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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 633 में से

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पृष्ठ 257

२४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि' ये आठ शब्द आते हैं। अर्थ—(विभक्तौ)
विभक्ति परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर (अ) अकार
आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ही अकार आदेश होगा।
'द्वि' शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त होता है। द्विवचन
प्रत्यय आने पर सब विभक्तियों में प्रथम प्रकृतसूत्र द्वारा इकार को अकार हो 'द्व' बन
जाता है। तब रामशब्द के समान प्रक्रिया होकर रूप सिद्ध होते हैं। द्विशब्द की सम्पूर्ण
रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० द्वौ* ० | प० ० द्वाभ्याम् ०
द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयो ‡ ०
तृ० ० द्वाभ्याम्† ० | स० ० ,, ०
च० ० ,, ० | त्यदादियों का प्राय सम्बोधन नहीं होता।

  • 'द्वि + औ' यहां अकार अन्तादेश हो वृद्धि हो जाती है।
    † 'द्वि + भ्याम्' यहां अकार अन्तादेश हो सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है।
    ‡ 'द्वि + ओस्' यहां अकार अन्तादेश हो ओसि च (१४७) से एकार तथा एचोऽय-
    वायाव (२२) से एकार को अय् आदेश हो जाता है।

अभ्यास (२६)
(१) अव्ययों से अतिरिक्त ऐसे कौन से शब्द हैं जो तीनों लिङ्गों में सरूप
अर्थात् समान रूप वाले होते हैं ?
(२) ऐसे किसी शब्द का उल्लेख करें जिस की सुबन्तप्रक्रिया आम् को छोड़
अन्यत्र हरिशब्दवत् होती हो।
(३) सीतायाः पतये नमः यहां समासाभाव में भी कैसे घिसञ्ज्ञा हो कर
तज्जन्य कार्य हो जाते हैं ?
(४) निम्नलिखित सञ्ज्ञाओं में कौन सी सञ्ज्ञा प्रकृति की, और कौन सी
प्रत्यय की होती है ? ससूत्र यथाधीतं टिप्पणं करें—
१ अपृक्त। २ अङ्ग। ३. आट्। ४ उपधा। ५ सर्वनाम। ६. सङ्ख्या।
७ षट्। ८ घि। ६ सर्वनामस्थान। १० विभक्ति। ११ भ। १२
पद। १३ प्रातिपदिक। १४ सम्बुद्धि। १५ बहुवचन।
(५) (क) न लुमताङ्गस्य सूत्र में 'अङ्गस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(ख) शेषो घ्यसखि सूत्र में 'शेष' पद का ग्रहण क्यों किया गया है ?
(ग) हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० सूत्र में 'दीर्घात्' पद के ग्रहण का क्या
प्रयोजन है ?
(घ) अतिदेश किसे कहते हैं ? इस का क्या लाभ होता है ?
(ङ) प्रत्यय का लुक् होने पर भी क्या प्रत्ययलक्षण हुआ करता है ?