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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 633 में से

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पृष्ठ 256

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४१
—'त्रय + आम्' । अब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, नामि (१४६)
से दीर्घ तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व करने पर 'त्रयाणाम्' रूप सिद्ध होता है।
'त्रि + सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्ययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर
'त्रिषु' रूप सिद्ध हुआ। 'त्रि' शब्द की समग्र रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० त्रयः | प० ० ० त्रिभ्यः
द्वि० ० ० त्रीन् | ष० ० ० त्रयाणाम्
तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु
च० ० ० त्रिभ्यः | सं० ० ० हे त्रयः !
बहुव्रीहिसमास में अन्यपद प्रधान रहता है, समस्यमान पद गौण अर्थात्
अप्रधान रहते हैं। यह हम पीछे (१३३) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। जब बहुव्रीहि-
समास में 'त्रि' शब्द गौण होता है तब भी इस सूत्र से उस के स्थान पर 'त्रय' आदेश
हो जाता है। सूत्र में 'त्रेः' यहां एकवचन करना ही इस में प्रमाण है; अन्यथा अष्टाभ्य
औश् (३००) की तरह यहां भी त्रेस्त्रयः की बजाय 'त्रयाणां त्रयः' इस प्रकार का
सूत्र बनाते।
प्रियाः त्रयः यस्य सः=प्रियत्रिः, बहुव्रीहिसमासः । जिसे तीन प्रिय हों उसे
'प्रियत्रि' कहते हैं। 'प्रियत्रि+आम्' इस स्थिति में त्रि के स्थान पर त्रय आदेश हो—
प्रियत्रय+आम्। तब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, ह्रस्वान्त अङ्ग को
दीर्घ तथा नकार को णकार हो कर 'प्रियत्रयाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अन्य
विभक्तियों में रूप 'हरि' की तरह होते हैं। 'प्रियत्रि' की रूपमाला यथा—
प्र० प्रियत्रिः प्रियत्री प्रियत्रयः | प० प्रियत्रेः प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभ्यः
द्वि० प्रियत्रिम् ,, प्रियत्रीन् | ष० ,, प्रियत्र्योः प्रियत्रयाणाम्
तृ० प्रियत्रिणा प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभिः | स० प्रियत्रौ ,, प्रियत्रिषु
च० प्रियत्रये ,, प्रियत्रिभ्यः | सं० हे प्रियत्रे! हे प्रियत्री! हे प्रियत्रयः!
अब सङ्ख्यावाचक द्वि(दो) शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६३) त्यदादीनामः ।७।२।१०२॥
एषामकारो विभक्तौ । द्विपर्यन्तानामेवेष्टिः । द्वौ २ । द्वाभ्याम् ३ ।
द्वयोः २ ॥
अर्थः—विभक्ति परे रहने पर त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर अकार आदेश
हो । द्विपर्यन्तानाम् —'द्वि' तक ही त्यदादियों को अकार करना इष्ट है।
व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। अः ।१।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ
से) । समासः—त्यद्-शब्द आदिर्येषान्ते त्यदायः, तद्गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि-समासः ।
सर्वादिगण के अन्तर्गत त्यदादिगण आया है। यह त्यद् शब्द से आरम्भ होता है। इस
की अवधि भाष्यकार ने 'द्वि' शब्द पर्यन्त नियत की है। इस प्रकार इस गण में 'त्यद्,
ल० प्र० (१६)