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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 633 में से

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पृष्ठ 251

२३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
विशेष—'बहुपति' (ईषदून पति) शब्द में 'बहुच्' प्रत्यय है, जो कि—विभाषा
सुपो बहुच् पुरस्तात् (५।३।६८) इस सूत्र से प्रकृति मे पूर्व होगा। उस का उच्चारण
'पति' की तरह होगा। यदि 'बहु' शब्द अभीष्ट हो, तब 'भूपति' की तरह होगा।
प्रश्न—सीतायाः पतये नमः इत्यादि स्थानों पर समास न होने से कैसे घिसञ्ज्ञा
कर दी गई है ?
उत्तर—यहां पर छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति इस उक्ति के अनुसार षष्ठीयुक्त-
श्छन्दसि वा (१।४।६) से घिसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये। अथवा—तत्पुरुषे कृति बहु-
लम् (८१२) सूत्र से बहुलग्रहणसामर्थ्यात् यहां षष्ठी का समास में अलुक् जान कर
घिसञ्ज्ञा समझनी चाहिये।
[लघु०] कतिशब्दो नित्य बहुवचनान्तः ॥
अर्थ:—'कति' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है।
व्याख्या—'किम्' शब्द से 'डति' प्रत्यय करने पर कति शब्द सिद्ध होता है।
इस का प्रयोग सदा बहुवचन में ही होता है, एकवचन और द्विवचन में नहीं। क्योंकि
'कति' (कितने) शब्द बहुत्व का ही वाचक है एक दो का नहीं।
'कति + शस्' (जस्) इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१८६) बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या ।१।१।२३॥
अर्थ—बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा डतिप्रत्ययान्त शब्द 'सङ्ख्या'
सञ्ज्ञक होते हैं।
व्याख्या—बहु-गण-वतुं-डति ।१।१। सङ्ख्या ।१।१। समासः—बहुश्च गणश्च
वतुंश्च डतिश्च = बहु-गण-वतुं-डति, समाहारद्वन्द्वः । 'वतुँ' और 'डति' प्रत्यय हैं, अतः
प्रत्ययग्रहणे तदन्त-ग्रहणम् से तदन्त शब्दों का ही ग्रहण होगा। केवल प्रत्ययों की सञ्ज्ञा
करना निष्प्रयोजन होने से सञ्ज्ञाविधौ प्रत्यय-ग्रहणे तदन्त-ग्रहणं नास्ति यह निषेध
प्रवृत्त न होगा। अर्थ—(बहु-गण-वतुं-डति) बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा
डतिप्रत्ययान्त शब्द (सङ्ख्या) सङ्ख्या सञ्ज्ञक होते हैं।
'कति + जस्' यहां प्रकृतसूत्र से डतिप्रत्ययान्त 'कति' शब्द की सङ्ख्या सञ्ज्ञा
हो जाती है। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१८७) डति च ।१।१।२४॥
डत्यन्ता सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञा स्यात् ॥
अर्थ:—डति-प्रत्ययान्त सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञक हो।
व्याख्या—डति ।१।१। च इत्यव्ययपदम् ।१।१। (बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या
से) । षट् ।१।१। (ष्णान्ता षट् से)। अर्थ—(डति) डतिप्रत्ययान्त (सङ्ख्या) सङ्-
ख्यासञ्ज्ञक शब्द (षट्) षट् सञ्ज्ञक होते हैं।
'कति + जस्' यहां कतिशब्द डतिप्रत्ययान्त है और साथ ही सङ्ख्यासञ्ज्ञक
भी है; अतः इस की षट्सञ्ज्ञा हो जाती है। आकडारादेका संज्ञा (१६६) इस