्शने अङ्कने च (चुरा०) इस धातु से लेश्चेर्मुद् च (उणा०
४४०) सूत्र द्वारा ई प्रत्यय तथा मुँट् का आगम हो कर 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता
है । लक्ष्मीमतिक्रान्त = अतिलक्ष्मी, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति
समास । लक्ष्मी का अतिक्रमण करने वाला पुरुष 'अतिलक्ष्मी' कहाता है ।
'अतिलक्ष्मी+स्' (सुं) । ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता; रुत्व
तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'अतिलक्ष्मी' रूप बनता है ।
इस के शेष रूप 'बहुश्रेयसी' के समान बनते हैं । 'अतिलक्ष्मी' में 'लक्ष्मी' शब्द
नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अब इस के गौण हो जाने पर भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७)
वार्तिक द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती हैं । अतः नदी के सब पूर्वोक्त कार्य हो जाते हैं ।
इस की समग्र रूपमाला यथा—
प्र० अतिलक्ष्मी, अतिलक्ष्म्यौ, अतिलक्ष्म्य । द्वि० अतिलक्ष्मीम्, अतिलक्ष्म्यौ,

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४६
अतिलक्ष्मीन् । तृ० अतिलक्ष्म्‍या, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभिः । च० अतिलक्ष्म्यै,
अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । प० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः ।
ष० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीणाम् । स० अतिलक्ष्म्याम्, अतिलक्ष्म्योः,
अतिलक्ष्मीषु । सं० हे अतिलक्ष्मि !, हे अतिलक्ष्म्यौ !, हे अतिलक्ष्म्यः ! ।
[लघु०] प्रधीः ॥
व्याख्या—प्रध्यायतीति प्रधीः (विशेष रूप से मनन करने वाला) । 'प्रधी'
शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च इस वार्त्तिक
द्वारा क्विँप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर सिद्ध होता है । व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त
होने के कारण इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती है ।
'प्रधी + स्' (सुँ) यहां ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) द्वारा
सकार का लोप न हुआ । रुँत्व विसर्ग हो कर—'प्रधीः' ।
'प्रधी + औ' इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ के प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च
(१६२) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त
होने पर अग्रिम अपवादसूत्र प्राप्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियँङुवँङौ। ६।४।७७॥
श्नुप्रत्ययान्तस्य, इवर्णोवर्णान्तस्य धातोः, भ्रू इत्यस्य च, अङ्गस्य
इयँङुवँङौ स्तोऽजादौ प्रत्यये परे । इति प्राप्ते—
अर्थः—अजादि प्रत्यय परे होने पर श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त
धातु रूप तथा भ्रू रूप अङ्गों के स्थान पर इयङ् और उवङ् आदेश होते हैं ।
व्याख्या—अचि ।७।१। श्नु-धातु-भ्रुवाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य
इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । य्वोः ।६।२। इयँङुवँङौ ।१।२। 'श्नु,
धातु, भ्रू' ये सब अङ्ग होने चाहियें । अङ्गसञ्ज्ञा प्रत्यय परे होने पर ही हुआ करती
है, अतः 'प्रत्यये' पद का अध्याहार हो 'अचि' का विशेषण बना कर यस्मिन्विधिस्त-
दादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि करने पर 'अजादौ प्रत्यये' बन जायेगा । श्नुश्च धातु-
श्च भ्रूश्च—श्नु-धातु-भ्रुवः, तेषाम् = श्नु-धातु-भ्रुवाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'श्नु' यह
प्रत्यय है, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियमानुसार तदन्त अर्थात् श्नुप्रत्ययान्त का ही
ग्रहण होगा । 'भ्रू' यह शब्द है, भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरूञ्च डूंः
(उणा० २२७) द्वारा डू प्रत्यय करने पर इस की निष्पत्ति होती है । इस का विशेष
वर्णन आगे अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरण में किया जायेगा । इश्च उश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्वः,
तयोः = य्वोः । यह 'श्नु-धातु-भ्रुवाम्' पद के 'धातु' अंश का ही विशेषण है, क्योंकि
श्नु और भ्रू के सदा उवर्णान्त होने से उन के साथ इस का सम्बन्ध नहीं हो सकता ।
'धातु' अंश का विशेषण होने से 'य्वोः' से तदन्तविधि हो कर 'इवर्णान्तस्य उवर्णान्तस्य
च धातोः' ऐसा बन जाता है । इस प्रकार समुचित अर्थ यह होता है—(अचि) अजादि
प्रत्यय परे होने पर (श्नु-धातु-भ्रुवाम्) श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त

२५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

धातु रूप तथा भ्रू शब्द (अङ्गानाम्) इन अङ्गा के स्थान पर (इयङ्हुवेंडौ) इयङ्
और उवँङ् आदेश होते हैं।
ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा ये आदेश अङ्ग के अन्त्य इकार उकार के स्थान पर
होते हैं। स्थानेऽन्तरतम (१७) से इवर्ण को इयङ् तथा उवर्ण को उवँङ् आदेश होगा।
इन आदेशों में ङ् की इत्संज्ञा हो जाती है इय्, उव् शेष रहते हैं।
'प्रधी+औ' यहाँ औ' यह अजादि प्रत्यय परे है, प्रधी में 'धी' इवर्णान्त
धातु है। [यद्यपि धातु 'ध्यै' था तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार इसे भी
धातु मान लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि कृत्प्रत्ययान्त हो जाने से यह प्राति-
पदिक हो गया है, तथापि णिब्वन्ता धातुत्वं न जहति इस से इस का धातुत्व भी अक्षत
रह जाता है।] तो प्रकृतसूत्र से इस के ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश प्राप्त होता
है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध कर यण् विधान करता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२००) एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ।६।४।८२॥
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णः, तदन्तो यो धातुः, तदन्त-
स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अजादौ प्रत्यये परे । प्रध्यौ । प्रध्यम् । प्रध्यः ।
प्रध्यि । शेषं पपीवत् ॥
अर्थ —धातु का अवयव जो संयोग वह पूर्व में नहीं है जिस इवर्ण के, वह
इवर्ण है अन्त में जिस धातु के, वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेक अचो
वाला अङ्ग, उस के स्थान पर यण् हो अजादि प्रत्यय परे होने पर।
व्याख्या—एः ।६।१। अनेकाचः ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। यण् ।१।१।
(इणो यण् से) । धातोः ।६।१। (अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० से। श्नु और भ्रू का—
उवर्णान्त होने से 'एः' के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता अतः उन का अनुवर्त्तन नहीं
किया जाता) । अचि ।७।१। (अचि श्नुधातु० से) । 'एः' यह षष्ठी का एकवचन है।
इस का अर्थ है—'इवर्णस्य'। 'धातोः' पद आवर्तित [दो बार पढ़ा हुआ] किया जाता
है। एक 'धातोः' पद 'एः' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'एः' से तदन्तविधि होकर
'इवर्णान्तस्य धातोः' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातोः' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के
'संयोग' अंश के साथ अन्वित होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'एर्धातोः'
(इवर्णान्तस्य धातोः) यह विशेषण है। अतः विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'इवर्णा-
न्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ होता है। 'अनेकाचः' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है।
अनेके अचो यस्य यस्मिन् वा सोऽनेकाच्, तस्य = अनेकाचः, बहुव्रीहिसमास। 'असंयोग-
पूर्वस्य' का 'एः' के साथ सामानाधिकरण्य है। नास्ति संयोगः पूर्वो यस्य सोऽसंयोगपूर्वः,
नञ्बहुव्रीहिसमास। इस प्रकार यह अर्थ हुआ—(धातोः, असंयोगपूर्वस्य) धातु का
अवयव संयोग जिस के पूर्व में नहीं ऐसा (एः) जो इवर्ण, वह है अन्त में जिस में ऐसी
(धातोः) जो धातु, वह है अन्त में जिस के ऐसा (अनेकाचः) जो अनेक अचो वाला
(अङ्गस्य) अङ्ग, उस के स्थान पर (यण्) यण् आदेश होता है (अचि) अजादि

अजन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५१
प्रत्यय परे हो तो। तात्पर्य—अजादि प्रत्यय परे होने पर उस अनेकाच् अङ्ग को यण्
आदेश होता है, जिस के अन्त में इवर्णान्त धातु है। परन्तु धातु के इवर्ण से पूर्व धातु
का अवयव संयोग नहीं होना चाहिये ।
'प्रधी+औ' यहां 'धी' इवर्णान्त धातु है। इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई
अवयव संयोगयुक्त नहीं। [यद्यपि 'प्र्' संयोग है, तथापि वह धातु का अवयव नहीं,
उपसर्ग का है। किञ्च वह इवर्ण से पूर्व भी नहीं है, अकार और धकार का व्यवधान
पड़ता है ।] यह धातु जिस के अन्त में है ऐसा अनेकाच् अङ्ग 'प्रधी' है। इस से परे
'औ' यह अजादि प्रत्यय वर्त्तमान है। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा प्रकृतसूत्रे से
ईकार को यण्=यकार आदेश हो कर—प्रध्य्+औ='प्रध्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है।
प्रधी+अस् (जस्) । यहां सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से प्राप्त यण् का
प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से वाध हो जाता है। अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से
इस का भी निषेध हो कर पुनः पूर्ववत् यण् की प्राप्ति होने लगती है। इस पर अचि
श्नु० (१६६) से इस का वाध हो कर इयङ् की प्रसक्ति होती है। पर अन्त में एरने-
काचः० (२००) से इसे भी बाधित कर यण् हो जाता है—प्रध्य्+अस् । अब सकार
को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है।
'प्रधी+अम्' यहां भी सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से यण्, उस का वाध
कर अमि पूर्वः(१३५) से पूर्वरूप प्राप्त था। उस का परत्व के कारण अचि श्नुधातु०
(१६६) सूत्र वाध कर लेता है। तब उस के भी अपवाद एरनेकाचः० (२००) से
यण् हो कर 'प्रध्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
'प्रधी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस का परत्व के
कारण अचि श्नुधातु० (१६६) सूत्र वाध कर लेता है। पुनः एरनेकाचः० (२००) से
यण् करने पर सकार को रुँत्व विसर्ग हो 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि
यहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार भी
नहीं होता।
'प्रधी+आ' (टा) यहां इयँङ् प्राप्त होने पर एरनेकाचः० (२००) से यण्
हो कर 'प्रध्या' प्रयोग सिद्ध होता है।
तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में—'प्रधीभ्याम्' ।
तृतीया के बहुवचन में—'प्रधीभिः'।
'प्रधी+ए' (ङे) यहां भी पूर्ववत् इयँङ् का वाध कर यण् करने से—'प्रध्ये'।
चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में—'प्रधीभ्यः'।
'प्रधी+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी इयँङ् का वाध कर एरनेकाचः० (२००)
से यण् हो जाता है—'प्रध्यः'। इसी प्रकार ओस् में—'प्रध्योः'।
'प्रधी+आम्' यहां नदीसञ्ज्ञा न होने से नुट् प्राप्त नहीं होता। तब एरने-
काचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्याम्' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि एरने-

२५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
काच० (२००) और ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) के विप्रतिषेध की अवस्था में परत्व
के कारण नुट् (७।१।५४) ही होता है यण् (६।४।८२) नहीं।
'प्रधी+इ' (ङि) यहां सवर्णदीर्घ का बाध कर इयङ् प्राप्त होता है। पुनः
उस का भी बाध कर एरनेकाच० (२००) से यण् करने पर 'प्रध्यि' रूप सिद्ध होता है।
प्रधी+सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्यययो (१५०) से मूर्धन्य हो—'प्रधीषु'।
सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन के एकवचन में नद्यन्त न होने से अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व
(१६५) द्वारा ह्रस्व नहीं होता—हे प्रधी' । 'प्रधी' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्यः प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः
द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,, प्रध्योः प्रध्याम्
तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्यि ,, प्रधीषु
च० प्रध्ये ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधी' हे प्रध्यौ' हे प्रध्य'
वक्तव्य—ऊपर कहा गया 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् धातु से क्विप्
प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस प्रकार से निष्पन्न हुआ 'प्रधी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग
नहीं होता। यह पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग सब प्रकार का हो सकता है।
अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से इस की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। यदि प्रथम ध्यै
चिन्तायाम् धातु से क्विप् प्रत्यय कर के 'धी' शब्द बना दिया जावे तो वह नित्यस्त्री-
लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञक होगा। तब प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी' इस प्रकार समस्त
किया हुआ पुंल्लिङ्ग 'प्रधी' शब्द भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) से नदीसञ्ज्ञक
हो जायेगा। तब आट्, नुट् आदि नदीकार्य भी होंगे।
प्रधी (प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी । उत्तम बुद्धि वाला)
प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्या† प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः
द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,,† प्रध्योः प्रधीनाम्‡
तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्याम्* ,, प्रधीषु
च० प्रध्यै† ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधि' @ हे प्रध्यौ' हे प्रध्य'
†आण्नद्या (१६६) आटश्च (१६७), एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य (२००)।
‡यहां एरनेकाच० (२००) में यण् तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट्
का विप्रतिषेध होने पर परकार्य नुट् हो जाता है।
*यहां ङेराम्० (१६८) में ङि को आम्, आण्नद्या (१६६) से आट् आगम,
आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा एरनेकाच० (२००) में यण् हो जाता है।
@अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व (१६५), एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४)।
शङ्का—नित्यस्त्रीलिङ्ग 'धी' शब्द में अचि श्नु० (१६६) सूत्र द्वारा इयङ्
हो— धियौ, धिय' आदि रूप बना करते हैं। परन्तु जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के
स्थान पर इयङ् उवङ् हों वहां प्रथम नेयङ्उवङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से नदी
सञ्ज्ञा का सर्वथा निषेध हो जाता है, तत्पश्चात् ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित्

अजन्त-पुलिङ्ग-प्रकरणम् २५३
विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में नदीसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता
है; जैसा कि अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में 'श्री' शब्द पर होता है । तो इस प्रकार 'प्रकृष्टा
धीर्यस्य' इस विग्रह वाले प्रधी शब्द में भी आप को वैसा करना चाहिये था । आप के
वैसा न करने का क्या कारण है ?
समाधान - नेयैङुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र वहां पर निषेध करता है
जहां इयङ्, उवङ् प्राप्त नही किन्तु साक्षात् हुआ करते हैं । अत एव 'इयँङुवँङोरस्त्री'
न कह कर सूत्र में 'स्थान' शब्द का ग्रहण किया है। 'प्रधी' शब्द मे प्रत्यक्ष यण् होता
है इयङ् नही अतः नदीत्व का निषेध न होगा । ङिति ह्रस्वश्च (२२२) तथा वाऽऽमि
(२३०) सूत्रों मे 'इयँङुवँङ्स्थानौ' की अनुवृत्ति आती है अतः वे भी प्रवृत्त न होगे ।
[लघु०] एवं ग्रामणीः । ङौ तु ग्रामण्याम् ॥
व्याख्या—ग्रामं नयतीति = ग्रामणीः । 'ग्राम'कर्मोपपद णीञ् प्रापणे (भ्वा०
उ०) धातु से कर्त्ता मे क्विप् च (८०२) सूत्र से क्विप् प्रत्यय करने पर 'ग्रामणी'
(ग्राम का नेता, नम्बरदार) शब्द निष्पन्न होता है । अग्रग्रामाभ्यां नयेतेर्णो वाच्यः
वार्तिक से यहां नकार को णकार हुआ है ।
'ग्रामणी' शब्द मे 'नी' इवर्णान्त धातु है । इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई
अवयव संयोगयुक्त नही । तदन्त 'ग्रामणी' शब्द अनेकाच् अङ्ग भी है । अतः अजादि
प्रत्ययों में सर्वत्र एरनेकाचः० (२००) से यण् हो जायेगा । अचि श्नु० (१६६) से
इयङ् न होगा । 'ग्रामणी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नही, किन्तु सब लिङ्गों में साधारण
है; अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा न होगी । तब आट्, नुट् आदि
नदीकार्य न होगे, सम्बुद्धि में ह्रस्व भी न हो सकेगा । समग्र रूपमाला यथा—
प्र० ग्रामणीः* ग्रामण्यौ ग्रामण्यः प० ग्रामण्यः ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभ्यः
द्वि० ग्रामण्यम् " " ष० " ग्रामण्योः ग्रामण्याम्
तृ० ग्रामण्या ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभिः स० ग्रामण्याम्† " ग्रामणीषु
च० ग्रामण्ये " ग्रामणीभ्यः सं० हे ग्रामणीः! हे ग्रामण्यौ! हे ग्रामण्यः!
*हल्ङन्त न होने से सुंलोप नही होता ।
†डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र में 'नी' के साक्षात् निर्देश के कारण 'ङि'
को 'आम्' आदेश हो जाता है । नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् का आगम नही होता ।
इसी प्रकार 'अग्रणी' (आगे जाने वाला) तथा 'सेनानी' (सेनापति) शब्दों
के रूप बनते है ।
अब एरनेकाचः० को अधिक स्पष्ट करने के लिये प्रत्युदाहरण दर्शाते है—
[लघु०] अनेकाचः किम्—नीः, नियौ, नियः । अमि शसि च परत्वाद् इयङ्—
नियम्, नियः । ङेराम्—नियाम् ॥
व्याख्या—एरनेकाचः० (२००) सूत्र में कहा गया है कि 'अङ्ग अनेकाच् हो'
यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'नी' शब्द में यण् का न होना । 'नी' (णीञ् प्रापणे
धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'नी' शब्द निष्पन्न होता है । इस का अर्थ है—ले जाने

२५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
वाला = नेता ।) नीशब्द एकाच् है अनेकाच् नहीं, अतः इस में यण् आदेश न हो सकेगा,
अचि श्नु० (१६६) सूत्र से इयङ् हो जायेगा । इस की समग्र रूपमाला यथा—
प्र० नी † नियौ नियः | प० नियः * नीभ्याम् नीभ्यः
द्वि० नियम् ‡ ,, ,, ‡ | ष० ,, * नियोः नियाम् *
तृ० निया नीभ्याम् नीभिः | स० नियाम् @ ,, नीषु
च० निये * ,, नीभ्यः | स० हे नी ! √ हे नियौ ! हे नियः !
†ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता ।
‡अम् और शस् में क्रमशः अमि पूर्वं (१३५) तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६)
सूत्र को परत्व के कारण अचि श्नु० (१६६) सूत्र बाध कर लेता है । इसी प्रकार
एरनेकाच० (२००) द्वारा विहित यण् भी इन का बाधक समझ लेना चाहिये ।
*सब लिङ्गों में साधारण होने से 'नी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती । अतः
आट् आदि नदीकार्य नहीं होते ।
@डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) में 'नी' के विशेष उल्लेख के कारण ङि को
आम् हो जाता है ।
√नदीत्व न होने के कारण अम्बार्थ० (१६५) द्वारा ह्रस्व न होगा ।
[लघु०] असंयोगपूर्वस्य किम् ? सुधियौ, यवक्रियौ ॥
व्याख्या—एरनेकाच० (२००) सूत्र में कहा गया था कि धातु के इवर्ण से
पूर्वं संयोग नहीं होना चाहिये—यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'सुधियौ' और
'यवक्रियौ' में यण् का न होना । इन स्थानों पर धातु के इवर्ण से पूर्वं संयोग है अतः यण्
न हुआ, तब इयङ् हो कर रूप बना ।
[ध्यान रहे कि संयोग भी जब धातु का अवयव होगा, तभी यण् का निषेध
होगा । 'सुधी' आदि शब्दों में संयोग धातु का अवयव है । 'उन्नी' शब्द में संयोग
धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार को मिला कर बना है अतः निषेध न होगा
यण् हो जायेगा । 'उन्यौ, उन्यः' आदि रूप बनेंगे ।]
सुष्ठु श्रयतीति सुश्रीः (अच्छी तरह आश्रय करने वाला) । सुपूर्वक श्रिञ्
सेवायाम् (भ्वा० उ०) धातु से विब्वेञ्चिप्रादिभ्य० (वा० ४८) इस वार्तिक से क्विप्
प्रत्यय और दीर्घ करने पर 'सुश्री' शब्द निष्पन्न होता है । तीनों लिङ्गों में साधारण
होने के कारण इस की नदीसञ्ज्ञा न होगी । 'सुश्री' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सुश्रीः * सुश्रियौ सुश्रियः | प० सुश्रियः † सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः
द्वि० सुश्रियम् ,, ,, | ष० ,, † सुश्रियोः सुश्रियाम् †
तृ० सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः | स० सुश्रियि ‡ ,, सुश्रीषु
च० सुश्रिये † ,, सुश्रीभ्यः | स० हे सुश्री ! हे सुश्रियौ ! हे सुश्रियः !
*अङ्यन्त होने से सुँलोप नहीं होता ।
†नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि नदीकार्य नहीं होते ।
‡यहाँ न तो नदीसञ्ज्ञा है और न ही नीशब्द, अतः ङि को आम् न होगा ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५५
वक्तव्य—सु=शोभना श्रीर्यस्य स सुश्रीः। इस प्रकार विग्रह मानने पर भी
'सुश्री' शब्दों के रूपों में कोई अन्तर नहीं आता। प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७)
वार्त्तिक की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर
इयङ्स्थानी होने के कारण नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से निषेध हो जाता है।
इसी प्रकार आगे 'शुद्धधी, सुधी' आदि शब्दों में भी समझ लेना चाहिये। यहां ङिति
ह्रस्वश्च (२२२) से ङित् विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में वैकल्पिक
नदीत्व की भी आशङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिस स्त्रीलिङ्ग अङ्ग से ङित् वा
आम् का विधान हो उस की उन सूत्रों से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा की जाती है (देखो—
शेखर में ङिति ह्रस्वश्च)। यहां ङित् और आम् का विधान तो सुश्री, सुधी आदि
पुंल्लिङ्ग शब्दों से किया गया है और नदीसञ्ज्ञा उन के अवयव श्री, धी आदि शब्दों
की करनी है। अतः नदीसञ्ज्ञा सर्वथा न होगी। लघुकौमुदी और मध्यकौमुदी के
विवृत्तिकार श्री पण्डित विश्वनाथ जी शास्त्री तथा लघुकौमुदी के हिन्दी व्याख्याकार
श्री पण्डित श्रीधरानन्द जी शास्त्री को 'सुश्री' शब्द पर महती भ्रान्ति हो गयी है। वे
यहां नदीसञ्ज्ञा करना बतलाते हैं। यदि वैसा हो तो सुधी आदि शब्दों में भी नदीत्व
प्रसक्त होगा, जो उन के मत में भी अनिष्ट है। यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) के महा-
भाष्य पर श्रियै अतिश्रियै ब्राह्मण्यै, क्व मा भूत्—श्रिये अतिश्रिये ब्राह्मणाय ये वचन
यहां विशेष मननीय हैं।
इसी प्रकार 'यवक्री' (जौ खरीदने वाला) शब्द के रूप होते हैं। यह भी
'असंयोगपूर्वस्य' का प्रत्युदाहरण है। यवान् क्रीणातीति—यवक्रीः, यवकर्मोपपदात्
डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये (क्रया० उ०) इति धातोः क्विँप् च (८०२) इति क्विँप्प्रत्ययः।
इस की समग्र रूपमाला यथा—
प्र० यवक्रीः यवक्रियौ यवक्रियः | प० यवक्रियः यवक्रीभ्याम् यवक्रीभ्यः
द्वि० यवक्रियम् " " | ष० " यवक्रियोः यवक्रियाम्
तृ० यवक्रिया यवक्रीभ्याम् यवक्रीभिः | स० यवक्रियि " यवक्रीषु
च० यवक्रिये " यवक्रीभ्यः | सं० हेयवक्रीः! हेयवक्रियौ! हेयवक्रियः!
इस शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सुश्री' शब्द के समान होती है। सर्वत्र अजादि
प्रत्ययों में इयङ् हो जाता है। नदीसञ्ज्ञा कहीं नहीं होती।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२०१) गतिश्च ।१।४।५६॥
प्रादयः क्रियायोगे गतिसञ्ज्ञाः स्युः ॥
अर्थः—क्रियायोग में प्रादि शब्द गतिसञ्ज्ञक होते हैं।
व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (प्रादयः से)। क्रियायोगे ।७।१। (उपसर्गाः क्रिया-
योगे से)। गतिः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(प्रादयः) प्र आदि बाईस शब्द
(क्रियायोगे) क्रिया के योग में (गतिः) गतिसञ्ज्ञक (च) भी होते हैं।
यह सूत्र एकसञ्ज्ञाधिकार (१६६) के अन्तर्गत पढ़ा गया है। इस अधिकार में
उपसर्गाः क्रियायोगे (३५) सूत्र द्वारा क्रियायोग में प्रादियों की उपसर्गसञ्ज्ञा कह आये हैं।